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ईजी नोट्स-2019 बी. ए. प्रथम वर्ष प्राचीन इतिहास प्रथम प्रश्नपत्र

ईजी नोट्स

प्रकाशक : एपसाइलन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2011
आईएसबीएन :0

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बी. ए. प्रथम वर्ष प्राचीन इतिहास प्रथम प्रश्नपत्र के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार हिन्दी माध्यम में सहायक-पुस्तक।


प्रश्न 2 - काचगुप्त कौन थे ? स्पष्ट कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. काचगुप्त के विषय में सक्षेप में लिखिए।

उत्तर-

काचगुप्त

समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति के रचयिता हरिवेण ने चन्द्रगुप्त (प्रथम) के राज्य त्याग का मार्मिक वर्णन किया है। उसने लिखा है कि भरी सभा में चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने बेटे समुद्रगुप्त को गले लगाया। वह भावातिरेक से भरा था और रोमांचित हो रहा था, उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे। उसने अपने बेटे से कहा - "तुम योग्य हो, पृथ्वी पर राज्य करो।' आगे हरिवेण ने लिखा है कि सभ्य जनों ने उसकी घोषणा का स्वागत किया किन्तु तुल्य कुलज लोगों (अर्थात् भाइयों) ने विजयी समुद्रगुप्त को दुःखी भाव से देखा, उसके हृदय में द्वेष उमड़ रहा था।

कवि का कथन हो सकता है कि अतिरंजित हो, तथापि इतना तो है ही कि चन्द्रगुप्त का राज्य परित्याग और समुद्रगुप्त का राजतिलक किसी गम्भीर वातावरण और विशेष अवस्था में हुआ था। यह बात राजकीय घोषणा पर सभ्यों और तुल्य कुलजों की परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है। इसका भाव यह है कि अन्य राजकुमार भी गद्दी की ओर दृष्टि लगाये हुए थे और उनके उत्तराधिकार के दावों से प्रजा में उत्तेजना थी और सम्भवतः राजनीतिक जीवन भी अव्यवस्थित हो रहा था। वर्तमान तथा भाव संकटों का अन्त करने के लिए राजा ने सबकी उपस्थिति में समुद्रगुप्त को राजगद्दी सौंप दी। राज्य के प्रमुख अधिकारी हरिवेण ने बहुत दिन बीत जाने के बाद जब प्रतिद्वन्द्वी राजकुमार के दुःख पर बल देते हुए इस घटना का उल्लेख किया तो इसका स्पष्ट अर्थ यही निकलता है कि उक्त घटना महत्वपूर्ण रही होगी। इस प्रकार वह महत्वपूर्ण परिणामों से भरी ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत करता जान पड़ता है।

अस्तु ऐसा समझा जाता हैं कि समुद्रगुप्त के भाइयों ने उसके विरुद्ध विद्रोह किया था। उक्त प्रशस्ति में तीन श्लोक आगे अंश में है वह अंश गल गया है, पर अनुमान किया जा सकता है कि उसमें इस विद्रोह की चर्चा थी। प्रसंग समुद्रगुप्त के किसी युद्ध का है कहा गया है उसने उसे अपने बाहुबल से जीता। इस युद्ध का उल्लेख उसके आर्यावर्त के अभियान से पहले है, इससे ऐसा जान पड़ता है कि उसने अपने राज्य के प्रारम्भिक दिनों में ही गृह कलह का शमन किया था। सम्भवतः समुद्रगुप्त के भाइयों ने उसके विरुद्ध एक होकर अपने में से किसी को उसके स्थान पर राजा बनाने की योजना की थी। हेरास का अनुमान है कि वह विद्रोही भाई काच था, जिसका परिचय उसके सिक्कों से मिलता है।

इतिहासकारों के एक वर्ग का कहना है कि काच नाम युक्त सिक्के समुद्रगुप्त के हैं और काच उसका ही अपर नाम था। उनके तर्क हैं -

1. काच के सिक्कों पर समुद्रगुप्त के व्याघ्र-निहन्सा अश्वमेघ भांति के सिक्कों से बहुत समानता रखता है।

