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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 प्राचीन भारतीय इतिहास

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2793
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 प्राचीन भारतीय इतिहास - सरल प्रश्नोत्तर

अथर्ववेद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

प्रश्न- जाति प्रथा की उत्पत्ति एवं विकास पर प्रकाश डालिए।

अथवा
जाति प्रथा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. जाति प्रथा की उत्पत्ति एवं विकास का वर्णन कीजिए।
2. जाति की उत्पत्ति का राजनैतिक सिद्धान्त बताइए।
3. जाति की उत्पत्ति का परम्परागत सिद्धान्त बताइए।
4. जाति की उत्पत्ति का आर्थिक सिद्धान्त बताइए।
5. जाति की उत्पत्ति का नैतिक सिद्धान्त बताइए।
6. जाति की उत्पत्ति का प्रजातान्त्रिक सिद्धान्त बताइए।
7. जाति की उत्पत्ति का मानववाद सिद्धान्त बताइए।
8. जाति की उत्पत्ति का धार्मिक सिद्धान्त बताइए।

उत्तर-

जाति प्रथा की उत्पत्ति एवं विकास

जाति प्रथा की उत्पत्ति एवं विकास के बारे में पूर्णतया जानकारी प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि हम जानें कि जाति शब्द की क्या परिभाषा है तथा जाति का वास्तविक अर्थ क्या है?

जाति के अन्तर्गत ब्याह और खान-पान के सम्बन्धों में प्रतिबन्ध रहता है। कुछ विद्वानों ने वर्ण एवं जाति को एक ही समझा है, लेकिन वर्ण और जाति में अन्तर है। एक वर्ण के लोग एक ही व्यवसाय को करते हैं परन्तु एक ही जाति के लोग विभिन्न व्यवसाय कर सकते हैं।

आर. सी. दत्त ने - अपनी पुस्तक 'प्राचीन भारतीय संस्कृति' में जाति प्रथा की परिभाषा निम्न प्रकार से दी है -

“हिन्दू आर्य लोग सैकड़ों वरन् हजारों वर्ष तक बाहरी लोगों से बिल्कुल अलग रहे जैसाकि हम लोग किसी जाति के इतिहास में नहीं पाते। इस प्रकार से अलग रहने में लाभ और हानि दोनों ही थी। इसके अन्य फलों में एक फल यह भी हुआ कि सामाजिक जीवन के नियम अधिक दृढ़ और कठोर होते गये और इससे लोगों की स्वतंत्रता और स्वाधीनतापूर्वक कार्य करने की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण हो गई। गंगा और यमुना के उपजाऊ और रमणीय तटों पर चार-पांच शताब्दियों तक शान्तिपूर्वक रहने के कारण सभ्य राज्य स्थापित कर सके थे। दर्शन, विज्ञान तथा शिल्प की उन्नति कर सके थे। पर इन्हीं शान्त और दुर्बल करने वाले प्रभावों से लोग उन सामाजिक वर्गों से अलग हो गये, जो जातियाँ कहलायीं।

प्रो. रैप्सेन ने - जाति प्रथा का आधार रंग को बतलाया है। आर्य लोग गौर वर्ण के थे तथा अनार्य लोग कृष्ण वर्ण के थे। इस प्रकार रंग के आधार पर दो वर्ग बन गये थे जो क्रमशः आर्य और दस्यु कहलाये। कालान्तर में गौर वर्ण के लोग पुनः ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य वर्गों में विभक्त हो गये और इस प्रकार शूद्रों को मिलाकर चार वर्णों का निर्माण हुआ।

ऋग्वेद के पूरुष सूक्त में वर्ण व्यवस्था के विकास का अलंकारिक भाषा में वर्णन किया गया है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में कहा गया है -

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद बाहं राजन्य कृतः।
उरु तदस्य यद् वैश्य पद्भ्याम् शूद्रो अजायतः ||

अर्थात् विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, पेट से वैश्य तथा पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए थे।

