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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 राजनीति विज्ञान

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2796
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 राजनीति विज्ञान : लोक प्रशासन

अध्याय - 4

आधुनिक राज्य में लोक प्रशासन की भूमिका

(The Role of Public Administration
in Modern State)

प्रश्न- लोक प्रशासन के महत्व पर विवेचना कीजिए।

उत्तर -

लोक प्रशासन का महत्व

आधुनिक सामाजिक विज्ञानों में लोक प्रशासन सर्वाधिक लोकप्रिय उपयोगी तथा व्यवहारिक ज्ञान प्राप्ति में अग्रणी विषय सिद्ध हो रहा है। लोक प्रशासन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए चार्ल्स आस्टिन बीयर्ड लिखते हैं, “प्रशासन से अधिक महत्वपूर्ण अन्य कोई विषय नहीं हो सकता है। मेरे विचार से शासन तथा हमारी सभ्यता का भविष्य इसी बात पर निर्भर करता है कि सभ्य समाज के कार्यों की पूर्ति के लिए प्रशासन का दार्शनिक, वैज्ञानिक तथा व्यवहारिक स्वरूप कितना विकसित होता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप कर चुका, लोक प्रशासन ही आधुनिक सभ्यताओं संस्कृतियों तथा मानव सहित समस्त जीव- जगत् का भविष्य है। लोक प्रशासन के महत्व को निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है -

(1) राज्य का व्यावहारिक तथा विशिष्ट भाग - राजनीतिक विज्ञानियों के अनुसार, राज्य के चार मूलभूत तत्वों (निश्चित भू-भाग, जनसंख्या, तथा शासन) में शासन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। शासन अर्थात् सरकार के कार्यों तथा दायित्वों को मूर्तरूप प्रदान करने में लोक प्रशासन एक अनिवार्य तथा विशिष्ट आवश्यकता है। अरस्तु के अनुसार राज्य जीवन के लिए अस्तित्व में आया तथा अच्छे जीवन के लिए उसका अस्तित्व बना हुआ है, यद्यपि आधुनिक युग में राज्य को एक बुराई के रूप में नहीं वरन् मानव कल्याण तथा विकास के लिए एक अनिवार्य रूप में देखा जाता है। वर्तमान युग में प्रत्येक राज्य में चाहे वहाँ शासन का कोई भी प्रकार हो, राज्य का कर्तव्य जनकल्याण ही है। अनादिकाल से ही राज्य की इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रशासन एकमात्र माध्यम रहा है। यद्यपि राजशाही व्यवस्थाओं में प्रशासन का स्वरूप आज की भाँति उत्तरदायी तथा विकासपरक नहीं था। तथापि प्रशासन, राज्य की व्यवहारिक अभिव्यक्ति अवश्य था। राज्य के लिए कार्य करते-करते अथवा जन सेवाएँ सुलभ कराते-कराते कतिपय ऐसे प्रशासनिक सिद्धान्त, नियम तथा प्रक्रियाएँ विकसित हो गई जो आज राज्य के प्राणतत्व सिद्ध हो रही हैं।

(2) जन कल्याण का माध्यम- आधुनिक विश्व में राज्य का स्वरूप न्यूनाधिक मात्रा में लोकतांत्रिक तथा जनकल्याणकारी है। आज अहस्तक्षेपवादी राज्य (Laissez faire state) की अवधारणा दम तोड़ चुकी है। वर्तमान समाजों की अधिकांश मानवीय आवश्यकताएँ राज्य के अभिकर्ता अर्थात् लोक प्रशासन द्वारा पूरी की जाती हैं। व्हाईट के अनुसार "कभी ऐसा भी समय था जब जनता सरकारी (राजा के) अधिकारियों के दमन के अतिरिक्त और कोई अपेक्षा नहीं करती थी। कालान्तर में आम जनता ने यह सोचा कि उसे स्वतन्त्र तथा भाग्य के भरोसे छोड़ दिया जाए, किन्तु आज का समाज प्रशासन से सुरक्षा तथा विभिन्न प्रकार की सेवाओं की आशा करता है।' भारत का संविधान भी नीति निर्देशक तत्वों के माध्यम से समाज के दीन-हीन तथा निर्योग्यताग्रत व्यक्तियों के लिए राज्य द्वारा विशेष अचक प्रयासों तथा कल्याण कार्यक्रमों के निर्देश लोक प्रशासन को देता है। चिकित्सा, स्वास्थ्य, परिवार, कल्याण, शिक्षा, प्रौढ, शिक्षा, जनसंचार, परिवहन, ऊर्जा, सामाजिक, सुरक्षा, कृषि उद्योग, कुटीर उद्योग, पशुपालन, सिंचाई, डाक तथा आवास इत्यादि समस्त मूलभूत मानवीय सामाजिक सेवाओं का संचालन प्रशासन के माध्यम से ही सम्भव है इसी कारण आज का राज्य प्रशासकीय राज्य भी कहलाता है।

