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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- वाणिज्य शिक्षण में प्रश्नों के दोषपूर्ण रूप का उल्लेख करते हुए, एक अच्छे प्रश्न की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
प्रश्नों के दोषपूर्ण रूप निम्नलिखित हैं-
(i) प्रतिध्वन्यात्मक प्रश्न - जब कथन करने के तुरन्त बाद ही कथन-सामग्री पर प्रश्न पूछे जाते हैं तो ऐसे प्रश्नों को प्रतिध्वन्यात्मक प्रश्नों की संज्ञा दी जाती है। ये प्रश्न इसलिए दोषपूर्ण हैं कि इन प्रश्नों से बालकों की विचार, स्मृति तथा तर्कशक्ति का विकास नहीं होता।
(ii) हाँ अथवा नहीं प्रश्न - इस प्रकार के प्रश्न दोषपूर्ण होते हैं क्योंकि ऐसे प्रश्नों का उत्तर- बालक बिना कुछ सोचे-समझे केवल अनुमान के आधार पर ही दे देते हैं। इससे न तो उनकी जिज्ञासा ही जाग्रत होती है और न उन्हें स्वयं चिन्तन करके अपने मत को निश्चित करने के अवसर मिलते हैं।
(iii) इलिप्टिकल प्रश्न - इस प्रकार के प्रश्नों में वाक्य का अन्तिम शब्द छिपा रहता है, जैसे भारत एक (क्या) देश है? ऐसे प्रश्नों में बालक केवल अन्तिम शब्द को बताकर वाक्य पूरा कर देते हैं। ऐसे प्रश्नों से भी बालकों की मानसिक क्रियाओं को कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलता।
(iv) पुष्टिकारक प्रश्न - अध्यापक ऐसे प्रश्नों के अन्त में 'ठीक है न' आदि जोड़कर अपने. कथन की बालकों से पुष्टि करवाता है। पुष्टिकारक प्रश्न बालकों की विचार प्रक्रिया को कुण्ठित कर देते हैं। अतः शिक्षक को ऐसे प्रश्नों का प्रयोग नहीं कराना चाहिए।
(v) आलंकारिक प्रश्न - आलंकारिक प्रश्न वे होते हैं जिन्हें शिक्षण के समय जिस बात पर अधिक बल दिया जाए उसे चुनौती के रूप में पूछा जाए जैसे- क्या परिवार नियोजन के बिना जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि रुक सकती है ? ऐसे प्रश्न भाषा को आलंकारिक बनाते हुए कथन को तो महत्त्वपूर्ण अवश्य बनाते हैं परन्तु बालकों को मानसिक दृष्टि से क्रियाशील नहीं रखते। वैसे भी आलंकारिक प्रश्न केवल नाममात्र के प्रश्न होते हैं। इनके द्वारा बालकों की विचार तथा तर्कशक्ति आदि शक्तियों को विकसित नहीं किया जा सकता।
(vi) सांकेतिक प्रश्न - सांकेतिक प्रश्न उन प्रश्नों को कहते हैं जो बालकों को उत्तर- का संकेत करते हैं। ऐसे प्रश्नों में उनके उत्तर- भी छिपे रहते हैं, जैसे- क्या हरियाणा उत्तर-ी भारत में है ? ऐसे प्रश्नों का उत्तर- देते समय बालकों को तनिक भी सोचना-विचारना नहीं पड़ता। अतः ऐसे प्रश्न पूछने से बालकों को कोई लाभ नहीं होता।
(vii) अनिश्चित, संदिग्ध तथा अप्रसांगिक प्रश्न– उक्त तीनों प्रकार के प्रश्नों का उत्तर- स्पष्ट रूप से नहीं दे पाते। अतः इस प्रकार के सभी प्रश्न दोषपूर्ण माने जाते हैं।
(viii) एक से अधिक उत्तर- देने वाले प्रश्न - कुछ ऐसे प्रश्न भी होते हैं जिनमें एक से अधिक उत्तर- की आवश्यकता पड़ती है, जैसे भारत ने कब तथा क्यों पंचवर्षीय योजनाएँ लागू कीं ? ऐसे प्रश्न दोषपूर्ण माने जाते हैं। शिक्षक को चाहिए कि इस प्रकार के प्रश्नों के दो प्रश्न बनाकर पूछे।