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति का आधार व्यवसाय या कार्य द्वारा हुआ है। यह कथन तर्कपूर्ण तथा न्याय-संगत बताया गया है। इस प्रकार वर्ण का अर्थ व्यवसायानुसार चार वर्णों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में विभाजित था।

आरम्भ में दास और आर्य दो वर्ण थे। इसके पश्चात् व्यवसाय के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य वर्ण की उत्पत्ति हुई। मनुस्मृति में इन वर्णों के कर्त्तव्यों का उल्लेख स्पष्ट किया गया है। आपत्तिकालीन तथा विशेष परिस्थितियों ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य अन्य व्यवसाय भी ग्रहण कर सकते थे। इसी प्रकार अन्य वर्गों के लिए भी निर्धारित कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्म करने की व्यवस्था भी की गई है। परन्तु इन कर्मों में कुछ प्रतिबन्ध भी लगाये गये हैं। उदाहरण के लिए ब्राह्मण मांस, शराब और नमक इत्यादि नहीं बेच सकता। दूसरे एक वर्ण का व्यक्ति अपने से उच्च वर्ण के व्यवसाय को ग्रहण नहीं कर सकता। इन अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के कारण वर्ण शंकर जातियों की उत्पत्ति हुई जो निम्न प्रकार से थीं। ब्राह्मण पिता और वैश्य माता की सन्तान अम्बष्ट कहलायीं।

स्थूल रूप से जाति की उत्पत्ति सिद्धान्तों को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है

1. राजनैतिक सिद्धान्त - राजनैतिक सिद्धान्त के अनुसार जाति प्रथा इण्डो आर्यन संस्कृति की एक ब्राह्मण सन्तान है जो गंगा के प्रदेश में पली और वहां से उसका लाभ उठाने वाले ब्राह्मणों द्वारा भारत के अन्य भागों में भेजी गई। घुरिये के अनुसार ब्राह्मणों के अपनी प्रजातीय शुद्धता को स्थायी रखने के लिए यह प्रयत्न किया। डॉ. घुरिये ने लिखा है मैं यह निष्कर्ष निकाल सकता हूं कि भारत में जाति इण्डो आर्यन संस्कृति का एक ब्राह्मण बालक है जोकि गंगा और जमुना के देश में पला और वहां से देश के अन्य भागों में पहुंचा। इस सिद्धान्त को सबसे पहले एक फ्रेंच पादरी अबे दुबोयस ने 12वीं शताब्दी के अन्त में प्रतिपादित किया | Hind Manners and Customs में अबे दुबोयस ने लिखा है कि जाति प्रथा ब्राह्मणों द्वारा और ब्राह्मणों के लाभ के लिए बनाई हुई चतुराई से भरी योजना है। इबेटसन ने दुबोयस का समर्थन करते हुए कहा है कि ब्राह्मणों ने अपने लाभ के लिए अपने और अपने समर्थक क्षत्रियों के व्यवसायों को ऊंचा बतलाया और अन्य समस्त जातियों के व्यवसायों को नीचा बतलाया। इस प्रकार अपनी चतुर योजना से ब्राह्मणों ने सारे समाज पर एकाधिपत्य स्थापित कर लिया।

आलोचना - राजनैतिक सिद्धान्त के विरुद्ध में डी. एन. मजूमदार ने निम्नलिखित दो तर्क उपस्थित किये हैं

(i) इसमें विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के क्रम में पाये जाने वाले प्रजातीय भेदों की उपेक्षा की गई है।

(ii) भारत के जाति भेद के आधार पर बने अत्यन्त जटिल सामाजिक स्तरीकरण को देखते यह असंभव प्रतीत होता है कि इनकी उत्पत्ति पुरोहितों द्वारा किये गये सामाजिक विभाजन से हो और इसका मुख्य कारण पुरोहितों की प्रभुता बनाये रखना हो।

राजनैतिक सिद्धान्त के विरुद्ध श्री मजूमदार का उपरोक्त मत पर्याप्त समीचीन प्रतीत होता है।

