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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- उपचारात्मक शिक्षण क्या है? हिन्दी शिक्षण में उपचारात्मक शिक्षण आयोजन (व्यवस्था) किस प्रकार किया जा सकता है?

उत्तर-

उपचारात्मक शिक्षण

उपचारात्मक शिक्षण, जैसा कि इसके नाम से विदित होता है, एक इस प्रकार का शिक्षण या अनुदेशनात्मक कार्य होता है जिसे किसी एक विद्यार्थी या विद्यार्थियों के समूह विशेष की किसी विषय विशेष के अधिगम से सम्बन्धित कोई एक विशेष कठिनाई, कमजोरी या समस्या, जिसकी किसी निदानात्मक' परीक्षण या इसी प्रकार के कुछ निदानात्मक उपायों के माध्यम से पता चलता हो, का निवारण करने के लिए काम में लाया जाता है।"

इस तरह किसी भी प्रकार के उपचारात्मक शिक्षण का मुख्य आधार वे निदानात्मक प्रयत्न होते हैं जिन्हें इस विशेष उद्देश्य के लिए किया जाता है कि अधिगम कार्य में जिस तरह की परेशानियों, कठिनाइयों तथा कमजोरियों का सामना अधिगमकर्त्ता/अधिगमकर्त्ताओं को करना पड़ रहा है उनके बारे में ठीक-ठीक निदान किया जा सके। जितनी अच्छी तरह से ये निदानात्मक प्रयत्न किये जायेंगे और उनके फलस्वरूप उतनी अच्छी तरह से निदानात्मक परिणाम प्राप्त होंगे, विद्यार्थी की अधिगम कठिनाई, कमजोरी तथा परेशानियों से उसे मुक्ति दिलाने हेतु उतने ही अच्छे ढंग से उपचारात्मक शिक्षण का नियोजन एवं क्रियान्वयन किया जा सकेगा।

अतः यह कथन कि जैसा निदान होता है, उपचार भी वैसे ही किया जाता है, सभी अर्थों में खरा उतरता है। इस मूल मान्यता का अनुसरण करते हुए जीव विज्ञान में सम्भावित उपचारात्मक शिक्षण के बारे में कुछ निम्न धारणाएँ बना सकते हैं-

(i) अगर कक्षा के सभी या अधिकांश विद्यार्थी किसी एक प्रकार की अधिगम कठिनाई या कमजोरी का अनुभव कर रहे हैं तो उनके निवारण हेतु एक साझा उपचारात्मक कार्यक्रम अपनाया जा सकता है। इस कार्य हेतु कठिनाई तथा कमजोरी जिस क्षेत्र या प्रकरण विशेष से सम्बन्धित है उस प्रकरण या अधिगम विशेष के पुनः शिक्षण-अधिगम हेतु विशेष अतिरिक्त कक्षाएँ लगाई जा सकती हैं तथा उसके शिक्षण हेतु अन्य अधिगम शिक्षण विधियों, दृश्य-श्रव्य साधनों तथा शिक्षण व्यूह रचनाओं, अभ्यास कार्य, प्रयोगात्मक कार्य आदि का सहारा लिया जा सकता है।

(ii) अगर निदान की गई कठिनाई या कमजोरी ऐसी है जिसे विद्यार्थी विशेष द्वारा ही अनुभव किया जा रहा है तब उपचारात्मक उपाय भी वैयक्तिक और विशिष्ट ही होंगे। इस तरह अगर कोई विद्यार्थी किसी प्रकरण विशेष में इसलिए किसी अधिगम कठिनाई का अनुभव कर रहा है, क्योंकि इसे पढ़ने के लिए जो पूर्व ज्ञान तथा अधिगम क्षमताएँ उसे चाहिए वे उसके पास नहीं हैं तो इसका एकमात्र बेहतर इलाज यही है कि उसे यह बुनियादी आधार प्रदान कर दिया जाए। उसकी पुरानी कमजोरी, जो विषय विशेष के अर्जन में रह गई है उसे दूर कर दिया जाए। इस कार्य हेतु इस कमजोरी के निवारण हेतु व्यक्तिगत रूप से जो भी शिक्षण चाहिए वह उपयुक्त विधियाँ तथा तकनीकों से प्रदान करना ही यहाँ उसके लिए उपचारात्मक शिक्षण का प्रयोजन माना जायेगा।