किन्तु काच के सिक्कों और समुद्रगुप्त के उपर्युक्त दोनों भांति के सिक्कों पर देवी की स्थिति भंगिमा में सादृश्य अवश्य है, पर दृष्टव्य यह है कि समुद्रगुप्त के सिक्कों में भारतीयता अधिक झलकती है। काच के सिक्कों पर देवी के साथ में विदेशी विषाण (कार्नुकोपिया) है। समुद्रगुप्त के व्याघ्र निहत्ता भांति के सिक्कों पर उसके स्थान पर भारतीय कमल है फिर समुद्रगुप्त के सिक्कों पर देवी मकर पर खड़ी हैं जो एक भारतीय प्रतीक है और उसमें काच के सिक्कों की अपेक्षा, जिसमें देवी आसन पर खड़ी है अधिक मौलिकता है। इससे स्पष्ट है कि काच के सिक्के समुद्रगुप्त के सिक्कों से पहले के हैं।

2. काचगुप्त के चितौर का अभिलेख काचो गावजित्य कर्मभिरुत्तमैर्दिवं जातयि समुद्रगुप्त के सिक्के के लेख 'अप्रतिहतो वित्रिच्य क्षितिं सचरितैदिवं जयति' का शब्दान्वय मात्र है और यह इस बात का द्योतक है कि कांच के सिक्के समुद्रगुप्त द्वारा प्रचलित किये गये थे। किन्तु यह तर्क उपस्थित करते समय यह भुला दिया गया है कि चन्द्रगुप्त (द्वितीय) के छत्र की भांति के सिक्कों पर भी छिंतवजित्य सुचरितै और कुमारगुप्त (प्रथम) के खड्गहस्त भांति पर गामवजित्य सुचरितै कुमारगुप्तों दिवं जयति है।

3. काचगुप्त के सिक्कों के पट की ओर मिलने वाले सर्वरात्रोच्छेता विरुद का प्रयोग परवर्ती गुप्त अभिलेखों में समुद्रगुप्त के लिए हुआ है, अतः ये सिक्के उसके ही हो सकते हैं।

किन्तु दृष्टव्य है कि समुद्रगुप्त के प्रायः अन्य सभी विरुद, जिनका कि उनके सिक्कों पर उल्लेख हुआ है किसी न किसी रूप में प्रयाग प्रशस्ति में देखे जा सकते हैं। इस सिक्के पर उपलब्ध सर्वराजोच्छेता विरुद की उसमें कहीं भी किसी प्रकार की कोई चर्चा नहीं है। हरिवेण ने समुद्रगुप्त को अनेक भ्रष्ट राजोत्सत्ता राजवंश प्रतिष्ठापक कहा है, उन्हें सर्वराजोच्छेता कहना उनके इस सत्कार्य के सर्वथा विपरीत होगा। समुद्रगुप्त ने अपने लिए कभी भी सर्वराजोच्छेता का प्रयोग न किया होगा। अतः ये सिक्के उनके कदापि नहीं हो सकते। दूसरी बात यह है कि इस विरुद का प्रयोग अकेले समुद्रगुप्त के लिए नहीं हुआ है। चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को भी प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्र शासन में सर्वराजोच्छेता कहा गया है।

4. गुप्त राजाओं के एक से अधिक नाम थे, सम्भव है कि समुद्रगुप्त का भी पहले काच नाम रहा हो किन्तु ऐसी स्थिति स्मरणीय है कि उन सभी राजाओं के, जिनके एक से अधिक नाम थे, सभी सिक्कों पर समान रूप से एक ही नाम का प्रयोग हुआ है। कोई कारण नहीं कि समुद्रगुप्त इस परम्परा का अपवाद हो और अपने अकेले एक ही प्रकार के सिक्कों पर अपरचित नाम दिया हो।

इसी प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि गुप्तों का राजलांछन बद्ध गरुड़ध्वज, वीणावादक, अश्वमेघ, अश्वारोही, सिंहनिहन्ता आदि असाधारण भांति के सिक्कों को छोड़कर अन्य सभी सिक्कों पर समुद्रगुप्त के समय से लेकर वंश के अन्तिम राजा तक समान रूप से सिक्के के स्वरूप का एक अभिन्न अंग है। किसी गुप्तवंशी शासक के सिक्कों का कोई ऐसा प्रकार नहीं है जिसके कुछ सिक्कों पर गरुड़ध्वज हो और कुछ पर न हो। चन्द्रगुप्त (प्रथम) के किसी सिक्के पर गरुडध्वज नहीं है, यही अवस्था (बयाना दफीने के एक सिक्के को छोड़कर) काचगुप्त के सिक्कों की भी है। स्पष्ट है कि काच समुद्रगुप्त से पहले हआ और चन्द्रगुप्त (प्रथम) के समान ही उसने पहले अपने सिक्कों पर गरुडध्वज का प्रयोग नहीं किया। पीछे चलकर उसने इसे अपनाया, जिसका प्रमाण बयाना दफीने में मिला सिक्का है और उसके बाद ही गरुड़ध्वज के प्रयोग का प्रचलन हुआ और बाद के सिक्कों का अभिन्न अंग बन गया।

