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ईजी नोट्स-2019 बी. ए. प्रथम वर्ष प्राचीन इतिहास प्रथम प्रश्नपत्र

ईजी नोट्स

प्रकाशक : एपसाइलन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2011
आईएसबीएन :0

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बी. ए. प्रथम वर्ष प्राचीन इतिहास प्रथम प्रश्नपत्र के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार हिन्दी माध्यम में सहायक-पुस्तक।


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गुप्त वंश : प्रमुख शासक एवं इनकी उपलब्धियाँ
(Gupta Dynasty : main Rulers and their Achievements)

दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न

1. गुप्तों की उत्पत्ति के विषय में आप क्या जानते हैं ? विस्तृत विवेचन कीजिए।
अथवा
गुप्त कौन थे ? चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्यकाल तक गुप्तवंश के प्रारम्भिक इतिहास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
गुप्तों के आविर्भाव के पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति का विवेचन कीजिए।
अथवा
गुप्त कौन थे ? चन्द्रगुप्त प्रथम पर टिप्पणी लिखिए।
अथवा
चन्द्रगुप्त प्रथम के लिच्छवियों से वैवाहिक सम्बन्ध के स्वरूप महत्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
गुप्तों के उद्भव एवं मूल स्थान का विवेचन कीजिए।
अथवा
चन्द्रगुप्त तथा लिच्छवी के बीच क्या सम्बन्ध थे ?

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न

1. गुप्तों की उत्पत्ति एवं उनके मूल स्थान की विवेचना कीजिए।
2. गुप्त सम्राट कौन थे ?
3. सिद्ध कीजिए कि गुप्त शासक क्षत्रिय थे।
अथवा
सिद्ध कीजिए कि गुप्त पूर्णतः क्षत्रिय थे।
4. सिद्ध कीजिए कि गुप्त शासक वैश्य थे।
5. गुप्तवंश का राजनैतिक इतिहास बताइए।
6. चन्द्रगुप्त प्रथम के विषय में बताइए।

उत्तर : मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात् लगभग 500 वर्षों तक उत्तर भारत में किसी भी शक्तिशाली राज्या का पता नहीं चलता। मौर्यों के ह्रास के साथ देश अनेक राजतान्त्रिक और जनतांत्रिक (गण एवं नगर) राज्यों के रूप में विघटित हो गया। उनकी घटती-बढ़ती शक्ति ही इस काल की प्रमुख विशेषता कही जा सकती है। कुछ काल के लिए मध्य प्रदेश में शुंग वंश सत्ताधारी हुआ, पंजाब में विदेशी आक्रमणों बाख्त्री-यवन, पहलव और शकों ने अपना अधिकार जमाया। उसके बाद कुषाणों के सम्बन्ध में अनेक लोगों की धारणा है कि उन्होंने एशियाई इतिहास में महत्तम सफलता प्राप्त की थी। कहा जाता है कि उनका साम्राज्य पश्चिम में भारत की परिधि के बाहर दूर और पूरब में बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ था, किन्तु इसकी सत्यता संदिग्ध है। यह संदिग्ध न भी हो तब भी यह तो सत्य है कि कुषाण साम्राज्य एक शती से अधिक न टिक सका।

उत्तर-पश्चिम से निरन्तर होने वाले आक्रमणों के कारण भारतीय जनता ने शीघ्र ही एक ऐसे शक्तिशाली शासन की आवश्यकता का अनुभव किया जो इस उपद्रव को रोकने में समर्थ हो। फलतः हम देख सकते हैं कि तीसरी शताब्दी ई. के उत्तरार्द्ध में देश के तीन कोनों से तीन शक्तिशाली राज्यों को उदय हुआ। मध्य देश के पश्चिमी भाग में नाग अथवा भारशिव उठे। उन्होंने अपने सतत् संगठित प्रयत्नों से भारत में स्थित कुषाण साम्राज्य को चूर-चूर कर दिया। उनका दावा है कि उन्होंने गंगा तक फैली सारी भूमि को अपने अधिकार में कर लिया था और अश्वमेघ यज्ञ किये थे।

दक्षिण में वाकाटकों का उदय हुआ, उन्होंने न केवल दक्षिणी पठार में अपने राज्य का विस्तार किया वरन् विन्ध्य के उत्तर में भी काफी बड़े भू-भाग पर उनका प्रभाव था। पदमहिषी तीसरी शक्ति का उदय पूर्व में हुआ। यह शक्ति भी गुप्तों की थी, वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक कोने में छोटे से राज्य के रूप में उदित हुए और उन्होंने अपने युग की महत्तम शक्ति कहलाने का गौरव प्राप्त किया। उनके साम्राज्य के अन्तर्गत विन्ध्य के उत्तर का सारा भू-भाग समाहित था और दक्षिण पर भी उन्होंने अपना प्रभाव डाल रखा था।

भारशिव, वाकाटक और गुप्त तीनों देश की उभरती हुई शक्तियाँ थीं, किन्तु आश्चर्य की बात है कि उनमें परस्पर प्रभुत्व की स्पर्धा के कोई चिह्न दिखाई नहीं देते।

गुप्त सम्राट कौन थे - गुप्तों के सम्बन्ध में विद्वानों ने नाना प्रकार की कल्पनाएं प्रस्तुत की हैं। इस वंश का आदि शासक उनके अपने अभिलेखों के अनुसार महाराज श्री उपाधिधारी गुप्त था। उनका बेटा और उत्तराधिकारी घटोत्कच था, उसकी भी वही उपाधि थी। गुप्त और घटोत्कच नाम ऐसे हैं जो सामान्यतः शासक वर्ग में नहीं पाये जाते। इस कारण विद्वानों की धारणा है कि ये लोग किसी उच्च कुल के न थे।

काशी प्रसाद जायसवाल का मत है कि गुप्त सम्राट जाट और मूलरूपेण पंजाब के निवासी थे। उन्होंने अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित तथ्य उपस्थित किये हैं-

