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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
प्रश्न- यौन उत्पीड़न के स्वरूपों की व्याख्या कीजिए।
लघु उत्तरीय प्रश्न
- बलात्कार किसी पीड़ित को किस प्रकार प्रभावित करता है?
- सर्वोच्च न्यायालय ने कार्य स्थल पर उत्पीड़न के कितने प्रकार निर्धारित किए हैं?
उत्तर-
यौन उत्पीड़न के कई स्वरूप हैं। एक स्त्री को उसके काम की जगह पर उत्पीड़ित किया जा सकता है या उसे घर या गली-कूचे में परेशान किया जा सकता है। नीचे के भाग में हम यौन उत्पीड़न के दो महत्वपूर्ण स्वरूपों का विवेचन करेंगे।
(1) बलात्कार
(2) काम के स्थान पर उत्पीड़न।
बलात्कार
बलात्कार वह क्रिया है जिसमें बलपूर्वक स्त्री के साथ लैंगिक अंतःक्रिया की जाती है और जो उसकी इच्छा के विपरीत होती है। किसी भी लड़की के साथ उसका बिना स्वीकृति अथवा सहमति के संबंध रखा जाता है या किसी और के साथ धमकाकर जब यौन संबंध रखा जाता है तो इसे बलात्कार कहते हैं।
आज के समय में बलात्कार की घटनाएँ भयावह रूप से बढ़ रही हैं। यह एक चौंकाने वाली बात है लेकिन सही है कि कई स्त्रियाँ जब पुलिस थाने में अपनी शिकायत करने गयीं तो पुलिस वालों ने उनका बलात्कार किया। इस सम्बन्ध में मथुरा जेल में 16 वर्ष की आदिवासी लड़की के साथ पुलिस कस्टडी में जो बलात्कार हुआ उसने गैर महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बहुत हो-हल्ला मचाया। धार्मिक रूढ़िवादियों ने इसे साम्प्रदायिकता का जामा पहनाया। इसकी वजह से कई बार साम्प्रदायिक संबंध पैदा होते हैं। यह तथ्य भी अविश्वसनीय है कि जिसे सुरक्षा स्वर्ग कहते हैं वह सुरक्षा सिद्ध नहीं होता। घर के लोगों में से ही पुरुष नातेदार किशोर लड़कियों का बलात्कार करते हैं।
बलात्कार न केवल शारीरिक नुकसान पहुँचाता है बल्कि गंभीर शारीरिक दर्द भी देता है और मनोवैज्ञानिक समस्याएँ भी उत्पन्न करता है। यदि बलात्कार की शिकार कोई युवती या किशोरी होती है (आजकल छोटी बच्चियों का भी बलात्कार होता है) तब वह जानती भी नहीं कि उसके साथ क्या हो रहा है। जो कुछ इस उम्र में लड़की के साथ हो रहा है वह बाद में चलकर वयस्क अवस्था में उसके लिए हानिकारक हो सकता है। इस लड़की के साथ में जो मनोवैज्ञानिक वेदना होती है वह उसके जीवन काल तक चलती रहती है।
कार्यस्थल पर यौन दुर्व्यवहार
बलात्कार एक ऐसा यौन-उत्पीड़न है जो आसानी से ध्यान में आ सकता है। लेकिन यौन दुर्व्यवहार का एक स्वरूप भी है जो अब तक किसी को मालूम नहीं था और किसी ने इसकी चिंता भी नहीं की। इसका तात्पर्य मारपीट और दुर्व्यवहार से नहीं, जिससे स्त्री अपने काम के स्थान पर अनुभव करती है चाहे काम का स्थान दफ्तर हो या खेती-बाड़ी का स्थान। यह अपराध की श्रेणी में नहीं आता है क्योंकि काम करने वाली स्त्रियों को इस यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। लेकिन अधिकांश महिलाओं को आर्थिक दबाव के कारण स्त्रियाँ यह दुर्व्यवहार सहन करना पड़ता है। पुरुष प्रधानता के सम्पर्क आसानी से बढ़ सकते हैं कि यदि कार्यस्थल पर काम करने वाली स्त्रियाँ के लिये यदि असहायता हो तो स्त्रियाँ को अपने घर से बाहर जाने करने से पहले सोचना चाहिए। अगर स्त्री अपने सम्मान के लिये इतनी गंभीर नहीं है तो वह घर के अन्दर ही रहे।
सर्वोच्च न्यायालय ने कार्य स्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न से सम्बंधित पाँच प्रकार के व्यवहारों के घटित होने का उल्लेख किया है—
- शारीरिक स्पर्श और यौन आचरण हेतु कुछ सुझाव देना।
- धमकाना अथवा यौन प्रसंगों के लिये आग्रह करना।
- यौन सम्बंधी भाषा का प्रयोग करना।
- अश्लील साहित्य का प्रदर्शन करना।
- कोई भी ऐसा शारीरिक और मौखिक कार्य जिसके अन्तर्गत अनचाहे यौन सम्बन्धी तत्व या तथ्य शामिल हों।
सर्वोच्च न्यायालय ने सभी नियोक्ताओं को चाहे संगठित क्षेत्र में हो या असंगठित, यह आदेश दिया कि वे यौन उत्पीड़न पर नियंत्रण रखने के लिये एक कमेटी बनायें। इस कमेटी का कार्य यह होगा कि वह यौन उत्पीड़न की सभी मामलातों पर ध्यान रखे और उचित कार्यवाही करें। इस प्रावधान के होते हुए भी आज भी कई संगठनों ने ऐसी कमेटियाँ नहीं बनाई हैं और न स्त्री कर्मचारी अपने अधिकारों के बारे में जागरूक हैं। यह भी सत्य है कि उचित प्रमाण के अभाव में कई मामलों का निपटारा हो जाता है। इतना होने पर भी यह संदिग्ध है कि यौन उत्पीड़न की घटनाओं के मामलों में कानून के प्रावधान के अन्तर्गत न्याय की आशा की जा सकती है।
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