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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 राजनीति विज्ञान

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2796
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 राजनीति विज्ञान : लोक प्रशासन

प्रश्न- भारत में केन्द्रीय बजट का निर्माण किस प्रकार होता है?

अथवा
बजट भारतीय संसद में किस प्रकार पारित होता है? इसके विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत में बजट निर्माण के प्रमुख चरणों का वर्णन कीजिए।


सम्बन्धित लघु / अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. विनियोग विधेयक पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर -

भारतीय संसद की बजट निर्माण प्रक्रिया

भारतीय वित्तीय वर्ष 01 अप्रैल से प्रारम्भ होकर अगले वर्ष के 31 मार्च तक चलता है, अतः उससे पहले वर्ष के जुलाई अथवा अगस्त माह से ही अनुमानों की तैयारी का कार्य प्रारम्भ हो जाता है। बजट की तैयारी स्थानीय कार्यालयों से प्रारम्भ होती है। जुलाई के अन्त में वित्त मन्त्रालय विभिन्न मन्त्रालयों के विभागाध्यक्षों को उनके व्यय की आवश्यकताओं के अनुमान को तैयार करने के लिए प्रपत्र भेजता है, जिनमें निम्न बातें सम्मिलित होती हैं-

(1) गत वित्तीय वर्ष की वास्तविक आय तथा व्यय
(2) वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए स्वीकृत अनुमान
(3) वर्तमान वित्तीय वर्ष के संशोधित अनुमान
(4) आगामी वित्तीय वर्ष के लिए बजट अनुमानों में प्रस्तावित वृद्धि या कमी।

प्रशासकीय मन्त्रालयों द्वारा तैयार किए गए बजट अनुमानों की एक प्रति भारत सरकार के महालेखाकार को प्रेषित कर दी जाती है। महालेखाकार इन अनुमानों की सूक्ष्मता से जाँच करता है तथा अपनी टिप्पणी के साथ वित्त मन्त्रालय के समक्ष प्रस्तुत करता है। तत्पश्चात् वित्त मन्त्रालय द्वारा उनका सूक्ष्म परीक्षण किया जाता है। प्रशासकीय मन्त्रालयों द्वारा तैयार किए गए बजट अनुमानों को मोटे रूप में तीन भागों में बांटा जा सकता है-

(1) स्थायी प्रभार
(2) प्रचलित योजनाएँ,
(3) नवीन योजनाएं।

व्यय के अनुमान पूर्ण हो जाने के पश्चात् सरकारी आय अर्थात् राजस्व के अनुमान तैयार किए जाते हैं। सरकारी आय का अनुमान लगाना वित्त मन्त्रालय का कार्य है। आयकर विभाग केन्द्रीय उत्पादन कर विभाग, सीमाशुल्क विभाग तथा अन्य सरकारी राजस्व का संग्रह करने वाले विभाग हैं जोकि विगत वित्तीय वर्ष में संग्रह किये गये सरकारी राजस्व के आंकड़ों के आधार पर आगामी वित्तीय वर्ष के लिए सम्भावित सरकारी राजस्व का अनुमान लगाते हैं। इसके पश्चात् वित्त मन्त्रालय का कार्य व्यय की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करों की दर में आवश्यक परिवर्तन तथा नए कर लगाने के लिये सिफारिश करना तथा कुछ पुराने करों को हटाने का निर्णय लेना है। यद्यपि सरकारी आय-व्यय से सम्बद्ध नीति सम्बन्धी मामले मन्त्रिपरिषद द्वारा तय किए जाते हैं।

इस प्रकार से तैयार बजट को संसद की स्वीकृति की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जो कि निम्नवत् है-