1. गुप्त शासक निम्न जाति के थे - (i) 'कौमुदी महोत्सव' नामक नाटक में एक आर्य पात्र के मुख से चण्डसेन नामक पात्र का कारस्कर कहा गया है और उसे शासक होने के अयोग्य बताया गया है। जायसवाल ने चण्डसेन के रूप में चन्द्रगुप्त प्रथम की कल्पना की है। कारस्कर लोग अर्ध थे और वे समाज में हेय समझे जाते थे।

(ii) कारस्कर लोग पंजाब में हिमालय की तराई में रहने वाले मुद्रों की एक शाखा कहे गये हैं।
(iii) नेपाल के गुप्तवंशी राजा ग्वाल अथवा अहीर जाति के कहे जाते हैं। जाटों को भी लोग ग्वालों (अहीरों) के समकक्ष मानते हैं अर्थात् गुप्त लोग जाट थे।
(iv) जाटों का एक वर्ग 'धारी' कहलाता है। चन्द्रगुप्त (द्वितीय) की पुत्री वाकाटक रानी प्रभावती गुप्ता ने अपने पुत्र के एक ताम्रशासन में अपने को धारण तथा अपने पति को विष्ण वद्ध गोत्रिय बताया है।
(v) मंजुश्रीमूलकल्प में गुप्तों के प्रसंग में मधुरायं जात वंशाव्या आया है। इसमें आये जात शब्द को जायसवाल ने जाट माना है।
अधिकतर विद्वानों द्वारा एक-दूसरे वर्ग की चेष्टा गुप्तों को वैश्य सिद्ध करने की रही है। इन लोगों का मुख्य तर्क शासकों के नाम के उत्तरांश गुप्त पर आधारित है। स्मृति के अनुसार गुप्त का प्रयोग केवल वैश्य के लिए होता है। इसके साथ ही वे इस बात पर अधिक बल देते हैं कि गुप्तों का गोत्र धारण अग्रवाल जाति को, जो वैश्यों में सबसे बड़ा और समृद्ध समाज है, एक प्रसिद्ध गोत्र है, सत्यकेतु विद्यालंकार ने अग्रवाल जाति के इतिहास में बताया है।

2. गुप्त शासक क्षत्रिय थे - गौरीशंकर ओझा तथा कुछ अन्य विद्वान गुप्त शसकों को क्षत्रिय बताते हैं। उनका कहना है कि -

(i) पूर्वकालिक गुप्तवंशीय शासक अपने मूल के सम्बन्ध में भले ही मौन हों, उनके सम्बन्ध में उत्तरावर्ती गुप्त शासकों के अभिलेखों द्वारा जाना जा सकता है। अस्तु मध्य प्रदेश में शासन करने वाले महाशिवगुप्त के सिरपुर अभिलेख में ज्ञात होता है कि गुप्त चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे।
(ii) धाडवाड के गुत्तर नरेश, जो सोमवंशीय क्षत्रिय थे, अपने को चन्द्रगुप्त (द्वितीय) विक्रमादित्य का वंशज कहते हैं।
(iii) जावा देश से प्राप्त वहाँ की भाषा में लिखित तन्त्र कामान्तर नामक ग्रन्थ में वहां के नरेश, इक्ष्वाकु वंशीय राजा ऐश्वर्यपाल ने अपने वंश का आरम्भ समुद्रगुप्त से बताया है।
(iv) पंचोम ताम्रशासन में छः शासकों के गुप्तान्त नाम हैं। वे लोग स्पष्ट शब्दों में अर्जुन के वंशज कहे गये हैं। इससे प्रकट होता है कि गुप्त लोग क्षत्रिय थे।
(v) गुप्तों का वैवाहिक सम्बन्ध लिच्छवि, नाग, वाकाटकों से था। इससे भी प्रकट होता है कि वे लोग क्षत्रिय थे।
गुप्तों की सामाजिक स्थिति की कल्पना जहाँ तक सीमित नहीं थी। राय चौधरी ने यह संकेत करने के चेष्टा की है कि गुप्त लोग ब्राह्मण थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता ने अपना गोत्र धारण कहा है अतः उनकी धारणा है कि गुप्तों का सम्बन्ध शृंगवंशीय अग्निमित्र की पदमहिषी धरणी से रहा होगा और शुंग लोग ब्राह्मण थे। इन सभी अनुमानों में कौन सत्य के निकट है ? यह किसी प्रकार भी नहीं कहा जा सकता। सभी अनुमान बहुत पीछे कही गयी बातों पर आधारित हैं और जिन वंशों से सम्बन्ध रखती हैं, उनमें से इस गुप्तवंश का कोई सम्बन्ध न था, इसका कोई प्रमाण नहीं है फिर भी जो बातें कही गयी हैं उनमें तथ्य की अपेक्षा कल्पना अधिक है।

3. गुप्त शासक वैश्य थे - प्रख्यात विद्वान एलन, आयंगर तथा सदाशिव अल्तेकर गुप्तों को वैश्य स्वीकार करते हैं और प्रमाणों की पुष्टि में पुराणों का उल्लेख करते हैं। क्योंकि पुराणों तथा स्मृतियों में : ब्राह्मणों की उपाधि शर्मा या देव थी, क्षत्रियों की उपाधि 'त्राता' थी और वैश्यों की गुप्त या ‘भूति' तथा शूद्रों की दास मानी गयी थी। वायु पुराण में इस सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेख मिलता है -

"शर्मा देवश्च विप्रस्य वर्मा त्राता च भुभुजः।
भूतिर्गुप्तश्च वैश्यस्य दासः शुद्रस्यकारयेत्।।''

खण्डन - यह मत मानना इसलिए सम्भव नहीं क्योंकि धार्मिक मत का कोई प्रमाणिक आधार नहीं है। ब्राह्मण भी अपने नाम के आगे गुप्त लिखते थे जैसे-विष्णुगुप्त, उपगुप्त आदि। अतः इस आधार पर गुप्तों को वैश्य नहीं कह सकते।

4. गुप्त पूर्णतः क्षत्रिय थे - गुप्तों को पूर्णतः क्षत्रिय मानने के हमारे पास पर्याप्त मात्रा में प्रमाण उपलब्ध हैं -