2. परम्परात्मक सिद्धान्त - परम्परात्मक सिद्धान्त के अनुसार जाति स्वयं ब्रह्मा की रचना है। ऋग्वेद में लिखा है "ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः " उरू तदस्य यद्वैश्यः पदभ्यां शूद्रोऽजायत अर्थात् ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जांघों से तथा शूद्र चरणों से उत्पन्न हुए।

आलोचना - वास्तव में जाति का यह वर्णन वर्ण पर लागू होता है। इससे जन्ममूलक तीन हजार जातियों का उद्गम नहीं समझा जा सकता।

3. आर्थिक अथवा व्यवसायात्मक सिद्धान्त - नेसफील्ड के अनुसार, “व्यवसाय और व्यवसाय ही भारत में जाति प्रथा के उद्गम के लिए उत्तरदायी है। प्राचीन हिन्दू परम्पराओं ने नेसफील्ड के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है “ चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।" बौद्ध साहित्य में अठारह शिष्यों तथा हाथी दांत का काम करने वाले दन्तकार, वस्त्र बुनने वाली तन्तुवाय आदि जातियों का वर्णन मिलता है। भारत में अधिकांश जातियों के व्यवसाय निश्चित थे। लोहार, सुनार, चमार, बढ़ई, जुलाहा आदि जातियों के ये नाम उनके व्यवसायों के ही सूचक हैं।

नेसफील्ड के सिद्धान्त में दोष - नेसफील्ड के सिद्धान्त में निम्नलिखित दोष बतलाये जाते हैं-

(i) इससे जातियों के ऊंच-नीच की व्याख्या नहीं होती - व्यवस्यात्मक सिद्धान्त से यह नहीं ज्ञात होता कि जातियां एक-दूसरे से ऊंची-नीची क्यों समझी जाती हैं। लोहार का काम समाज के लिए बड़ा उपयोगी है फिर भी लोहार जाति नीची क्यों समझी जाती है? धातुओं का काम करने वाली जातियाँ, बांस की टोकरियाँ और बर्तन बनाने वाली जातियों से ऊंची क्यों मानी जाती हैं? दक्षिणी भारत में कृषक नीची जाति के क्यों माने जाते हैं?

(ii) सभी किसानों की जाति एक क्यों नहीं है - भारत की 67 प्रतिशत खेती करने वाली जनता में सैकड़ों जाति के लोग हैं। नेसफील्ड के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि सभी किसानों का व्यवसाय एक होते हुए भी जाति एक क्यों नहीं है? भारत में व्यवसाय तो अधिक नहीं है परन्तु जातियों की संख्या तीन हजार के बीच में है। थोड़े से व्यवसायों से इतनी अधिक जातियाँ कैसे बन गयीं? इसीलिए डी० एन० मजूमदार ने लिखा है कि यद्यपि पेशा (Function) प्राचीनकाल में सामाजिक वर्गीकरण का आधार रहा है परन्तु वह हिन्दू सामाजिक पद्धति की पूरी और सही व्याख्या नहीं कर सकता।

(iii) इसमें प्रजातीय तत्वों की उपेक्षा की गई है - इसमें भारत की विभिन्न जातियों में कोई प्रजातीय तत्व नहीं माना गया है। यह मत अनेक आधुनिक खोजों से असत्य सिद्ध हो चुका है।

4. नैतिक सिद्धान्त - शरतचन्द्र राय ने जाति की उत्पत्ति का नैतिक अथवा शीलाचारिक सिद्धान्त उपस्थित किया है। इन सिद्धान्त के अनुसार जाति प्रथा की उत्पत्ति इण्डो आर्यन लोगों की वर्ण व्यवस्था, पूर्व द्राविड़ लोगों की जनजातीय व्यवस्था और द्राविड़ लोगों की व्यवस्यात्मक पद्धति के परस्पर प्रभाव और संघर्ष से हुई तथा इण्डो आर्यन लोगों के कर्म सिद्धान्त ने इसे सुदृढ़ रूप प्रदान किया।

