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बी ए - एम ए >> फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्र फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्रयूनिवर्सिटी फास्टर नोट्स
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बी. ए. प्रथम वर्ष (सेमेस्टर-1) शिक्षाशास्त्र के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार हिन्दी माध्यम में सहायक-प्रश्नोत्तर
प्रश्न- भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए कौन-कौन से उपाय हैं?
उत्तर-
भारत में भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता के विकास के उपाय
(Means of Developing Emotional and National Integration in India)
स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ वर्ष बाद ही हमने अनुभव किया कि हमारे देश में भावात्मक (राष्ट्रीय) एकता में कमी आ रही है और तभी से इसके कारणों एवं उपायों पर निरन्तर विचार होता आ रहा है। इसके मूल कारणों के संदर्भ में हमने कुछ मुख्य गोष्ठियों, सम्मेलनों और समितियों के निर्णय प्रस्तुत किये हैं। यहाँ उन्हीं के द्वारा राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए सुझाए उपायों का संक्षेप में उल्लेख करना आवश्यक है -
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित
1. राष्ट्रीय एकता गोष्ठी (1958) - के सुझाव इस गोष्ठी ने राष्ट्रीय एकता के विकास हेतु निम्नलिखित सुझाव दिये थे -
(i) भारतीय इतिहास को उसके सही रूप में लिखा जाये।
(ii) शिक्षा संस्थाओं में राष्ट्रीय उत्सव मनाये जायें।
(iii) धर्म और जाति के नाम पर छात्रवृत्तियाँ न दी जायें।
(iv) धर्म और जाति के नाम पर छात्रावास न बनाये जायें।
2. उपकुलपति सम्मेलन (1961) - के सुझाव इसका विचार क्षेत्र केवल विश्वविद्यालय की भूमिका तक सीमित था। इसने राष्ट्रीय एकता के विकास में विश्वविद्यालय के स्वरूप और कार्य सम्बन्धी निम्नलिखित सुझाव दिये थे-
(i) विश्वविद्यालयों के जातीय स्वरूप, जैसे - हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी और मुसलमान विश्वविद्यालय, अलीगढ को समाप्त किया जाये।
(ii) विश्वविद्यालयों के क्षेत्रीय और भाषायी स्वरूप को समाप्त किया जाये। विश्वविद्यालयों में देश के किसी भी क्षेत्र के युवकों को उनकी योग्यता के आधार पर प्रवेश दिया जाये। इसके लिए शिक्षा का माध्यम एक होना आवश्यक है और वह राष्ट्रभाषा हिन्दी अथवा अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी ही हो सकती है।
(iii) विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की नियुक्ति अथवा छात्रों के प्रवेश में जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र व धर्म किसी भी आधार पर कोई भेदभाव न बरता जाये।
3. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता समिति (1961) के सुझाव - यह कांग्रेस दल द्वारा गठित की गई थी, इसलिए इसकी सिफारिशें वोट की राजनीति पर आधारित होना स्वाभाविक है। इसने निम्नलिखित सुझाव दिये थे
(i) शिक्षा तथा अन्य क्षेत्रों में राष्ट्रीय दृष्टिकोण को बढ़ावा।
(ii) विघटनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश।
(iii) सरकारी नौकरियों में जाति और धर्म की प्रवृत्ति पर रोक।
(iv) अल्पसंख्यकों के लिए अवसरों में वृद्धि।
4. मंत्रियों के सम्मेलन (1961) के सुझाव - यह भी राजनीतिक नेताओं का सम्मेलन था, पर प्रान्तीयता से ऊपर उठकर विचार व्यक्त करना इनकी यथा संदर्भ में विवशता थी। राष्ट्रीय एकता के विकास हेतु इन्होंने निम्नलिखित सुझाव दिये थे
(i) राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार।
(ii) समस्त भारतीय भाषाओं के लिए एक लिपि।
(iii) अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी को बनाये रखना।
(iv) त्रिभाषा सूत्र (1. मातृभाषा, 2. अहिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी और क्षेत्रों में कोई एक अन्य भारतीय भाषा और 3. अंग्रेजी या अंतर्राष्ट्रीय महत्व की कोई अन्य भाषा) लागू किया जाये।
(v) परीक्षा का माध्यम प्रादेशिक भाषाओं के साथ-साथ हिन्दी और अंग्रेजी भी।
(vi) विश्वविद्यालयी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी अथवा हिन्दी। भविष्य में केवल हिन्दी हों।
5. डॉ. सम्पूर्णानन्द भावात्मक एकता समिति (1961-62) के सुझाव - इस समिति ने स्पष्ट किया कि भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता के विकास में शिक्षा की अहम् भूमिका है। इसने निम्नलिखित सुझाव दिये थे-
(i) विद्यालयों के कार्यक्रम को कुछ इस प्रकार सुनिश्चित करना कि उनमें भाग लेते हुए बच्चों में वर्ग संकीर्णता समाप्त हो और उनमें उचित आदर्शों का निर्माण हो।
(ii) शिक्षा ऐसी हो जो बच्चों को भविष्य के प्रति आश्वस्त करें।
(iii) शिक्षा ऐसी हो जो बच्चों में राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य भावना का विकास करे।
6. राष्ट्रीय एकता समिति (1967) के सुझाव - यह समिति भी राजनीतिक लोगों की समिति थी, अतः इसके सुझाव भी राजनीतिक प्रेरित हैं। इसने निम्नलिखित सुझाव दिये थे -
