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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
प्रश्न- क्या सभी समाजों में लिंग विषयक भूमिकाएं समान हैं?
उत्तर-
नहीं, ऐसा नहीं है। अलग-अलग समाजों में लिंग (जेंडर) विषयक भूमिकाएं और लिंग (जेंडर) विषयक अपेक्षाओं की प्रकृति अलग है क्योंकि इनकी रचना सामाजिक ही रहती है। लिंग (जेंडर) विषयक भूमिकाएं बहुविध हैं। लिंग (जेंडर) विषयक भूमिकाएं (i) स्त्री एवं पुरुष के विशेष अवधारणाएं निर्धारित करती हैं। (ii) विशेष सामाजिक प्रणाली के पोषण के लिए अत्यावश्यक है। स्त्रियों-पुरुषों को विशेष और विभिन्न कार्यकलाप, क्षेत्र अथवा कार्य निर्धारित करते हैं। (iii) संस्कृति और समाजों द्वारा विषयपरक मूल्य निर्धारित जिसमें महिलाओं को अधीनस्थ स्थिति प्रदान की गई है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध स्त्री अधिकारवादी सिमोन दी बिवोयर का यह कहना कि महिलाओं का जन्म नहीं होता, उन्हें महिला बनाया जाता है, यह कथन अत्यंत ही उपयुक्त है। इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति को विशेष रूप से निर्मित पुरुषत्व या स्त्रीत्व की स्थिति के तहत देखा जाता है। लिंग (जेंडर) विषयक स्वभाव, नियतिवाद व पुरुषत्व वर्चस्व की सामाजिक गूंज है। यद्यपि, लिंगिक (जेंडर) पहचान की सामाजिक रचना परिवर्तनशील है क्योंकि स्व, निकाय, प्रकृति और स्त्रियों ऐतिहासिक रूपों में विविध रूप से विकसित होते हैं और सामाजिक व्यवस्थाओं से संबंध परिवर्तनशील होते हैं। हमारी पहचान और उससे समझ अधूरी तरह है। इसलिए लिंग विषयक पहचान को अधिकतम हो सकता है। उदाहरण के लिए, राजनीतिक लाभबंदी के माध्यम से उत्तरी सामाजिक रचना को समझना चाहिए जैसा कि पहले कहा जा चुका है समाज में सामाजिक रूप से रचित असमान लिंगिक भूमिकाओं को स्थान बनाने में विभिन्न सामाजिक एजेंसियां सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
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