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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
प्रश्न- श्रम बाजार (औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन) में महिलाओं के प्रति किस प्रकार का भेदभाव दिखाई देता है?
उत्तर-
परंपरागत रूप से श्रम बाजार में महिलाओं और पुरुषों के प्रतिनिधित्व में भिन्नताएं और मजदूरी में भी विविधताओं की व्याख्या, महिलाओं की निम्न उत्पादक, उपयुक्त दशा और प्रशिक्षण के दृष्टि से मानव पूंजी में उनका निम्न स्तर और पारिवारिक उत्तरदायित्वों के आधार पर, जो कि श्रम बाजार में अधिक भागीदारी में बाधक बनता है, आधारों पर की जाती है। फिर भी लिंग (जेंडर) की सांस्कृतिक और सामाजिक रचना श्रम बाजार में पुरुषों और महिलाओं की अभिव्यक्ति के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पुरुषों और महिलाओं के जीव विज्ञान संबंधी विभिन्न और अभिवृति की समझ या बोध से कार्य स्थान को लिंग संबंधित निर्धारित (जेंडरिंग) होता है।
महिलाओं की अभिव्यक्ति के बारे में निर्णय श्रम के लैंगिक विभाजन के लिंग (जेंडर) विशेष रचना के आधार पर होता है जिसके अनुसार महिलाओं को बच्चों तथा बुजुर्गों की शिक्षा का ख्याल रखने वाली, भोजन बनाने वाली या गृहकार्य करने वाली के रूप में देखा जाता है। उनकी लैंगिकता को समझने-समझाने, निष्क्रियता तथा शांत रहने का वाहक माना जाता है।उनके लिंग (जेंडर) के हर पहलुओं को कार्यस्थल पर भी जब वे बाजार में प्रवेश करती हैं उनकी परिभाषा करने वाले के रूप में देखा जाता है। इस परिवेश पर आधारित कृतिपरक नौकरियों के स्थिरियता के रूप में वर्गीकृत किया गया है तथा उन नौकरियों में स्वतः ही महिलाओं की बहुलता है, उदाहरण के लिए, पालन, परिचर्चा, तर्क के काम इत्यादि। इतना ही नहीं महिलाओं की आय को प्रारंभिक नहीं माना जाता है अपितु पुरुष की आय को ही अनुकंपर माना जाता है और इसलिए उनकी होम प्रतिष्ठा मानी जाती है, कौशल का कम विकास हो जाता है तथा वेतन मिलता है। इस प्रकार लिंग (जेंडर) विषयक भूमिकाओं की रचना श्रम बाजार के लिए मजदूरी के आधार बनाता है। समकालीन अवधि में श्रम बाजार में अधिक-से-अधिक महिलाओं का प्रवेश हो रहा है, इस तथ्य के बावजूद यही प्रवृत्ति जारी है।
श्रम बाजार की लिंग विषयक रुढ़िवादिता की प्रक्रिया लिंग पर आधारित रूढ़िवादी भूमिका का पुनः प्रबल बनाते हैं। अतः दोनों प्रक्रियाओं के आपस में एक-दूसरे की पूरक: सबल बनाने के रूप में उभरकर बन जाती हैं और उस तरह यह समाज में लिंग विषयक भूमिका को संस्थागत करने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करती है।
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