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फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्र

यूनिवर्सिटी फास्टर नोट्स

प्रकाशक : कानपुर पब्लिशिंग होम प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 307
आईएसबीएन :0

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बी. ए. प्रथम वर्ष (सेमेस्टर-1) शिक्षाशास्त्र के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार हिन्दी माध्यम में सहायक-प्रश्नोत्तर

प्रश्न- प्राथमिक शिक्षा की प्रमुख समस्यायें क्या हैं? उन्हें हल करने के सुझाव दीजिए।


उत्तर-
हमारे देश को स्वतंन्त्रता मिलने पर सबसे पहले हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया। शिक्षा को सुधारने के लिए उसका पुनर्मूल्यांकन करना आवश्यक समझा गया तथा पुनर्मूल्यांकन के समय उन्हीं कारणों से सामना हुआ जिनके कारण हमारा देश लम्बे समय तक अशिक्षित रहा था।
प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है-

प्रशासन की समस्या

प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में केन्द्र तथा राज्यों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। इन दोनों के मध्य अच्छे सम्बन्धों का अवसर अभाव पाया जाता है। इसके फलस्वरूप शिक्षा के लिए उत्तरदायी प्रशासनिक अधिकारी विद्यालयों की पूर्णरूप से देखभाल नहीं करते हैं। अनेक अधिकारियों में अपने कार्यों को दूसरे विभाग व अधिकारियों पर थोपने की प्रवृत्ति पाई जाती है। अमेरिका की प्राथमिक शिक्षा का अध्ययन करने पर पाया गया है कि प्राथमिक शिक्षा का दायित्व स्थानीय प्रशासन का होता है जो जन समुदाय के सहयोग से शिक्षा का संचालन करता है। इसी प्रकार इंगलैण्ड में स्थानीय शिक्षा प्राधिकरण, प्राथमिक का दायित्व रहता है। राज्य तथा केन्द्र सरकार आर्थिक सहायता के अलावा अन्य किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करते हैं। हमारे देश में प्रशासन में इस प्रकार की स्पष्टता तथा कार्यकुशलता का अभाव है। इस सम्बन्ध में बलवन्तराय कमेटी के सुझाव इस प्रकार हैं-
1. राज्य की शिक्षा नीति देश की आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित होनी चाहिये।
2. प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए सरकारी तथा गैर सरकारी प्रतिनिधियों की एक परिषद् का निर्माण हो जो इसका समान विकास करे।
3. प्रत्येक विद्यालय के द्वारा आसानी से प्राप्त किये जा सकने वाले मापदण्ड तथा न्यूनतम सीमायें तय किये जाने चाहिये। ये कार्य राज्य सरकार के द्वारा हो।
4. प्रत्येक राज्य को अनिवार्य शिक्षा को लागू करने के लिए प्रभावशाली प्रशासन का गठन करना चाहिये जो इस सम्बन्ध में प्रत्येक उपलब्ध साधनों का लाभ उठा सकें।
5. शिक्षा के लिए धन की आवश्यकता रहती है। राज्य को धन का प्रबन्ध करना चाहिये जिससे शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध हो सके।
6. प्राथमिक शिक्षा की सफलता प्रशासक तथा निरीक्षकों पर निर्भर होती है। इस काम के लिए व्यक्तियों को ठीक ढंग से चुना जाये।।