(iii) अगर निदान की गई कठिनाई या कमजोरी ऐसी नहीं है जो उसके पूर्व ज्ञान तथा पिछली पढ़ाई हुई बातों को अच्छी तरह ग्रहण करने से सम्बन्धित हो तब उसके कारण अवश्य ही वर्तमान में किए जाने वाले शिक्षण अधिगम कार्यक्रम में हुए होंगे। निदानात्मक परीक्षण के परिणाम तथा विद्यार्थी विशेष द्वारा की जाने वाली अधिगम त्रुटियों के विश्लेषण से ही अब यह मालूम पड़ेगा कि उसके द्वारा विषय या प्रकरण विशेष के अधिगम के सन्दर्भ में किस प्रकार की कठिनाई या कमजोरी का अनुभव किया जा रहा है तथा उसके पीछे कौन-से सम्भावित कारण हो सकते हैं। इस प्रकार के निदान के आधार पर ही उसके लिए विशिष्ट उपचारात्मक शिक्षण का आयोजन का नियोजन किया जा सकता है।

इस प्रकार से विभिन्न प्रकार के निदानात्मक कार्य और उनके परिणामों का उचित विश्लेषण करने के आधार पर ही विद्यालयों में उपचारात्मक शिक्षण के संगठन की व्यवस्था की जा सकती है।

हिन्दी में उपचारात्मक शिक्षण का आयोजन / व्यवस्था

हिन्दी विषय हेतु विद्यालयों में उपचारात्मक शिक्षण का संगठन प्रायः निम्न विविध रूपों में सम्पन्न किया जा सकता है-

कक्षा-शिक्षण - इस प्रकार की औपचारिक शिक्षण व्यवस्था में कक्षा के वर्तमान स्वरूप और संरचना में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता है। यह जानकर कि कक्षा के विद्यार्थी विषय विशेष से किसी एक शाखा प्रकरण, विषय-वस्तु, प्रक्रिया, अवधारणा आदि को समझने में कठिनाई का अनुभव कर रहे हैं या जो कुछ भी उन्हें अब पढ़ाया जा रहा है उसके बारे में अपेक्षित पूर्व ज्ञान उनके पास नहीं है, अध्यापक पूरी कक्षा को उसके बारे में शिक्षण प्रदान करता है। पहले पढ़ाए पाठ को पुनः पढ़ाता है। किसी भी अंश को अच्छी तरह स्पष्ट करता है, उसके बारे में विविध प्रकार के अधिगम अनुभवों को बहु-इन्द्रिय माध्यम से प्रस्तुत करता है और इस तरह ऐसे सभी प्रयत्न अपने शिक्षण के द्वारा करता है जिनसे कक्षा के सभी विद्यार्थियों को विषय विशेष में अनुभव की जाने वाली अधिगम कठिनाई, कमजोरी तथा परेशानी को दूर करने में पूरी-पूरी सहायता मिले। इस प्रकार के उपचारात्मक शिक्षण कक्षा के सभी विद्यार्थियों की साझी अधिगम कठिनाइयों को दूर करने में उपयुक्त भूमिका निभा सकता है।

ट्यूटोरियल शिक्षण - उपचारात्मक शिक्षण में यह अत्यन्त उपयोगी है। ट्यूटोरियल में छात्रों की व्यक्तिगत समस्याओं एवं कठिनाइयों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं-