(i) सुन्दरवर्मन को क्षत्रिय स्वीकार किया गया है। उसने जिस चन्द्रसेन को गोद लिया उसे अपना कृतक पुत्र बनाया। अतः उसका क्षत्रिय होना अनिवार्य है क्योंकि हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार सजातीय को ही गोद लिया जा सकता है। इसका समर्थन मनु की मनुस्मृति से भी होता है। चन्द्रसेन चन्द्रगुप्त प्रथम क्षत्रिय हैं। अतः गुप्त क्षत्रिय वंश के थे।

(ii) धारवाड़ के गुन्टल नरेश, अपने को उज्जैन नरेश चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का वंशज मानते थे। बम्बई गजेटियर में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को क्षत्रिय बतलाया गया है।

(iii) मध्य प्रदेश के गुप्तवंशीय नरेश महाशिवगुप्त की सिरपर (रायपुर मध्य भारत) की प्रशस्ति के गुप्तों को चन्द्रवंशीय क्षत्रिय बतलाया गया है।

(iv) आर्य मंजूश्रीमूलकल्प के आधार पर डा. जायसवाल ने गुप्तों को क्षत्रिय स्वीकार किया है।

(v) चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया था, इसलिए चन्द्रगुप्त भी क्षत्रिय था।

सम्पूर्ण मतों का विवेचन करने के बाद यह बात स्पष्ट हो जाती है कि गुप्तवंशीय राजा क्षत्रिय थे और यही मत अधिक प्रमाणिक समीचीन प्रतीत होता है। प्रो. वासुदेवशरण उपाध्याय ने भी गुप्तों को क्षत्रिय वंश का स्वीकार किया है।

गुप्तों का मूल स्थान - गुप्त राजाओं के मूल निवास स्थान के बारे में पर्याप्त मतभेद हैं। कुछ विद्वान मगध को गुप्तों का निवास स्थान मानते हैं परन्तु यह बात सिद्ध नहीं होती कि गुप्तों के पूर्व मगध पर किसका शासन था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि गुप्तों का निवास स्थान उत्तर प्रदेश में सारनाथ के पास था जहाँ पर श्रीगुप्त ने चीनी मन्दिर बनवाया था।

डा. गांगुली और डा. आर. सी. मंजूमदार ने गुप्तों का आदि स्थान बंगाल बताया है। उनके मतानुसार मृग शिखावन के समीप का चीनी मन्दिर मुर्शिदाबाद में था। पुराणों में गुप्तों के आदि स्थान को उत्तर प्रदेश और मगध के अन्तर्गत माना गया है। प्रख्यात इतिहासकार डा. मुकर्जी एलन तथा आयंगर आदि गुप्तों को सदैव से पाटलिपुत्र को उनके साम्राज्य का अंग मानते हैं।

गुप्त वंश का राजनैतिक इतिहास
(Political History of Gupta Dynasty)

गुप्तों का उदय - तीसरी शताब्दी के तीसरे चरण में भारतीयों और नागों के पश्चात् भारतीय इतिहास के रंगमंच पर गुप्तों का पदार्पण मगध में पाटलिपुत्र तथा उसके समीपवर्ती प्रदेशों के स्वामी के रूप में होता है।

गुप्तवंशीय संस्थापक श्रीगुप्त - गुप्त अभिलेखों में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि गुप्त अपनी वंशावली के साथ आरम्भ होते हैं। इसमें सर्वप्रथम श्रीगुप्त का नाम आता है। अतः यह स्पष्ट है कि गुप्तों के आदिपुरुष का नाम श्रीगुप्त था। प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में गुप्तवंश को 'आदिराजा बताया गया है। श्रद्धापुर ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त को धारण गोत्र का बताया गया है। डा. आर. सी. मजूमदार के अनुसार हम अस्थायी रूप से गुप्तवंश के श्रीगुप्त को इत्सिंग द्वारा वर्णित महाराज श्रीगुप्त मान सकते हैं। इत्सिंग का बताया हुआ मन्दिर मगध में नहीं बल्कि उत्तरी या केन्द्रीय बंगाल की पश्चिमी सीमाओं पर स्थित था। श्रीगुप्त के राज्य में बंगाल का कुछ अंश सम्मिलित रहा होगा।

महाराजा की उपाधि - गुप्तवंशीय लेखों में 'महाराजा' की उपाधि श्रीगुप्त और घटोत्कच दोनों के लिए प्रयोग की गई है। यह उपाधि आमतौर पर सामन्तों द्वारा प्रयोग की जाती थी। डा. आर. के. मुकर्जी ने श्रीगुप्त के बारे में अपना मान्य अभिमत प्रकट करते हुए अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'दि गुप्ता इम्पायर' के पृष्ठ 11 पर लिखा है -

------The name of this king is to be taken as 'Gupta' and the prefix 'Sri' as an honorific as shown in all the names of the Gupta emperors mentioned in this inscription. Where Sri is a part of the names is Srimati in inscription No. 46 of flut the prefix Sri will still be added in the case of royalty, where SriSrimati (I bid), Nor is the name Gupta by itself objectionable. We have
analogous names as Devak for Devadattat (Katyayan,s) varttsk on Panini, VIII 3.15) or Harsh Vardhan.'

राज्य सीमाएं तथा तिथि-इत्सिंग के विवरण से श्रीगुप्त की राज्य सीमाओं का उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार मग शिखावन के आसपास का क्षेत्र श्रीगुप्त के अधीन था। गांग का शासन बंगाल में मर्शिदाबाद के जिले में कहीं पर था और इसका शासनकाल 175-200 ई. तक रहा। परन्तु पुराणों के अनुसार चौथी शताब्दी के प्रारम्भ में गुप्तों का शासन गंगा के तटों पर (प्रयाग तथा साकेत नगरों से युक्त) मानना पड़ेगा। स्मिथ महोदय ने श्रीगुप्त की तिथि 275 से 300 ई. स्वीकार की है।

