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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :215
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2702
आईएसबीएन :0

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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

इकाई-3

लैंगिक शक्ति एवं शिक्षा

[Gender, Power and Education]

अध्याय 9 -परिवार, विद्यालय तथा औपचारिक/अनौपचारिक संगठनों में लैंगिक पहचान व व्यवहार

[Gender identities and socialization practices in family, school and other formal and informal organisations]

प्रश्न- स्व, पहचान व समाज किस प्रकार आपस में सम्बद्धित हैं?

लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. 'स्व' से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में बताइए।
  2. लिंग विषयक असमानता कहाँ-कहाँ व्याप्त है?

उत्तर-

स्व और पहचान की अवधारणाओं पर व्यापक रूप से चर्चा की गई है तथा समाजविज्ञानों की अलग-अलग विधाओं में इसकी अलग-अलग व्याख्या दी गई है तथा स्पष्ट किया गया है। पूर्णतः यह व्यक्ति की चेतना, आत्मबोधक व्यक्तित्व को स्व कहा जा सकता है और एक व्यक्ति का विशिष्ट व्यक्तित्व जिसे स्थिरस्थायी अस्तित्व माना जाता है को पहचान कहा जा सकता है। प्रतिबिंबात्मक अतार्किकवादिता सिद्धांतों के अनुसार स्व और पहचान के मुद्दों का बार-बार प्रयोग किया जाता है। अन्तर्क्रियावादी सिद्धांतों के अनुसार स्व समाज का प्रतिनिधित्व करता है जिसका अर्थ है समाज स्व के रूप प्रस्तुत करता है जो पुनः सामाजिक व्यवहार को आकार प्रदान करता है। उनके लिए समाज और धर्म असंगत, एकात्मक और अखंड है। यथार्थ, संरचनागत प्रतीकात्मक अन्तर्वैयक्तिक समाज का अर्थशास्त्र विभिन्न किन्तु अन्तर्ग्रहीय तथा संबंधों के संगीतमय प्रणाली के रूप में देखते हैं जिसकी परिधि में सामाजिक वर्ग, आयु, लिंग, प्रजाति, धर्म, रीति-रिवाज इत्यादि पर आधारित नामानुसार विभिन्न विशेषताएँ दिखाई होती हैं। इस स्व को अनेक पहलुओं से भी देखा जाता है क्योंकि इसमें नाना प्रकार के हिस्से शामिल होते हैं, जो कई-कई 'परस्पर निर्भर' होते हैं। इन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्र होते हैं, कभी-कभी इनमें द्वंद्व रहता है और ये अनेक तरीकों से संगठित होते हैं। प्रदत्त विशेषताओं को परिवर्तित करने की जिसकी रचना, भूमिका प्रयोग के आधार पर, स्व से बाहर होती है। इस प्रकार स्व की परिवर्तनीय यथार्थ पहचान अथवा आत्मचेतना भूमिका अधिग्रहण के समूह के रूप में की गई है। उदाहरण के लिए किसी विशेष लिंग, जाति, प्रजाति, वर्ग इत्यादि का होना और प्रत्येक पहचान से संबद्ध भूमिका प्रस्तुता के रूप में पहचान के कुलक (Set) की संपूर्णता ही 'स्व' है। इसके द्वारा हम समझते हैं कि पहचान भूमिकाओं से बंधे हुए स्व-बोध है और इन भूमिकाओं के माध्यम से संगठित सामाजिक संबंधों में स्थित है। यह तर्क भी दिया गया है कि पहचान के ऊपर भी अंतर होता है। अर्थात एक गई हुई पहचान को अनेक प्रकार की परिस्थितियों में बुलाना अथवा इसकी परीक्षा विशेष संभाव्यता के रूप में की जा सकती है। इस प्रकार विशेष भूमिकाओं को अभिव्यक्त करने वाले आकारों के बीच चयन इन भूमिकाओं के साथ संबंधित पहचानों को सजीव क्रियाशीलता प्रदान करता है (बिलाल सिंह राय 2004)।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि परंपरागत रूप से स्व और पहचान को सामाजिक रूप से ही देखा जाता है। समाज में रहने वाले व्यक्तियों के रूप में वे दूसरे समाज के अन्य लोगों के साथ संपर्क, अपने अवलोकन और अनुभवों के आधार पर विभिन्न सामाजिक प्रक्रिया या परिचर्चा के साथ-साथ अपनी सामाजिक पहचान को कल्पना या रचना करते हैं। समुदाय और भावनाओं की भावना व्यक्ति स्व को सामाजिक पहचान के विचार से गहरा संबंध है (सेन सीफ, सिंह राय 1999)। समुदाय और लोगों का स्पष्ट प्रभाव है जिनके साथ व्यक्ति का स्व स्वयं को जोड़ता और संबंधित करता है (वही)। इस दृष्टि से लिंग (स्वयं को महिला या पुरुष रूप में स्वीकार करना या किसी विशेष कार्य-प्रकाश) एक पहचान के रूप में एक सामाजिक पहचान है, जो कि मुख्य रूप से उपभोक्तावादी सामाजिक अन्तक्रिया द्वारा जुड़ित होता है तथा समुदाय द्वारा प्रभावित किया जाता है। दार्शनिक रूप से यह नामावलीमय नहीं है, अपितु संरचित विविध अरण्य रचना है और सांस्कृतिक पहचान की सतत रचना की जाती है (हॉल 1990)। इसका अभिप्राय यह है कि लिंग विषयक पहचान को न केवल सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट और सामाजिक रूप से निर्मित है जो समय और स्थान के अनुसार भिन्नता दर्शाती है।

लिंग (जेंडर) विषयक असमानता अधिसंख्य समाजों में विद्यमान है, इसका अभिप्राय यह है कि महिलाओं और पुरुषों को सौंपी गई भूमिकाओं तथा उत्तरदायित्व, उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रमों तथा संस्थानों को उपलब्धता और उन पर नियंत्रण तथा निर्णय लेने के अवसरों में भेद और असमानता है। प्रत्येक समाज में लिंग (जेंडर) विषयक भेद और लिंग (जेंडर) विषयक असमानता के परिणाम में अंतर है और यह उस समाज विशेष में विद्यमान लिंग (जेंडर) विषयक भूमिका की प्रकृति पर निर्भर करता है।

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