(3) रक्षा, अखण्डता तथा शान्ति व्यवस्था - राजशाही शासन व्यवस्थाओं से राजा का मुख्य ध्येय अपने राज्य की सीमाओं में निरन्तर विस्तार करने का रहता था। जो वर्तमान सन्दर्भों में दम तोड़ चुका है। आज का राज्य विस्तारवादी होने के स्थान पर जन कल्याणकारी है। लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि राज्य अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं करता है। परमाणु हथियारों के विकास, प्रायोजित आतंकवाद के विस्तार तथा परिवर्तित होते राजनायिक एवं कूटनीतिक सम्बन्धों ने विदेश नीति तथा रक्षा नीति के समक्ष नित्य नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं यद्यपि युद्ध के समय सीमाओं तथा राष्ट्र की रक्षा करना, सैनिक प्रशासन का दायित्व है, किन्तु शान्ति काल में सीमाओं की चौकसी तथा राष्ट्र की आन्तरिक अखण्डता, शान्ति व्यवस्था, साम्प्रदायिक सौहार्द तथा समरसता बनाए रखने का दायित्व लोक प्रशासन का है। हरमन फाइनर के शब्दों में, “कुशल प्रशासन सरकार का एकमात्र सशक्त सहारा है इसकी अनुपस्थिति में राज्य क्षत-विक्षत हो जायेगा। इस सम्बन्ध में जेम्स एल. पैरी ने कहा है- "सरकार को ऐसे कार्य सौंपे गये हैं। जिन्हें या तो बाजार पूरे करने में असमर्थ है या जो निजी क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं समझे गए हैं।

(4) लोकतंत्र का वाहक एवं रक्षक - प्रजातंत्र की अवधारणा सैद्धान्तिक रूप से चाहे कितनी ही सशक्त तथा प्रभावी दिखाई देती हो लेकिन प्रजातंत्र की स्थापना तथा विस्तार केवल  तब ही सम्भव है जबकि लोक प्रशासन इस दिशा में सार्थक पहल कर आम व्यक्ति तक शासकीय कार्यों की सूचना पहुँचाना, नागरिक तथा मानव अधिकारों की क्रिर्यान्विति करना, निष्पक्ष चुनाव करवाना, जन शिकायतों का निस्तारण करना, राजनीतिक चेतना में वृद्धि करना तथा विकास कार्यों में जन सहभागिता सुनिश्चित कराने के क्रम में लोक प्रशासन की भूमिका सर्वविदित है। फाइनर के अनुसार, "किसी भी देश का संविधान चाहे कितना ही अच्छा हो और वहाँ के मंत्रिगण भी सुयोग्य हो, किन्तु बिना कुशल प्रशासकों के उस देश का शासन सफल सिद्ध नहीं हो सकता है।' लोकतान्त्रिक मूल्यों में केवल निष्पक्ष चुनाव तथा जनता की सहभागिता ही सम्मिलित नहीं है। वरन् समानता न्याय तथा वितरण के मूलभूत सिद्धान्तों सहित प्रशासनिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण भी प्रमुख है। भारत में सन् 1989 से 1999 तक हुए पाँच आम चुनावों के समय पश्चिमी देशों द्वारा प्रायः यह आशंका व्यक्त की गई थी कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अर्थात् भारत शीघ्र ही विखण्डित हो जाएगा, किन्तु लोकतंत्र में जनास्था तथा प्रशासनिक सुद्धढ़ता के कारण यह धारणा निर्मूल सिद्ध हो चुकी है। वस्तुतः लोक प्रशासन केवल लोकतंत्र का संवाहक ही नहीं वरन् उसका सजग प्रहरी भी है। डवाईट वाल्डो के अनुसार, "लोक प्रशासन को सांस्कृतिक सम्मिश्रण का भाग मानते हुए लोकतंत्र तथा समाज में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका स्वीकारते हैं।'

