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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- शैक्षणिक निदान की परिभाषा देते हुए, उनकी आवश्यकता पर प्रकाश डालिए तथा शैक्षणिक उपचार की परिधि निर्धारित करते हुए उसके उद्देश्यों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
शैक्षणिक निदान क्या है?
अध्यापन के क्षेत्र में जो नए-नए अनुसंधान किए जा रहे हैं, उनमें हम शैक्षणिक निदान को भी ले सकते हैं। यह एक नए प्रकार की क्रिया है, जिसके द्वारा उन कठिनाइयों का निदान किया जाता है, जो बालक-बालिकाओं के सीखने के समय सामने आती हैं। उन कठिनाइयों को समझ कर उन्हें दूर किया जा सकता है, और अध्यापन को प्रभावी बनाया जा सकता है। "शैक्षणिक निदान वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा लक्षणों के आधार पर बालक-बालिकाओं की कठिनाइयों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। " शैक्षणिक निदान की उपर्युक्त परिभाषा के आधार पर इसकी कठिनाइयों की जानकारी तथ्यों के परीक्षण पर आधारित होती है। तथ्यों का संग्रह करने के लिये भिन्न-भिन्न साधनों का प्रयोग किया जाता है। शैक्षणिक उपचारगृहों (Clinics) में तो यान्त्रिक उपकरण प्रयोग में लाए जाते हैं, परन्तु बालकों की कठिनाइयों का निदान करते समय अध्यापकों को तो अयान्त्रिक साधनों पर ही निर्भर रहना होगा। उन्हें छात्र - छात्राओं के कक्षा-कार्य में ही वे लक्षण देखने होंगे, जिनसे उनकी कठिनाइयों के सम्बन्ध में अनुमान लगाया जा सके।
कई बार साधारण निरीक्षण से ही लक्षण स्पष्ट झलकने लगते हैं परन्तु कई बार सावधानीपूर्वक परीक्षण करने के बाद ही उनकी प्रतीति होती है। लक्षण किसी भी प्रकार से प्रकट हों, उन्हें छात्रों की कठिनाइयों का मूलाधार माना जा सकता है। शिक्षाविदों ने इस कार्य के लिये कई निदानात्मक परीक्षणों का आयोजन किया है। इन परीक्षणों के आधार पर यह कहा जा सकता है, कि बालक-बालिकाएँ जब कोई बात सीखते हैं, तो उनके सामने दो प्रकार की कठिनाइयाँ सामने आती हैं-
(क) विषय से सम्बन्धित, अर्थात् विषय-वस्तु का बालक के उपयुक्त न होना।
(ख) कार्य करने के अनुपयुक्त तरीके, जिनका उपचार किया जा सकता है।
वाचन के समय यदि बालक कठिन शब्दावली अथवा विचारों की गहराई के कारण ठीक-ठीक न पढ़ सके, तो इस कठिनाई की गणना पहले प्रकार में होगी। परन्तु जब बालक शब्दों की पहचान में, उनके अर्थ समझने में अथवा अनुच्छेद की प्रमुख बातें खोज सकने में असमर्थ होते हैं, तो कठिनाई की गणना द्वितीय प्रकार में की जाएगी।
शैक्षणिक निदान का प्रयोजन - शैक्षणिक निदान के अधोलिखित प्रयोजन हो सकते हैं-
(1) विषय-वस्तु से सम्बन्धित बालक-बालिकाओं की कठिनाइयाँ क्या हैं?
(2) उनके सामने विशिष्ट कठिनाई क्या है, जिसका उपचारं करना चाहिए?
यदि बालक की कठिनाई विषय-वस्तु से सम्बन्धित है, तो उसे उसके उपयुक्त बनाया जाय। परन्तु यदि उसकी कठिनाई का कारण उसकी अनुपयुक्त आदतें हैं, तो इसके निराकरण का प्रयास करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर उसके व्यक्तित्व का विश्लेषण भी करना चाहिए जिससे छात्र-छात्राओं की कठिनाइयों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह व्यक्ति पर निर्भर करेगा, कि विश्लेषण का क्षेत्र सीमित हो अथवा व्यापक।
शैक्षणिक निदान की परिसीमा- आमतौर पर शैक्षणिक निदान की परिधि में निम्नलिखित मूल विषय ही लिये जाते हैं-
(1) वाचन
(2) लेखन
(3) अक्षर-विन्यास या वर्तनी
(4) व्याकरण
(5) गणित।
व्यक्ति इन्हीं विषयों द्वारा ज्ञान की प्राप्ति करता है। इसलिए प्रारम्भिक पाठशाला की पाठ-चर्चाओं में इनका महत्त्व बहुत अधिक है। यदि विद्यार्थियों ने इन विषयों का ठीक प्रकार से अध्ययन कर लिया हो, तो आगे चलकर अन्य विषयों से सम्बन्धित उनकी कठिनाइयाँ कम हो जायेंगी। अभी तक निदानात्मक शिक्षण के सम्बन्ध में जितना भी कार्य हुआ है, उसका सम्बन्ध इन्हीं से है। परन्तु आशा है, कि निकट भविष्य में इसकी परिसीमा में अन्य कई विषय भी आ जाएँ। सफल अध्यापन की दृष्टि से यह आवश्यक है, कि पाठ्यक्रम के सभी विषयों में निदानात्मक उपकरण तैयार किये जायें।