विद्यालयों की व्यवस्था

नगरों में जनसंख्या के अनुपात में विद्यालय नहीं हैं तथा विद्यालयों में छात्रों की संख्या व उनकी उपस्थिति की भी एक समस्या है। कुछ स्थान पर अधिक छात्र होते हैं तो विद्यालय कम तथा कहीं विद्यालय अधिक तो छात्र कम। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी विद्यालय के भवनों की जर्जर अवस्था एक प्रमुख समस्या है। अध्यापक वर्ग भी ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापन कार्य के लिए सहर्ष तैयार नहीं होते हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में विद्या का प्रसार उचित रूप से नहीं हो पाता है। आदिवासियों, अपराधी व्यक्तियों तथा सुदूर पर्वतीय इलाकों में रहने वाले व्यक्तियों के लिए विशेष विद्यालय होते हैं, परन्तु इनकी संख्या जनसंख्या के अनुपात को देखते हुये नाममात्र की है।
वित्त या आर्थिक समस्या - बड़े दुःख के साथ हमें इस तथ्य को स्वीकार करना पड़ता है कि हमारे देश में अन्य विलासिताओं पर सरकार तथा निजी क्षेत्र दोनों अपार पैसा व्यय कर देते हैं परन्तु शिक्षा के नाम पर वे आर्थिक समस्या का रोना रोते हैं। हमारे देश में शिक्षा पर बहुत कम धन खर्च किया जाता है। शिक्षा के कुल बजट का 50% धन अन्य देशों में प्राथमिक शिक्षा पर व्यय होता है परन्तु हमारे यहाँ इसका प्रतिशत मात्र 33% है। हमें इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिये कि बिना धन के शिक्षा का प्रसार सम्भव नहीं है क्योंकि जब अध्यापकों को धन नहीं मिलेगा व छात्रों को पूर्ण साधन प्राप्त नहीं होंगे तो शिक्षा अपने... निम्न स्तर पर पहुँच जायेगी।