(5) सामाजिक परिवर्तन का माध्यम - आधुनिक समाजों विशेषतः विकासशील देशों की परम्परागत जीवन शैली अंधविश्वास, रूढ़ियों तथा कुरीतियों में सुनियोजित सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा राजनीतिक चेतना, आर्थिक, विकास, संविधान, कानून, मीडिया, दबाव, समूह तथा स्वयंसेवी संगठनों सहित प्रशासन भी एक यंत्र माना जाता है। लोक प्रशासन न केवल सामाजिक परिवर्तन का हथियार है, वरन् सामाजिक नियन्त्रण का माध्यम है। मैकआइवर एवं पेज के अनुसार, "सामाजिक नियंत्रण का अभिप्राय उस ढंग से है जिसके द्वारा सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था की एकता तथा स्थायित्व बनी रह सके और जिसमें व्यवस्था परिवर्तनशील सन्तुलन के रूप में समग्र रहती हुई क्रियाशील बनी रहे। भारत में गरीबी भुखमरी, बाल अपराध सहित दहेज, विधवा विवाह, छुआछुत, सती प्रथा, मृत्युभोज, बाल-विवाह, नशाखोरी, बलात्कार तथा निरक्षरता जैसी सामाजिक समस्याएँ विद्यमान है। इन सामाजिक समस्याओं तथा कुरीतियों का समाधान केवल सरकार द्वारा निर्मित सामाजिक नीतियों, सामाजिक नियोजन तथा सामाजिक विधानों के द्वारा ही हो सकता है- प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर अद्यतन भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के अधीन कार्यरत प्रशासनिक संस्थानों का मुख्य लक्ष्य सामाजिक-आर्थिक विकास सहित आम व्यक्ति का जीवन स्तर ऊँचा उठाना ही रहा है। निस्संदेह सामाजिक परिवर्तन एक विशिष्ट आयाम है। इस सम्बन्ध में प्रथम प्रधान मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का मानना था "लोक प्रशासन सभ्य जीवन का रक्षक मात्र ही नहीं वरन् सामाजिक न्याय तथा सामाजिक परिवर्तन का महान साधन है। ऐसा इसलिए सम्भव है कि लोक प्रशासन "जनमत निर्माण" का सशक्त माध्यम है।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- 'लोक प्रशासन' के अर्थ और परिभाषाओं की विवेचना कीजिए।
  2. प्रश्न- लोक प्रशासन की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
  3. प्रश्न- लोक प्रशासन के क्षेत्र पर प्रकाश डालिए।
  4. प्रश्न- लोकतांत्रिक प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
  5. प्रश्न- प्रशासन' शब्द का प्रयोग सामान्य रूप से किन प्रमुख अर्थों में किया जाता है?
  6. प्रश्न- "लोक प्रशासन एक नीति विज्ञान है" यह किन आधारों पर कहा जा सकता है?
  7. प्रश्न- लोक प्रशासन का महत्व बताइए।
  8. प्रश्न- प्रशासन के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
  9. प्रश्न- लोक प्रशासन के क्षेत्र का 'पोस्डकोर्ब दृष्टिकोण' की व्यख्या कीजिये।
  10. प्रश्न- लोक प्रशासन को विज्ञान न मानने के क्या कारण हैं?
  11. प्रश्न- एक अच्छे प्रशासन के गुण बताइए।
  12. प्रश्न- विकासशील देशों में लोक प्रशासन की चुनौतियाँ बताइये।
  13. प्रश्न- 'लोक प्रशासन में सैद्धान्तीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति', टिप्पणी कीजिए।
  14. प्रश्न- कार्मिक प्रशासन के मूल तत्व क्या हैं?
  15. प्रश्न- राजनीतिज्ञ एवं प्रशासक के मध्य अन्तर लिखिए।
  16. प्रश्न- शासन एवम् प्रशासन में अन्तर स्पष्ट कीजिये।
  17. प्रश्न- अनुशासन से क्या तात्पर्य है? लोक प्रशासन में अनुशासन के महत्व को दर्शाइए।
  18. प्रश्न- भारत में लोक सेवकों के आचरण को अनुशासित बनाने के लिए किए गए प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
  19. प्रश्न- लोक सेवकों को अनुशासन में बनाए रखने के लिए उन पर लगाए गए प्रतिबन्धों का वर्णन कीजिए।