आलोचना- यह सिद्धान्त जाति प्रथा के दार्शनिक पक्ष पर अधिक जोर देता है। इसमें जाति प्रथा को उत्पन्न करने वाली अनेक जटिल और विरोधी परिस्थितियों की उपेक्षा की गई है। /

5. प्रजातिक सिद्धान्त - कुछ विद्वानों ने जाति प्रथा की उत्पत्ति के विषय में प्रजातिक सिद्धान्त उपस्थित किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न जातियाँ समूह है। रिजले का कहना है कि आर्य लोगों ने चपटी नाक वाली द्रविड़ प्रजातियों को समाज में निम्न स्थान दिया। अतः जिस जाति के सदस्यों की नाक जितनी चपटी होगी वह उतनी ही नीची जाति होगी। डॉ० घुरिये के अनुसार जाति प्रथा आर्य प्रजातियों की रक्त शुद्धता को स्थायी रखने के लिए ब्राह्मणों की एक पुरोहितों चालाकी है। डॉ० डी० एन० मजूमदार का कहना है कि जाति का स्तर रक्त की शुद्धता और सामाजिक वर्गों के पृथक्करण पर निर्भर है। नेसफील्ड ने कहा है कि जातियों के संस्तरण में व्यवसाय की श्रेष्ठता या निम्नता का प्रतिनिधित्व किया गया है। हमें यह सोचना चाहिए कि जाति की स्थिति रक्त की शुद्धता की मात्रा और सामाजिक समूहों द्वारा स्थापित पृथक्करण की सीमा पर निर्भर है। एन० के० दत्त रिजले से सहमत हैं।

आलोचना - जाति प्रथा की उत्पत्ति के प्रजातिक सिद्धान्त के आलोचकों में जे० एच० हट्टन सबसे प्रमुख हैं। इस सिद्धान्त के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क हैं-

1. प्रजातीय कारकों में मुसलमानों और ईसाइयों में जाति प्रथा क्यों नहीं बनी?

2. प्रजातिक भेद होने पर भी विश्व के अन्य देशों में जाति प्रथा क्यों नहीं बनी?

3. यह सिद्धान्त अस्पृश्यता की व्याख्या नहीं करता।

4. यह सिद्धान्त यह नहीं बतलाता कि प्रजातियों से जातियाँ कैसे बनीं?

5. यह मत तथ्यों द्वारा गलत सिद्ध होता है। 1931 की जनगणना रिपोर्ट में डॉ० गुहा ने बतलाया था कि मालाबार के नायरों, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त के पठानों तथा बंगाल के ब्राह्मणों में एक ही प्रजातीय समूह के लक्ष्य मिलते हैं। फिर इनकी जातियाँ एक क्यों नहीं हैं? हिन्दू समाज की सैकड़ों जातियों में इसी प्रकार से अनेक उदाहरण पाये जा सकते हैं।

6. माना का सिद्धान्त - जे० एच० हट्टन के अनुसार "जाति प्रथा की उत्पत्ति अनार्य जातियों के धार्मिक विश्वासों और नियमों विशेषतः माना के सिद्धान्त से हुई।" माना एक प्रकार की रहस्यमय शक्ति है। हट्टन के अनुसार जाति प्रथा में अन्तर्विवाह की प्रथा, अस्पृश्यता, खान-पान में छुआ-छूत का विचार आदि कारण अन्य जातियों के माना से बचाव के लिए प्रारम्भ हुआ। 'माना' से बचने की आवश्यकता यहां तक महत्वपूर्ण मानी गई कि दक्षिण भारत में नीची जातियाँ भी उच्चकोटि के संपर्क से अपने को अपवित्र हुआ मानने लगी।

आलोचना - हट्टन के इस सिद्धान्त की आलोचना करते हुए डी. एन. मजूमदार ने कहा है कि इसमें मतभेद हैं कि माना ने हिन्दू जाति व्यवस्था की उत्पत्ति में कितना हाथ बंटाया है। माना के सिद्धान्त में सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें यह नहीं बताया गया कि माना का सिद्धान्त विश्व की समस्त जातियों में पाये जाने पर भी उससे केवल भारत में ही जाति प्रथा की उत्पत्ति क्यों हुई?