अध्यापकों की समस्या

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापकों को भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यथा -
1. योग्यता सम्बन्धी समस्या,
2. विद्यालयों की खराब दशा,
3. समानता की समस्या,
4. वेतन की समस्या।
योग्यता के सम्बन्ध में समस्या इस प्रकार है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए हाईस्कूल तथा प्रशिक्षण निम्नतम योग्यता है परन्तु बहुत से अध्यापक इस योग्यता को भी पूरा नहीं करते हैं। इस प्रकार अयोग्य शिक्षकों के शिक्षण कार्य में लिप्त होने के कारण स्वाभाविक रूप से शिक्षा का स्तर गिरता है। विद्यालयों में जर्जर भवन तथा मूलभूत सुविधाओं का अभाव भी शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। विपरीत मौसम में शिक्षक इन दीवार, छतविहीन विद्यालयों में किस प्रकार रह सकते हैं? इसी प्रकार राज्य के द्वारा संचालित तथा निजी क्षेत्रों के द्वारा संचालित अध्यापकों के वेतनमान में भी बहुत अन्तर देखने को मिलता है तथा इससे भी अध्यापकों के अन्दर हीन भावना पैदा होती है। इस सम्बन्ध में प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के सम्बन्ध में कोठारी आयोग ने निम्न सुझाव दिये हैं-
1. प्राथमिक स्कूलों में अध्यापन कार्य प्रशिक्षित अध्यापकों के द्वारा हो तथा उन्हें 10 वर्ष पढ़ाने का अनुभव प्राप्त हो।
2. प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक को कम-से-कम दो वर्ष का शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूर्ण किया हुआ हो।
3. अप्रशिक्षित अध्यापकों के लिए सेवाकालीन पाठ्यक्रम तथा डाक द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त करने की सुविधा मिलनी चाहिये।
पाठ्यक्रम की समस्या - हमारी शिक्षण प्रणाली में सुव्यवस्थित पाठ्यक्रम का अभाव है। कहीं यह इतना कम है कि छात्र तथा अध्यापक दोनों खाली रहते हैं कहीं इतना अधिक है कि विद्यार्थी किताबों के बोझ से दबा रहता है। हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में पाठ्यक्रम को आकर्षक बनाना चाहिये। पाठ्यक्रम केवल सैद्धान्तिक ही न हो अपितु व्यावहारिकता से पूर्ण हो जो मानवता, राष्ट्रीय लक्ष्य को पूर्ण रूप से समझ सकें।
स्थान की समस्या - प्राथमिक शिक्षा में स्थान की समस्या भी प्रमुख है। अधिकतर विद्यालय किराये के पुराने भवनों में चल रहे हैं जो बिल्कुल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं, उनमें न तो प्रकाश की व्यवस्था है और न ही हवा की। इस प्रकार के वातावरण में न तो मानसिक विकास ठीक प्रकार से हो पाता है और न ही शारीरिक विकास। खराब मौसम में ये विद्यालय कब गिर जायें कुछ कहा नहीं जा सकता। इन परिस्थितियों में अध्यापक तथा छात्र दोनों को तकलीफों का सामना करना पड़ता है।
साधनों का अभाव - प्राथमिक विद्यालय में साधनों का अभाव सबसे प्रमुख समस्या है। शिक्षा के समुचित संचालन में बैठने के आसन, फर्नीचर, ब्लैक बोर्ड, चॉक तथा जन सुविधायें, जैसे-मूत्रालय, शौचालय, साफ पानी। आदि की आवश्यकता होती है परन्तु अनेक विद्यालयों में छात्रों के बैठने के आसन भी नहीं हैं। भवन खराब हैं। ब्लैक बोर्ड, चॉक का अभाव रहता है प्रयोगशाला, लाइब्रेरी, खेल के मैदान व अन्य सुविधाओं का तो अर्थ भी छात्र नहीं जानते हैं। इन समस्याओं के दो प्रमुख कारण हैं। प्रथम तो यह कि धन की कमी रहती है तथा द्वितीय यह कि उपलब्ध धन का प्रयोग सही ढंग से नहीं होता है।
सहायक सेवाओं की समस्या- सहायक सेवाओं में 1. दोपहर का भोजन, 2. निःशुल्क पाठ्य-पुस्तकें, 3. निःशुल्क वस्तुयें, 4. निवास व्यवस्था, 5. चिकित्सा सम्बन्धी सुविधायें आदि आती हैं। दोपहर के भोजन के लिए कुछ ही विद्यालयों में व्यवस्था है परन्तु बहुत से विद्यालय ऐसे हैं जहाँ बालक अपने घर से दो या तीन किमी. की दूरी तय करके विद्यालय आते हैं। गर्मियों में यह कार्य और भी कठिन होता है। विद्यालय समस्त होने के बाद ही बच्चे अपने घर भोजन ग्रहण करते हैं। इससे बच्चों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। आस-पास के समुदाय को चाहिये कि वे अनाज एकत्र करके स्कूल को सौंप दे जिससे बालकों को दोपहर में भोजन प्राप्त हो सके। कुछ स्थानों पर पूर्ण भोजन के स्थान पर अल्पहार देने का प्रावधान भी किया गया। राज्य सरकार व केन्द्र सरकार का यह कर्त्तव्य है कि विद्यार्थियों को विशेषकर प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा तथा पाठ्य-पुस्तकें उपलब्ध करायें निर्धन छात्रों को वस्त्रों आदि की सहायता भी देनी चाहिये।
अन्य समस्यायें- अन्य समस्याओं में लड़कियों की शिक्षा, अध्यापकों का प्रशिक्षण, उनका स्तर, अच्छी पाठ्य-सामग्री जो अध्यापक तथा छात्रों दोनों के लिये हो आदि समस्यायें आती हैं। लड़कियों की शिक्षा के सम्बन्ध में कोठारी आयोग ने कहा है कि इनके लिए कुछ अलग विद्यालय हों तथा अधिकतर सह-शिक्षा प्रयोग हो। अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए ग्रीष्मकालीन पाठ्यक्रम तथा डाक प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। अच्छे स्तर के साहित्य का भी निर्माण होना चाहिये तथा विज्ञान विषय को पढ़ाने के लिए आधारभूत सुविधायें, प्रयोगशाला, उपकरण आदि की व्यवस्था होनी चाहिये।
अनुसन्धान की समस्या - प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अनेक प्रकार की समस्यायें हैं। इन समस्याओं को अनेक प्रकार के बुनियादी अनुसन्धान करने पर हल किया जा सकता है।
सामान्य रूप से अनुसन्धान निम्न क्षेत्रों में हो सकते हैं -
1. प्राथमिक विद्यालय को बुनियादी विद्यालय बनाना।
2. अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा को लागू करना।