समूहगत ट्यूटोरियल शिक्षण - इस प्रकार की शिक्षण व्यवस्था में कक्षा के विद्यार्थियों को कुछ समूह विशेषों में विभक्त करने की चेष्टा की जाती है। इस विभाजन का आधार इस बात को लेकर होता है कि एक समूह में शामिल विद्यार्थियों की लगभग विषय विशेष सम्बन्धी एक जैसी अधिगम कठिनाइयाँ, कमजोरियाँ और समस्याएँ हों। अब प्रत्येक समूह को किसी एक शिक्षक या विभिन्न शिक्षकों द्वारा अलग-अलग रूप से, उनकी अपनी अधिगम कठिनाइयों या कमजोरियों के हिसाब से शिक्षण प्रदान किया जाता है। प्रत्येक ट्यूटोरियल ग्रुप का इंचार्ज एक ट्यूटर होता है। वह या तो विद्यार्थियों में से ही किसी होशियार विद्यार्थी को यह काम सौंप देता है अथवा विषय अध्यापक ही प्रत्येक समूह के लिए अलग-अलग रूप से अपने समय का विभाजन कर लेता है। इस तरह की व्यवस्था कैसे भी अपनाई जाए, मूल उद्देश्य यही रहता है कि ट्यूटोरियल समूह में शामिल सभी विद्यार्थियों की साझी अधिगम कठिनाइयों और कमजोरियों को सामूहिक रूप से हल किया जा सके। इसके लिए विषय विशेष के पाठ्यक्रम से सम्बन्धित जिन प्रकरणों, विषय-वस्तु या अधिगम अनुभवों को ग्रहण करने में विद्यार्थियों को कठिनाई आ रही है उनका पुनः शिक्षण किया जा सकता है। किसी विशेष प्रकार के ज्ञान और कौशल को जिस ढंग से बालक ग्रहण कर सके उस ढंग से प्रदान करने का प्रयत्न किया जाता है विभिन्न प्रकार की शिक्षण और अनुदेशनात्मक सामग्री का उस रूप में प्रयोग किया जा सकता है जिससे विद्यार्थियों को जो बात पहले समझ नहीं आ रही थी वह बात ठीक से समझ में आ सके।

समूहगत ट्यूटोरियल शिक्षण कक्षा शिक्षण की तुलना में कई बातों को लेकर उपयोगी सिद्ध होता है। . इसमें विद्यार्थियों को समूहों में बाँटकर शिक्षण प्रदान किया जाता है और एक समूह में वे ही विद्यार्थी शामिल होते हैं जिनकी अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयाँ एक जैसी हों। पूरी कक्षा को एक साथ शिक्षण देने में बहुधा बहुत से विद्यार्थी ऐसे रह जाते हैं जिनकी अधिगम कठिनाइयाँ और कमजोरियाँ एक-दूसरे से मेल नहीं खाती हैं। दूसरे विद्यार्थियों की खातिर उन्हें इस प्रकार के शिक्षण को बेकार ही झेलना पड़ता है और इससे उनकी शक्ति और समय का अनावश्यक रूप से अपव्यय होता रहता है। समूहगत ट्यूटोरियल शिक्षण व्यवस्था में इस प्रकार की कठिनाई कम होती है, क्योंकि विद्यार्थियों की संख्या सीमित रहती है और अध्यापक को भी सीमित बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण प्रदान करना होता है।

वैयक्तिक ट्यूटोरियल शिक्षण - इस प्रकार की शिक्षण व्यवस्था में प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी अपनी अधिगम कठिनाइयों और कमजोरियों के हिसाब से वैयक्तिक शिक्षण प्रदान किया जाता है। इस व्यवस्था में अध्यापक द्वारा प्रत्येक विद्यार्थी को अलग-अलग रूप से वह सभी प्रकार की वांछित सहायता, मार्ग-दर्शन और कोचिंग प्रदान करने की व्यवस्था की जाती है जिससे उनकी अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों और कमजोरियों का अच्छी तरह निराकरण कर उनकी योग्यताओं और क्षमताओं का अधिक-से-अधिक विकास किया जा सके। कहने की आवश्यकता नहीं है इस प्रकार की उपचारात्मक शिक्षण व्यवस्था में विद्यार्थियों के अधिगम सम्बन्धी व्यक्तिगत उत्तरों का अधिक-से-अधिक ध्यान रखकर उनकी अपनी विशेष अधिगम कठिनाइयों और कमजोरियों के हिसाब से अलग-अलग प्रकार के शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। यहाँ सभी विद्यार्थी अपनी-अपनी अधिगम गति, योग्यता और क्षमताओं के हिसाब से जैसी वांछित सहायता, व्यक्तिगत ध्यान और पुनर्बलन की अपेक्षा करते हैं वह सभी उन्हें वैयक्तिक रूप से भली-भाँति प्रदान किया जाता है ताकि उनकी व्यक्तिगत कठिनाइयों का निवारण कर उन्हें अधिगम पथ पर भली-भाँति अग्रसर किया जा सके।

