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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- निदानात्मक परीक्षण क्या है? इसके निर्माण की प्रक्रिया लिखिए।
अथवा
निदानात्मक परीक्षण से आप क्या समझते हैं? हिन्दी शिक्षण में इसका क्या महत्व है?
अथवा
निदानात्मक शिक्षण से क्या अभिप्राय है? हिन्दी में निदानात्मक शिक्षण की आवश्यकता को बताइये।
उत्तर-
हिन्दी शिक्षण में विद्यार्थियों की कठिनाइयों एवं त्रुटियों की जानकारी प्राप्त करने हेतु जिन परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें निदानात्मक परीक्षण कहते हैं। निदानात्मक परीक्षण उपलब्धि परीक्षण का ही एक रूप है जिसके अन्तर्गत विशिष्ट वस्तु अथवा अधिगम अनुभव के अर्जित ज्ञान की विशिष्टताओं तथा कमियों का मूल्यांकन किया जाता है। शिक्षा शब्दकोश में निदानात्मक परीक्षण का अर्थ निम्न शब्दों में समझाया गया है- "निदानात्मक परीक्षण विशेष तौर से उपचारात्मक उपायों के लिए आधार के रूप में बालकों की विशेष कमजोरियों को सुनिश्चित करने के विचार से एक सीमित विषय क्षेत्र / सम्बन्धित उपक्षेत्र में उपलब्धि के मापन के लिए एक उद्दिष्ट परीक्षा है। "
एक निदानात्मक परीक्षण का निर्माण
हिन्दी अध्यापक को अपने आप भी एक निदानात्मक परीक्षण का निर्माण कर सकने की निपुणता अवश्य ही अर्जित करनी चाहिए। इस प्रकार के परीक्षण के निर्माण तथा उपयोग सम्बन्धी कार्यों को प्रायः निम्नांकित तीन चरणों में पूरा किया जाता है-
(अ) निदानात्मक परीक्षण के निर्माण के लिए नियोजन करना।
(ब) निदानात्मक परीक्षण का निर्माण करना।
(स) निदानात्मक परीक्षण लेना और उसकी व्याख्या करना।
(अ) निदानात्मक परीक्षण के निर्माण के लिए नियोजन - एक निदानात्मक परीक्षण के निर्माण हेतु उचित नियोजन की काफी जरूरत होती है। इस प्रकार के नियोजन में कुछ निम्न बातों पर ध्यान देना ठीक रहता है-
1. अधिगम कठिनाइयों तथा कमजोरियों से सम्बन्धित क्षेत्रों से अवगत होना - निदानात्मक परीक्षण के निर्माण की शुरुआत उसके निर्माण की जरूरत पर ही आधारित होती है। जीव विज्ञान के अधिगम में कौन कितना कमजोर है या किसकी क्या कठिनाइयाँ हैं, इस बात की पूरी जानकारी हेतु उपलब्ध परीक्षणों के परिणाम, कक्षा में किया जाने वाला अभ्यास कार्य, विद्यार्थियों को कक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न और उनके उत्तर, गृहकार्य का निरीक्षण तथा विद्यार्थियों के कक्षा व्यवहार आदि की उचित सहायता ली जा सकती है। इस तरह विद्यार्थी विशेष की उपलब्धि या निष्पत्ति का मूल्यांकन करने तथा उसके व्यवहार का मूल्यांकन करने हेतु जो भी तकनीक या साधन काम में लाए जाते हैं उनसे प्राप्त परिणामों तथा निष्कर्षों से ऐसे संकेत अवश्य मिल जाते हैं कि विद्यार्थी विशेष या कक्षा और समूह विशेष में कठिनाई तथा कमजोरी का आभास हो जाए, यह पता चल जाए कि हिन्दी के इस क्षेत्र से सम्बन्धित अधिगम में विद्यार्थी कठिनाई या अक्षमता का अनुभव कर रहा है। जिस क्षेत्र विशेष में इस प्रकार की कठिनाई तथा कमजोरी का अभास हो उसी को अब निदानात्मक परीक्षण का विषय बनाया जा सकता है।