बजट को संसद की स्वीकृति

(1) बजट का संसद के सम्मुख प्रस्तुतीकरण - कार्यपालिका द्वारा बजट तैयार किए जाने के उपरान्त इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु संसद में विचार-विमर्श हेतु प्रस्तुत किया जाता है। भारत में दो प्रकार के बजट प्रस्तुत किए जाते हैं- पहला रेल बजट जो कि रेल मन्त्री द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। रेल बजट सामान्यतया 15 फरवरी को प्रस्तुत किया जाता है तथा दूसरा आय बजट जोकि वित्त मन्त्री द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। आय बजट सामान्यतः प्रचलित परम्पराओं के अनुसार फरवरी के अन्तिम दिनों में प्रस्तुत किया जाता है। लोकसभा में बजट प्रस्तुत करते समय बजट भाषण सम्बन्धित मन्त्री द्वारा दिया जाता है जो वास्तव में संसद के महत्वपूर्ण भाषणों में से होता है। लोकसभा में वित्त मन्त्री का भाषण समाप्त होने पर बजट की एक प्रति राज्य सभा के पटल पर रखी जाती है। उसके तुरन्त पश्चात् वित्त मन्त्री वित्त विधेयक प्रस्तुत करता है जिसमें सरकार के कराधान प्रस्ताव होते हैं उसके बाद सदन स्थगित कर दिया जाता है। जिस दिन बजट प्रस्तुत किया जाता है उस दिन बजट पर चर्चा नहीं की जाती।

बजट में दो प्रकार के व्ययों को अलग-अलग करके रखा जाता है। एक व्यय तो वे होते हैं जो भारत की संचित निधि से किए जाने वाले होते हैं। दूसरे व्यय वे होते हैं जो भारत की संचित निधि पर पारित होते हैं। पारित से तात्पर्य निर्धारित व्यय से है, जिन पर बहस नहीं होती तथा उन व्ययों पर मत भी नहीं लिए जाते।

(2) बजट पर सामान्य चर्चा - बजट के प्रस्तुतीकरण से बजट पारित होने की सम्पूर्ण प्रक्रिया में लगभग 30 दिन का समय लगता है। लोकसभा के कार्य संचालन नियम संख्या 207 (1) (2) में बजट प्रस्तुतीकरण के कुछ दिन पश्चात् सामान्य चर्चा का दिशा-निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि 'सदन को इस बात की अनुमति होगी कि वह सम्पूर्ण बजट अथवा उसमें प्रस्थापित सिद्धान्त के किसी प्रश्न के बारे में विचार-विमर्श कर सके, परन्तु इस समय कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा एवं न ही सदन में बजट पर मतदान लिया जा सकेगा। आम चर्चा के दौरान व्यय के किसी भी मद को परिचर्चा से बाहर नहीं रखा जाता तथा प्रत्येक मुद्दे पर प्रशासनिक नीतियों की संक्षिप्त आलोचना की जा सकती है। बजट पर सामान्य चर्चा के उपरान्त अन्तिम दिन वित्तमन्त्री अपना संक्षिप्त उत्तर देता है।

(3) विभागों से सम्बन्धित स्थायी समितियों द्वारा बजट समीक्षा - सन् 1993 के बजट सत्र के दौरान एक महत्वपूर्ण निर्णय विभागों से सम्बन्धित स्थायी संसदीय समितियों के गठन का लिया गया, जिनका कार्य अन्य बातों के साथ-साथ विभिन्न मन्त्रालयों अथवा विभागों की अनुदान मांगों पर सदन में चर्चा करना और मतदान से पहले इनकी समीक्षा करना है। इस नई समिति व्यवस्था के द्वारा संसद का कार्यपालिका के व्यय करने के अधिकार पर अंकुश बढ़ा है और सरकार की संसद के सम्मुख जवाबदेही बढ़ी है।