पर्यवेक्षित ट्यूटोरियल शिक्षण - इस प्रकार की उपचारात्मक शिक्षण व्यवस्था में विद्यार्थियों के ऊपर ही यह जिम्मेदारी डाल दी जाती है कि वे विषय विशेष में अनुभव की जाने वाली कठिनाइयों और कमजोरियों को अपने प्रयत्नों से ही दूर करने की कोशिश करें। इस दृष्टि से वे अब यहाँ जो बातें समझ में नही आई हों उन्हें अच्छी तरह पढ़कर, उन पर अच्छी तरह चिन्तन-मनन कर तथा विशेष रूप से ध्यान देकर समझने का प्रयत्न करते हैं। अभ्यास कार्य, पुनरावत्ति, स्वाध्याय आदि की सहायता लेते हैं। कौशलों का अच्छी तरह उपयोग कर देखते हैं और इस तरह वे सभी ऐसे प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं जिनसे विषय सम्बन्धी, अधिगम कठिनाइयों, कमजोरियों तथा समस्याओं से उन्हें मुक्ति मिल सके। ऐसा करते समय उन्हें अपने अध्यापकों का पर्याप्त मार्गदर्शन तथा आवश्यकतानुसार वांछित सहायता भी प्राप्त होती रहती है। इस तरह इस प्रकार के उपचारात्मक शिक्षण में उपचार हेतु प्रयत्न तो विद्यार्थियों द्वारा स्वयं ही किए जाते हैं परन्तु इन प्रयत्नों को उचित रूप से अध्यापक का मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण भी प्राप्त होता रहता है। अध्यापक द्वारा प्रदत्त इस प्रकार का पर्यवेक्षण सम्बन्धी कार्य समूहगत भी हो सकता है और वैयक्तिक भी। यानी वह विद्यार्थियों को उपयुक्त, मार्गदर्शन, जब वह अकेले अकेले काम कर रहे होते हैं, तब भी दे सकता है और जब समूह में कार्यरत हों, तब भी दे सकता है।

स्व-अनुदेकित शिक्षण - इस प्रकार की उपचारात्मक शिक्षण व्यवस्था में विद्यार्थियों को स्व-अनुदेशन द्वारा ही अपनी कमजोरियों और कठिनाइयों को दूर करने के उपाय करने पड़ते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार का अध्यापकीय पर्यवेक्षण या मार्ग-दर्शन प्राप्त नहीं होता। यहाँ जिस प्रकार की वियगत कठिनाइयाँ और कमजोरियाँ निदान की जाती हैं उनको ध्यान में रखते हुए स्व-अनुदेशन सामग्री, अभिक्रमित अधिगम पैकेज के रूप में या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्राम के रूप में विद्यार्थी विशेष को उपलब्ध करा दी जाती है और फिर वह उस अनुदेशन सामग्री का उपयोग करते हुए स्वयं ही उससे उचित अनुदेशन ग्रहण करते हुए अपनी अधिगम कठिनाइयों तथा कमजोरियों के निवारण के प्रयत्न करता है। इस प्रकार के स्व- शिक्षण या अधिगम के प्रयत्न उसकी अपनी गति, शक्ति और सामर्थ्य के हिसाब से वह स्वयं तय करता है और अपनी कठिनाइयों तथा कमजोरियों को दूर करने की सारी जिम्मेदारी उसी की होती है।