  20. प्रश्न- किसी संगठन में अनुशासन के योगदान पर टिप्पणी लिखिए।
  21. प्रश्न- प्रशासन में अनुशासनहीनता को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण कौन-कौन से हैं?
  22. प्रश्न- "अनुशासन में गिरावट लोक प्रशासन के लिए चुनौती" इस कथन पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
  23. प्रश्न- लोक प्रशासन से आप क्या समझते हैं? निजी प्रशासन लोक प्रशासन से किस प्रकार भिन्न है?
  24. प्रश्न- "लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन में अनेकों असमानताएँ होने के बावजूद कुछ ऐसे बिन्दू भी हैं जो उनके बीच समानताएँ प्रदर्शित करते हैं।' कथन का परीक्षण कीजिए।
  25. प्रश्न- निजी प्रशासन में लोक प्रशासन की अपेक्षा भ्रष्टाचार की सम्भावनाएँ कम है, कैसे?
  26. प्रश्न- निजी प्रशासन के नकारात्मक पक्षों पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
  27. प्रश्न- लोक प्रशासन की तुलना में निजी प्रशासन में राजनीतिकरण की सम्भावनाएँ न्यूनतम हैं, कैसे?-
  28. प्रश्न- निजी प्रशासन के दो प्रमुख लाभ बताइए।
  29. प्रश्न- लोक प्रशासन के महत्व पर विवेचना कीजिए।
  30. प्रश्न- आधुनिक राज्यों में लोक प्रशासन के विभिन्न रूपों को स्पष्ट कीजिए।
  31. प्रश्न- विकासशील देशों में लोक प्रशासन की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
  32. प्रश्न- संगठन का अर्थ स्पष्ट करते हुए, इसके आधारों को स्पष्ट कीजिए।
  33. प्रश्न- संगठन के आधारों को स्पष्ट कीजिए।
  34. प्रश्न- संगठन के प्रकारों को स्पष्ट कीजिए। औपचारिक संगठन की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  35. प्रश्न- औपचारिक संगठन की विशेषताएँ बताइये।
  36. प्रश्न- अनौपचारिक संगठन से आप क्या समझते हैं? इनकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  37. प्रश्न- औपचारिक तथा अनौपचारिक संगठन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  38. प्रश्न- संगठन की समस्याओं पर प्रकाश डालिए।
  39. प्रश्न- संगठन के यान्त्रिक अथवा शास्त्रीय दृष्टिकोण (उपागम) को स्पष्ट कीजिए।
  40. प्रश्न- पदसोपान प्रणाली के गुण व दोष बताते हुए इसका मूल्यांकन कीजिए।
  41. प्रश्न- संगठन के आदेश की एकता सिद्धान्त की विस्तृत विवेचना कीजिए।
  42. प्रश्न- आदेश की एकता सिद्धान्त के गुण बताते हुए इसकी समालोचनाओं पर भी प्रकाश डालिए।
  43. प्रश्न- 'प्रत्यायोजन' से आप क्या समझते हैं? प्रत्यायोजन को परिभाषित करते हुए इसकी आवश्यकता एवं महत्व को बताइए।
  44. प्रश्न- प्रत्यायोजन के विभिन्न सिद्धान्तों एवं प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
  45. प्रश्न- संगठन के सिद्धान्तों के विशेष सन्दर्भ में प्रशासन को लूथर गुलिक एवं लिंडल उर्विक के योगदान की विवेचना कीजिए।
  46. प्रश्न- लोक प्रशासन के क्षेत्र में एल्टन मेयो द्वारा प्रस्तुत मानव सम्बन्ध उपागम पर प्रकाश डालिए।
  47. प्रश्न- हरबर्ट साइमन के निर्णय निर्माण सम्बन्धी मॉडल की व्याख्या कीजिए।
  48. प्रश्न- हर्बर्ट साइमन के निर्णय निर्माण सिद्धान्त का लोक प्रशासन में महत्व पर प्रकाश डालिए।
  49. प्रश्न- नौकरशाही का अर्थ बताइये और परिभाषाएँ दीजिए।
  50. प्रश्न- नौकरशाही की विशेषताएँ अथवा लक्षणों को बताइये।
  51. प्रश्न- निर्णयन का क्या अर्थ है? प्रशासन में निर्णयन प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
