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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
प्रश्न- भारत में बलात्कार का कानून कब बना था? क्या इसके बनने के बाद बलात्कारों की संख्या में कमी आई है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
बलात्कार के सन्दर्भ में 1983 में अदालत ने जो फैसला दिया उसके अनुसार बलात्कार से पीड़ित महिला को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए कोई प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं थी। अदालत ने यह कहा कि जैसी स्थिति हमारे देश में है, इसके अनुसार स्त्री के लिये यह प्रमाण देना कि उसने बलात्कार का विरोध किया है यह बताना उसके घाव पर नमक छिड़कने के समान है। अब उसे बताने की जरूरत नहीं है। भारतीय साक्ष्य (संशोधन) बिल 2002, जिसमें 1872 के मूल अधिनियम में से दो धाराओं को हटा दिया है, इस बात को स्पष्ट करता है कि बलात्कार का शिकार सामान्यतः अतिनीक चरित्र का व्यक्ति होता है।
न्यायपालिका की क्रियाशीलता पर जोर देने वाले 1983 के संशोधन के अनुसार बलात्कार के कानून में आज भी बलात्कार से पीड़ित होने वाली स्त्रियाँ न्यायालय के सामने नहीं आती हैं और इसलिए इसकी कोई रिपोर्ट हमें नहीं मिलती। कोर्ट के सामने नहीं आने का कारण यह है कि इसके साथ में एक सामाजिक कलंक लगा हुआ है और स्त्रियाँ इससे बचने की कोशिश करती हैं। इस जनता में भी यह जागरूकता नहीं है कि बलात्कार जैसे अमानवीय घटनाओं का विरोध करें।
बलात्कार स्त्रियों के सशक्तीकरण के लिए एक गंभीर चुनौती है। बलात्कार यह भय बना रहता है कि स्त्रियाँ सामाजिक गतिशीलता के महत्वाकांक्षा नहीं रख पाती। माता-पिता भी अपनी लड़कियों के जीवन के ऊँचे मूल्यों को प्राप्त करने के लिये प्रेरित नहीं कराते। लेकिन समानता के प्रयत्न भी स्त्रियों के साथ यौन दुर्व्यवहार के बिना रोक-टोक चलते रहने के कारण आगे नहीं बढ़ पाते।
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