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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :215
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2702
आईएसबीएन :0

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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

प्रश्न- परिवार एवं गृहस्थी में श्रम के लैंगिक विभाजन पर प्रकाश डालिए। यह किस प्रकार लैंगिक भूमिका को निर्धारित करता है?

लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. एक मौलिक संस्था के रूप में परिवार किन कृत्यों को पूर्ण करता है?
  2. गृहस्थी में श्रम का लैंगिक विभाजन महिलाओं के लिए किन उत्तरदायित्वों को निर्धारित करता है?

उत्तर-

परिवार और गृहस्थ समाज की सर्वोत्तम मौलिक संस्थाओं में एक है। यह लिंग (जेंडर) विषयक रचना और लिंग विषयक भेदभाव का प्रमुख कारक है। परिवार संस्था की संरचना चाहे यह एकल हो या संयुक्त, आयु के आयामों, सगोत्रता या बंधुता और सबसे महत्वपूर्ण लिंग (जेंडर) पर टिकी है। समाज की एक मौलिक संस्था के रूप में परिवार कतिपय महत्वपूर्ण कृत्यों को पूरा करता है जैसे (क) यौन संबंधों का नियमित तथा व्यवस्थित नियंत्रण, (ख) पोषण करना तथा युवा पीढ़ी का पोषण करना तथा संस्कार सिखाना, (ग) आर्थिक उत्पादन और इस तरह से उत्पाद का वितरण, (घ) विवाह नोदनर, समूहों के बीच परस्पर संबंधों की स्थापना तथा रख-रखाव जो अलग-अलग परिवारों को समुदाय तथा समाज से संबंधित करता है। (ङ) उत्तराधिकार को वैधता प्रदान करना। यह माना जाता है कि परिवार आर्थिक उत्पादकता की क्षमताओं की कमी, आवश्यकताओं और आवश्यक कृत्यों की पूर्ति, हस्तांतरण में संलग्नता की भावना और परस्पर निर्भरता एवं सुरक्षा का प्रयोजन पूरा करता है। यह सभी मूलभूत कार्य हैं जो परिवार को महत्वपूर्ण संस्था बनाते हैं। जो उत्पादक संरचना को स्पष्ट रूप से छिपाता है जो कि इस संस्था की सीमा को बनाए रखने तथा इसके ठीक तरह से काम करने को सुनिश्चित करने में सहायक होता है। उनके अनुसार भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों का विभाजन, संसाधनों का आवंटन और अधिकार का वितरण तो वास्तव में परिवार तथा गृहस्थी में विद्यमान रहता है, लिंग (जेंडर) आधारित है तथा महिलाओं को हीन प्रतिष्ठा प्रदान करता है। समाज में महिलाओं और पुरुषों को उनके लैंगिक पहचान के आधार पर अलग-अलग उत्पादक कार्य विनिर्दिष्ट किए गए हैं। कार्य के आवंटन में यह लिंग (जेंडर) विषयक भेद अति आवश्यक है कि महिलाओं और पुरुषों के कार्यों को पृथक और समान श्रेणि दिए गए हैं। पुरुषों को रोटी कमाने तथा महिलाओं को घर संभालने का कार्य। यह इस बात को दर्शाता है कि सामाजिक संरचना से विभिन्न प्रकार के कार्यों को समान वरीयता का मान्यता नहीं प्राप्त होगी।

गृहस्थी में श्रम का लैंगिक विभाजन महिलाओं के लिए जिन उत्तरदायित्वों को निर्धारित करता है वह प्रधानतः पुनरुत्पादन, जननी, बच्चों की देखभाल और समाजीकरण की आवश्यकताओं से घिरा और सुस्पष्ट है, जबकि पुरुष की कमाना होता है एवं कार्यकलापों के प्रमुख क्षेत्रों को समान प्रतिष्ठा दिया जाता है। यदि गृहस्थी के अंदर और बाहर संसाधनों का भी वितरण समान होगा, जैसा कि हम जानते हैं तथा विभिन्न अध्ययनों ने प्रमाणित किया है, गृहस्थी के अंदर संसाधनों का वितरण असमान है। महिलाओं को नियमित रूप से पुरुषों से कम सम्मान मिलता ही इतना ही नहीं, क्षेत्रों के 'सार्वजनिक' और 'निजी' के पुर्नकरण से भी हीन प्रतिष्ठा और मान्यता विहीनता का प्रावधान होता है। महिलाओं के गृहस्थी में उत्पाद क्रियाकलापों का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में आता है। बैरट (1988) पंजाबी समाजों में लिंग (जेंडर) विषयक रचना और श्रम के लैंगिक विभाजन संबंधी एक अध्ययन में दर्शाते हैं कि महिलाएँ घर के घरेलू कार्य तथा बच्चों के देखभाल की पूरी जिम्मेदारी होती है और यह ऐसी जिम्मेदारी है जो अवैतनिक है तथा जिसका मूल्य भी कम आंका गया है। महिलाओं के उत्तरदायित्व को नकारात्मक छवि श्रम बाजार में भी दिखाई पड़ती है।