7. व्यावसायिक श्रेणियों का सिद्धान्त - इबेटसन के मत के अनुसार जातियाँ व्यावसायिक श्रेणियों का परिवर्तित रूप है। Punjab Castes नामक पुस्तक में इबेटसन के तीन शक्तियों की क्रिया-प्रतिक्रिया (Interaction) को जाति प्रथा कारण माना है-

(i) जनजातियाँ (Tribes),
(ii) व्यावसायिक श्रेणियां (Guids)
(iii) धर्म।

इस मत के अनुसार जनजातियों ने क्रमशः निश्चित व्यवसायों को अपनाकर व्यावसायिक श्रेणियों का रूप धारण कर लिया। प्राचीन भारत में इन व्यावसायिक श्रेणियों में पुरोहितों को विशेष सम्मान प्राप्त था। उनमें वंशानुगत व्यवसाय तथा अन्तर्विवाह की प्रथा की देखा-देखी अन्य श्रेणियों में भी ये प्रथायें चलने लगीं और इस प्रकार व्यावसायिक श्रेणियाँ क्रमशः जातियाँ बन बैठीं।

आलोचना - इस सिद्धान्त से यह नहीं समझाया गया है कि व्यावसायिक श्रेणियों के विश्व में लगभग सभी देशों में पाये जाने पर भी भारत में ही जाति प्रथा का विकास क्यों हुआ?

8. धार्मिक सिद्धान्त - भारत में ही जाति प्रथा का विकास होने से यह सिद्ध होता है कि उसके कारण व्यावसायिक श्रेणियों के अतिरिक्त कुछ अन्य भी थे। जाति प्रथा के उद्गम के धार्मिक सिद्धान्त (Religious Theory) के प्रवर्तकों में होकार्ट और सेनार्ट के नाम उल्लेखनीय हैं जिनका वर्णन निम्न प्रकार से है-

(i) होकार्ट का सिद्धान्त - होकार्ट के अनुसार समाज का विभाजन धार्मिक सिद्धान्तों और प्रथाओं के कारण हुआ है। प्राचीन भारत में धर्म का अत्यधिक महत्व था। प्रायः राजा को भगवान का अवतार माना जाता था। राजा शासन व्यवस्था के ही नहीं बल्कि धार्मिक कार्यों के भी अधिनायक होते थे और इस प्रकार उनको समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। ऐसे पुरोहित राजाओं ने धर्म के निर्देश के अनुसार विभिन्न कार्यों को करने वाले विभिन्न समूहों की सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत अलग-अलग पद या प्रतिष्ठा प्रदान की। धार्मिक सिद्धान्तों के आधार पर बने ये विभिन्न समूह ही आगे चलकर जाति के रूप में विकसित हुए।

आलोचना - होकार्ट के सिद्धान्त की निम्नलिखित आलोचना की गई है-

होकार्ट यह भूल जाता है कि जाति प्रथा पूर्णतया एक धार्मिक संस्था नहीं है, वह एक सामाजिक संस्था भी है। इस सामाजिक संस्था में धार्मिक तत्व हो सकते हैं पर धर्म ही उसका सब कुछ नहीं है। इस कारण इसकी उत्पत्ति में धर्म को अधिक से अधिक एक सहायक कारण माना जा सकता है।

होकार्ट का सिद्धान्त इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि विभिन्न जातियों में खान-पान और विवाह सम्बन्धी निषेध क्यों हैं?