घटोत्कच - श्रीगुप्त सम्राट के पश्चात् उसके पुत्र महाराजाधिराज घटोत्कच का उल्लेख प्राप्त होता है। इसका प्रमाण हमें समुद्रगुप्त की प्रयागप्रशस्ति से प्राप्त होता है परन्तु उसमें घटोत्कच के आगे गुप्त का उल्लेख नहीं है। डॉ. ब्लाक वैशाली से प्राप्त एक मुहर में, जिसमें घटोत्कच उत्कीर्ण हैं, इन दोनों की समता स्वीकार करते हैं।

परन्तु इतिहासकार यह मत स्वीकार नहीं करते हैं और इसके विपक्ष में निम्नलिखित तर्क देते हैं-

1. गुप्त अभिलेखों में महाराज गुप्त के पुत्र या चन्द्रगुप्त प्रथम के पिता का नाम कहीं भी घटोत्कच गुप्त नहीं आया है बल्कि घटोत्कच आया है।
2. वैशाली से प्राप्त मुहर का समय और घटोत्कच के समय में एक शताब्दी का अन्तर है। वैशाली में मुहरों के निर्माण का आदेश चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय दिया गया था। अतः एक सौ वर्ष पूर्व घटोत्कच की मुहर बनाने की कोई आवश्यकता न थी। इस मत को भी डी. आर. भण्डारकर ने प्रतिपादित किया है। अतः यह सिद्ध होता है कि वैशाली की मुहर वाला घटोत्कच चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन या इसी वंश का अन्य कोई राजकुमार रहा होगा क्योंकि उस समय राजकुमार यदा-कदा प्रदेशों के नायक रहा करते थे। इसकी पुष्टि ग्वालियर से प्राप्त एक गुप्त अभिलेख से होती है।

घटोत्कच गुप्त का समय निश्चित करने में विद्वानों में बड़ी ऊहापोह की स्थिति है परन्तु एलन महोदय इसके राज्यकाल को 300 से 320 ई. मानते हैं। परन्तु कुछ विद्वान श्रीगुप्त के अन्त से लेकर चन्द्रगुप्त प्रथम के उत्कर्ष तक (280 ई. से 319 ई.) के काल को गुप्त शासन मानते हैं।

घटोत्कच के लिए पुरातात्विक साक्ष्यों में 'महाराजा' उपाधि का प्रयोग हुआ है।

चन्द्रगुप्त (प्रथम)

चन्द्रगुप्त (प्रथम) घटोत्कच के पुत्र और गुप्तवंश के क्रम में तीसरे राजा थे। वास्तविक अर्थों में इन्हें ही साम्राज्य का संस्थापक कहना चाहिए। जैसकि पहले कहा गया है, वे 312 ई. में सत्तारूढ़ हुए होंगे। अभिलेखों में इन्हें 'महाराजाधिराज' कहा गया है। इसी प्रकार उनकी उपाधि अपने पूर्वजों से बड़ी है। और यह उनके सार्वभौम शासक होने का द्योतक है। उनकी रानी महादेवी, कुमार देवी ही पहली रानी हैं, जिनका उल्लेख वंश-सूचियों में हुआ है। वे लिच्छवि परिवार की थीं। प्रयाग प्रशस्ति में उनके पुत्र समुद्रगुप्त को लिच्छवि दौहित्र कहा गया है और इस विरुद्ध का उल्लेख प्रायः सभी परवर्ती गुप्त अभिलेखों में हुआ।

कुछ सोने के सिक्के ऐसे पाये गये हैं जिन पर एक ओर चन्द्रगुप्त (प्रथम) अपनी रानी कुमारदेवी के साथ आमने-सामने खड़े अंकित किये गये हैं और उन पर उन दोनों का नाम लिखा है। इन सिक्कों के दूसरी ओर सिंहवाहिनी देवी का चित्रण है और लिच्छवयः अर्थात् लिच्छवि लोग अंकित हैं।

लिच्छवियों का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थों में वैशाली (आधुनिक वसाढ़, जिला मुजफ्फरपुर, बिहार) स्थित गणतन्त्र के रूप में प्रायः मिलता है। ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में वे मगध सम्राट के काँटे बने हुए थे। वैवाहिक सम्बन्ध स्थपित करके ही बिम्बसार उन पर विजय पा सके और अजातशत्रु षड्यन्त्र द्वारा ही उनकी शक्ति को पंगु करने में समर्थ हो पाये। लिच्छवियों के आक्रमणों को रोकने के लिए ही उन्हें पाटलिपुत्र में दुर्ग बनाना पड़ा था। किन्तु इस काल के पश्चात् उनके इतिहास के सम्बन्ध में कोई भी निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं होती। किन्त जिस प्रकार समद्रगुप्त के लिच्छवि दौहित्र होने में गुप्तों ने अपना गौरव व्यक्त किया है और जिस ढंग से सिक्कों पर लिच्छवियों का नाम अंकित किया गया है, उनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इस काल में काफी शक्तिशाली रहे होंगे और उनके साथ किये गये वैवाहिक सम्बन्ध का गुप्तों के राजनीतिक उत्थान में विशेष योग रहा होगा।

गुप्तों के उत्थान में लिच्छवियों की भूमिका किस प्रकार की थी, इस सम्बन्ध में विद्वानों ने अनेक प्रकार की कल्पनाएं की हैं। जायसवाल की धारणा रही है कि गुप्तों ने लिच्छवियों की सहायता से किसी क्षत्रिय राजा से मगध का सिंहासन प्राप्त किया था। उनकी इस धारणा का आधार कौमुदी महोत्सव नामक नाटक है, जिसे वे घटनाओं की समकालिक रचना मानते है। उन्होंने उक्त नाटक के पात्र चण्डसेन की पहचान चन्द्रगुप्त (प्रथम) से की है और कल्पना की है कि उन्होंने अपने नाम का सेन अंश त्यागकर गुप्त नाम धारण किया। इस प्रकार उन्होंने अपने पितामह के नाम को वंश नाम का रूप दिया। इस प्रकार के नाम परिवर्तन के समर्थन में उन्होंने वसन्तसेन और ससन्तदेव का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो एक ही राजा के नाम थे। उन्होंने दहसेन का भी उल्लेख किया है जिनका नाम सिक्कों पर दछगण के रूप में मिलता है। उन्होंने यह भी कहा कि चन्द्र का प्राकृत रूप चण्ड है। इसके समर्थन में उन्होंने सातवाहन नरेश चण्डसाति के अभिलेख का उल्लेख किया है जिसमें चन्द्र का रूप चण्ड है। दशरथ शर्मा ने उनके इस मत का समर्थन करते हुए सातवाहन नरेश चण्डसाति के अभिलेखों और श्री चण्डसाति अंकित सिक्कों तथा क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है। इतिहास के चन्द्रगुप्त (प्रथम) और नाटक के चण्डसेन दोनों के लिच्छवियों के साथ घनिष्ठता की बात, जायसवाल की दृष्टि में उक्त पहचान को पुष्ट करती है।