परम्परावादी, जो विद्यमान स्वरूप में परिवार में श्रम के लैंगिक विभाजन का समर्थन करते हैं, यह तर्क देते हैं कि मानव प्रजाति की निरंतरता के लिए यह स्वाभाविक, ईश्वरीय, अनुकरणीय और प्रयोजनवादी और यहाँ तक कि अनिवार्य भी है। उनके लिए महिलाओं की जैविक दुर्बलता ही पुरुषों के लिए कठिन कार्यों तथा महिलाओं के लिए सरल घरेलू कार्यों के सामाजिक संस्थाकरण का आधार रही है।

कठिन और सरल कार्य के इस द्वैतता ने महिलाओं के कार्यों को तुच्छ बनाया है, तथा परिणमत: उनके कार्यों का अवमूल्यन हुआ है तथा इसे संरचनागत रूप से निरंतरता बना दिया कि महिलाओं उन कार्यों को, जिनका कोई शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, नहीं कर सकती अथवा उन्हें नहीं करना चाहिए। कोई कठोर काम तोड़ सकती थीं या महिलाएँ कर सकती हैं तो नकारा जाता है और महिलाएँ जो कार्य कर सकती हैं उसे कम मूल्य का समझा जाता है।

इस प्रकार परिवार पहचान के माध्यम से संरचनागत लिंग (जेंडर) विषयक भूमिकाओं को अचेतन वास्तविक में लिंग (जेंडर) विषयक भूमिकाओं और प्रत्याशाओं में असंगति उत्पन्न करता है तथा परिवार और समाज में पुरुषों द्वारा महिलाओं के शोषण का निमित्त बनता है। यह लिंग (जेंडर) विषयक भूमिका नागरिकों पुरुषों के कृत्यों के सच्चे अर्थों में मान्यता मानता है तथा इन्हें स्वतंत्र, तर्कबद्धयुक्त, निर्णायक और उत्पादक माना जाता है तथा महिलाओं के घरेलू और बच्चों के देखभाल के कार्य को उनके शारीरिक क्रियाशीलता के विस्तार के रूप में देखा जाता है और इसीलिए इसे वास्तविक कार्य के रूप में नहीं देखा जाता है।

लिंगीकृत समाज में विषमता, जिसमें पितृसत्तात्मक परिवारों में लड़कियों की तुलना में लड़कों को और महिलाओं की तुलना में पुरुषों को उच्चतर मूल्य प्रदान करता है, दिखाई पड़ता है। इतना ही नहीं यह संस्थानों जैसे भोजन, शिक्षा, संपत्ति, अवसर का यहाँ तक कि स्थान का भी दोनों स्त्रियाँ और पुरुषों के लिए निर्धारण करता है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण संस्थानों की उपलब्धता में असमानता एक और पुरुषों और स्त्रियों के जीवन के लिए अलग-अलग बुनियादी का निर्धारण करता है, दूसरी ओर लिंगों (जेंडर) के समाज इस तरह से करती है कि पुरुष निर्णय लेने वाले तथा शक्तिशाली होते हैं, महिलाओं और उनके कार्य अवैतनिक होते हैं। शरीर पर भी पुरुष प्रधान नियंत्रण नहीं है। शारीरिकता महिलाओं को इस तरह से प्रभावित करता है कि वे आत्मभान, निम्न आत्मसम्मान, आत्मविश्वास की कमी, अज्ञानता, उदासीनता, निर्णयता और निष्क्रिय स्वानियता के लक्षण दर्शाते हैं।

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