बी ए - एम ए >> बीए सेमेस्टर-4 गृह विज्ञान बीए सेमेस्टर-4 गृह विज्ञानसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीए सेमेस्टर-4 गृह विज्ञान - सरल प्रश्नोत्तर
स्मरण रखने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य
प्रसार शिक्षा का महत्व - प्रसार शिक्षा के निम्नलिखित महत्व हैं-
प्रसार शिक्षा के माध्यम से पूरे विश्व में हो रहे तकनीकी विकास एवं शोधों के बारे में जानकारी मिलती है। इस जानकारी का उपयोग अपने रोजगार को बढ़ाने तथा नये रोजगार के अवसरों को प्राप्त करने में किया जा सकता है। इस तकनीकी जानकारी के माध्यम में आगे बढ़ने के नये अवसर भी मिलते हैं।
प्रसार शिक्षा के माध्यम से लोग अपने ही व्यवसाय से जुड़े अन्य लोगों के अनुभवों से लाभान्वित होते हैं। इसके परिणामस्वरूप उन्हें अपनी समस्याओं को दूर करने तथा अपने द्वारा की गयी गलतियों को भी सुधारने का अवसर मिल जाता है।
प्रसार शिक्षा के माध्यम से ग्रामीण विकास को एक नई दिशा मिलती है। इसके माध्यम से गाँवों की दशा निश्चित रूप से सुधरती जा रही है तथा ग्रामीणों के जीवन स्तर में भी बहुत बड़ा बदलाव आया है और उनका जीवन स्तर भी ऊँचा उठा है।
प्रसार शिक्षा के द्वारा लोगों को अपने काम का सही मुआवजा मिलने के फलस्वरूप लोगे का ध्यान अपने काम-धंधों में अधिक लगने लगा है। लोग अपना काम बहुत मन लगाक करते हैं, जिसका परिणाम भी अच्छा प्राप्त होता है। देश के विकास के लिए यह एक अच्छ संकेत है।
प्रसार शिक्षा द्वारा मनुष्य सीखने की क्रिया के साथ-साथ अपने व्यवहार तथा मनोवृत्ति में भी परिवर्तन लाता है। ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ व्यक्ति यह भी जान सकता है कि उसकी क्या आवश्यकताएं हैं, उसके नैतिक मूल्य क्या हैं और इसके प्रति उनकी मनोवृत्ति कैसी होनी चाहिए।
डगलस एंस्मिजर के अनुसार - "प्रसार शिक्षा परिवर्तन के सिद्धान्त पर आधारित है। इसमें मनोवृत्ति तथा पद्धति में परिवर्तन लाने पर जोर दिया जाता है। यह परिवर्तन उन व्यक्तियों में लाने की कोशिश की जाती है, जिनके साथ काम किया जाता है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि प्रसार की प्रकृति पारस्परिक एवं सहयोगात्मक व्यवहार पर आधारित है।
जे. पी. लिगनस के अनुसार - "प्रसार शिक्षा एक व्यवहारिक विज्ञान है जिसकी विषय वस्तु क्षेत्रों के अनुभवों से एकत्रित शोधों तथा संबंधित सिद्धान्तों से उद्गमित होती है, जिसका दर्शन, सिद्धान्त, विषय वस्तु विधियाँ, उपयोगी तकनीकों के विकास द्वारा विद्यालयी शिक्षा की सीमा के बाहर के युवाओं तथा प्रौढ़ों की समस्याओं को सुलझाने के लिए केन्द्रित होती है।'
ओ. पी. दहामा के अनुसार - "प्रसार शिक्षा एक शैक्षणिक विधि है, जिसके अन्तर्गत ग्रामीण लोगों को उनकी उन्हीं विशिष्ट स्थानीय परिस्थितियों में ही उन्नत पद्धति के बारे में जानकारी दी जाती है तथा अच्छे प्रकार से उन्हें समझाकर निर्णय लेने में उनकी मदद की जाती है।'
डॉ रंजीत सिंह के अनुसार - "प्रसार शिक्षा एक विज्ञान है जो संबंधित व्यक्तियों के व्यवहार में शैक्षणिक विधियों का उपयोग करके उनमें परिवर्तन लाती है। यह अपने स्वयं के प्रयासों से अपने सामान्य रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने का तरीका भी सिखाती है।"
