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बी ए - एम ए >> फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्र फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्रयूनिवर्सिटी फास्टर नोट्स
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बी. ए. प्रथम वर्ष (सेमेस्टर-1) शिक्षाशास्त्र के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार हिन्दी माध्यम में सहायक-प्रश्नोत्तर
प्रश्न- राष्ट्रीय एकीकरण एकता के मार्ग में कौन-कौन सी बाधाएँ हैं? शिक्षा राष्ट्रीय एकीकरण के विकास में किस प्रकार योगदान दे सकती है?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकता के मार्ग में जातिवाद, भाषावाद, साम्प्रदायिकता और प्रान्तीयता मुख्य बाधक तत्व हैं परन्तु सोचना अब यह है कि इनको बढ़ावा कौन दे रहा है। हमारी सम्मति में इनको बढ़ावा स्वयं सरकार है और राजनैतिक दल दे रहे हैं। इनके अतिरिक्त बढ़ती हुई जनसंख्या, आर्थिक विषमता और अन्य राष्ट्रों का हस्तक्षेप भी हमारे देश में राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधा डाल रहे हैं और जैसाकि शिक्षाविद स्वयं स्वीकार करते हैं, उदार शिक्षा की कमी भी इसके लिए उत्तरदायी है। अतः यहाँ इन पर थोडा विचार करना आवश्यक है -
1. जातिवाद, भाषावाद, साम्प्रदायिकता और प्रान्तीयता - हमारा देश एक विशाल देश है। इसमें अनेक जातियाँ हैं, अनेक भाषाओं का प्रयोग होता है, अनेक धार्मिक सम्प्रदाय हैं और यह शासन की दृष्टि से अनेक प्रान्तों में बंटा हुआ है और जहाँ वर्ग हो, वहाँ वर्ग-संघर्ष होना स्वाभाविक है और जहाँ संघर्ष हो वहाँ एकता का प्रश्न ही नहीं उठता पर वास्तविकता तो यह है कि हमारे देश में ये भिन्न-भिन्न जातियाँ, भिन्न-भिन्न भाषाएँ, भिन्न-भिन्न धार्मिक सम्प्रदाय और भिन्न-भिन्न क्षेत्र (जिनका आधार स्थान नहीं, भाषा और संस्कृति था) ये तो तब भी थे जब हमने स्वतंत्रता संग्राम लड़ा था, और तब देश में राष्ट्रीय एकता अपनी चरम सीमा में थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसमें निरन्तर कमी आती जा रही है और इसका मूल कारण है- हमारी सरकार और राजनैतिक दल।
2. राज्य की भेदभाव पूर्ण नीति - हमारे लोकतंत्र के मूल सिद्धान्त हैं - स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और न्याय। हमारे संविधान में भी यह घोषणा की गई है कि राज्य स्थान, जाति, लिंग और धर्म आदि किसी भी आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं बरतेगा, परन्तु अफसोस, हमारा राज्य स्थान, जाति, लिंग और धर्म, सभी के आधार पर भेदभाव बरत रहा है। किस प्रकार, यह आप स्वयं देख समझ रहे हैं। परिणाम यह है कि देश के नागरिकों में समान नागरिक होने का भाव ही उत्पन्न नहीं हो पा रहा जो राष्ट्रीय एकता का मूल आधार है।
3. वोट की राजनीति - भारत में विभिन्न जातियाँ, भाषाएँ और धार्मिक सम्प्रदाय तो पहले से ही थे परन्तु इनके बीच खाई खोदने का काम राजनैतिक दलों ने किया है, वोट की राजनीति ने किया है और यदि हम यह कहें कि वोट की राजनीति ही राष्ट्रीय एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। इस संदर्भ में पहली बात तो यह है कि हमारे देश में अधिकतर राजनैतिक दलों का निर्माण जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बनते हैं सभी राजनैतिक दल जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर वोट बटोरते हैं। कोई अपने को दलितों का हिमायती कहता है, कोई अपने को पिछड़े वर्ग का हिमायती कहता है और कोई अपने को अल्पसंख्यकों का हिमायती कहता है। इतना ही नहीं अपितु कोई अपने को किसानों के हितों का रक्षक बताता है तो कोई अपने को मजदूरों के हितों का रक्षक बताता है। कोई अपने क्षेत्र के विकास पर वोट मांगता है तो कोई अपनी भाषा के नाम पर वोट मांगता है। राष्ट्रहित की बात सोचने और करने वाले अब दिखाई ही नहीं देते तब आप ही सोचिए कि देश में राष्ट्रीय एकता कैसे हो सकती है।
4. बढ़ती हुई जनसंख्या और बेरोजगारी- हमारे देश में जिस तेजी के साथ जनसंख्या बढ़ रही है, उस तेजी के साथ उसमें उत्पादन के स्रोत नहीं बढ़ रहे हैं, परिणामस्वरूप बेरोजगारी बढ़ रही है। इससे राष्ट्र के चरित्र पर प्रभाव पड़ रहा है और चरित्र के अभाव में राष्ट्रीय एकता की बात सोचना व्यर्थ है।
5. आर्थिक विषमता - हमारे देश की जो भी आर्थिक नीति रही, उससे आर्थिक विषमता घटने के स्थान पर निरन्तर बढ़ रही है। इसमें कोई शक नहीं कि देश का आर्थिक विकास हो रहा है, देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, लोगों का जीवन स्तर उठ रहा है परन्तु जिस तेजी से धनी और अधिक धनी हो रहा है उस तेजी से सामान्य जनता का आर्थिक स्तर नहीं उठ रहा है। इस आर्थिक दौड़ में लोग स्वार्थ के आगे राष्ट्र हित की बात नहीं सोच पा रहे जो राष्ट्रीय एकता की पहली शर्त है।
राष्ट्रीय एकता के विकास में शिक्षा की सहायता
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता महसूस की गयी। परिणामस्वरूप देश में राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय भावना के विकास पर अधिक बल दिया जा रहा है। चूँकि शिक्षा इसके विकास में अत्यधिक महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है, इसीलिए इसी साधन द्वारा राष्ट्रीय चेतना के विकास के कार्य को पूर्ण करने का प्रयास किया जा रहा है।