(ii) सेनार्ट का सिद्धान्त - सेनार्ट ने जाति प्रथा की उत्पत्ति को भोजन सम्बन्धी निषेधों के आधार पर समझाया है। उसका कहना है कि पारिवारिक पूजा और कुल देवता से भिन्नता के कारण भोजन सम्बन्धी प्रतिबन्ध उत्पन्न हुआ। एक देवता को मानने वाले अपने को एक ही पूर्वज की सन्तान मानते थे और देवता को एक विशेष प्रकार के भोजन का भोग चढ़ाते थे। इन्हीं विभिन्नताओं के आधार पर एक देवता को मानने वालों ने अपने को दूसरे प्रकार के देवता को मानने वालों से अलग मान लिया। दूसरे, आर्यों के भारत में आने से मिश्रित प्रजातीय समूह बने। उधर आर्यों में प्रजातीय, शुद्धता, धार्मिक पवित्रता इत्यादि की ओर बड़ा ध्यान था। उन लोगों में जप, तप और पूजा का कार्य करने वाले लोगों ने अपनी पवित्रता को बनाये रखने के लिए और अपने को सुप्रतिष्ठित रखने के लिए अपने नैतिक बल के प्रयोग द्वारा धर्म के आधार पर जाति प्रथा का निर्माण हुआ जिसमें ब्राह्मण सबसे ऊपर थे।

आलोचना - सेनार्ट के सिद्धान्त के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं

1. सेनार्ट के सिद्धान्त की आलोचना करते हुए डालमैन ने लिखा है कि सेनार्ट ने जाति प्रथा की उत्पत्ति को इतना सरल बना दिया है कि उसका सिद्धान्त वैज्ञानिक नहीं रह गया है।

2. केवल धार्मिक तत्वों के आधार पर जाति प्रथा की उत्पत्ति को समझने का प्रयत्न उचित नहीं मालूम पड़ता क्योंकि जाति प्रथा जैसी जटिल सामाजिक संस्था की उत्पत्ति कारण से नहीं मानी जा सकती।

3. इसके अलावा सेनार्ट ने जाति और गोत्र में भी भ्रम पैदा कर दिया है।

डी० एन० मजूमदार के अनुसार - “संस्कृतियों के संघर्ष में अपनी प्रजाति और संस्कृति को अन्तः मिश्रण से बचाने तथा शुद्ध रखने के लिए अन्तर्विवाही समूह ही जाति प्रथा के मूल कारक हैं।

स्लेटर ( Slater) के अनुसार - उद्योग-धन्धों के भेदों को गुप्त रखने के लिए जाति प्रथा प्रारम्भ हुई।

गिल्बर्ट (Gilbert) के अनुसार -  भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नता से जाति प्रथा की उत्पत्ति हुई।

जैक्सन (Jackson) के अनुसार -  हिन्दू राजाओं ने प्रत्येक जाति को अपना कार्य करने के लिए बाध्य किया।

निष्कर्ष - वास्तव में जाति प्रथा की उत्पत्ति में आर्यों की वर्ण व्यवस्था, अनार्यों की प्रजाति व्यवस्था, माना, धर्म, व्यवसाय, ब्राह्मणों के स्वार्थ, राजाओं के कानून, भौगोलिक परिस्थितियों, धार्मिक, कर्मकाण्ड, व्यावसायिक श्रेणियाँ, प्रजातीय भेद तथा अन्य अनेक कारकों का हाथ है। जाति प्रथा एक जटिल प्रथा है। अतः उसकी उत्पत्ति भी अनेक कारकों से हुई है। इस प्रकार जाति प्रथा की उत्पत्ति के विषय में दिये गये उपरोक्त सभी मत एकांगी हैं। वें जाति प्रथा के मूल में स्निर अनेक कारणों में से किसी एक अथवा दो चार को लेकर उन्हें ही सब कुछ मान बैठते हैं। इस विषय में सर्वागीण दृष्टिकोण से काम लेना आवश्यक है।

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प्रथम तीनों जातियाँ (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) में अपनी ही जाति की स्त्रियों से जो अपने पवित्र कर्मों को न करती हों, उनकी सन्तान ब्रात्य कहलाती थीं।