(i) साम्प्रदायिकता का दमन।
(ii) उपद्रव मचाने वाले सेना संगठनों - शिवसेना, तमिल सेना, नाग सेना आदि पर प्रतिबन्ध।
(iii) भाषा विवाद का हल।
(iv) शिक्षा में सुधार।
7. शिक्षा जगत की अन्य गोष्ठियों के सुझाव - इस बीच इस विषय पर न जाने कितनी गोष्ठियों का आयोजन हुआ, कितने प्रकाशन हुए, उन सबकी सिफारिशों को यहाँ प्रस्तुत करना सम्भव नहीं पर सभी ने शिक्षा को जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म आदि के संकुचित धरातल से उठाकर उसे राष्ट्रीय हित से जोड़ने की बात कही। यह कार्य कैसे किया जाये, इस विषय पर उन्होंने अनेक सुझाव दिये जिनमें शिक्षा के उद्देश्यों को व्यापक बनाना और पाठ्यचर्या में राष्ट्र हित की सामग्री को स्थान देना मुख्य हैं।
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- प्रश्न- वैदिक काल में गुरुओं के शिष्यों के प्रति उत्तरदायित्वों का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य के परस्पर सम्बन्धों का विवेचनात्मक वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु यह किस सीमा तक प्रासंगिक है?
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा के कम से कम पाँच महत्त्वपूर्ण आदर्शों का उल्लेख कीजिए और आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए उनकी उपयोगिता बताइए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे? वैदिक काल में प्रचलित शिक्षा के मुख्य गुण एवं दोष बताइए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के प्रमुख गुण बताइए।
- प्रश्न- प्राचीन काल में शिक्षा से क्या अभिप्राय था? शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे?
- प्रश्न- वैदिककालीन उच्च शिक्षा का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा में प्रचलित समावर्तन और उपनयन संस्कारों का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का विकास तथा आध्यात्मिक उन्नति करना था। स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- आधुनिक काल में प्राचीन वैदिककालीन शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा में कक्षा नायकीय प्रणाली के महत्व की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक कालीन शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं? शिक्षा के विभिन्न सम्प्रत्ययों का उल्लेख करते हुए उसके वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा का अर्थ लिखिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
- प्रश्न- शिक्षा के दार्शनिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के समाजशास्त्रीय सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के राजनीतिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के आर्थिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के मनोवैज्ञानिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- क्या मापन एवं मूल्यांकन शिक्षा का अंग है?
- प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए। आपको जो अब तक ज्ञात परिभाषाएँ हैं उनमें से कौन-सी आपकी राय में सर्वाधिक स्वीकार्य है और क्यों?
- प्रश्न- शिक्षा से तुम क्या समझते हो? शिक्षा की परिभाषाएँ लिखिए तथा उसकी विशेषताएँ बताइए।
- प्रश्न- शिक्षा का संकीर्ण तथा विस्तृत अर्थ बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा क्या है?
- प्रश्न- शिक्षा का 'शाब्दिक अर्थ बताइए।
- प्रश्न- शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी अपने शब्दों में परिभाषा दीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
- प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा की दो परिभाषाएँ लिखिए।
- प्रश्न- शिक्षा की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- आपके अनुसार शिक्षा की सर्वाधिक स्वीकार्य परिभाषा कौन-सी है और क्यों?
- प्रश्न- 'शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है।' जॉन डीवी के इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
- प्रश्न- 'शिक्षा भावी जीवन की तैयारी मात्र नहीं है, वरन् जीवन-यापन की प्रक्रिया है। जॉन डीवी के इस कथन को उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा विज्ञान है या कला या दोनों? स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ को स्पष्ट कीजिए तथा शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा और साक्षरता पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए। इन दोनों में अन्तर व सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षण और प्रशिक्षण के बारे में प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- विद्या, ज्ञान, शिक्षण प्रशिक्षण बनाम शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- विद्या और ज्ञान में अन्तर समझाइए।
- प्रश्न- शिक्षा और प्रशिक्षण के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।










