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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
इकाई-4
लैंगिक न्यायशास्त्र (भारतीय संदर्भ में)
[Gender Jurisprudence (In Indian Perspective)]
अध्याय 12 - परिवार, पड़ोस तथा औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं में यौन-उत्पीड़न के प्रति जागरूकता के महत्व को समझना
[Understanding the importance of Awareness of sexual harassment in family, neighbourhood and other formal and Informal institutions]
प्रश्न- घरेलू दुर्व्यवहार किसे कहते हैं?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- स्त्रियों के साथ परिवार में किस प्रकार की घटनाएँ घटित होती हैं? तथा उन पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है?
- घरेलू हिंसा का क्या कारण है?
उत्तर-
औरतों के साथ दुर्व्यवहार घर या घर से बाहर कहीं भी घटित हो सकता है। सामान्यतया परिवार एक ऐसा सुरक्षित स्थान माना जाता रहा है जहाँ स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं हो सकता लेकिन स्त्रियों का यह भ्रम भी दूर हो जाता है जब उन्हें अपने मका मे ही दुर्व्यवहार का सामा करना पड़ता है। घरेलू दुर्व्यवहार या हिंसा वह विनाशकारी कार्य है जो घर में स्त्री को आहत करता है या चोत या हानि पहुँचाता घरेलू मामला है और इसमें उनकी कार्यवाही नहीं है। देखा यहाँ तक गया है कि पुलिस भी इसे घरेलू हिसा मानकर कोई कार्यवाही नहीं करती। समाज तो इसमे तब ही दखल देता है जब स्त्री की हत्या हो जाती है, वह आत्महत्या कर लेती है या उसे कोई गंभीर चोट लगती है। इस अवस्था में पहुँचने पर स्त्री को जो हानि होती है वह तो हो ही जाती है। एक उदाहरण द्वारा समझने का प्रयास कीजिए। यहाँ आशा नामक लड़की के जीवन की घटनाओं को बताया गया है आशा के साथ बराबर उत्पीड़न होता था और प्रतिदिन उसके ससुराल पक्ष वाले पति औऱ उसकी बहिनें तंग करती थीं। इस दुर्व्यवहार का कारण दहेज की माँग थी। पड़ोसी अच्छी तरह से जानते थे कि आशा के साथ क्या हो रहा था लेकिन वे इसकी सूचना पुलिस को नहीं देते थे एक रात, आशा को आग को समर्पित कर दिया गया और तब आशा के माता-पिता का ध्यान इस भयानक दृश्य की ओर आकर्षित हुआ। आशा के सारे शरीर के जल जाने के बाद वह मूर्च्छित हो गई। माता-पिता के आने मे देरी हो चुकी थी। उन्हें सात्वना देना बहुत मुश्कित था। आशा ने बराबर शिकायत की थी कि उसके साथ दुर्व्यवहार हो रहा हैं लेकिन उसके माता-पिता और भाइयो ने बताया कि उसका स्थान तो पति का घर ही है और इस तरह के मसले अपने आप सुलझ जायेगेष आशा का यह मामला कोई अकेली घटना नहीं है। अनगिनत स्त्रियाँ इस तरह से घरेलू हिंसा की शिकरा होती हैं और ऐसे शारीरिक तथा मानसिक दुर्व्यवहार वैवाहिक जीवन में बेरोक टोक चलते रहते हैं।
सामान्यतः घरेलू हिंसा का प्रभाव मानसिक ही होता है लेकिन दुर्व्यवहार में स्त्रियों की 'किसी अधिकार' की सीमाएँ भी सम्मिलित हो जाती हैं। इस घटना को देखते हुए आमपूरी समझ में आ जाएगा कि दुर्व्यवहार का तात्पर्य क्या है। लड़की को स्कूल नहीं भेजा जाता और उसे घर का काम करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है। उसे पौष्टिक भोजन नहीं दिया जाता जबकि लड़के को बढ़िया भोजन और शिक्षा दी जाती है और विकास के लिए समस्त सुविधाएँ भी प्रदान की जाती हैं। इस घटना में यदि लड़की के साथ मारपीट नहीं की जाती और न इसमें गाली-गलौज होता है, होता यह है कि लड़की को जो अधिकार प्राप्त हैं, वह नहीं मिलते और इसलिए यह बंधन होता है।
यह दिल हिला देने वाली बात है कि तीस प्रतिशत स्त्रियाँ घर में होने वाले दुर्व्यवहार से पीड़ित हैं। घरेलू दुर्व्यवहार जैसे कि पत्नी की पीटना, लड़कियों को गाली-गलौज करना, दहेज के लिए प्रताड़ित करना जिसका अंत दहेज के कारण मृत्यु या स्त्री के घर से बाहर निकलने नहीं देना आदि शामिल हैं। घरेलू दुर्व्यवहार एक ऐसी संकृति से जुड़ा हुआ है जो मौन की संस्कृति है और स्त्री कुछ भी बोलती नहीं हैं और सारे मसले को व्यक्तिगत कहकर टाल देती हैं। स्थिति यह भी होती है कि पास-पड़ोस के लोग इस घरेलू दुर्व्यवहार को जानते हैं और यह कहकर छोड़ देते हैं कि यह दूसरों का मसला है। अधिकांश परिवारों में आदमी और स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से आत्म निर्भर नहीं हैं और भी स्वतंत्र रूप से फैसले नहीं ले सकतीं और तब उन स्त्रियों की स्थिति की कल्पना कीजिए जो अपने पति के अधीन हैं और जिन्हें अपने फैसले लेने का कोई अधिकार नहीं है। समाज में यह माना जाता है कि घर में पुरुष स्वामी होता है और स्त्री अधीनस्थ। अक्सर समाज का यह रवैया यही रहता है कि दुर्व्यवहार को सहन करें और इस तरह परिवार का सम्मान भी क्षति से बचा रहे। यह बात भी नहीं है कि स्त्रियों की सहायता करने वाली संस्थाएँ जैसे कि शरणार्थी और सुरक्षा देने वाली स्वयंसेवी संस्थाएँ बहुत कम हैं जहाँ जाकर स्त्रियाँ रह सकें। घर या घर से बाहर शरण देने वाली संस्थाओं के अभाव में स्त्रियों के लिए घरेलू हिंसा बहुत बड़ा खतरा है।
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