(4) अनुदान मांगों पर बहस तथा मतदान - जब बजट पर सामान्य चर्चा समाप्त हो जाती है तो अनुदान मागों पर बहस प्रारम्भ हो जाती है तथा मतदान प्रक्रिया पर लगभग 26 दिन तक लग जाते हैं। यह बहस बजट पारित करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। लोकसभा कार्यवाही अधिनियम (131) के तहत प्रत्येक अनुदान मांग को समग्र रूप से तथा उसके अन्तर्गत मद-वार ब्योरों के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। प्रत्येक मन्त्रालय का सम्बन्धित मन्त्री अपनी मांगें प्रस्तुत करते समय तक संक्षिप्त भाषण देता है। संविधान के अनुच्छेद 113 (2) के तहत लोकसभा को इन्हें स्वीकार करने या न करने का अधिकार होता है। बजट मांगों पर बहस तथा मतदान के लिए लोकसभा अध्यक्ष सदन के नेता से बात करके अलग-अलग विभाग के लिये उनके आकार के अनुसार समय का निर्धारण करता हैं। समय की समाप्ति के उपरान्त मतदान का प्रस्ताव रख दिया जाता है।

शासन की ओर से मांगें रखी जाती हैं तथा विपक्ष की ओर से कटौती प्रस्ताव रखे जाते हैं। कटौती प्रस्ताव रखकर विरोधी यह बताना चाहते हैं कि शासन को व्यय के लिए उतना धन न स्वीकृत किया जाय जितनी कि उसकी मांग है। यदि कटौती प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो उस पर बहस शुरू हो जाती है।

व्यवहार में प्रायः ऐसा नहीं होता कि कटौती प्रस्ताव पारित हो जाय और शासन की मांगों की स्वीकृत न किया जाये। यदि संसद शासन की मांग को अस्वीकृत करता है तो इसका अर्थ शासन के प्रति अविश्वास व्यक्त करना होता है। इसलिए जब तक शासन को संसद में विश्वास मत प्राप्त हो तब तक संसद शासक की मांगों को अस्वीकृत ही करती हैं। अनुदान में भी बहस तथा मतदान के उपरान्त जब स्वीकृत हो जाती है तो वे अनुदान कहलाती है।

(5) मतदान प्रक्रिया - भारतीय संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत 26 दिनों के भीतर अनुदान मांगों को पास करने की परम्परा है। अध्यक्ष द्वारा किसी अनुदान मांग पर बहस के लिए निर्धारित समय के अन्तिम दिन सांय 5 बजे मतदान का कार्य प्रारम्भ हो जाता है। इसी प्रक्रिया से सभी विभागों को अनुदान मांगों से गुजरना होता है किन्तु पूरी बहस के लिए निर्धारित दिनों के अन्तिम दिन शेष बची सभी मांगों पर भी मतदान हो जाता है चाहे उन पर बहस हुई हो या न हुई हो। इस प्रकार अन्तिम दिन कई मांगें बिना बहस के ही पास कर दी जाती हैं। ऐसा सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 1995-96 लोकसभा के समय हुआ जब केवल रक्षा तथा संचार की बजट मांगों पर ही बहस हो सकी। शेष सभी मन्त्रालयों की मांगों पर बिना बहस किए ही 30 मन्त्रालयों के 80 विभागों की लगभग 3,72,462 करोड़ रुपये की अनुदान मांगों को एक साथ पारित कर दिया गया। इसी प्रकार 2001 में लोकसभा ने रक्षा, गृह, विदेश और कृषि सहित लगभग 45 मन्त्रालयों की अनुदान मांगों को बिना बहस के पारित कर दिया था। तहलका प्रकरण को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच बने गतिरोध के कारण मात्र ग्रामीण विकास और विनिवेश मन्त्रालयों के अलावा अन्य किसी मन्त्रालय के विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा नहीं हो सकी।

