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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- पाठ्यक्रम से आपका क्या अभिप्राय है? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
अथवा
पाठ्यक्रम से आप क्या समझते है? वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पाठ्यक्रम शिक्षा का एक अभिन्न अंग है, जिसके द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति होती है।शिक्षा के संपूर्ण क्षेत्र में इसका एक विशेष स्थान है, जो उद्देश्यों एवं आदर्शों के निर्धारण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह एक ऐसा साधन हैं, जो छात्र तथा अध्यापक को जोड़ता है। अध्यापक पाठ्यक्रम के माध्यम से छात्रों के मानसिक, शारीरिक, नैतिक, सांस्कृतिक, संवेगात्मक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक विकास के लिए प्रयास करता है। पाठ्यक्रम द्वारा छात्रों को प्रशिक्षण एवं अध्यापकों को दिशा-निर्देश के अवसर प्राप्त होते हैं। पाठ्यक्रम एक प्रकार से अध्यापक के पश्चात् छात्रों के लिए दूसरा पथ प्रदर्शक है। पाठ्यक्रम में विषयों के साथ-साथ स्कूल के सारे कार्यक्रम आते हैं। शिक्षालय में होने वाले समस्त कार्यक्रम का आधार पाङ्ग्यक्रम ही है। यदि पाठ्यक्रम को शिक्षा का प्राण कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। कुछ विद्वानों ने तो इसे शिक्षा एवं विद्यालय का दर्शनशास्त्र भी कहा है। इसके इस महत्त्व को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि इसका नियोजन वैज्ञानिक रीति से किया जाय। ऐसा होने पर ही विद्यालय का कार्य सुचाह्न हृप से चल सकता है। पाठ्यक्रम शिक्षण की निपुणता, उसके उद्देश्यों और सामाजिक आवश्यकताओं के प्रति उसकी उपयुक्तता निर्धारित करता है।
पाठ्यक्रम का शाब्दिक अर्थ - पाश्र्यक्रम के लिए अंग्रेजी में 'करीक्यूलम' शब्द का प्रयोग किया जाता है।'करीक्यूलम' शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द 'क्यूरेरे' से हुई है। 'क्यूरेरे' का मतलब है 'दौड़ करना' या ' भागना।जैसे-दौड़ के मैदान में कोई व्यक्ति दौड़कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है वैसे ही पाश्र्यक्रम के द्वारा विद्यार्थी निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।
पाठ्यक्रम की सबसे लोकप्रिय परिभाषा कनिंघम के अनुसार- “पाठ्यक्रम अध्यापकरूपी कलाकार के हाथ में वह साधन है, जिसके माध्यम से वह अपने पदार्थरूपी छात्र को अपने कलागृहरूपी स्कूल में अपने उद्देश्य के अनुसार-विकसित अथवा ह्वप प्रदान करती है।” इसमें कोई संदेश नहीं कि अपने पदार्थ को अपने आदर्शों के अनुकूल ढालने की कलाकार को बहुत स्वतंत्रता है, क्योंकि कलाकार का पदार्थ निर्जीव है, परन्तु स्कूल में अध्यापक का पदार्थ छात्र सजीव है। पुराने समय में जबकि आवश्यकताएँ सीमित थीं, साधन सीमित थे, अध्यापक को अपने पदार्थ अर्थात् छात्र को नया ह्वप देने की पूरी स्वतंत्रता थी, परन्तु अब बदलती हुई परिस्थितियों में अध्यापक की यह महत्ता घट गई है, फिर भी निश्चय ही अध्यापक के हाथ में पाठ्यक्रम बहुत ही महत्त्वपूर्ण साधन है।
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