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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2762
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- वस्तुनिष्ठ परीक्षण निर्माण के लिये विभिन्न पदों का वर्णन कीजिए।

उत्तर-

वस्तुनिष्ठ परीक्षण निर्माण के विभिन्न पद
(Various Steps for Objective Type Test Construction)

वाणिज्य में वस्तुनिष्ठ परीक्षण लिए अनुसरण किए जाने वाले पद निम्नलिखित हैं-

1, प्ररचना बनाना (Preparing a Design) - वस्तुनिष्ठ परीक्षण की प्ररचना उस रूपरेखा को उपलब्ध कराती है जिसमें लक्ष्यों, प्रश्नों, विषय-सामग्री, कठिनता स्तर, खण्ड योजना आदि का विवरण होता है। प्ररचना का विकास शिक्षकों, छात्रों, परीक्षकों, विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करके किया जाता है। प्ररचना को पूर्णतया तैयार करने के बाद इसे परीक्षण निर्माता ( प्रश्नपत्र बनाने वाला) को दिया जाता है। परीक्षण का निर्माण करते समय समुचित प्ररचना के अनुरूप निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है-

(i) परीक्षण की रूपरेखा पूर्व-निर्धारित शिक्षण लक्ष्यों के अनुसार-होना।

(ii) प्रश्न निर्धारित योग्यता की जाँच करने वाले होना।

(iii) पाठ्यवस्तु को सुगम इकाइयों में पुनर्गठित करके अंकों का आवंटन करना।

(iv) बड़े अध्यायों की उपेक्षा न करना।

(v) विभिन्न प्रकार के वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को आनुपातिक महत्व देना तथा इसी के अनुसार-प्रश्नों का आवंटन करना।

(vi) वस्तुनिष्ठ परीक्षण के निर्माण में परीक्षण निर्माता को परीक्षार्थी की क्षमता को ध्यान में रखना।

(vii) माध्यमिक स्तर पर 15% आसान, 70% सामान्य व 15% कठिन प्रश्न रखना।

2. ब्लू प्रिन्ट बनाना (Preparation of Blue Print) - वस्तुनिष्ठ परीक्षण की संरचना बनाने हेतु ब्लू प्रिन्ट अति महत्वपूर्ण होता है। शिक्षण लक्ष्यों एवं पाठ्यवस्तु में आनुपातिक बलों का निर्वाह करते हुए समुचित रूप से विभाजन करके बहुविकल्पीय रिक्त स्थान, सत्य / असत्य आदि की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए। वस्तुनिष्ठ परीक्षण हेतु ब्लू प्रिन्ट के अनुसार-उपयुक्त प्रश्नों का चयन करना चाहिए, जिसका प्रारूप निम्नलिखित है-

 

 

ब्लू प्रिन्ट तैयार करना

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टिप्पणी- (i) कोष्ठक में प्रश्नों की संख्या तथा बाहर कुल अंक होंगे।
(ii) विकल्पों को a, b, c व d द्वारा व्यक्त करें।
(iii) बहु. वि. - बहुविकल्पीय

3. वस्तुनिष्ठ प्रश्न लेखन तथा परीक्षण तैयार करना (Writing of Questions and Question Paper) -  वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की रचना ब्लू प्रिन्ट के अनुरूप करनी होती है। यदि शिक्षण लक्ष्यों पर आधारित किसी प्रश्न बैंक में दिये हों तो वहाँ से चयन कर सकते हैं। प्रश्न का चयन करते समय परीक्षण निर्माता को निम्नलिखित बातें देखनी चाहिए-

(i) प्रश्न का अपेक्षित रूप का होना।
(ii) प्रश्न का अपेक्षित प्रकरण से सम्बन्धित होना।
(iii) प्रश्न का अपेक्षित शिक्षण लक्ष्य की पूर्ति करने वाला होना।
(iv) प्रश्न का अपेक्षित क्लिष्टता वाला होना।

4. भाषा (Language) - वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की भाषा का सही एवं स्पष्ट होना आवश्यक होता है। कठिन प्रश्नों का प्रयोग करने से बचना चाहिए। प्रश्नों की भाषा ऐसी हो जिससे विद्यार्थी समान भाव निकाले।प्रश्नों में प्रयुक्त शब्द मूल अर्थ से भिन्न नहीं होने चाहिए।

5. अंक विभाजन एवं अंकन के लिये कुंजी तैयार करना (Preparing Scoring Key and Marking Scheme) - मूल्याँकन में अंकन हेतु उत्तर- कुंजी बनानी चाहिए। इससे अंकन में विविधता से बचा जा सकेगा।

