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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? निबन्धात्मक प्रकार एवं वस्तुनिष्ठ प्रकार के परीक्षणों में अन्तर कीजिए।
उत्तर-
परीक्षण का अर्थ - परीक्षण किसी भी योग्यता क्षमता तथा उपलब्धि के मापन का सर्वोत्तम उपकरण होता है। उपकरण यदि सार्थक प्रमाणिक है तथा उस पर देश, काल तथा परिस्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता है तो उसे उत्तम परीक्षण कहा जाता है।
अध्यापक अपने छात्रों की उन्नति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय-समय पर उनकी परीक्षाएं लेता रहता है। इन परीक्षओं का उद्देश्य छात्रों की सफलता का मापन करना होता है तथा अध्यापक इस बारे में आश्वस्त होना चाहता है कि विद्यार्थी ने विषय सम्बन्धी योग्यता पूर्ण रूप से प्राप्त कर ली है या नहीं।इस परीक्षा के प्राप्तांक विद्यार्थी को किसी एक निश्चित क्षेत्र में सफलता का ज्ञान कराते है। उपलब्धि परीक्षा के द्वारा बालकों की योग्यता की तुलना की जाती है। इस परीक्षा में हम सापेक्षित सफलता पर बल देते हैं न कि पूर्ण सफलता पर सुपर के शब्दों में "एक उपलिब्धयाँ क्षमता परीक्षण यह ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है कि व्यक्ति ने क्या कितना सीखा तथा यह कोई कार्य कितनी कुशलता के साथ भली प्रकार लेता है।"
फ्रीमैन के अनुसार- " उपलब्धि परीक्षण वह अभिकला है कि जो एक विषय विशेष या पाठ्यक्रम के विभिन्न विषयों में व्यक्ति के ज्ञान, समझ एवं कौशल का मापन करता है।"
परीक्षण निर्माण के सामान्य सिद्धान्त - परीक्षण निर्माण के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित है-
1. किसी भी प्रकार के परीक्षण से विष विशेष के सभी उद्देश्यों की परीक्षा नहीं ली जा सकती है।
2. परीक्षा का प्रारूप अत्यन्त व्यापक होना चाहिए।
3. द्विअर्थी एवं भ्रामक प्रश्नों को परीक्षा में स्थान नहीं देना चाहिए।
4. परीक्षण में प्रश्नों की संख्या पर्याप्त होनी चाहिए। प्रथम प्रशासन में प्रश्नों की संख्या वास्तविक प्रशासन के प्रश्नों से लगभग दुगनी होनी चाहिए।
5. ऐसे प्रश्नों को सम्मिलित किया जाए जिससे छात्रों के ज्ञान की व्यावहारिक क्षमता का मूल्यांकन किया जा सके।
6. प्रत्येक प्रश्न स्वतन्त्र होना चाहिए प्रश्न में ही प्रश्न का उत्तर- देने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
7. प्रश्नों की भाषा, सरल, सुबोध, संक्षिप्त एवं स्पष्ट होनी चाहिए।
8. परीक्षा सम्बन्धी सामान्य निर्देश प्रारम्भ में ही चाहिए।
9. परीक्षा सम्बन्धी विशिष्ट उदाहरण समझा देने चाहिए।
10. उत्तर- लिखने के लिए पर्याप्त स्थान एवं समय दिया जाना चाहिए।
11. परीक्षा की विश्वसनीयता एवं वैद्यता को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
12. परीक्षा का नामकरण या शीर्षक यथोचित होना होना चाहिए।
निबन्धात्मक एंव वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में अन्तर
| क्रम | निबंधात्मक परीक्षण | वस्तुनिष्ठ परीक्षण |
|---|---|---|
| (1) | निबंधात्मक परीक्षण में प्रश्नों की रचना करना सरल कार्य है। इनमें प्रश्नों की संख्या कम होती है। इनके उत्तर लंबी उत्तरियाँ होते हैं। | वस्तुनिष्ठ परीक्षण में प्रश्नों की संरचना करना अत्यन्त कठिन होता है। इसमें प्रश्नों की संख्या अधिक तथा उत्तर संक्षिप्त हाँ/नहीं या मिलान वाले होते हैं। |
| (2) | निबंधात्मक परीक्षण में पाठ्य वस्तु का सीमित मूल्यांकन हो पाता है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षण में पाठ्यवस्तु का व्यापक रूप से मूल्यांकन होता है। |