2. कठिनाई क्षेत्र को और अधिक सीमित करना - निदानात्मकं परीक्षण जिस इकाई या प्रकरण विशेष पर बनाया जाना है उसे जितना भी सीमित कर दिया जाए उतना ही अच्छा रहता है। जैसे किसी विद्यार्थी ने किसी उपलब्धि परीक्षण में बहुत कम अंक लिये हैं तो हमें उसके इस मूल्यांकन परिणाम को और अधिक गहराई से विश्लेषण करना होगा। यह विश्लेषण बता सकता है कि विद्यार्थी अध्ययन में नहीं बल्कि व्याकरण में कमजोर है। आगे वह यह भी संकेत करता है कि अब इस बात को निदानात्मक परीक्षण का विषय बनाया जा सकता है। इस तरह हम निदानात्मक परीक्षण निर्माण हेतु किसी एक इकाई, उप इकाई, अवधारणा विशेष को चुन लेते हैं जिससे उसका गहराई और विस्तार से निदान किया जा सके। इस तरह भिन्न-भिन्न इकाइयों, उप इकाइयों या अवधारणा विशेषों पर निदानात्मक परीक्षणों का निर्माण करके फिर उन्हें एक इकट्ठा रूप दे देना चाहिए ताकि एक बड़े क्षेत्र, शाखा या पूरे विषय के लिए निदानात्मक परीक्षण तैयार हो सके।
3. विषय-वस्तु विश्लेषण - हिन्दी की एक उप इकाई या किसी एक अवधारणा से सम्बन्धित विषय सामग्री का अब ठीक तरह विश्लेषण करके यह जानने का प्रयत्न करना चाहिए कि-
1. इस उप इकाई तथा अवधारणा के अधिगम हेतु किस प्रकार के ज्ञान, कौशल आदि की आवश्यकता है अर्थात् प्रारिम्भक व्यवहार कैसा होना चाहिए।
2. इस उप इकाई तथा अवधारणा के अधिगम के अर्जन के उपरान्त विद्यार्थी के व्यवहार में किस प्रकार के परिवर्तन की अपेक्षा की जाती है अर्थात् अन्तिम व्यवहार कैसा होना चाहिए।
4. परीक्षण प्रश्नों के बारे में निर्णय लेना - विषय-वस्तु के विश्लेषण तथा प्रारम्भिक और अन्तिम व्यवहार की जानकारी लेने के बाद निदानात्मक परीक्षण में किस प्रकार के प्रश्न होने चाहिए, यह निर्णय लिया जाता है। प्रश्नों की संख्या निदानात्मक परीक्षण में प्रायः ज्यादा ही रखी जाती है और कठिनाई तथा समस्या विशेष की खोज करना इनका उद्देश्य होता है। अतः ऐसे परीक्षण में निबन्धात्मक प्रश्नों की तुलना में लघु-उत्तरात्मक तथा अति लघु उत्तरात्मक प्रश्नों को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के रूप में रिक्त स्थान पूर्ति प्रकार के प्रश्नों का प्रयोग किया जाना चाहिए। हिन्दी के अध्ययन में विद्यार्थियों की त्रुटियों या कमजोरियों का पता लगाने हेतु इस प्रकार के प्रश्नों की रचना करना अच्छा रहता है जिससे विषय-वस्तु के अध्ययन में जिस प्रकार के ज्ञान, कौशल तथा वैज्ञानिक ज्ञान सम्बन्धी अवधारणाओं की जरूरत है वे उनमें हैं या नहीं, इस बात का पता चल सके।
5. परीक्षण लेने सम्बन्धी निर्णय लेना - निदानात्मक परीक्षण कैसे लिया जाएगा, इस बारे में भी आवश्यक निर्णय निदानात्मक परीक्षण के निर्माण सम्बन्धी नियोजन स्तर पर ही ले लिया जाना चाहिए, जैसे परीक्षण के लिए समय सीमा क्या रहेगी, परीक्षण देने से सम्बन्धित आवश्यक निर्देश विद्यार्थियों को क्या दिए जायेंगे, परीक्षण प्रश्नों के अंकन तथा परीक्षण परिणामों की व्याख्या करने में क्या प्रक्रिया अपनानी होगी आदि-आदि।
(ब) निदानात्मक परीक्षण का निर्माण
1. नियोजन स्तर पर जो निर्णय लिये जाते हैं उनको ध्यान में रखते हुए परीक्षण के निर्माण हेतु उचित प्रक्तों का चयन कर लिया जाता है। यह चयन मुख्यतया निम्न तीन बातों पर केन्द्रित होता है-