6. विश्लेषण करना ( Analysis) - परीक्षण के विभिन्न पक्षों पर समुचित नियंत्रण करने हेतु प्रश्नों का क्रमवार विश्लेषण करना ठीक रहता है। विश्लेषण में निम्नलिखित को देखा जाता है-

(i) प्रश्नों के शिक्षण लक्ष्यों का परीक्षण 
(ii) पाठ्यवस्तु के अनुसार-परीक्षण की व्यापकता का स्तर।
(iii) प्रश्नों की प्रकृति तथा क्लिष्टता।
(iv) उत्तर- देने में लगने वाला समय।
(v) परीक्षण के निर्माण की ब्लू प्रिन्ट में निर्धारित विशिष्टताओं से अनुरूपता।

 

क्रमवार विश्लेषण

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7. परीक्षण की जाँच (Tryout of the Test) - वस्तुनिष्ठ प्रश्न परीक्षण के मूल प्रारूप की विभिन्न स्तरों पर जाँच की जानी चाहिए। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित की जाँच होती है

(i) परीक्षण के शुरूआती प्रारूप को जाँचना,
(ii) परीक्षण के शुरूआती प्रारूप की अन्तिम जाँच करना।
(iii) परीक्षण का अन्तिम प्रारूप बनाना।

परीक्षण के शुरूआती प्रारूप की जाँच एक न्यादर्श चुनकर की जाती है। इसमें अभीष्ट सुधार व परिवर्तन किया जाता है तथा उपयुक्त प्रश्नों का ही परीक्षण किया जाता है।

परीक्षण के शुरूआती प्रारूप की जाँच के बाद उसकी अन्तिम जाँच के आधार पर प्रश्न चुने जाते हैं व सुधार किया जाता है। इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाता है-

(a) पद विश्लेषण ( पदों का चयन, पाठ काठिन्य एवं पद वैधता पर ध्यान देना )।
(b) पदों का चयन करके उसकी वैधता एवं विश्वसनीयता को बढ़ाना।
(c) पदों के कठिनता स्तर का निर्धारण करना।
(d) परीक्षण पदों की वैधता अथवा विभेदन क्षमता पर विचार करना।

परीक्षण के प्रारम्भिक प्रारूप के मूल्याँकन में परीक्षण प्रशासन की विधि एवं अंकन का भी मूल्याँकन किया जाता है जिसके आधार पर परीक्षण प्रशासकों एवं परीक्षार्थियों हेतु निर्देश, समय - सीमा, अंकन रीति आदि के बारे में तथा सुनिश्चित किए जाते हैं। अपेक्षित अंकन कुंजियाँ भी बना ली जाती हैं।

परीक्षण के मूल्याँकन में परीक्षण पर प्राप्त अंकों का किसी मानकीकृत परीक्षण के अंकों से सह-सम्बन्ध जाना जाता है।

अब परीक्षण का अन्तिम प्रारूप तैयार किया जायेगा तथा कठिनता स्तर व वैधता वाले पदों/ प्रश्नों का चयन होता है।

परीक्षण के प्रमापीकरण के बाद परीक्षण निर्माता द्वारा परीक्षण निर्देशिका बनायी जाती है। इसमें उद्देश्य, माप की जाने वाली योग्यता, अंकन रीतियाँ, परीक्षण वैधता, विश्वसनीयता व प्रमाप दिए जाते हैं। इसकी मदद से कोई भी व्यक्ति परीक्षण की जानकारी कर सकता है।

8. परीक्षण का सम्पादन (Moderation of Test) - उत्तम प्रशासन से परीक्षणों की वैधता एवं विश्वसनीयता रहती है। इसके लिए स्पष्ट निर्देश होने चाहिए। उपयुक्त व्यवस्था के बारे में निम्नलिखित कार्य हो सकते हैं-

(i) परीक्षा पूर्व कार्यों की व्यवस्था देखना जैसे प्रशिक्षित व अनुभवी अध्यापकों द्वारा परीक्षण निर्माण, परीक्षकों की पक्षपातहीनता, परीक्षा कार्यक्रम की घोषणा आदि।

(ii) परीक्षा के समय के कार्यों का प्रबन्ध करना जैसे उचित फर्नीचर व्यवस्था, सम्बन्धित निर्देश, अनुचित सामग्री पर रोक आदि।

(iii) परीक्षा के बाद के कार्य जैसे उत्तर- पुस्तिकाओं का मूल्याँकन, श्रेणियाँ, प्राप्तांक आदि।

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