नाटक में सुन्दरवर्मन ओर कल्याणवर्मन को मगध कुल का कहा गया है। जायसवाल की कल्पना है कि यह वंश प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित कोतकुल है। पाइस (ई. ए.) ने इस मत का खण्डन करते हुए कहा है कि सुन्दरवर्मन और कल्याणवर्मन मौखरि वंश के थे। मौखरिवंशीय राजाओं के समान उनके नाम वर्मनात हैं। मगध मौखरियों का मूल स्थान था, इस कारण ही वे मगध कुल के कहे गये हैं। इस प्रसंग में उन्होंने मयूर शर्मन के चन्द्रवल्ली अभिलेख की ओर ध्यान आकृष्ट किया है जिसमें कदम्बों के समय अर्थात् चौथी शताब्दी ई. में मौखरियों के मगध पर शासन करने की बात कही गयी है। हमने अपने ज्ञानार्जन के प्रारम्भिक दिनों में यह मत व्यक्त किया था कि यह मगध कुल उत्तरवर्ती सातवाहन सम्राटों का था। उस समय हमने इस ओर इंगित किया था कि कौमुदी-महोत्सव में कल्याणवर्मन को कर्णिपुत्र कहा गया है, जिसका तात्पर्य सुन्दरवर्मन से है और कर्णि सातवाहन वंश के सुविख्यात नरेश शातकर्णि के नाम का लघु रूप है। चण्डसेन द्वारा राज्यापहरण किये जाने के बाद लोगों ने कल्याणवर्मन को किष्किन्धा स्थित पम्पापुर भेज दिया। इस बात से भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस मगध कुल का सम्बन्ध सातवाहनों के देश से रहा होगा अर्थात् यह सातवाहन वंश का एक अंग होगा।

उस समय हमें भविष्योत्तर पुराण के कलियुग राज-वृत्तान्त से अपनी इस धारणा की पुष्टि होती जान पड़ी थी। इस वृत्तान्त में कहा गया है कि चन्द्रश्री नामक आन्ध्र नरेश मगध का शासक और घटोत्कच, गुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त (अर्थात् गुप्त वंश के प्रथम चन्द्रगुप्त) का अपनी पत्नी के सम्बन्ध से रिश्तेदार था। दोनों की पत्नियाँ परस्पर बहनें थीं और वे लिच्छवि कुल की थीं। अपनी पत्नी के, सम्बन्धियों अर्थात लिच्छवियों की सहायता से चन्द्रगुप्त मगध सेना का सेनापति नियुक्त किया गया था। इसके पश्चात् अपनी साली (रानी) के उकसाने पर उसने राजा चन्द्रश्री का वध कर दिया। तदन्तर स्वयं रानी से द्रोह कर उसके बेटे पुलोमा को मार डाला और आन्ध्रों को भगाकर सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया। इस ग्रन्थ में यह भी कहा गया है कि वाशिष्ठी पुत्र चन्द्रश्री शातकर्णि ने तीन वर्ष तक और उसके बेटे पुलोमा ने चन्द्रगुप्त के संरक्षण में सात वर्ष तक राज्य किया। इस प्रकार इस ग्रन्थ के कथनानुसार वाशिष्ठी पुत्र चन्द्रश्री शातकर्णि मगध के शासक थे और उनके पुलोमा नामक एक अल्प वृत्तान्त और कौमुदी-महोत्सव की कथा में बहुत साम्य हैं - मगध के सिंहासन को वहाँ के राजा के एक सम्बन्धी ने, जिसका लिच्छवियों से वैवाहिक सम्बन्ध था, अपछत कर दिया। राजा मारा गया, उसके अल्प वयस्क पुत्र ने कुछ काल तक राज्य किया तदन्तर वह भी मार डाला गया। इन बातों को दृष्टि में रखते हुए कलियुगराज-वृत्तान्त के चन्द्रगुप्त, चन्द्रश्री और पुलोमा की पहचान कौमुदी-महोत्सव के चन्द्रसेन, सुन्दरवर्मन और कल्याणवर्मन से और पुनः ऐतिहासिक चद्रगुप्त (प्रथम) और सातवाहन वंशीय शातकर्णि और पुलोमा से करना स्वाभाविक ही था।

किन्तु अब यह बात निस्संदिग्ध रूप से सिद्ध हो गयी है कि कलियुगराज-वृत्तान्त विशुद्ध कूट-ग्रन्थ है।

और कौमुदी-महोत्सव सातवीं शताब्दी ई. के मध्य से पूर्व की रचना नहीं है। इसलिए इन दोनों ही ग्रन्थों को गुप्त-इतिहास के लिए प्रमाणस्वरूप ग्रहण नहीं किया जा सकता। कौमुदी-महोत्सव समकालिक तो है ही नहीं, साथ ही अन्य विश्वसनीय सूत्रों से ज्ञात तथ्यों के विपरीत भी है।