| (3) | निबंधात्मक परीक्षण में अवबोधन उद्देश्य की प्राप्ति सफलतापूर्वक हो जाता है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षण में ज्ञान/उद्देश्य की प्राप्ति सफलतापूर्वक होती है। |
| (4) | निबंधात्मक परीक्षण से ज्ञान की परीक्षा सामान्यतः ली जा सकती है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षण में अवबोधन की परीक्षा सामान्यतः ली जा सकती है। |
| (5) | निबंधात्मक परीक्षण उपलब्ध परीक्षा, चयन एवं वर्गीकरण के लिए अधिक उपयुक्त है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षण निर्णयात्मक परीक्षा, निदान बुद्धि प्रवणता परीक्षाओं आदि के लिए उपयुक्त है। |
| (6) | निबंधात्मक परीक्षार्थी प्रश्न का उत्तर अपने शब्दों में देने के लिए पूर्ण स्वतंत्र होता है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षार्थी को इन परीक्षाओं में उत्तर सही विकल्प का चयन करते देना होता है। |
| (7) | निबंधात्मक परीक्षा प्रश्नों के एक छोटे न्यादर्श पर आधारित होती है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षा प्रश्नों के एक बड़े न्यादर्श पर आधारित होती है। |
| (8) | निबंधात्मक परीक्षा में परीक्षार्थी के सुन्दर लेख एवं अभिव्यक्ति कौशल का प्रभाव उसके अंकों पर पड़ता है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षा में लेखन कला एवं अभिव्यक्ति कौशल का प्रभाव नहीं पड़ता। |
| (9) | निबंधात्मक परीक्षाओं का निर्माण जितना आसान है मूल्यांकन उतना ही कठिन है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं का निर्माण जितना कठिन है मूल्यांकन उतना ही आसान है। |
| (10) | निबंधात्मक परीक्षा में मूल्यांकन में परीक्षक की मानसिकता का प्रभाव उसके अंक प्रदान करने पर पड़ता है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षा के मूल्यांकन में परीक्षक की मानसिकता का कोई प्रभाव उसके अंकों पर नहीं पड़ता है। |
| (11) | निबंधात्मक परीक्षा में दोनों परीक्षार्थी व परीक्षक स्वतंत्र होते हैं। परीक्षार्थी प्रश्नोंरूपी लेख एवं परीक्षक अंक प्रदान करने में। | वस्तुनिष्ठ परीक्षा में दोनों परीक्षार्थी व परीक्षक दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं। परीक्षार्थी प्रश्नोत्तर देने में व परीक्षक अंक प्रदान करने में। |
| (12) | निबंधात्मक परीक्षाओं की विश्वसनीयता एवं वैधता दोनों निम्न स्तर की होती है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं की विश्वसनीयता एवं वैधता दोनों उच्च स्तर की होती है। |
| (13) | निबंधात्मक परीक्षाओं के मानक स्थापित नहीं किए जा सकते। | वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं के मानक स्थापित होते हैं। |
| (14) | निबंधात्मक परीक्षाओं में परीक्षक को विषय पर पूर्ण अधिकार देने पर ही अंकों ठीक प्रकार से सम्भव है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं में परीक्षक को अंक कुंजी के आधार पर अंकन करना होता है। व्यक्तिगत विषय विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती। |
| (15) | निबंधात्मक परीक्षाओं का प्रशासन सरल होता है कोई विशेष निर्देश देने की आवश्यकता नहीं होती। | वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं का प्रशासन अपेक्षाकृत कठिन होता है। इसमें प्रशिक्षण व सावधानियाँ आवश्यक हैं। |
| (16) | निबंधात्मक परीक्षा में परीक्षक स्वयं अंक सीमा निर्धारित करता है। अच्छे उत्तर के लिए वह 60% से 80% तक तथा असमाधानकारक उत्तर के लिए 60% से 60% तक निर्धारण कर लेता है। | वस्तुनिष्ठ परीक्षा में परीक्षक स्वयं अंक प्रदान करने की सीमा को निर्धारित नहीं करता बल्कि परीक्षार्थी स्वयं अंक सीमा का निर्धारण करता है। |
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