1. ब्राह्मणों ब्रात्यों से मिज्जकन्तकं, आवन्त्य, बातधान, पुस्पध, सखै।
2. क्षत्रियों ब्रात्यों से - झल्ल, मल्ल, लिच्छवि, नट, करन, खस द्रविड़।
3. वैश्य ब्रात्यों से - सुधन्वन, अचार्य, कारुश, विजन्मन, मैत्र, सात्वत्।
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उपरोक्त सूची मनुस्मृति से प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के कुटीर उद्योग-धन्धों के कारण भी अनेक जातियों का प्रादुर्भाव हो गया, लोहे का काम करने वाला लुहार, सोने का काम करने वाला स्वर्णकार और चमड़े का कार्य करने वाला चर्मकार कहा जाने लगा। कालान्तर में इनमें भी विभाग होने लगे और गोत्र के नाम से पुकारे जाने लगे, यह गोत्र, प्रवर, अस्मद विभिन्न स्थानों पर रहने के कारण हुए। ब्राह्मणों के स्थान के आधार पर ही सूर्यपारी, कान्यकुब्ज, सारस्वत, गौड़, शकद्वीपी, मैथली, नायर, लम्बूदरी आदि शाखाओं का निर्माण हुआ। सूर्य के तटवासी सूर्यपारी, सरस्वती के तट पर बसे सारस्वत, गौड़ देश के गौड़ ब्राह्मण कहलाये। लिपिक के पद पर कार्य करने घाले, कायस्थ कहलाये।

