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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
प्रश्न- लैंगिक समानता को सुदृढ़ बनाने में पाठ्य-पुस्तकों की क्या भूमिका है?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- पाठ्यक्रम में आदर्शवादी पाठ्य-पुस्तकों का समावेश क्यों करना चाहिए?
- नैतिकता पर आधारित पुस्तकों को पाठ्यक्रम में किस स्तर में सम्मिलित करना चाहिए?
उत्तर-
लैंगिक समानता को सुदृढ़ बनाने में पाठ्यपुस्तकों की भूमिका पाठ्यपुस्तकों में निहित विषय-सामग्री के द्वारा भी लैंगिक समानता को सुदृढ़ बनाया जा सकता है। जैसे— हिंदी की पुस्तकों में महादेवी वर्मा, सरोजिनी नायडू आदि के जीवन को स्थान देने से बालिकाओं में उनके आदर्शों पर चलने की भावना जाग्रत होती है तथा लैंगिक समानता का मार्ग भी प्रशस्त होता है। अतः लैंगिक समानता को सुदृढ़ बनाने में पाठ्यपुस्तकों की भूमिका का वर्णन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है—
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आदर्शवादी पाठ्यपुस्तकों का समावेश— विद्यालय में आदर्शवादी पाठ्य-पुस्तकों को सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि आदर्शों के अभाव में लैंगिक असमानता को समाप्त नहीं किया जा सकता है। अतः प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर पर आदर्शवादी पाठ्य-पुस्तकों को स्थान दिया जाना चाहिए। इसी के द्वारा प्रत्येक बालक व बालिका में आदर्शों का विकास किया जा सकता है तथा आदर्शवादी बालक-बालिकाओं में लैंगिक असमानता की स्थिति नहीं देखी जाती है।
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सकारात्मक सोच आधारित पाठ्यपुस्तकें— प्रत्येक स्तर पर चयनित पाठ्यचर्या में उन पाठ्यपुस्तकों का समावेश अनिवार्य रूप से होना चाहिए जिसके द्वारा बालक व बालिकाओं में सकारात्मक सोच विकसित हो सके एवं महिला व पुरुष के मध्य किसी प्रकार के भेदभाव प्रदर्शित न हो पाए। इससे लैंगिक भेदभाव समाप्त होगा तथा सामाजिक स्तर पर भी इसका अनुकूल प्रभाव पड़ेगा।
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समानता की भावना का समावेश— पाठ्य पुस्तकों में समानता का भाव प्रदर्शित करने वाली विषय सामग्री का समावेश होना चाहिए ताकि बालक-बालिकाओं में समानता का भाव विकसित हो सके। प्राथमिक स्तर बालक-बालिका के सहयोग से समवर्ती कहानियाँ पढ़ाई जानी चाहिए।
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महिला के सशक्तीकरण का समावेश— महिला सशक्तीकरण से संबंधित सामग्रियों का समावेश पाठ्य-पुस्तकों में होना चाहिए। महिला सशक्तीकरण के उपायों से बालिकाओं में जागरूकता का विकास होता है एवं बालिकाएँ अपने अधिकारों से परिचित होती हैं। साथ ही बालक भी परिचित होते हैं जिससे वे बालिकाओं के प्रति सकारात्मक भाव रखते हैं। इससे भी लैंगिक समानता सुदृढ़ होती है।
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नैतिकता आधारित पाठ्यपुस्तकें— प्राथमिक स्तर पर ही नैतिकता आधारित पाठ्यपुस्तकों का प्रचलन होता है, जबकि इसका प्रचलन उच्च माध्यमिक स्तर तक होना चाहिए। नैतिकता आधारित पाठ्यपुस्तकों से बालक व बालिकाओं के नैतिक दायित्व निर्धारित किए जाते हैं, जिससे बालक-बालिकाओं में समानता का प्रदर्शन किया जाता है। जब प्राथमिक स्तर से उच्च माध्यमिक स्तर तक बालक व बालिकाएँ नैतिकता आधारित पाठ्य-पुस्तकों का अध्ययन करेंगे तो निश्चित ही लैंगिक समानता का विकास होगा।
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महिला जागरूकता आधारित पाठ्यपुस्तकें— पाठ्यपुस्तकों में महिला जागरूकता से संबंधित विषय सामग्रियों का समावेश करना चाहिए तथा बालक एवं बालिकाएँ दोनों इन प्रकारों को पढ़ें ताकि उन्हें छुआछूत एवं भेदभाव से मुक्त हो सके। साथ ही छात्र भी उन्हें जागरूक करने में सहायक होंगे। इससे भी लैंगिक समानता का विकास होगा।
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स्वतंत्रता की भावना का विकास— पाठ्यपुस्तकों की विषय सामग्री में महिला-पुरुष के अधिकारों का विवेचन होना चाहिए एवं प्रत्येक बालक व बालिका को अपनी स्वतंत्रता से संबंधित अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए। इस प्रकार के तथ्यों के अध्ययन के द्वारा दोनों (बालक व बालिका) एक-दूसरे की स्वतंत्रता पर, पर्यवेक्षण विचार करने में सक्षम होंगे। इससे भी लैंगिक असमानता का उन्मूलन होगा तथा लैंगिक समानता स्थापित होगी।
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