(6) लेखानुदान - भारतीय संविधान के अनुच्छेद 116 (1) के तहत संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि बजट प्रक्रिया के पूर्ण होने के पूर्व ही वित्तीय वर्ष के प्रथम दो माह के लिए कार्यपालिका को अग्रिम अनुदान स्वीकृत कर खर्च करने की अनुमति प्रदान करे ताकि सरकार अनुदान की मांगों पर मतदान होने तथा विनियोग विधेयक तथा वित्त विधेयक के पारित होने तक अपना व्यय का कार्य चला सके। सामान्यतः यह धनराशि अनुदानों के विभिन्न मांगों के अधीन समस्त वर्ष के लिए अनुमानित व्यय के 1/6 भाग के बराबर होती है। लेखानुदान की परम्परा के कारण अब अनुदान मांगों पर 1 अप्रैल के बाद तक भी बहस आवश्यक होने पर जारी रह सकती है। इस प्रक्रिया के कारण प्रशासनिक कमियों को और अधिक खुलासा करने का अवसर मिलता है जिससे कि कार्यपालिका और अधिक सतर्कता अपना सके।

(7) विनियोग विधेयक पर विचार एवं स्वीकृति - सदन के द्वारा अनुदान मांगों पर मतदान हो जाने का मतलब यह नहीं होता है कि सरकार को सार्वजनिक कोष (Public Fund) से पैसा निकालने का हक प्राप्त हो गया है। लोकसभा के द्वारा अनुदान की मांगों को पारित होने के बाद इस प्रकार पारित राशियों और समेकित निधि पर पारित व्यय को पूरा करने के लिए अपेक्षित राशि को समेकित निधि से निकालने की संसद की स्वीकृत विनियोग विधेयक के माध्यम से मांगी जाती है। संविधान के अनुच्छेद 114(3) के अन्तर्गत संसद द्वारा ऐसा कानून बनाए बिना कोई भी राशि समेकित निधि से नहीं निकाली जा सकती। जब सभी अनुदान मांगों पर मतदान हो जाता है तो उनको संचित निधि सहित विनियोजित अधिनियम में एकीकृत कर लिया जाता है और इस प्रकार धन खर्च करने के अधिकार को प्राप्त करने के लिए विनियोग विधेयक को पास करवाने की प्रक्रिया सम्पादित करनी होती है। इस विधेयक का आशय संचित निधि से व्यय के विनियोग के लिए सरकार को कानूनी अधिकार देना हैं। विधेयक को लोकसभा के द्वारा पारित किए जाने के पश्चात अध्यक्ष उसे धन विधेयक के रूप में प्रमाणित करता है और उसको राज्य सभा के पास भेज देता है। राज्य सभा को धन विधेयक में संशोधन करने या उसे अस्वीकृत करने की शक्ति प्राप्त नहीं है, उसे विधेयक पर अपनी स्वीकृति देनी ही होती है। इसके उपरान्त विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के लिए उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

(8) वित्त विधेयक पर विचार एवं स्वीकृति - संसद में बजट के पारित होने का यह अन्तिम चरण है। शासन संसद से व्यय करने के लिए जब एक राशि अनुदान के रूप में स्वीकृत करा लेता है तो फिर उसके समक्ष धनराशि प्राप्त करने के लिए प्रस्ताव रखता है। राशि प्राप्त करने का स्रोत विभिन्न कर होते हैं। कर लगाने वाले विधेयक ही वित्त विधेयक कहलाते हैं। भारतीय संविधान की धारा 263 के अनुसार यह निर्धारित किया गया है कि कोई भी कर संसद की स्वीकृति के बिना न तो लगाया जा सकता है तथा न ही वसूल किया जा सकता है।

वित्त विधेयक में पूर्व प्रचलित तथा नए कर दोनों प्रकार के कर प्रस्तावों को सम्मिलित किया जाता है। आयकर, उत्पादन शुल्क, निगम कर आदि कुछ स्थायी कर होते हैं, जिनकी प्रचलित दरों में सरकार आवश्यकतानुसार प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए परिवर्तन प्रस्तावित करती है। विनियोग विधेयक में बहस के दौरान प्रायः कोई परिवर्तन नहीं किया जाता जबकि वित्त विधेयक में बहस के दौरान सदस्यों द्वारा करों में संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते हैं। यह प्रस्ताव कर बढ़ाने अथवा कर लगाने सम्बन्धी नहीं हो सकते।