  52. प्रश्न- हेनरी फेयाफल द्वारा उल्लिखित किये गये संगठन के सिद्धान्तों को बताइए।
  53. प्रश्न- 'गेंगप्लांक' पर टिप्पणी कीजिये।
  54. प्रश्न- हरबर्ट साइमन द्वारा 'प्रशासन की कहावत' किन्हें कहा गया है और क्यों?
  55. प्रश्न- ऐल्टन मेयो को मानव सम्बन्ध उपागम के प्रवर्तकों में शामिल किया जाता है, क्यों?
  56. प्रश्न- निर्णयन के अवसरों का वर्णन कीजिए।
  57. प्रश्न- निर्णयन के लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
  58. प्रश्न- प्रतिबद्ध नौकरशाही की विवेचना कीजिए।
  59. प्रश्न- सूत्र एवं स्टाफ अभिकरण का आशय स्पष्ट कीजिए। सूत्र एवं स्टाफ अभिकरण में अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
  60. प्रश्न- सूत्र या पंक्ति अभिकरण से क्या आशय है एवं सूत्र (लाइन) या पंक्ति अभिकरणों की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  61. प्रश्न- प्रशासन में स्टाफ अभिकरण के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  62. प्रश्न- स्टाफ अभिकरणों के कार्यों पर प्रकाश डालिए।
  63. प्रश्न- स्टाफ अभिकरण के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डालिए।
  64. प्रश्न- सहायक अभिकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए एवं स्टाफ अभिकरण से इनकी भिन्नता पर प्रकाश डालिए।
  65. प्रश्न- मुख्य प्रशासक की प्रशासन में क्या स्थिति है? स्पष्ट कीजिए।
  66. प्रश्न- बजट से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित कीजिए। भारत में बजट कैसे तैयार किया जाता है?
  67. प्रश्न- बजट किसे कहते है? एक स्वस्थ बजट के महत्वपूर्ण सिद्धान्त बताइए।
  68. प्रश्न- भारत में केन्द्रीय बजट का निर्माण किस प्रकार होता है?
  69. प्रश्न- वित्त विधेयक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  70. प्रश्न- वित्त विधेयक के सम्बन्ध में राष्ट्रपति के विशेषाधिकार को स्पष्ट कीजिए।
  71. प्रश्न- बजट का महत्व बताइए।
  72. प्रश्न- भारत में बजट के क्रियान्वयन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  73. प्रश्न- बजट के कार्य बताइये।
  74. प्रश्न- बजट के प्रकार लिखिए।
  75. प्रश्न- वित्त आयोग के कार्य बताइए।
  76. प्रश्न- योजना आयोग का प्रशासनिक ढाँचा क्या है?
  77. प्रश्न- शून्य आधारित बजट का वर्णन कीजिए।
  78. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन से आप क्या समझते हैं? नवीन लोक प्रशासन के उदय के कारण बताते हुए इसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का वर्णन कीजिए तथा नवीन लोक प्रशासन एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  79. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
  80. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए इसके लक्षणों का परीक्षण कीजिए।
  81. प्रश्न- नवीन लोक प्रबन्ध के अभ्युदय कैसे हुआ? नवीन लोक प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएँ बताते हुए इसके अंतर्गत सरकार की भूमिका में आए बदलावों पर प्रकाश डालिए।
  82. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन की भावी सम्भावनाओं को व्यक्त कीजिए।
  83. प्रश्न- नव लोक प्रशासन का उदय किन परिस्थितियों में हुआ?
  84. प्रश्न- नवीन लोक प्रशासन के प्रमुख तत्व कौन से हैं?
  85. प्रश्न- 'नवीन लोक प्रबन्ध' दृष्टिकोण के हानिकारक पक्षों पर प्रकाश डालिए।
  86. प्रश्न- नव लोक प्रबन्ध की पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण के समर्थक क्या आलोचना करते हैं?
