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बीए सेमेस्टर-4 राजनीति विज्ञान

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2746
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-4 राजनीति विज्ञान - सरल प्रश्नोत्तर

स्मरण रखने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य

थॉमस हॉब्स ने अपने युग के राजनीतिक परिदृश्य में जो परिवर्तन देखे हैं, उनसे उसे विश्वास हो गया कि मानव सभ्यता की रक्षा के लिए सुदृढ़ शासन व्यवस्था जरूरी है।

हॉब्स को ऐसा लगा कि विज्ञान की नई विधि का प्रयोग करते हुए उसे सच्चे राजनीति दर्शन के द्वार का ताला खोलने के लिए कुँजी मिल गई है।

हॉब्स ने अपने आपको राजनीति के विज्ञान का प्रवर्तक घोषित कर दिया।

राजनीति विज्ञान की स्थापना का अर्थ होगा ऐसी परिभाषाएँ प्रस्तुत करना जिनके आधार पर कॉमनवेल्थ स्थापित किया जा सके और उसके आवश्यक नियम प्राप्त किए जा सकें।

नागरिक शासन की रचनाएँ घड़ियों के तुल्य हैं। जैसे- कोई यन्त्र अपने हिस्सों का जोड़ होता है, वैसे ही राज्य भी व्यक्तियों का समुच्चय है।

प्राकृतिक स्वतन्त्रता केवल अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार दूसरों को धर दबोचने और लूट लेने की आजादी है।

ऐसी हालत में लड़ाई-झगड़े और छीना-झपटी का बोल-बाला रहता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध प्रत्येक व्यक्ति की लड़ाई की दशा है।

प्राकृतिक समानता का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक क्षमताओं की दृष्टि से कोई मनुष्य किसी दूसरे से कम नहीं होता।

राज्य की स्थापना का मूल कारण मनुष्यों की दूरदर्शिता है जो यह अनुभव करते हैं कि नागरिक समाज (Civil Society) आत्मरक्षा और सन्तुष्ट जीवन का एकमात्र साधन है।

हॉब्स ने प्रभुसत्ता से जुड़ी हुई शक्ति की आवश्यकता पर बल दिया है। लेवियाथन के अनुसार, तलवार की ताकत के बिना प्रतिज्ञा पत्र कोरे शब्द-जाल होते हैं जो मनुष्य को सुरक्षा प्रदान करने में तनिक भी समर्थ नहीं होते हैं।

हॉब्स के राजनीतिक चिन्तन का केन्द्र व्यक्ति है।

सकारात्मक कानून का मूल स्रोत प्रभुसत्ताधारी की इच्छा है।

सरकार चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो उसकी उत्पत्ति जनसाधारण की इच्छा और जनसाधारण के हित साधन के उद्देश्य से हुई है।

प्रभुसत्ता के बिना राज्य के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती।

गैलीलियो की यान्त्रिकी से प्रभावित होकर हॉब्स ने यह विचार रखा कि सम्पूर्ण प्रकृति की व्याख्या यान्त्रिक दृष्टि से की जा सकती है। परन्तु मानव प्रकृति पर ही यह बात लागू होती है।

मनुष्य निरन्तर सक्रिय रहने वाला प्राणी है। व्यक्ति अपने आप में इच्छाओं का समुच्चय है जो उसे निरन्तर गतिमान रखती है।

हम मानव स्वभाव में संघर्ष के तीन मुख्य कारण देखते हैं- प्रतिस्पर्द्धा, भय और यश। प्रतिस्पर्द्धा के कारण वे लाभ के लिए, भय के कारण रक्षा के लिए और यश के कारण प्रसिद्धि के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहते हैं।

शक्ति ही सत्य है, कोई भी जो कुछ भी ले सके और जितना देर अपने पास रखने में समर्थ है वही उतने समय के लिए उसका है।

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