जायसवाल के इस कथन से कि चण्डसेन नाम का चण्ड चन्द्रगुप्त के चन्द्र का प्राकृत रूप है, कोई भी सहमत नहीं हो सकता। संस्कृत का चन्द्र प्राकृत में चन्द्र होता है चन्ड नहीं। सामान्यतः पूर्ववर्ती र, द, को ड में परिवर्तित करता है उत्तरवर्ती र नहीं। जैन-प्राकृत (अर्धमागधी और जैन-महाराष्ट्री) में कभीकभी न्द डूड हो जाता है पर वहाँ भी ण्ड नहीं होता। अर्धमागधी में भी चन्द्र का चन्द होता है चण्ड नहीं, और जैन- प्राकृत में चण्ड रूप अत्यन्त दुष्प्राप्य है। चन्द्र चण्ड नहीं हो सकता, इसका कारण स्पष्ट यह है कि पूर्ववर्ती न द का रूप परिवर्तन से रक्षा करता है सातवाहन अभिलेखों और सिक्कों से दिये गये उदाहरण अत्यन्त संदिग्ध हैं। कोडवल्ली कूप-अभिलेख में राजा के संस्कृत नाम का रूप वशिष्ठीपुत्र चण्डस्वाति है चन्द्रस्वाति नहीं और यही रूप पुराणों में भी मिलता है। वायु, ब्रह्माण्ड और मत्स्यपुराण की अधिकांश हस्तलिखित प्रतियों में चण्द्रश्री शातकर्णि हैं, केवल विष्णु और भागवत ही एक आध और मत्स्य की एक प्रति में चन्द्रश्री है। रैप्सन ने कुछ सिक्कों पर निःसंदिग्ध वशिष्ठीपुत्र सिरिचड-सातिस पढ़ा है। किन्तु जिस अक्षर को उन्होंने 'ड' पढ़ा है उसका रूप उससे भिन्न नहीं है, जिसे उन्होंने उसी राजा के कुछ अन्य सिक्कों पर  पढ़ा है। इन सिक्कों का अभिलेख भी चण्ड ही है और इसी रूप में कोडवल्ली कूपअभिलेख का नाम भी पढ़ा जा सकता है।

दशरथ शर्मा का यह कहना कि क्षेमेन्द्र ने प्राकृत नाम चण्डसेन को चन्द्रसिंह कर दिया सत्य प्रतीत नहीं होता। क्षेमेन्द्र के बृहत्कथामंजरी के निर्णय, सागर संस्करण में क वती लम्बक में बैताल की आठवीं कहानी में ताम्रलिपि नरेश का नाम दो स्थलों पर निसन्देह चन्द्रसिंह मिलता है (श्लोक 420 और 430)। उस स्थल पर सोमदेव के कथासरित्सागर में पाठ चण्डसेन है। किन्तु साथ ही यह भी दृष्टव्य है कि वृत्कथामंजरी में ही उसी कथा के अन्तर्गत उसी व्यक्ति का नाम अन्यत्र चण्डसेन लिखा है चन्द्रसिंह नहीं (श्लोक 446, 442) और यह इस बात का द्योतक है कि वृहत्कथामंजरी में भी नाम चण्डसेन ही है, चन्द्रसिंह अपपाठ है जो दो स्थलों तक ही सीमित है।

कौमुदी-महोत्सव में ही हमें चन्द्र का प्राकृत रूप चन्द मिलता है। दूसरी ओर चण्डसेन नाम का प्रयोग संस्कृत और प्राकृत दोनों में समान रूप से हुआ है जो स्वयं इस बात का द्योतक है कि जिस ध्वनि परिवर्तन की कल्पना जायसवाल ने की है वह लेखिका के विचार में कभी आया ही नहीं था। यदि चन्द्र के चण्ड रूप में परिवर्तित होने की ध्वनिक सम्भावना होती तो यह समझ पाना कठिन है कि संस्कृत के नाटक में एक महत्वपूर्ण पात्र का नाम प्राकृत रूप में क्यों दिया गया और किसी अन्य नाम का नाटक में प्राकृतीकरण क्यों नहीं हुआ ?

नाम की बात के अतिरिक्त नाटक की कथा भी पुरातात्विक सूत्रों से ज्ञात तथ्यों से सर्वथा भिन्न है। गुप्त अभिलेखों के अनुसार लिच्छवियों के साथ चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध विवाह के माध्यम से था। चण्डसेन-लिच्छवि के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है। नाटक के अनुसार सुन्दरवर्मन् के दत्तक के रूप में चन्द्रसेन का उल्लेख है और उसे विषवृक्ष और हीन जाति का बताया है। उसे पितृघातक भी कहा गया है। चन्द्रगुप्त के दत्तक होने की बात कहीं भी किसी सूत्र से किसी को भी ज्ञात नहीं हैं उसे किसी ने कहीं भी पितृघातक नहीं कहा है। इस प्रकार चन्द्रगुप्त (प्रथम) को नाटक का चण्डसेन मानना सम्भव नहीं है और न ही इस नाटक को इतिहास के निमित गम्भीरता के साथ लिया जा सकता है।

जॉन एलन की कल्पना है कि चन्द्रगुप्त (प्रथम) द्वारा सर्वप्रथम विजित किये जाने वाले स्थानों में वैशाली, जो लिच्छवियों के अधीन था, एक था और सन्धि की एक शर्त के रूप में कुमारदेवी के साथ उनका विवाह हुआ था। एलन के कथनानुसार गुप्तों को लिच्छवि-रक्त का जो गर्व है वह लिच्छवियों की प्राचीन वंश परम्परा का है न कि उनके साथ की गयी किसी सन्धि या सहयोग से प्राप्त भौतिक लाभ का परिणाम। सोहोनी (श्री. वा.) की भी धारणा है कि चन्द्रगुप्त (प्रथम) और कुमारदेवी के विवाह का निर्णय रणभूमि में हुआ था।

दो राजाओं के बीच हुए युद्ध के परिणामस्वरूप राजघरानों में विवाह होने के निःसन्देह अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। किन्तु इस प्रकार के विवाह को कभी प्रतिष्ठााभाव से नहीं देखा जाता रहा है, ऐसे विवाह को न केवल स्मृतियों में राक्षस विवाह ठहराया गया है वरन् अभिलेखों में भी उसे ऐसा ही कहा गया है। इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न पुत्र अपने को उस कुल से सम्बन्धित होने में कभी शौख का अनुभव नहीं करेगा जिसका उसने, उसके पिता ने अथवा पिता-कुल के किसी अन्य ने रणभूमि में दलन किया था। ऐसी अवस्था में पराजित पक्ष यदि प्रख्यात या शक्तिशाली रहा है तो विजयी पक्ष ने अपने को उस शक्ति को विजित करने वाला कहने में ही गौरव माना है।

