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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- भाषा शिक्षण की दृष्टि से निबन्धात्मक परीक्षा के गुण एवं दोषों की विवेचना कीजिए।

अथवा
"निबन्धात्मक परीक्षा एक आवश्यक बुराई है।" भाषा शिक्षण के सम्बन्ध में इस कथन की विवेचना कीजिए।
अथवा
भाषा शिक्षण की दृष्टि से निबन्धात्मक परीक्षा में कौन-कौन से दोष हो सकते हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
हिन्दी भाषा शिक्षण में निबन्धात्मक परीक्षा के गुण-दोषों की विवेचना कीजिये।

उत्तर-

निबन्धात्मक परीक्षा

मूल्यांकन की प्रविधियों में एक होती है- परीक्षा प्रविधि जिसके अन्तर्गत मौखिक परीक्षा, प्रायोगिक परीक्षा तथा लिखित परीक्षाएँ होती हैं। लिखित परीक्षा के दो रूप होते हैं- एक वस्तुनिष्ठ परीक्षा तथा दूसरी निबन्धात्मक परीक्षा।

निबन्धात्मक परीक्षा परीक्षार्थी को प्रश्नों के उत्तर- तथ्यों तथा अपने विचारों के आधार पर लिखित रूप से अभिव्यक्त करने होते हैं।

सिम्स के अनुसार- "निबन्धात्मक परीक्षा समस्यामूलक स्थिति का सापेक्षिक रूप से स्वतन्त्र एवं विस्तृत प्रत्युत्तर है जो विद्यार्थी के मानसिक अनुभवों की संरचना, गतियों एवं कार्य-प्रणाली से सम्बन्धित सूचना देती है।"

 

निबन्धात्मक परीक्षा के निम्नलिखित गुण एवं दोष होते हैं-

निबन्धात्मक परीक्षा के गुण

निबन्धात्मक परीक्षा में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-

1. निबन्धात्मक परीक्षा पाठ्यवस्तु के विस्तृत पक्षों का वर्णन करने में महत्वपूर्ण है।

2. निबन्धात्मक परीक्षा में तार्किक विवेचना तथा आलोचनात्मक मूल्यांकन की विशेषता पायी जाती है।

3. निबन्धात्मक परीक्षा शिक्षक को यह जानने में सहायता प्रदान करती है कि विद्यार्थी या उत्तरदाता अपने विचारों को स्पष्टतः तथा शुद्ध भाषा में व्यक्त कर सकता है कि नहीं।

4. निबन्धात्मक परीक्षा में विद्यार्थी को प्रश्न का उत्तर- देने की पूर्ण स्वतन्त्रता रहती है।

5. निबन्धात्मक परीक्षा से विद्यार्थी की लेखन कला एवं शैली, विचार अभिव्यक्ति की क्षमता, कल्पना शक्ति, तर्क शक्ति तथा उसके मौलिक चिन्तन का अनुमान लगाया जा सकता है।

निबन्धात्मक परीक्षा के दोष

1. निबन्धात्मक परीक्षा विद्यार्थियों के पुस्तकीय ज्ञान के सम्पूर्ण हिस्से की जाँच नहीं करती।

2. निबन्धात्मक परीक्षा प्रणाली का एक दोष यह भी है कि यह परीक्षा केन्द्रित होती है।

3. निबन्धात्मक परीक्षा के आधार पर विद्यार्थियों के भविष्य के सम्बन्ध में कोई पूर्व एवं निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

4. निबन्धात्मक परीक्षा के मूल्यांकन की कोई मानकीकृत विधि न होने से इसकी विश्वसनीयता की कमी पायी जाती है।

5. निबन्धात्मक परीक्षा में किसी प्रश्न को अलग-अलग शिक्षकों द्वारा जाँचे जाने पर परिणामों में अन्तर पाया जाता है जो कि दोषपूर्ण है।

6. निबन्धात्मक परीक्षा विद्यार्थियों में रटने की प्रवृत्ति को बढ़ाती है।

निबन्धात्मक परीक्षा आत्माभिव्यक्ति लेखन शैली तथा अलंकरित भाषा अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट माध्यम है। अनेक दोषों के होते हुए भी भाषा शिक्षण से निबन्धात्मक परीक्षा को अलग नहीं किया जा सकता है। साहित्य सुन्दर ललित भाषा में लिखित अभिव्यक्ति करण के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अच्छी अभिव्यंजनक किसी को भी आकर्षित करने की प्रद्भुत क्षमता रखती है। निबन्धात्मक परीक्षा के माध्यम से अच्छे निबन्ध, आलोचना, समीक्षाएँ, वैचारिक लेख, अविस्मरणीय पत्र लेखन आत्मकथाएँ आदि की अभिव्यक्ति की क्षमता उत्पन्न की जाती है। अच्छी स्मरण शक्ति तथा उसके श्रेष्ठ तरीके से अभिव्यक्त करना निबन्धात्मक परीक्षा के द्वारा ही सम्भव है। निबन्धात्मक परीक्षा एक आवश्यक बुराई है क्योंकि-

(1) निबन्धात्मक परीक्षा में विश्वसनीयता का अभाव होने के बावजूद इसके द्वारा प्रभावित एवं सम्बद्ध चिन्तन के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

(2) निबन्धात्मक परीक्षा में सीमित प्रतिनिधित्व तथा वैधता का अभाव होने के बावजूद इसके छात्रों को प्रत्युत्तर देने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है।

(3) निबन्धात्मक परीक्षा में भविष्य कथन का अभाव होता है फिर भी निबन्धात्मक परीक्षा शिक्षक को यह जानने में सहायता देती है कि बालक अपने विचारों को स्पष्टतः एवं अच्छी भाषा में व्यक्त कर सकता है या नहीं।

(4) निबन्धात्मक परीक्षा अधिक लिखने के कारण लेख दोष आ जाता है फिर भी निबन्धात्मक परीक्षा छात्रों की अच्छी भाषा लिखने का प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

(5) निबन्धात्मक परीक्षा में आत्मनिष्ठता तथा अंकन में अनिश्चितता का दोष होने के बाद भी यह परीक्षण पाठ्य वस्तु के विस्तृत पक्षों की विवेचना करने उन पर तार्किक क्रम से निबन्ध लिखने उनको आत्मसात करने और उनकी आलोचना व मूल्यांकन करने के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

(6) निबन्धात्मक परीक्षण में प्रश्नों की संख्या पूरे पाठ्यक्रम के अनुपात में कम होने का दोष माना जाता है किन्तु इस परीक्षा में छात्रों को सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के माध्यम से अपने विचारों को शुद्ध एवं क्रमबद्ध रूप से स्मरण करने संगठित करने एवं उन्हें अभिव्यक्त करने के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

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