वित्त विधेयक वित्तमन्त्री के द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है। वित्तमन्त्री प्रस्ताव रखता है कि वित्त विधेयक को विचारार्थ लिया जाना चाहिए। सदन उस पर विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद प्रारम्भ कर देता है। शासन की कराधान नीति पर वाद-विवाद प्रारम्भ हो जाता है, तत्पश्चात विधेयक को प्रवर समिति के पास भेज दिया जाता है। प्रवर समिति उस पर विचार-विमर्श कर अपना प्रतिवेदन सदन को प्रस्तुत करती है। सदन उस पर गहराई से विचार-विमर्श करता है। वित्त विधेयक चूँकि बहुमत दल के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है अतः लोकसभा उसे पास कर देती है। अब इसे राज्य सभा के पास भेज दिया जाता है जोकि 14 दिनों के भीतर उसे लौटाने को बाध्य है। विनियोग विधेयक की भांति वित्त विधेयक पर भी राज्य सभा की शक्तियाँ सीमित हैं। जब दोनों सदन वित्त विधेयक को पारित कर देते हैं तो उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु हस्ताक्षर के लिए भेज दिया जाता है तत्पश्चात् यह विधेयक कानून बन जाता है तथा सरकार को कर राजस्व लगाने तथा वसूलने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

 