(i) उप-इकाई या अवधारणा विशेष की विषय-वस्तु की प्रकृति।
(ii) उप इकाई या अवधारणा विशेष की अधिगम हेतु आवश्यक प्रारम्भिक व्यवहार कौशल आदि के सन्दर्भ में।
(iii) उप-इकाई या अवधारणा विशेष के अधिगम के पश्चात् विद्यार्थी का अपेक्षित व्यवहार ( अर्जित ज्ञान, कौशल, अनुप्रयोग आदि के सन्दर्भ में)।
2. उपरोक्त तीन बातों को ध्यान रखते हुए अब लघु-उत्तरात्मक, अति लघु उत्तरात्मक तथा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का निर्माण किया जाना चाहिए। प्रश्न-पत्र में आवक्यक निर्देश देने एवं समय अवधि आदि दिए जाने की भी व्यवस्था कर देनी चाहिए। प्रश्नों की उत्तर- कुंजी तथा आदर्श उत्तरों का निर्माण भी, उत्तरों की उचित व्याख्या और उनसे सही उत्तर- प्राप्त करने हेतु भी, अब यहाँ किया जाना चाहिए।
3. इस प्रश्न-पत्र / परीक्षण द्वारा अब विद्यार्थियों के एक समूह विशेष की परीक्षा लेकर इसकी उपयोगिता की जाँच करने का प्रयत्न किया जा सकता है। इस जाँच के आधार पर इसमें आवक्यक सुधार किए जा सकते हैं और फिर इसे एक निदानात्मक परीक्षण के रूप में आगे प्रस्तुत करने के बारे में सोचा जा सकता है।
(स) निदानात्मक परीक्षण लेना और उसकी व्याख्या करना - इस प्रकार से बनाए गए निदानात्मक परीक्षण से अब किसी एक विद्यार्थी या विद्यार्थियों के समूह विशेष / कक्षा की परीक्षा ली जा सकती है। परीक्षा लेते समय परीक्षण से सम्बन्धित सभी आवश्यक निर्देश विद्यार्थियों को अच्छी तरह समझा दिए जायेंगे। जब वे अपना कार्य समाप्त कर देंगे तो उनसे उत्तर-पत्रों को प्रश्न-पत्र सहित इकट्ठा कर लिया जाएगा। यहाँ अब उनके उत्तरों के अंकन के लिए उत्तर- कुंजी तथा आदर्श हल की सहायता ली जा सकती है और उनके उत्तरों के विश्लेषण के आधार पर (विशेषकर जो त्रुटियाँ वह करते हैं उनका उचित विश्लेषण कर ) यह निर्णय लिया जा सकता है कि उनके द्वारा की जाने वाली गलतियों, अनुभव की जाने वाली कठिनाइयों तथा कमजोरियों की वास्तविक प्रकृति क्या है? इन्हीं कमजोरियों तथा कठिनाइयों का उचित निदान ही आगे के उपचारात्मक उपायों या शिक्षण का आधार बनता है। इसलिए परीक्षण से प्राप्त उत्तरों की सही दृष्टि से व्याख्या करके विद्यार्थियों की कमजोरियों तथा कठिनाइयों से अवगत होना अपने आप में बहुत अधिक महत्त्व रखता है।
हिन्दी शिक्षण में निदानात्मक परीक्षण का महत्व
(1) निदानात्मक परीक्षण के द्वारा हिन्दी अध्ययन की किसी विशेष समस्या या क्षेत्र में छात्रों की कठिनाई या कमजोरी का पता करने का प्रयास किया जाता है।
(2) इस परीक्षण के द्वारा छात्रों की वांछनीय एवं वास्तविक उपलब्धियों के मध्य दूरी को समाप्त कराने में सहायता मिलती है।
(3) यह परीक्षण अच्छे निर्देशन, परामर्श एवं शिक्षण हेतु महत्वपूर्ण उपाय सुझाने में समर्थ हैं।
(4) हिन्दी शिक्षक असफल छात्र की किसी क्षेत्र/खण्ड विशेष में व्यावहारिक समस्या अथवा असफलता के कारणों को खोजता है और उनका निराकरण करके अधिगम पथ पर अग्रसित होने के लिए सहायता देता है।
(5) इससे छात्रों की कठिनाईयों अथवा कमजोरियों को दूर करने के लिए उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था करने में सफलता मिलती है।
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