यदि गुप्तों को लिच्छवि दौहित्र होने का गर्व था, तो उसका एकमात्र यही अर्थ हो सकता है कि चन्द्रगुप्त (प्रथम) के साथ लिच्छवि राजकुमारी का विवाह सामान्य स्थिति में हुआ था और लिच्छवियों के साथ हुए इस विवाह सम्बन्ध से गुप्तों को अपने उत्थान में सहायता प्राप्त हुई थी। प्राचीन भारतीय राजवंशावलियों में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ नाना का उल्लेख दौहित्र-कुल के वंश क्रम में हुआ है और ऐसी प्रत्येक अवस्था में इस बात के प्रमाण मिलते हैं। जिनसे ज्ञात होता है कि जामाता को अपने ससुर कुल से समुचित सहायता उपलब्ध हुई थी। वाकाटक नरेश रुद्रसेन (प्रथम) और रुद्रसेन (द्वितीय) के ससुरों का उल्लेख वाकाटक वंश-परम्परा में केवल इस कारण हुआ है कि उनके साथ किया गया विवाह-सम्बन्ध वाकाटक वंश के लिये पर्याप्त हितकर सिद्ध हुआ। विष्णु कुणडिन-नरेश माधववर्मन अपने को वाकाटक कुमारी का सन्तान होने का गौरव इसलिये मानता है कि वाकाटक-परिवार के साथ विवाहसम्बन्ध उसके वंश के उत्थान में अत्यधिक सहायक हुआ था।

अतः विन्सेण्ट स्मिथ का यह अनुमान गलत नहीं कहा जा सकता है कि उन दिनों लिच्छवियों का पाटलिपुत्र पर अधिकार था और विवाह के माध्यम से चन्द्रगुप्त ने अपने पत्नी के सम्बन्धियों के राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया था।

अल्तेकर (अ. स.) की धारणा है कि कुमारदेवी स्वाधिकार से रानी थी। इसका अर्थ यह हुआ कि चन्द्रगुप्त (प्रथम) को प्रवेश लिच्छवि-परिवार में रानीपति (प्रिन्स-कन्सर्ट) के रूप में हुआ था और लिच्छवि राज्य के साथ उनका सम्बन्ध कुछ उसी ढंग का था जिस ढंग पर इंग्लैण्ड के राज्य पर मेरी के साथ तृतीय विलियम का नाम जुड़ा था। पति-पत्नी के इस प्रकार के संयुक्त राज्य की सम्भावना उनके सिक्कों से प्रकट होती है। ये सिक्के चन्द्रगुप्त के महाराजाधिराज की सम्राटीय उपाधि धारण करने के लिए किये गये होंगे और इन नये सिक्के पर लिच्छवियों के आग्रह पर ही उनकी राजकुमारी का नाम दिया गया होगा।

अल्तेकर द्वारा विलियम तृतीय और मेरी के साथ चन्द्रगुप्त (प्रथम) और कुमारदेवी की गयी तुलना अपने आप में काफी आकर्षक है और वह सहज ग्राह्य हो सकती है, यदि भारतीय इतिहास में पिता की गद्दी पर पुत्री के बैठने की परम्परा का ज्ञान अथवा उदाहरण प्राप्त होता। भारतीय धर्मशास्त्रों में पिता की सम्पत्ति पर पुत्री का दावा अज्ञात है। अतः कुमारदेवी स्वाधिकार से कदापि, रानी नहीं रही होंगी। तथापि स्मिथ और अल्तेकर दोनों के ही सुझाव तत्वतः सत्य के निकट प्रतीत होते हैं। उन्हें केवल भारतीय परम्परा की दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। वस्तु स्थिति की कल्पना इस प्रकार की जा सकती है - लिच्छवी-नरेश पुत्रहीन मरे होंगे। स्मृतियों में पुत्र के अभाव में दौहित्र का दाय स्वीकार किया गया है। इस प्रकार लिच्छवि सिंहासन का उत्तराधिकार राजकुमारी कुमारदेवी के पुत्र को प्राप्त होने की स्थिति आयी। होगी। यह भी हो सकता है कि उनके पिता की मृत्यु के समय तक उसके कोई पुत्र न हुआ हो। अतः शासन-प्रबन्ध के निमित्त मध्यावधि प्रबन्ध इस प्रकार किया गया हो कि चन्द्रगुप्त (प्रथम) लिच्छवि-राज्य का प्रबन्ध-भार ग्रहण करें। इसके साथ ही नाना प्रकार की उत्पन्न होने वाली राजनीतिक गुत्थियों को बचाने के लिए यह भी उचित माना गया होगा कि उनकी लिच्छवि पत्नी का भी सम्बन्ध शासन से जोड़ लिया जाय और शासन लिच्छवियों के नाम पर किया जाय। इस अनुमान की स्पष्ट झलक सिक्कों द्वारा प्रकट होती है। चन्द्रगुप्त का नाम सिक्कों पर ठीक उसी स्थान पर है जहाँ गुप्त सिक्कों पर राजा का नाम लिखा पाया जाता है। साथ ही गुप्त सिक्कों पर पायी जाने वाली प्रशस्ति अथवा विरुद का सर्वथा अभाव है। इसके स्थान पर उनकी पत्नी का नाम है और जहां पर प्रचलनकर्ता का नियमित रूप से विरुद रहता है, वहाँ लिच्छवियों का नाम लिच्छवयः है। जब एक बार यह प्रबन्ध हो गया तो यह निर्बाध रूप से इस प्रकार चलता रहा कि वास्तविक अधिकारी समुद्रगुप्त के जन्म के बाद भी उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता नहीं हुई। चन्द्रगुप्त, समुद्रगुप्त के वयस्क होने तक शासन करते रहे। जब समुद्रगुप्त वयस्क हो गये तो अत्यन्त शालीनता के साथ चन्द्रगुप्त (प्रथम) समुद्रगुप्त को राज्याधिकार सौंप कर विरत हो गये। उनके इस स्वैच्छिक विराग का वर्णन हरिषेण ने अत्यन्त सजीव रूप में प्रथम प्रशस्ति में किया है।