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- 'लोक प्रशासन' के अर्थ और परिभाषाओं की विवेचना कीजिए।
  2. प्रश्न- लोक प्रशासन की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
  3. प्रश्न- लोक प्रशासन के क्षेत्र पर प्रकाश डालिए।
  4. प्रश्न- लोकतांत्रिक प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
  5. प्रश्न- प्रशासन' शब्द का प्रयोग सामान्य रूप से किन प्रमुख अर्थों में किया जाता है?
  6. प्रश्न- "लोक प्रशासन एक नीति विज्ञान है" यह किन आधारों पर कहा जा सकता है?
  7. प्रश्न- लोक प्रशासन का महत्व बताइए।
  8. प्रश्न- प्रशासन के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
  9. प्रश्न- लोक प्रशासन के क्षेत्र का 'पोस्डकोर्ब दृष्टिकोण' की व्यख्या कीजिये।
  10. प्रश्न- लोक प्रशासन को विज्ञान न मानने के क्या कारण हैं?
  11. प्रश्न- एक अच्छे प्रशासन के गुण बताइए।
  12. प्रश्न- विकासशील देशों में लोक प्रशासन की चुनौतियाँ बताइये।
  13. प्रश्न- 'लोक प्रशासन में सैद्धान्तीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति', टिप्पणी कीजिए।
  14. प्रश्न- कार्मिक प्रशासन के मूल तत्व क्या हैं?
  15. प्रश्न- राजनीतिज्ञ एवं प्रशासक के मध्य अन्तर लिखिए।
  16. प्रश्न- शासन एवम् प्रशासन में अन्तर स्पष्ट कीजिये।
  17. प्रश्न- अनुशासन से क्या तात्पर्य है? लोक प्रशासन में अनुशासन के महत्व को दर्शाइए।
  18. प्रश्न- भारत में लोक सेवकों के आचरण को अनुशासित बनाने के लिए किए गए प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
  19. प्रश्न- लोक सेवकों को अनुशासन में बनाए रखने के लिए उन पर लगाए गए प्रतिबन्धों का वर्णन कीजिए।
  20. प्रश्न- किसी संगठन में अनुशासन के योगदान पर टिप्पणी लिखिए।
  21. प्रश्न- प्रशासन में अनुशासनहीनता को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण कौन-कौन से हैं?
  22. प्रश्न- "अनुशासन में गिरावट लोक प्रशासन के लिए चुनौती" इस कथन पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
  23. प्रश्न- लोक प्रशासन से आप क्या समझते हैं? निजी प्रशासन लोक प्रशासन से किस प्रकार भिन्न है?
  24. प्रश्न- "लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन में अनेकों असमानताएँ होने के बावजूद कुछ ऐसे बिन्दू भी हैं जो उनके बीच समानताएँ प्रदर्शित करते हैं।' कथन का परीक्षण कीजिए।
  25. प्रश्न- निजी प्रशासन में लोक प्रशासन की अपेक्षा भ्रष्टाचार की सम्भावनाएँ कम है, कैसे?
  26. प्रश्न- निजी प्रशासन के नकारात्मक पक्षों पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
  27. प्रश्न- लोक प्रशासन की तुलना में निजी प्रशासन में राजनीतिकरण की सम्भावनाएँ न्यूनतम हैं, कैसे?-
  28. प्रश्न- निजी प्रशासन के दो प्रमुख लाभ बताइए।
  29. प्रश्न- लोक प्रशासन के महत्व पर विवेचना कीजिए।
  30. प्रश्न- आधुनिक राज्यों में लोक प्रशासन के विभिन्न रूपों को स्पष्ट कीजिए।
  31. प्रश्न- विकासशील देशों में लोक प्रशासन की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
  32. प्रश्न- संगठन का अर्थ स्पष्ट करते हुए, इसके आधारों को स्पष्ट कीजिए।
  33. प्रश्न- संगठन के आधारों को स्पष्ट कीजिए।
  34. प्रश्न- संगठन के प्रकारों को स्पष्ट कीजिए। औपचारिक संगठन की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  35. प्रश्न- औपचारिक संगठन की विशेषताएँ बताइये।
  36. प्रश्न- अनौपचारिक संगठन से आप क्या समझते हैं? इनकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  37. प्रश्न- औपचारिक तथा अनौपचारिक संगठन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  38. प्रश्न- संगठन की समस्याओं पर प्रकाश डालिए।
  39. प्रश्न- संगठन के यान्त्रिक अथवा शास्त्रीय दृष्टिकोण (उपागम) को स्पष्ट कीजिए।
  40. प्रश्न- पदसोपान प्रणाली के गुण व दोष बताते हुए इसका मूल्यांकन कीजिए।
  41. प्रश्न- संगठन के आदेश की एकता सिद्धान्त की विस्तृत विवेचना कीजिए।