एस. वी. सुपे के अनुसार - "प्रसार शिक्षा ग्रामीण लोगों की शिक्षा है जो उन्हें नियमित संस्थागत विद्यालयों तथा कक्षाओं की सीमाओं के बाहर ही उनके सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास के लिए दी जाती है।'
ए. एडीवी रेड्डी के अनुसार - "प्रसार शिक्षा सामुदायिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने का एक साधन है जिसके अन्तर्गत अनेक तथ्यों, क्षेत्रों तथा विषय वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है जिसमें कृषि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।'
प्रसार शिक्षा का आधार ग्रामीण जीवन है।
प्रसार शिक्षा का उद्भव ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में हुआ है। ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोन सन 1873 में किया था।
भारत में कृषि सम्बन्धी अनुसंधानों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिटयूट की स्थापना पूसा, बिहार में सन् 1908 में की गई थी।
प्रसार शिक्षा के माध्यम से ग्रामीण विकास को एक नई दिशा मिली है। इसके द्वारा गाँवों की दशा निश्चित रूप से सुधरती जा रही है तथा ग्रामीणों के जीवन स्तर में भी परिवर्तन हुए हैं।
प्रसार शिक्षा को अध्ययन की दृष्टि से शैक्षिक उद्देश्य, भौतिक उद्देश्य, सामाजिक उद्देश्य, सामुदायिक उद्देश्य तथा सांस्कृतिक उद्देश्य में विभाजित किया गया है।
प्रसार शिक्षा के शैक्षिक उद्देश्यों के अन्तर्गत मनुष्य के ज्ञान, मनोवृत्ति तथा कार्यक्षमता में परिवर्तन लाना लक्षित किया गया है।
प्रसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों को शिक्षित करना है।
जनसंचार माध्यम भी प्रसार शिक्षण के व्यावहारिक पक्ष को लक्षित करके अपना कार्य सम्पादन करते हैं।
प्रसार शिक्षा के द्वारा शैक्षिक स्तर में विकास के साथ-साथ व्यक्ति में जागरूकता आती है।
प्रसार शिक्षा के द्वारा शिक्षित ग्रामीण कृषि सम्बन्धी पत्र-पत्रिकाओं का समुचित लाभ उठाकर अपने उद्योग को बढ़ा सकते हैं।
'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यह कथन अरस्तू का है, यह छोटा सा वाक्य व्यक्ति तथा समाज के परस्पर सम्बन्धों की व्याख्या करता है।.
प्रसार कार्य के अन्तर्गत एक सुदृढ़ सामाजिक परिवेश की परियोजना की जाती है जो मानव विकास में सहायक हो।
प्रसार शिक्षा के माध्यम से सूचनाएँ तथा जानकारियाँ ग्रामीणों तक पहुँचायी जाती हैं।
डॉ. रंजीत सिंह ने प्रसार दर्शन को निम्नलिखित विचारों पर आधारित माना है-
(i) समाज में घर आधारभूत इकाई है।
(ii) प्रजातंत्र में व्यक्ति सर्वोपरि है।.
(iii) परिवार प्रथम मौलिक मानवीय समूह है।
(iv) व्यवहार में परिवर्तन एक धीमा प्रक्रम है।
(v) प्रत्येक नए परिवर्तन का सामना प्रतिरोध से होता है।
(vi) विज्ञान तथा तकनीकी में विश्वास।
(vii) सामाजिक न्याय के प्रति आस्था।
प्रसार शिक्षा का सीधा सम्बन्ध मानव जीवन तथा उससे जुड़ी हुई दैनिक समस्याओं से है।
प्रसार शिक्षा को सही ढंग से समझने के लिए इसे तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
(i) मनुष्य के निजी विकास का क्षेत्र।
(ii) मनुष्य जिस वातावरण या परिवेश में रहता है, उसका विकास।
(iii) मानव निर्मित संस्थाओं और साधनों का विकास एवं उन्नति।
प्रसार कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण एवं अभिन्न अंग है - वयस्क शिक्षा।
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