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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- सतत् और व्यापक मूल्यांकन से आप क्या समझते हैं? विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर-
सतत् और व्यापक मूल्यांकन नवीनतम आधुनिक पद्धति है। मूल्यांकन पद्धति ने परम्परागत परीक्षण पद्धति को पूर्ण रूप से नकार दिया है, क्योंकि परम्परागत परीक्षा पद्धति दोषपूर्ण थी। विद्वानों ने परीक्षा पद्धति का पूर्ण अध्ययन करके निरंतर व्यापक मूल्यांकन पद्धति अभियोग कार्यक्रम 1992 को स्वीकार किया है, जिसमें मूल्यांकन कार्यक्रम की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
1. क्रमद्धता
2. वस्तुनिष्ठता
3. विश्वसनीयता
4. वैधता
५. व्यावहारिकता
6. व्यापकता
7. विद्यार्थी की सहभागिता
8. सतत्ता
शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर मूल्यांकन पद्धति, उपयोगी एवं प्रमाणित सिद्ध हो रही है। मूल्यांकन सतत् और व्यापक प्रक्रिया है। यह सम्पूर्ण शिक्षण प्रणाली का एक अभिन्न अंग है। मूल्यांकन का सीधा संबंध के उद्देश्यों से है। यह बच्चों के अध्ययन और अध्यापकों की अध्यापन क्रिया को पूर्ण रूप से प्रभावित करता है। सतत् एवं व्यापक परीक्षण पद्धति पूरी तरह से विश्वसनीय व दोषरहित है, जिसको क्रियात्मक कार्यक्रम 1992 ने लागू करने की सिफारिश की है। मूल्यांकन में विद्यार्थियों की सभी क्रियाओं, विद्यालयों में और विद्यालय से बाहर सहभागी क्रियाओं का पूर्ण मूल्यांकन किया जाता है।
क्लाराम एम. ब्राउन के अनुसार- “मूल्यांकन परिभाषा को बहुत अच्छी एवं लाभकारी माना गया है। मूल्यांकन के माध्यम से दोषरहित पूर्ण जाँच की जाती है। मूल्यांकन का क्षेत्र, परीक्षा एवं मापन की तुलना में अधिक विस्तृत होता है, मूल्यांकन में सदैव उद्देश्यों का विशेष ध्यान रखा जाता है।इन उद्देश्यों से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की जाती है।"
श्री मोफात के शब्दों में - “मूल्यांकन निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, यह छात्रों की औपचारिक, शैक्षिक, निरौपचारिक शैक्षिक उपलब्धियों का सही परीक्षण करता है। बालक के विकास में अधिक रूचि उत्पन्न करता है। विद्यार्थियों के विकास को अपनी भावनाओं, विचारों तथा क्रियाओं से संबंधित वांछित परिवर्तनों के रूप में व्यक्त करता है ।"
श्री एम. एल. जेम्स के अनुसार- “मूल्यांकन विद्यालय शिक्षण, कक्षा तथा स्वयं के द्वारा निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के संबंध में छात्रों की प्रगति की जांच है। मूल्यांकन का मुख्य प्रयोजन छात्रों को सीखने की प्रक्रिया को अग्रसर एवं उसका निर्देशन करना है। इस प्रकार मूल्यांकन. एक नकारात्मक प्रक्रिया न होकर सकारात्मक प्रक्रिया है।"
श्री. जे. डब्ल्यू राइस्टोन के अनुसार- “मूल्यांकन एक नवीन निरंतर एवं व्यापक प्रक्रिया है, जिसका प्रयोग मापन की धारणा को परम्परागत जांचों तथा परीक्षाओं की अपेक्षा अधिक व्यापक रूप में व्यक्त किया गया है।"
अतः मूल्यांकन एक व्यापक एवं सतत् परीक्षण करने वाली व्यक्तिगत, सामाजिक, सहकारी और विवरणात्मक प्रक्रिया है।
मूल्यांकन में सदैव उद्देश्यों का विशेष ध्यान रखा जाता है। उद्देश्यों से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर ही निष्कर्ष निकालने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की जाती है।
मूल्यांकन में सततता का विशेष महत्त्व है।
सतत्ता-वार्षिक परीक्षा परिणामों से छात्रों के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है। परंतु उनके बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ दैनिक साप्ताहिक, मासिक गतिविधियों, सामाजिक, सामुदायिक, व्यावहारिक गतिविधियों और शारीरिक उपलब्धियों का सही निरीक्षण, परीक्षण नहीं किया जा सकता है। अध्यापकों और अभिभावकों को पूरा वर्ष बीत जाने के बाद परीक्षा के परिणाम से केवल बौद्धिक उपलब्धि का ही पता चलता था। परंतु आज के वैज्ञानिक युग में बालक के सतत् और व्यापक परीक्षणों से सम्पूर्ण विकास का पता लगाना अनिवार्य है।
महात्मा गांधी जी की केवल शैक्षिक उपलब्धि को देखा जाए तो सामान्य ही थी, परंतु उनके व्यक्तिगत व्यक्तित्व, सामाजिक, सामुदायिक, राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों के कारण विश्व के महान महापुरुष और विश्व शांति के पुजारी थे। यह मूल्यांकन सतत् व्यापक सर्वेक्षण, निरीक्षण से ही किया जा सकता है।
कल्पना चावला का लिखित परीक्षण से मूल्यांकन करना आंशिक मूल्यांकन है। परंतु उसके दैनिक, साप्ताहिक, मासिक और वार्षिक परीक्षण की उपलब्धियों से उत्साहित होकर त्रुटियों को दूर करते हुए आगे बढ़ने के अवसर मिलने से उसका सर्वांगीण विकास हुआ, जिससे कम आयु अंतर्राष्ट्रीय स्पर्द्धा में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया।