तथ्य जो भी हों, अब तक उपलब्ध ज्ञान के आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि पूर्वी भारत के दो राज्यों लिच्छवि और गुप्तों में वैवाहिक सम्बन्ध के माध्यम से एकीकरण हुआ और इस प्रकार चन्द्रगुप्त प्रथम को एक काफी बड़ा राज्य प्राप्त हुआ। किन्तु चन्द्रगुप्त का कोई अभिलेख अथवा लेख प्राप्त नहीं है जिससे उनके राज्य के विस्तार का विवरण प्राप्त हो सके अथवा यह जाना जा सके कि उन्होंने किस प्रकार सम्राट पद प्राप्त किया। अपने पुत्र और पुत्र के उत्तराधिकारियों के अभिलेखों में ही वे महाराजाधिराज कहे गये हैं। सम्भवतः उनके राज्य में मगध, साकेत और प्रयाग सम्मिलित थे, इन्हें ही पुराणों में गुप्तों का क्षेत्र बताया गया है। उनके साम्राज्य के विस्तार का ठीक परिचय उनके पुत्र के विजय वर्णन से प्राप्त होता है।

उनके बेटे समुद्रगुप्त ने अपना अभियान उत्तर में कोशाम्बी, श्रावस्ती, अहिच्छता, मथुरा और परमावती के पड़ोसी राज्यों के विजय से आरम्भ किया। इसका अर्थ यह निकलता है कि चन्द्रगुप्त का राज्य वाराणसी से आगे गंगा के उत्तर में था। दक्षिण में कोशल-नरेश महेन्द्र के विजय आरम्भ होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि उस समय तक साम्राज्य का विस्तार मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भाग विलासपुर, रायपुर और सम्भलपुर और गंजाम जिले के कुछ अंश तक हो चुका था। पूर्व की ओर समुद्रगुप्त ने कोई अभियान नहीं किया, इससे जान पड़ता है कि समतट वाले अंश को छोड़कर बंगाल तक का भू-भाग चन्द्रगुप्त के राज्य में सम्मिलित था। पश्चिम में वह विदिशा की सीमा तक सीमित था क्योंकि उन दिनों वाकाटक नरेश विन्ध्य शक्ति के वहाँ शासक रहने का हमें पता चलता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त (प्रथम) के साम्राज्य के अन्तर्गत बिहार, बंगाल (समतट को छोड़कर) और बनारस तक का पूर्वी उत्तर प्रदेश अथवा उससे कुछ ही अधिक भू-भाग था।

किन्तु खेद इस बात का है कि हमें चन्द्रगुप्त (प्रथम) की वीरता और शौर्य की जानकारी नहीं हो पाती। इस सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने वंश की भावी महत्ता का मार्ग प्रशस्त किया था।

चन्द्रगुप्त (प्रथम) ने कितने दिनों तक शासन किया, यह निश्चय कर पाना कठिन है। राय चौधरी ने संदिग्ध भाव से समुद्रगुप्त के 325 ई. में गद्दी पर बैठने की सम्भावाना प्रकट की है। उन्होंने इस तिथि के अनुमान का कोई कारण नहीं बताया है, किन्तु ऐसा जान पड़ता है कि वे समुद्रगुप्त को गुप्त-संवत् का प्रतिष्ठापक मानते हैं। उनका यह अनुमान किसी भी प्रकार ग्राह्य नहीं है। स्मिथ की धारणा है कि चन्द्रगुप्त अपने राज्यारोहण के दस या पंद्रह वर्ष बाद अर्थात् 330 अथवा 335 ई. में मरा। फ्लीट और एलन भी, 335 ई. को चन्द्रगुप्त (प्रथम) की मृत्यु का समय मानते हैं। फ्लीट का यह भी मत है कि चन्द्रगुप्त ने वैशाली विजय के बाद कुमारदेवी से विवाह किया। यदि वस्तुतः इस प्रकार की कोई विजय चन्द्रगुप्त (प्रथम) ने की थी तो वह निसन्देह राज्यारोहण होने के बाद 319 ई. के बाद ही किसी समय की होगी। ऐसी स्थिति में 335 ई. में समुद्रगुप्त केवल 13 या 14 वर्ष का बालक रहा होगा। यह क्लिष्ट कल्पना होगी कि 13,14 अथवा 16 वर्ष के बालक को उसका पिता प्रतिद्वन्द्वी राजकुमारों के बीच योग्यतम घोषित करेगा। अतः रमेशचन्द्र मजूमदार की धारणा है कि राज्यारोहण के तत्काल बाद ही 320 ई. में चन्द्रगुप्त (प्रथम) ने विवाह किया होगा और समुद्रगुप्त सम्भवतः 350 ई. से पहले गद्दी पर नहीं बैठा।

किन्तु हम यह प्रतिपादित कर चुके हैं कि चन्द्रगुप्त (प्रथम) का विवाह राज्यारोहण से पहले हुआ था और समुद्रगुप्त का जन्म राज्यारोहण के बाद हुआ होगा। चन्द्रगुप्त (प्रथम) के राज्यारोहण के कितने दिनों बाद समुद्रगुप्त का जन्म हुआ यह कहना कठिन है। किन्तु इतना तो अनुमान किया ही जा सकता है। कि चन्द्रगुप्त ने समुद्रगुप्त को लिच्छवि-राज का वैध अधिकारी होने के कारण, उसे वयस्क होते ही 18 अथवा 25 वर्ष की आयु में राज्य सौंप कर वैराग्य लिया होगा। अतः हमारी धारणा है कि यह स्थिति 338 और 345 ई. के बीच किसी समय आयी होगी। इसके पूर्व या इसके बाद के किसी समय का अनुमान किसी प्रकार भी संगत नहीं कहा जा सकता।

राज्य-परित्याग के बाद चन्द्रगुप्त (प्रथम) कितने दिनों तक जीवित रहा, इसकी कल्पना करने की न आवश्यकता है और न की ही जा सकती है।

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