  42. प्रश्न- आदेश की एकता सिद्धान्त के गुण बताते हुए इसकी समालोचनाओं पर भी प्रकाश डालिए।
  43. प्रश्न- 'प्रत्यायोजन' से आप क्या समझते हैं? प्रत्यायोजन को परिभाषित करते हुए इसकी आवश्यकता एवं महत्व को बताइए।
  44. प्रश्न- प्रत्यायोजन के विभिन्न सिद्धान्तों एवं प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
  45. प्रश्न- संगठन के सिद्धान्तों के विशेष सन्दर्भ में प्रशासन को लूथर गुलिक एवं लिंडल उर्विक के योगदान की विवेचना कीजिए।
  46. प्रश्न- लोक प्रशासन के क्षेत्र में एल्टन मेयो द्वारा प्रस्तुत मानव सम्बन्ध उपागम पर प्रकाश डालिए।
  47. प्रश्न- हरबर्ट साइमन के निर्णय निर्माण सम्बन्धी मॉडल की व्याख्या कीजिए।
  48. प्रश्न- हर्बर्ट साइमन के निर्णय निर्माण सिद्धान्त का लोक प्रशासन में महत्व पर प्रकाश डालिए।
  49. प्रश्न- नौकरशाही का अर्थ बताइये और परिभाषाएँ दीजिए।
  50. प्रश्न- नौकरशाही की विशेषताएँ अथवा लक्षणों को बताइये।
  51. प्रश्न- निर्णयन का क्या अर्थ है? प्रशासन में निर्णयन प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
  52. प्रश्न- हेनरी फेयाफल द्वारा उल्लिखित किये गये संगठन के सिद्धान्तों को बताइए।
  53. प्रश्न- 'गेंगप्लांक' पर टिप्पणी कीजिये।
  54. प्रश्न- हरबर्ट साइमन द्वारा 'प्रशासन की कहावत' किन्हें कहा गया है और क्यों?
  55. प्रश्न- ऐल्टन मेयो को मानव सम्बन्ध उपागम के प्रवर्तकों में शामिल किया जाता है, क्यों?
  56. प्रश्न- निर्णयन के अवसरों का वर्णन कीजिए।
  57. प्रश्न- निर्णयन के लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
  58. प्रश्न- प्रतिबद्ध नौकरशाही की विवेचना कीजिए।
  59. प्रश्न- सूत्र एवं स्टाफ अभिकरण का आशय स्पष्ट कीजिए। सूत्र एवं स्टाफ अभिकरण में अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
  60. प्रश्न- सूत्र या पंक्ति अभिकरण से क्या आशय है एवं सूत्र (लाइन) या पंक्ति अभिकरणों की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  61. प्रश्न- प्रशासन में स्टाफ अभिकरण के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  62. प्रश्न- स्टाफ अभिकरणों के कार्यों पर प्रकाश डालिए।
  63. प्रश्न- स्टाफ अभिकरण के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डालिए।
  64. प्रश्न- सहायक अभिकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए एवं स्टाफ अभिकरण से इनकी भिन्नता पर प्रकाश डालिए।
  65. प्रश्न- मुख्य प्रशासक की प्रशासन में क्या स्थिति है? स्पष्ट कीजिए।
  66. प्रश्न- बजट से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित कीजिए। भारत में बजट कैसे तैयार किया जाता है?
  67. प्रश्न- बजट किसे कहते है? एक स्वस्थ बजट के महत्वपूर्ण सिद्धान्त बताइए।
  68. प्रश्न- भारत में केन्द्रीय बजट का निर्माण किस प्रकार होता है?
  69. प्रश्न- वित्त विधेयक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  70. प्रश्न- वित्त विधेयक के सम्बन्ध में राष्ट्रपति के विशेषाधिकार को स्पष्ट कीजिए।
  71. प्रश्न- बजट का महत्व बताइए।
  72. प्रश्न- भारत में बजट के क्रियान्वयन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  73. प्रश्न- बजट के कार्य बताइये।
  74. प्रश्न- बजट के प्रकार लिखिए।
  75. प्रश्न- वित्त आयोग के कार्य बताइए।
  76. प्रश्न- योजना आयोग का प्रशासनिक ढाँचा क्या है?
  77. प्रश्न- शून्य आधारित बजट का वर्णन कीजिए।
  78. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन से आप क्या समझते हैं? नवीन लोक प्रशासन के उदय के कारण बताते हुए इसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का वर्णन कीजिए तथा नवीन लोक प्रशासन एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  79. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
  80. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए इसके लक्षणों का परीक्षण कीजिए।
  81. प्रश्न- नवीन लोक प्रबन्ध के अभ्युदय कैसे हुआ? नवीन लोक प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएँ बताते हुए इसके अंतर्गत सरकार की भूमिका में आए बदलावों पर प्रकाश डालिए।