अच्छे प्रश्नों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) उद्देश्य की प्राप्ति - प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनकी सहायता से शिक्षण के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके। इस दृष्टि से शिक्षक का प्रश्न पूछने का उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए। इससे कक्षा में जीवन भी बना रहेगा।
(ii) भाषा - प्रश्नों की भाषा सरल, शुद्ध तथा स्पष्ट होनी चाहिए जिससे कक्षा के सभी बालक उन्हें सरलतापूर्वक समझ जों। इसलिए प्रश्नों में कठिन तथा अस्पष्ट भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में शिक्षक को प्रश्न बनाते समय बालकों के बुद्धि स्तर एवं भाषा की सरलता तथा स्पष्टता को ध्यान में रखना चाहिए।
(iii) नुकीले प्रश्न - ये प्रश्न इतने नुकीले तथा पैने होने चाहिए कि सभी बालक उनका उत्तर- देने के लिए तैयार हो जाएं। इस दृष्टि से प्रश्न न तो बहुत सरल होने चाहिए और न ही बहुत कठिन, अपितु उनकी रचना बालकों की योग्यता तथा उनके मानसिक स्तर को ध्यान में रखते हुए करनी चाहिए।
(iv) विचार उत्तेजक प्रश्न विचार - उत्तेजक होने चाहिए जिससे बालकों की मानसिक क्रियाएं सचेत एवं जाग्रत हो जाएं। दूसरे शब्दों में, प्रश्न ऐसे होने चाहिए कि उनका उत्तर- देने के लिए बालकों को अपनी स्मृति, विचार तथा तर्क आदि मानसिक शक्तियों का प्रयोग करना पड़े।यदि ऐसा नहीं होगा तो बालक प्रश्नों का उत्तर- यान्त्रिक रूप में देते रहेंगे।
(v) संक्षिप्त एवं प्रत्यक्ष प्रश्न - ये प्रश्न संक्षिप्त तथा विषय सम्बन्धित होने चाहिए। दूसरे शब्दों में प्रश्न इतने सरल तथा छोटे होने चाहिए कि उनका उत्तर- छोटे-छोटे वाक्यों में दिया जा सके। इसका यह लाभ होगा कि बालक ऐसे प्रश्नों को ठीक प्रकार से समझ सकेंगे और उनका उत्तर- सरलतापूर्वक दे सकेंगे।
(vi) निश्चित उत्तर - प्रश्नों का अर्थ निश्चित होना चाहिए जिससे कक्षा के सभी बालक उनका ठीक-ठीक उत्तर- दे सकें।
(vii) अच्छा वितरण - प्रश्नों को पाठ के प्रत्येक भाग से पूछना चाहिए। किसी भाग से कम तथा किसी भाग से अधिक प्रश्नों का पूछना किसी भी दशा में अच्छा नहीं कहा जा सकता। ऐसे ही प्रश्नों को समझने तथा उनका उत्तर- देने के लिए कक्षा के सभी बालकों को एक समान अवसर मिलने चाहिए। केवल एक अथवा दो बालकों से ही निरन्तर प्रश्नों के पूछने का फल यह होता है कि कक्षा के शेष बालक पाठ के विकास में सहयोग नहीं देते। वे क्रियाहीन बैठे रहते हैं जो उचित नहीं है।
(viii) क्रमबद्धता - प्रश्न श्रेणीबद्ध एवं क्रमिक होने चाहिए। इससे पाठ का स्वाभाविक विकास होता है।
(ix) आकार तथा कठिनाई स्तर में विभिन्नता - प्रश्नों का आकार तथा कठिनाई स्तर विभिन्न प्रकार का होना चाहिए। यदि ऐसा होगा तो बालक हतोत्साहित हो जाएंगे और कक्षा में नीरसता छा जाएगी।अतः प्रश्नों की रचना में विभिन्नता होनी चाहिए।
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