राष्ट्रीयता की दृष्टि से आज शिक्षा का लक्ष्य है, व्यक्तियों में राष्ट्रीय भावना का विकास करना एवं उनके हृदय में राष्ट्र के प्रति प्रेम उत्पन्न करना। शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि शिक्षा प्राप्त व्यक्ति राष्ट्रीय प्रेम से युक्त हो। राष्ट्रीयता की दृष्टि से राष्ट्र को सुदृढ़ तथा सफल बनाना नागरिकों का सबसे पुनीत कार्य समझा जाता है। अतः राष्ट्र की आवश्यकताओं, आदर्शो तथा मान्यताओं के अनुसार ही शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। नागरिकों में राष्ट्र के प्रति अपार भक्ति, शासक की आशा का पालन, अनुशासन, आत्मत्याग व कर्त्तव्य पालन आदि की भावनाओं का उद्वेग करना शिक्षा का आदर्श होता है। गत वर्षों में नाजियों ने जर्मनी में फासिस्टस ने इटली में शिक्षा द्वारा युवकों को राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत कर दिया था। आज रूस तथा चीन भी शिक्षा के माध्यम से वहाँ के युवकों में साम्यवाद की भावना का समावेश कर रहे हैं। प्रजातंत्रीय देश प्रजातंत्रीय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाये रखने के लिए अपने नागरिकों में राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास कर रहे हैं।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि शिक्षा राष्ट्र के निर्माण में सहायक होती है। इसमें देश तथा जाति भेद को आश्रय नहीं मिलता। देश के नागरिक एकता के लिए सूत्र में बँध जाते हैं। परस्पर द्वेष-भाव एवं स्वार्थ को छोड़कर राष्ट्र की सेवा के लिए तैयार रहते हैं। वे राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझते हैं और उन्हें निभाने का भरसक प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार देश की समस्याओं का अन्त होता है और देश समृद्धि व शक्तिशाली बनता है।
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- प्रश्न- वैदिक काल में गुरुओं के शिष्यों के प्रति उत्तरदायित्वों का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य के परस्पर सम्बन्धों का विवेचनात्मक वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु यह किस सीमा तक प्रासंगिक है?
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा के कम से कम पाँच महत्त्वपूर्ण आदर्शों का उल्लेख कीजिए और आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए उनकी उपयोगिता बताइए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे? वैदिक काल में प्रचलित शिक्षा के मुख्य गुण एवं दोष बताइए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के प्रमुख गुण बताइए।
- प्रश्न- प्राचीन काल में शिक्षा से क्या अभिप्राय था? शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे?
- प्रश्न- वैदिककालीन उच्च शिक्षा का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा में प्रचलित समावर्तन और उपनयन संस्कारों का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का विकास तथा आध्यात्मिक उन्नति करना था। स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- आधुनिक काल में प्राचीन वैदिककालीन शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा में कक्षा नायकीय प्रणाली के महत्व की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक कालीन शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं? शिक्षा के विभिन्न सम्प्रत्ययों का उल्लेख करते हुए उसके वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा का अर्थ लिखिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
- प्रश्न- शिक्षा के दार्शनिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के समाजशास्त्रीय सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के राजनीतिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के आर्थिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के मनोवैज्ञानिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- क्या मापन एवं मूल्यांकन शिक्षा का अंग है?
- प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए। आपको जो अब तक ज्ञात परिभाषाएँ हैं उनमें से कौन-सी आपकी राय में सर्वाधिक स्वीकार्य है और क्यों?
- प्रश्न- शिक्षा से तुम क्या समझते हो? शिक्षा की परिभाषाएँ लिखिए तथा उसकी विशेषताएँ बताइए।
- प्रश्न- शिक्षा का संकीर्ण तथा विस्तृत अर्थ बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा क्या है?
- प्रश्न- शिक्षा का 'शाब्दिक अर्थ बताइए।
- प्रश्न- शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी अपने शब्दों में परिभाषा दीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
- प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा की दो परिभाषाएँ लिखिए।
- प्रश्न- शिक्षा की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- आपके अनुसार शिक्षा की सर्वाधिक स्वीकार्य परिभाषा कौन-सी है और क्यों?
- प्रश्न- 'शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है।' जॉन डीवी के इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
- प्रश्न- 'शिक्षा भावी जीवन की तैयारी मात्र नहीं है, वरन् जीवन-यापन की प्रक्रिया है। जॉन डीवी के इस कथन को उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा विज्ञान है या कला या दोनों? स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ को स्पष्ट कीजिए तथा शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा और साक्षरता पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए। इन दोनों में अन्तर व सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षण और प्रशिक्षण के बारे में प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- विद्या, ज्ञान, शिक्षण प्रशिक्षण बनाम शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- विद्या और ज्ञान में अन्तर समझाइए।
- प्रश्न- शिक्षा और प्रशिक्षण के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।