सतत् निरीक्षण से विद्यार्थियों और अध्यापकों की शैक्षिक समस्याओं, कठिनाइयों को दूर करके सही दिशा और निर्देशों से सर्वांगीण विकास मार्ग प्रदर्शित किया जाता है।
मूल्यांकन से पाठ्यक्रम को आवश्यकतानुसार परिवर्तन, सुधार करने के संकेत प्राप्त होते हैं, क्योंकि पाठ्यक्रम तत्कालीन वातावरण, परिस्थितियों और सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुकूल प्रस्तुत किया जाता है।
मूल्यांकन से अध्यापकों को अध्यापन में सफलता, असफलता, त्रुटियों का आभास हो जाता है, इसलिए सफल अध्यापन विधियों और अनुभवों से प्रशिक्षण में सफलता प्राप्त करता है।
सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन से स्वयं विद्यार्थियों को भी सफलता और असफलता का आभास हो जाता है विद्यार्थी भी त्रुटियों, शंकाओं को दूर करके अध्यापकों के सही मार्गदर्शन में शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होता है।
सतत् और व्यापक मूल्यांकन अभिभावकों को भी उनके बच्चों की उपलब्धि का आभास करवाता है। अभिभावक अपने बच्चों के प्रति सक्रिय और जागरूक होकर बच्चों के सर्वांगीण विकास में पूरा योगदान देते हैं।
व्यापक-परम्परागत परीक्षा प्रणाली का गंभीरता से अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि यह पद्धति केवल शिक्षा तक सीमित थी. विद्यार्थी अध्यापक और अभिभावक केवल शैक्षणिक उद्देश्यों तकँ ही सीमित रह गये। छात्र और अध्यापकों की योग्यता और विशिष्ठ प्रतिभाओं का ह्रास होने लगा।
पाङ्ग्यक्रम में सहभागी क्रियाओं, शारीरिक स्वास्थ्य एवं चारित्रिक विकास की अनदेखी होने लगी जिससे विद्यार्थियों तथा नागरिकों का नैतिक और चारित्रिक पतन होने लगा। इस भयानक परिणाम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंता होने लगी।
पूरे विश्व में स्वार्थ और राजनैतिक भूख बढ़ गई। स्वार्थ के लिए निर्दोष नागरिकों की आंतकवादियों द्वारा हत्याएँ की जा रही हैं। तत्कालीन अमेरिका के राष्ट्रपति, श्री कनेडी, पाकिस्तान के प्रधान मंत्री श्री भुट्टो, उनकी पुत्री बेनजीर भुट्टो पूर्व प्रधानमंत्री, भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके पुत्र प्रधानमंत्री राजीव गांधी, तत्कालीन इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन, अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी जी की निर्मम हत्याएं विश्व पर कलंक और नैतिक मूल्यों के पतन का प्रमाण है। वर्तमान में प्रतिदिन सैनिकों, पुलिस कर्मियों, अधिकारियों, राजनेताओं और निर्दोष नागरिकों की हत्याएं भी अंतर्राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों के पतन का प्रमाण है। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व शान्ति के लिए नैतिक शिक्षा, अन्तर्राष्ट्रीय शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रजातान्त्रिक मूल्यों के विकास की आवश्यकता है, जिससे सम्पूर्ण विश्व में भ्रातृत्व भावना का विकास हो।
पूरे विश्व की सुख-समृद्धि और विश्व शांति के लिए पूरे विश्व के नागरिक एक-दूसरे का सहयोग करें। व्यापक मूल्यांकन का भी यही निष्कर्ष है कि शैक्षिक विकास के समस्त पक्षों को सम्मिलित किया जाये जो निम्नलिखित हैं-
(i) छात्रों की विविध रुचियों, साहित्य, संगीत, कला, खेलकूद, स्वास्थ्य संबंधी सभी क्रियाओं को सम्मिलित किया जाए।
(ii) छात्रों की समय के प्रति निष्ठा, नेतृत्व, क्षमता, स्थायित्व, उत्तर-दायित्व एवं सहयोग आदि व्यक्तिगत और सामाजिक गुणों को मूल्यांकन प्रणाली में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
(iii) विद्यार्थियों के शारीरिक विकास में आयु के अनुसार-वजन, कद (ऊँचाई ) व्यक्तिव, निरोग स्वस्थ शरीर का मूल्यांकन भी छात्र के विकास में सम्मिलित किया जाये।
(iv) छात्रों के दृष्टिकोण को, शैक्षिक विकास के उद्देश्यों में, भाषण, खेलकूद, वाद-विवाद प्रतियोगिता, क्यूज प्रतियोगिता, एन.सी.सी., एन.एस.एस., स्काऊटस, रैड क्रास आदि सहभागी क्रियाओं को सम्मिलित करके सम्पूर्ण मूल्यांकन करना चाहिए।
(v) विद्यार्थियों के शैक्षिक विकास के उद्देश्यों में समाजवाद, गणतंत्र, लोकतंत्र, धर्म-निरपेक्ष, राष्ट्रीय एकता, अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना और विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों को सम्मिलित कर, सर्वांगीण विकास का व्यापक और निरंतर मूल्यांकन करना चाहिए। जिससे विद्यार्थियों में व्यापक दृष्टिकोण से समय-समय पर निरंतर मूल्यांकन कर, सर्वगुण सम्पन्न, अंतर्राष्ट्रीय सोच का श्रेष्ठ नागरिक बनाया जा सके।
इसलिए परंपरागत दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली में सुधार व परिवर्तन करके नई आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की निरंतर एवं व्यापक प्रमाणित मूल्यांकन प्रणाली को सहर्ष अपनाया गया है।
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