3. निरक्षर अभिभावकों के दृष्टिकोण।
4. बहुकक्षा शिक्षण प्रक्रिया।
5. विद्यालय के समय में समायोजन।
6. अपव्यय व अवरोधन।
7. विद्यालय भवन।
8. विदेशों में अनिवार्य शिक्षा का अध्ययन।
9. विद्यालय भवन का निर्माण।
10. शिक्षा के सस्ते शिक्षण साधन।
इनके अलावा बहुत से क्षेत्र इसी प्रकार के हैं जिनमें अनुसन्धान की आवश्यकता है।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- वैदिक काल में गुरुओं के शिष्यों के प्रति उत्तरदायित्वों का वर्णन कीजिए।
  2. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य के परस्पर सम्बन्धों का विवेचनात्मक वर्णन कीजिए।
  3. प्रश्न- वैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु यह किस सीमा तक प्रासंगिक है?
  4. प्रश्न- वैदिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  5. प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा के कम से कम पाँच महत्त्वपूर्ण आदर्शों का उल्लेख कीजिए और आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए उनकी उपयोगिता बताइए।
  6. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे? वैदिक काल में प्रचलित शिक्षा के मुख्य गुण एवं दोष बताइए।
  7. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
  8. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के प्रमुख गुण बताइए।
  9. प्रश्न- प्राचीन काल में शिक्षा से क्या अभिप्राय था? शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे?
  10. प्रश्न- वैदिककालीन उच्च शिक्षा का वर्णन कीजिए।
  11. प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा में प्रचलित समावर्तन और उपनयन संस्कारों का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  12. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का विकास तथा आध्यात्मिक उन्नति करना था। स्पष्ट कीजिए।
  13. प्रश्न- आधुनिक काल में प्राचीन वैदिककालीन शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
  14. प्रश्न- वैदिक शिक्षा में कक्षा नायकीय प्रणाली के महत्व की विवेचना कीजिए।
  15. प्रश्न- वैदिक कालीन शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
  16. प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं? शिक्षा के विभिन्न सम्प्रत्ययों का उल्लेख करते हुए उसके वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
  17. प्रश्न- शिक्षा का अर्थ लिखिए।
  18. प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
  19. प्रश्न- शिक्षा के दार्शनिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  20. प्रश्न- शिक्षा के समाजशास्त्रीय सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  21. प्रश्न- शिक्षा के राजनीतिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  22. प्रश्न- शिक्षा के आर्थिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  23. प्रश्न- शिक्षा के मनोवैज्ञानिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  24. प्रश्न- शिक्षा के वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
  25. प्रश्न- क्या मापन एवं मूल्यांकन शिक्षा का अंग है?
  26. प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए। आपको जो अब तक ज्ञात परिभाषाएँ हैं उनमें से कौन-सी आपकी राय में सर्वाधिक स्वीकार्य है और क्यों?
  27. प्रश्न- शिक्षा से तुम क्या समझते हो? शिक्षा की परिभाषाएँ लिखिए तथा उसकी विशेषताएँ बताइए।
  28. प्रश्न- शिक्षा का संकीर्ण तथा विस्तृत अर्थ बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा क्या है?
  29. प्रश्न- शिक्षा का 'शाब्दिक अर्थ बताइए।
  30. प्रश्न- शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी अपने शब्दों में परिभाषा दीजिए।
  31. प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
  32. प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
  33. प्रश्न- शिक्षा की दो परिभाषाएँ लिखिए।
  34. प्रश्न- शिक्षा की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  35. प्रश्न- आपके अनुसार शिक्षा की सर्वाधिक स्वीकार्य परिभाषा कौन-सी है और क्यों?
  36. प्रश्न- 'शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है।' जॉन डीवी के इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
  37. प्रश्न- 'शिक्षा भावी जीवन की तैयारी मात्र नहीं है, वरन् जीवन-यापन की प्रक्रिया है। जॉन डीवी के इस कथन को उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
  38. प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
  39. प्रश्न- शिक्षा विज्ञान है या कला या दोनों? स्पष्ट कीजिए।
  40. प्रश्न- शिक्षा की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
  41. प्रश्न- शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ को स्पष्ट कीजिए तथा शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  42. प्रश्न- शिक्षा और साक्षरता पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए। इन दोनों में अन्तर व सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
  43. प्रश्न- शिक्षण और प्रशिक्षण के बारे में प्रकाश डालिए।
  44. प्रश्न- विद्या, ज्ञान, शिक्षण प्रशिक्षण बनाम शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
  45. प्रश्न- विद्या और ज्ञान में अन्तर समझाइए।
  46. प्रश्न- शिक्षा और प्रशिक्षण के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।

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