नवीन अनुसन्धान इस ओर संकेत करते हैं कि व्यक्तित्व - सम्बन्धी तत्त्व, सामाजिक वातावरण का प्रभाव तथा निकृष्ट अध्यापन इन सबसे बालकों की प्रशिक्षण सम्बन्धी कठिनाइयों का घनिष्ठ सम्बन्ध है। उपलब्ध परीक्षणों (Tests) द्वारा इन सबका मान ठीक प्रकार से नहीं हो सकेगा। इस सम्बन्ध में कुछ और साधनों को भी अपनाना होगा। ऐसे साधन निम्नलिखित हो सकते हैं-
(1) निरीक्षण
(2) साक्षात्कार
(3) संचित अभिलेख।
शैक्षणिक निदान और प्रेरणा - विद्यार्थियों को जब यह ज्ञात हो जाता है, कि अध्यापक उनकी कठिनाइयों को जानना चाहता है, तब उनमें एक नवीन चेतना आ जाती है और वे बड़ी प्रेरणा से कार्य करते हैं। यदि उनकी कठिनाइयों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है, तो वे कुछ समय बाद निष्क्रिय हो जाते हैं। शैक्षणिक निदान से यह पता चल जाता है कि बालक की कठिनाई के क्या-क्या कारण हैं। इन कारणों में प्रमुख ये हैं-
(1) व्यक्तित्व सम्बन्धी कठिनाइयाँ
(2) समायोजन सम्बन्धी कठिनाइयाँ
(3) अनु- वातावरण
(4) अवरुद्ध-संवेग इत्यादि।
जब तक कोई विशेष कारण न हो, तब तक निदानात्मक शिक्षण का आयोजन कक्षागृह से बाहर नहीं होना चाहिए। कार्य के रूप में छात्र - छात्राओं को ऐसा लेख दिया जा सकता है, जिसमें अशुद्धियाँ हों और उन्हें दूर करने के लिये कहा गया हो। सबसे प्रमुख बात यह है, कि वे अपनी अशुद्धियाँ दूर करने का प्रयत्न करें, और इस बात का उन्हें बार-बार प्रयास करना चाहिए।
शैक्षणिक उपचार की परिभाषा - शैक्षणिक निदान से बालकों की जिन कठिनाइयों का पता चलता है, उन्हें शैक्षणिक उपचार द्वारा दूर किया जा सकता है। वास्तव में शैक्षणिक निदान तथा शैक्षणिक उपचार एक सिक्के दो पहलू हैं। कुछ पाठ निदानात्मक होते हैं, तथा कुछ उपचारात्मक।
यद्यपि शैक्षणिक उपचार एक नया विषय है, परन्तु इस विधि का प्रयोग बहुत पहले से होता आया हैं। अच्छे शिक्षक सदैव अपने छात्रों की कठिनाइयों को दूर करते आये हैं। 'शैक्षणिक उपचार' शब्द चिकित्सा क्षेत्र से लिया गया है। इसका मुख्य प्रयोजन "प्रभावशाली विधियों का निर्माण, जिनसे प्रशिक्षण सम्बन्धी सभी अशुद्धियों का निराकरण किया जा सके। इस विधि के द्वारा यह प्रयास किया जाता है, कि छात्रों ने जो अशुद्धियाँ भूतकाल में की हैं, उन्हें वे भविष्य में न करें। विदेशों में गेट्स, चिट्टी, कोपल, राकेट आदि विद्वानों ने वाचन, अक्षर- विन्यास तथा अंकगणित आदि विषयों को लेकर अच्छा कार्य किया है।
शैक्षणिक उपचार की पद्धति तथा उसका उपयोग - वर्तमान समय में शैक्षणिक उपचार की कई पद्धतियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं-
(क) पुरानी पद्धति जिसका प्रयोग भूतकाल में भी होता था।
(ख) व्यक्ति - अध्ययन अथवा उपचार गृह पद्धति - इसमें व्यक्तिगत रूप से बालकों को उपचार करने के लिये अलग कर लिया जाता है।
(ग) शैक्षणिक निदान के उपरान्त अशुद्धियों का सामूहिक रूप से निराकरण।
(घ) व्यक्तिगत भेदों के आधार पर सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से छात्र - छात्राओं की कठिनाइयाँ दूर करना।
(ङ) अशुद्धियों का व्यक्तिशः निराकरण।
अतः स्पष्ट है, कि शैक्षणिक उपचार का प्रमुख प्रयोजन शैक्षणिक कठिनाइयों का निराकरण है। सीखते समय यदि छात्रों की अशुद्धियों का निराकरण कर दिया जाए, तो शैक्षणिक उपचार की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन कम होती जाएगी। आदर्श अवस्था तो तभी आएगी, जब अध्यापन इतने अच्छे ढंग का हो, कि गलती होने की कम सम्भावना हो।
शैक्षणिक उपचार के उद्देश्य - शैक्षणिक उपचार के उद्देश्यों में कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) छात्र-छात्राओं के अन्तर्द्वन्द्वों का समाधान।
(2) ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में बालक की अशुद्धियों का निराकरण।
(3) व्यक्तित्व से सम्बन्धित तत्त्वों का समुचित दिशा में विकास।
(4) अच्छी आदतों का विकास तथा ठीक दिशा में परिवर्तन।
(5) अवांछित आदर्शो के स्थान पर अच्छे आदर्शो की स्थापना।
(6) छात्र - छात्राओं की शारीरिक, भावात्मक तथा सामाजिक अक्षमताओं को दूर करना।
इस सम्बन्ध में एक सावधानी की आवश्यकता है। शैक्षणिक उपचार ऐसी कोई रामबाण औषधि नहीं है, जिससे छात्र - छात्राओं के सभी दोषों को दूर किया जा सके। सबसे प्रमुख बात तो यह है, कि उन्हें अपने दोषों का ज्ञान हो जाए और वे दोषयुक्त कार्य तथा दोषहीन कार्य में अन्तर देख सकें।
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