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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :215
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2702
आईएसबीएन :0

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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

प्रश्न- क्या पाठ्यपुस्तकों में अप्रत्यक्ष विधि से लिंगीय पक्षपात को दर्शाया है?

उत्तर-

पाठ्य पुस्तकों में लिंगीय प्रतिनिधित्व या पक्षपात निम्नलिखित उदाहरणों से समझाया जा सकता है—

पाठ्यपुस्तकों में सामाजिक लिंग आधारित वास्तविकता की अभिव्यक्ति

विशेष तौर पर पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान (जिसे विद्यालयों में 'अधिकारिक ज्ञान' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है)। विश्लेषण इस संदर्भ में करना आवश्यक हो जाता है कि किस तरह से पाठ्यपुस्तकें सामाजिक लिंग आधारित वास्तविकता को अभिव्यक्त करती हैं? तथा वे कौन-सी विरोधाभासी हैं जो पुस्तकों में अभिव्यक्त होती हैं तथा नारीत्व व पुरुषत्व आधारित व्यवहार को मजबूत करती हैं।

पुरुषवादी विचारधारा की अधिकता

अधिकतर पाठ्यपुस्तकों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि औपचारिक विद्यालय पाठ्यक्रम में पुरुषवादी विचारधारा अधिक पाई जाती है व महिला पक्ष की उपेक्षा की गई है।

लैंगिक भेद को दर्शाने वाली पाठ्यपुस्तकें

पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान को विद्यालयों में आधिकारिक ज्ञान के रूप में देखा जाता है। इनमें जो ज्ञान/सूचना/भाषा/चित्र आदि प्रस्तुत किए गए हैं, वे ही लैंगिक भेद को दर्शाते हैं।

प्रश्न- पाठ्य विषयों का चयन भविष्य की भूमिका निर्धारित करता है। क्या यह तथ्य सही है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर-

यह पाया गया है कि विद्यालयों में लड़कियों को 11वीं कक्षा में अतिरिक्त विषय के रूप में सिलाई-कढ़ाई, पेंटिंग या गृह कला में से एक को चुनना होता है जबकि लड़कों को बेसिक कम्प्यूटर, टाइपिंग, पेंटिंग में से एक का चयन करना होता है। कुछ विद्यालयों में गृहविज्ञान बालिकाओं के लिए अनिवार्य है जबकि बालक उसके बदले शारीरिक शिक्षा का चयन कर सकते हैं। विषयों के चयन के अवसर को लेकर इस प्रकार के दोहरापन से यह सवाल उठता है कि क्यों बालिकाओं को ही ऐसे विषयों में प्रशिक्षण देने पर बल दिया जा रहा है? जेंडर विषयक समाज में उनकी भूमिका का निर्धारण करते हैं। यहां यह कहना गलत न होगा कि विषयों का यह विभाजन मात्र ज्ञान के वितरण की समस्या नहीं है बल्कि ये भविष्य की भूमिकाओं के निर्धारण का भी मामला है।

पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम तथा पाठ्यपुस्तकों में भी इस बात पर विशेष रूप से ध्यान रखा जा रहा है कि लैंगिक समानता के दृष्टिकोण का विकास करने वाले विषयों को इसमें समाविष्ट किया जाए। पाठ्यपुस्तक में बच्चों में लैंगिक समानता का विकास करने वाली विषयवस्तु का समावेश हो तो निश्चित रूप से स्वस्थ मानसिकता लेकर बच्चों का विकास होगा। इसका कारण यह है कि पाठ्यपुस्तक ही एकमात्र ऐसा साधन है जो विद्यालय जाने वाले प्रत्येक छात्र-शिक्षक के पास उपलब्ध होता है। शिक्षक भले ही शिक्षण प्रक्रिया के दौरान किसी सहायक सामग्री का उपयोग न करें पर पाठ्यपुस्तक का उपयोग तो प्रत्येक शिक्षण करता ही है।

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