  87. प्रश्न- नव लोक प्रबन्ध की हरबर्ट साइमन द्वारा प्रस्तुत आलोचना पर प्रकाश डालिए।
  88. प्रश्न- प्रशासकीय कानून का क्या अर्थ है? प्रशासकीय कानून के विकास के प्रमुख कारण बतलाइए।
  89. प्रश्न- प्रशासकीय अधिनिर्णय का क्या अर्थ है? इसके विकास के प्रमुख कारणों का विवेचन कीजिए।
  90. प्रश्न- भारत में जन शिकायतों के निस्तारण हेतु ओम्बड्समैन की स्थापना हेतु किए गए प्रयासों की विवेचना कीजिए।
  91. प्रश्न- प्रशासन पर न्यायिक नियन्त्रण से क्या तात्पर्य है? कोई न्यायालय प्रशासन के कार्यों को किस प्रकार अवैध घोषित कर सकता है?
  92. प्रश्न- भारत में प्रशासन पर न्यायिक नियन्त्रण के विभिन्न साधनों का परीक्षण कीजिए।
  93. प्रश्न- भारत में प्रशासकीय न्यायाधिकरणों को कितने वर्गों में विभाजित किया गया है?
  94. प्रश्न- प्रशासकीय न्यायाधिकरणों से क्या लाभ हैं?
  95. प्रश्न- प्रशासकीय न्यायाधिकरणों की हानियाँ बताइए।
  96. प्रश्न- लोक प्रशासन के अध्ययन के आधुनिक उपागमों को बताइये तथा व्यवहारवादी उपागमन को सविस्तार समझाइये।
  97. प्रश्न- लोक प्रशासन के अध्ययन के व्यवस्था उपागम का वर्णन कीजिए।
  98. प्रश्न- लोक प्रशासन के संरचनात्मक कार्यात्मक उपागम की व्याख्या कीजिए।
  99. प्रश्न- लोक प्रशासन के अध्ययन के पारिस्थितिकी उपागम का वर्णन कीजिए।
  100. प्रश्न- सुशासन से आप का क्या आशय है? सुशासन की विशेषताएँ लिखिए।
  101. प्रश्न- भारतीय क्षेत्र में सुशासन स्थापित करने की प्रमुख चुनौतियाँ कौन-कौन सी हैं? स्पष्ट कीजिए।
  102. प्रश्न- भारत में सुशासन की स्थापना हेतु किये गये प्रयासों पर प्रकाश डालिए।
  103. प्रश्न- विकास प्रशासन से क्या अभिप्राय है? इसके प्रमुख लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
  104. प्रश्न- विकास प्रशासन से आप क्या समझते हैं? विकास प्रशासन के विभिन्न सन्दर्भों का उल्लेख करें।
  105. प्रश्न- विकास प्रशासन की धारणा के उद्भव व विकास को समझाते हुए विकास की विभिन्न रणनीतियों की विवेचना कीजिए।
  106. प्रश्न- विकास प्रशासन के विभिन्न तत्वों की विवेचना कीजिए।
  107. प्रश्न- विकास प्रशासन की प्रकृति एवं साधन बताइए।
  108. प्रश्न- विकास प्रशासन के सामान्य अभिप्राय के सम्बन्ध में प्रमुख विवादों (भ्रमों) पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
  109. प्रश्न- विकासात्मक नीतियों को लागू करने में विकास प्रशासन कहाँ तक उपयोगी है?
  110. प्रश्न- विकास प्रशासन की प्रमुख समस्याएँ बताइए।
  111. प्रश्न- विकास प्रशासन के 'स्थानिक आयाम' को समझाइए।
  112. प्रश्न- विकास प्रशासन की धारणा के विकास के दूसरे चरण में विकास सम्बन्धी कि मान्यताओं का उदय हुआ?
  113. प्रश्न- विकास प्रशासन के समय अभिमुखी आयाम पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
  114. प्रश्न- विकास प्रशासन और प्रशासनिक विकास में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  115. प्रश्न- राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका से आप क्या समझते हैं और उनके मध्य अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  116. प्रश्न- भारतीय प्रशासन के विकास का विश्लेषणात्मक वर्णन कीजिए।
  117. प्रश्न- राजनीति क्या है? मानव सामाजिकता में राजनीतिक भूमिका लिखिए।
  118. प्रश्न- वर्तमान भारतीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

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