अनौपचारिक किक्षण - विषय विशेष सम्बन्धी अनौपचारिक शिक्षण गतिविधियों को अगर औपचारिक शिक्षा के साथ भली-भाँति जोड़ दिया जाए तो जिन विद्यार्थियों के लिए उपचारात्मक शिक्षण चाहिए उनकी बहुत कुछ अधिगम कठिनाइयों और कमजोरियों के निवारण में इस प्रकार का अनौपचारिक शिक्षण काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इस प्रकार की अनौपचारिक शिक्षण गतिविधियों और कार्यक्रम के रूप में हम शैक्षिक भ्रमण, हिन्दी शिक्षण संगठन, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना, जीव विज्ञान सम्बन्धी विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का संग्रह करना, सामूहिक चर्चा एवं वाद-विवाद में भाग लेना अन्य विभिन्न प्रकार की ऐसी पाठ्य सहगामी क्रियाओं में भाग लेना, जिससे जीव विज्ञान के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता मिलती हो, आदि का नाम ले सकते हैं। निस्सन्देह इससे एक ओर तो विद्यार्थी की हिन्दी से जुड़े हुए अधिगम अनुभवों की अनायास ही रुचिपूर्ण ढंग से प्राप्ति होती रहती है तो दूसरी ओर जिन बातों को वह कक्षा अध्यापन से नहीं समझ पाते उन्हें ठीक प्रकार से उनकी वास्तविक अनुभवों के रूप में ग्रहण करना उनके लिए सहज हो जाता है। विशेषकर उन विद्यार्थियों को, जिनकी अधिगम कठिनाइयाँ और कमजोरियाँ कक्षा शिक्षण में रुचि न लेने के कारण होती हैं, उन्हें इन अनौपचारिक गतिविधियों से काफी लाभ होता है।

उपरोक्त पंक्तियों में हमने उपचारात्मक शिक्षण के संगठन सम्बन्धी विभिन्न प्रारूपों का वर्णन करके यह बताने की चेष्टा की है कि किसी कारणवश विद्यार्थी जीव विज्ञान में अपनी पिछली कक्षाओं की कमजोरी तथा न्यूनताओं की वजह से या वर्तमान में चल रहे शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में उपस्थित कुछ न्यूनताओं की वजह से जीव विज्ञान के किसी भी प्रकरण या अधिगम क्षेत्र में कठिनाई या कमजोरी अनुभव कर रहे हों तो उनके लिए क्या उपचारात्मक शिक्षण कदम उठाए जा सकते हैं। यहाँ हमने जिन अधिगम न्यूनताओं, कठिनाइयों तथा कमजोरियों के निदान तथा उपचार की चर्चा की है वे सभी ज्ञानात्मक क्षेत्र में होने वाले व्यवहार परिवर्तन से अपना सम्बन्ध रखते हैं। परन्तु यह बात भी हो सकती है कि जो भी कठिनाइयाँ तथा कमजोरियाँ जीव विज्ञान के किसी प्रकरण या अध्ययन क्षेत्र में विद्यार्थी अनुभव कर रहे हों उनके मूल में शारीरिक तथा संवेगात्मक व्यवहार सम्बन्धी कारण विराजमान हों।

इस प्रकार की कुछ परिस्थितियाँ निम्न प्रकार की हो सकती हैं-

(i) विद्यार्थी अपने खराब स्वास्थ्य, बीमारी तथा शारीरिक, मानसिक अपंगता की वजह से जीव विज्ञान के अधिगम में कठिनाई का अनुभव कर सकता है और पढ़ाई में कमजोर रह सकता है।

(ii) कोई भी विद्यार्थी विशेष या पूरा समूह विद्यालय में न मिलने वाली वांछित शैक्षिक सुविधाओं तथा उचित शिक्षण-अधिगम परिस्थितियों के कारण जीव विज्ञान के अधिगम अर्जन में कठिनाई तथा अक्षमता का प्रदर्शन कर सकता है।

(iii) विद्यार्थी विशुद्ध संवेगात्मक कारणों की वजह से भी अधिगम पथ पर आगे बढ़ने में काफी कठिनाई का अनुभव कर सकता है और फलस्वरूप हम उसे जीव विज्ञान विषय के अधिगम के सन्दर्भ में गहन अधिगम कठिनाइयों, कमजोरियों तथा अक्षमताओं से घिरा हुआ महसूस करते हैं। कई बार अध्यापक द्वारा प्रदत्त एक साधारण सी फटकार या लताड़ विद्यार्थी को बौद्धिक तथा संवेगात्मक रूप से नितान्त क्रियाशून्य तथा अपाहिज-सा बना डालती है।

संवेगात्मक बहाव में लिप्त आपसी अविश्वास का चक्र एक बार शुरू हो जाने पर थमता नहीं है। विद्यार्थी में अनगिनत कमियाँ अध्यापक को नजर आने लगती हैं और परिणामस्वरूप पहले तो वह अपने अध्यापक से दूर चला जाता है और फिर उसके द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषय से।

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