इस प्रकार इन सिक्कों से निश्चित सिद्ध होता है कि समुद्रगुप्त के समानान्तर अथवा उससे कुछ पहले काच का एक शासक हुआ था। राखालदास बनर्जी ने उसके अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उसकी पहचान समुद्रगुप्त के भाई के रूप में की है। साथ ही उनकी कल्पना यह भी थी कि वह कुषाणों के विरुद्ध किये गये स्वातन्त्र्य युद्ध में मारा गया। उसकी स्मृति में समुद्रगुप्त ने ये सिक्के प्रचलित किये। यह कल्पना अत्यन्त मौलिक है, किन्तु इस बात का कोई प्रमाण नहीं, जो इस बात का संकेत दे कि समुद्रगुप्त का कोई भाई कुषाणों के विरुद्ध युद्ध करते हुए मारा गया था। फिर भारतीय परम्परा में स्मारक सिक्कों की कभी कोई प्रथा नहीं रही।

शिथोले (बी. एस.) की धारणा है कि इन सिक्कों का प्रचलन काचगुप्त वंश में न होकर कोई बाहरी घुसपैठिया का है। उनका कहना है कि तोरमाण और मुहम्मद गोरी सदृश आक्रामकों ने अपने विरोधियों के सिक्कों का अनुसरण किया था। इस प्रकार के अनेक उदाहरण भारतीय मुद्रातत्व में मिलते हैं। अतः असम्भव नहीं है कि जिन दिनों समुद्रगुप्त दक्षिण के अभियान में व्यस्त था, किसी प्रकार का विद्रोह उठा हो और कोई बाहरी घुसपैठा हो, किन्तु इस प्रकार की किसी कल्पना की आवश्यकता नहीं है। साहित्यिक सूत्रों से ज्ञात होता है कि उसके एक भाई ने ही गद्दी हड़पने की चेष्टा की थी।

समुद्रगुप्त और उसके काल के इतिहास की चर्चा करते हुए मंजूश्री मूल कल्प में कहा गया है कि उसका भस्म नामक एक भाई था, जिसने तीन वर्ष तक शासन किया था। यह वक्तव्य बहुत कुछ उलझा हुआ है। मंजूश्रीमूल्कल्प में भस्म को विस्तृत विजय का श्रेय दिया गया है। बहुत सम्भव है कि उपलब्ध ग्रन्थ में इस स्थल की कुछ मूल पंक्तियाँ अनुपलब्ध हों, जिसके कारण ही यह उलझन है। हो सकता है कि अनुपलब्ध पंक्तियों में चन्द्रगुप्त (द्वितीय) का नाम रहा हो। यह भी सम्भव है कि इसमें जिन विजयों का उल्लेख किया गया हो या उनका सम्बन्ध समुद्रगुप्त से हो और बीच में काच का उल्लेख है इसका सम्बन्ध समुद्रगुप्त के विजय अभियान के बीच उसके राज्याधिकार करने की चेष्टा को व्यक्त करने के लिये किया गया है, तथ्य जो भी रहा हो इतना तो स्पष्ट है कि लेखक को समुद्रगुप्त के एक भाई होने और उसके राज्य प्राप्त करने की चेष्टा करने और कुछ काल तक राज्य करने की बात ज्ञात थी।

यह घुसपैठिया भस्म और कोई नहीं काच ही था। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि काच और भस्म एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। आप्टे और मोनियर विलियम्स सदृश कोशाकारों ने काच का अर्थ क्षारीय भस्म (अलकलाइन ऐड्रोज) बताया है।

समुद्रगुप्त के इस घुसपैठी प्रतिद्वन्द्वी भाई के सम्बन्ध में और कुछ ज्ञात नहीं है। सम्भव है कि वह समुद्रगुप्त के असाधारण शौर्य से भयभीत होकर उसके सम्मुख नतमस्तक हो गया हो, यह भी सम्भव है कि वह समुद्रगुप्त के विरुद्ध युद्ध करता हुआ मारा गया हो।

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