  82. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन की भावी सम्भावनाओं को व्यक्त कीजिए।
  83. प्रश्न- नव लोक प्रशासन का उदय किन परिस्थितियों में हुआ?
  84. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन के प्रमुख तत्व कौन से हैं?
  85. प्रश्न- 'नवीन लोक प्रबन्ध' दृष्टिकोण के हानिकारक पक्षों पर प्रकाश डालिए।
  86. प्रश्न- नव लोक प्रबन्ध की पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण के समर्थक क्या आलोचना करते हैं?
  87. प्रश्न- नव लोक प्रबन्ध की हरबर्ट साइमन द्वारा प्रस्तुत आलोचना पर प्रकाश डालिए।
  88. प्रश्न- प्रशासकीय कानून का क्या अर्थ है? प्रशासकीय कानून के विकास के प्रमुख कारण बतलाइए।
  89. प्रश्न- प्रशासकीय अधिनिर्णय का क्या अर्थ है? इसके विकास के प्रमुख कारणों का विवेचन कीजिए।
  90. प्रश्न- भारत में जन शिकायतों के निस्तारण हेतु ओम्बड्समैन की स्थापना हेतु किए गए प्रयासों की विवेचना कीजिए।
  91. प्रश्न- प्रशासन पर न्यायिक नियन्त्रण से क्या तात्पर्य है? कोई न्यायालय प्रशासन के कार्यों को किस प्रकार अवैध घोषित कर सकता है?
  92. प्रश्न- भारत में प्रशासन पर न्यायिक नियन्त्रण के विभिन्न साधनों का परीक्षण कीजिए।
  93. प्रश्न- भारत में प्रशासकीय न्यायाधिकरणों को कितने वर्गों में विभाजित किया गया है?
  94. प्रश्न- प्रशासकीय न्यायाधिकरणों से क्या लाभ हैं?
  95. प्रश्न- प्रशासकीय न्यायाधिकरणों की हानियाँ बताइए।
  96. प्रश्न- लोक प्रशासन के अध्ययन के आधुनिक उपागमों को बताइये तथा व्यवहारवादी उपागमन को सविस्तार समझाइये।
  97. प्रश्न- लोक प्रशासन के अध्ययन के व्यवस्था उपागम का वर्णन कीजिए।
  98. प्रश्न- लोक प्रशासन के संरचनात्मक कार्यात्मक उपागम की व्याख्या कीजिए।
  99. प्रश्न- लोक प्रशासन के अध्ययन के पारिस्थितिकी उपागम का वर्णन कीजिए।
  100. प्रश्न- सुशासन से आप का क्या आशय है? सुशासन की विशेषताएँ लिखिए।
  101. प्रश्न- भारतीय क्षेत्र में सुशासन स्थापित करने की प्रमुख चुनौतियाँ कौन-कौन सी हैं? स्पष्ट कीजिए।
  102. प्रश्न- भारत में सुशासन की स्थापना हेतु किये गये प्रयासों पर प्रकाश डालिए।
  103. प्रश्न- विकास प्रशासन से क्या अभिप्राय है? इसके प्रमुख लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
  104. प्रश्न- विकास प्रशासन से आप क्या समझते हैं? विकास प्रशासन के विभिन्न सन्दर्भों का उल्लेख करें।
  105. प्रश्न- विकास प्रशासन की धारणा के उद्भव व विकास को समझाते हुए विकास की विभिन्न रणनीतियों की विवेचना कीजिए।
  106. प्रश्न- विकास प्रशासन के विभिन्न तत्वों की विवेचना कीजिए।
  107. प्रश्न- विकास प्रशासन की प्रकृति एवं साधन बताइए।
  108. प्रश्न- विकास प्रशासन के सामान्य अभिप्राय के सम्बन्ध में प्रमुख विवादों (भ्रमों) पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
  109. प्रश्न- विकासात्मक नीतियों को लागू करने में विकास प्रशासन कहाँ तक उपयोगी है?
  110. प्रश्न- विकास प्रशासन की प्रमुख समस्याएँ बताइए।
  111. प्रश्न- विकास प्रशासन के 'स्थानिक आयाम' को समझाइए।
  112. प्रश्न- विकास प्रशासन की धारणा के विकास के दूसरे चरण में विकास सम्बन्धी कि मान्यताओं का उदय हुआ?
  113. प्रश्न- विकास प्रशासन के समय अभिमुखी आयाम पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
  114. प्रश्न- विकास प्रशासन और प्रशासनिक विकास में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  115. प्रश्न- राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका से आप क्या समझते हैं और उनके मध्य अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  116. प्रश्न- भारतीय प्रशासन के विकास का विश्लेषणात्मक वर्णन कीजिए।
  117. प्रश्न- राजनीति क्या है? मानव सामाजिकता में राजनीतिक भूमिका लिखिए।
  118. प्रश्न- वर्तमान भारतीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

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