कायस्थों के निवास स्थान के आधार पर अनेक उपजातियाँ बन गयीं। मथुरा में निवास करने वाले माथुर कहलाये, उत्तरी बंगाल के निवासी पौड्रंक, उड़िया निवासी उद्र, दक्षिण भारत के निवासी द्रविड़, काबुल निवासी कम्बोज, वैक्ट्रीया के यूनानी लोग 'यवन', 'तुरानी जाति के आक्रमण करने वाले 'शक', पहाड़ी लोग 'किरात', फारस के लोग पहलब और चीन के लोग चीनी कहलाये। इस प्रकार अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों, व्यवसायों तथा विभिन्न स्थानों पर रहने वालों के कारण जातियों का विकास हुआ।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- वर्ण व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? भारतीय दर्शन में इसका क्या महत्व है?
  2. प्रश्न- जाति प्रथा की उत्पत्ति एवं विकास पर प्रकाश डालिए।
  3. प्रश्न- जाति व्यवस्था के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए। इसने भारतीय
  4. प्रश्न- ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल की भारतीय जाति प्रथा के लक्षणों की विवेचना कीजिए।
  5. प्रश्न- प्राचीन काल में शूद्रों की स्थिति निर्धारित कीजिए।
  6. प्रश्न- मौर्यकालीन वर्ण व्यवस्था पर प्रकाश डालिए। .
  7. प्रश्न- वर्णाश्रम धर्म से आप क्या समझते हैं? इसकी मुख्य विशेषताएं बताइये।
  8. प्रश्न- पुरुषार्थ क्या है? इनका क्या सामाजिक महत्व है?
  9. प्रश्न- संस्कार शब्द से आप क्या समझते हैं? उसका अर्थ एवं परिभाषा लिखते हुए संस्कारों का विस्तार तथा उनकी संख्या लिखिए।
  10. प्रश्न- सोलह संस्कारों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  11. प्रश्न- प्राचीन भारतीय समाज में संस्कारों के प्रयोजन पर अपने विचार संक्षेप में लिखिए।
  12. प्रश्न- प्राचीन भारत में विवाह के प्रकारों को बताइये।
  13. प्रश्न- प्राचीन भारत में विवाह के अर्थ तथा उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए तथा प्राचीन भारतीय विवाह एक धार्मिक संस्कार है। इस कथन पर भी प्रकाश डालिए।
  14. प्रश्न- परिवार संस्था के विकास के बारे में लिखिए।
  15. प्रश्न- प्राचीन काल में प्रचलित विधवा विवाह पर टिप्पणी लिखिए।
  16. प्रश्न- प्राचीन भारतीय समाज में नारी की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
  17. प्रश्न- प्राचीन भारत में नारी शिक्षा का इतिहास प्रस्तुत कीजिए।
  18. प्रश्न- स्त्री के धन सम्बन्धी अधिकारों का वर्णन कीजिए।
  19. प्रश्न- वैदिक काल में नारी की स्थिति का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  20. प्रश्न- ऋग्वैदिक काल में पुत्री की सामाजिक स्थिति बताइए।
  21. प्रश्न- वैदिक काल में सती-प्रथा पर टिप्पणी लिखिए।
  22. प्रश्न- उत्तर वैदिक में स्त्रियों की दशा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  23. प्रश्न- ऋग्वैदिक विदुषी स्त्रियों के बारे में आप क्या जानते हैं?
  24. प्रश्न- राज्य के सम्बन्ध में हिन्दू विचारधारा का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  25. प्रश्न- महाभारत काल के राजतन्त्र की व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
  26. प्रश्न- प्राचीन भारत में राज्य के कार्यों का वर्णन कीजिए।
  27. प्रश्न- राजा और राज्याभिषेक के बारे में बताइये।
  28. प्रश्न- राजा का महत्व बताइए।
  29. प्रश्न- राजा के कर्त्तव्यों के विषयों में आप क्या जानते हैं?
  30. प्रश्न- वैदिक कालीन राजनीतिक जीवन पर एक निबन्ध लिखिए।
  31. प्रश्न- उत्तर वैदिक काल के प्रमुख राज्यों का वर्णन कीजिए।
  32. प्रश्न- राज्य की सप्त प्रवृत्तियाँ अथवा सप्तांग सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए।
  33. प्रश्न- कौटिल्य का मण्डल सिद्धांत क्या है? उसकी विस्तृत विवेचना कीजिये।
  34. प्रश्न- सामन्त पद्धति काल में राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
  35. प्रश्न- प्राचीन भारत में राज्य के उद्देश्य अथवा राज्य के उद्देश्य।
  36. प्रश्न- प्राचीन भारत में राज्यों के कार्य बताइये।
  37. प्रश्न- क्या प्राचीन राजतन्त्र सीमित राजतन्त्र था?
  38. प्रश्न- राज्य के सप्तांग सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
  39. प्रश्न- कौटिल्य के अनुसार राज्य के प्रमुख प्रकारों का वर्णन कीजिए।
  40. प्रश्न- क्या प्राचीन राज्य धर्म आधारित राज्य थे? वर्णन कीजिए।
  41. प्रश्न- मौर्यों के केन्द्रीय प्रशासन पर एक लेख लिखिए।
  42. प्रश्न- चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
  43. प्रश्न- अशोक के प्रशासनिक सुधारों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
  44. प्रश्न- गुप्त प्रशासन के प्रमुख अभिकरणों का उल्लेख कीजिए।
  45. प्रश्न- गुप्त प्रशासन पर विस्तृत रूप से एक निबन्ध लिखिए।
  46. प्रश्न- चोल प्रशासन पर एक निबन्ध लिखिए।
  47. प्रश्न- चोलों के अन्तर्गत 'ग्राम- प्रशासन' पर एक निबन्ध लिखिए।
  48. प्रश्न- लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में मौर्य प्रशासन का परीक्षण कीजिए।
  49. प्रश्न- मौर्यों के ग्रामीण प्रशासन पर एक लेख लिखिए।
  50. प्रश्न- मौर्य युगीन नगर प्रशासन पर प्रकाश डालिए।
  51. प्रश्न- गुप्तों की केन्द्रीय शासन व्यवस्था पर टिप्पणी कीजिये।
  52. प्रश्न- गुप्तों का प्रांतीय प्रशासन पर टिप्पणी कीजिये।
  53. प्रश्न- गुप्तकालीन स्थानीय प्रशासन पर टिप्पणी लिखिए।
  54. प्रश्न- प्राचीन भारत में कर के स्रोतों का विवरण दीजिए।
  55. प्रश्न- प्राचीन भारत में कराधान व्यवस्था के विषय में आप क्या जानते हैं?
  56. प्रश्न- प्राचीनकाल में भारत के राज्यों की आय के साधनों की विवेचना कीजिए।
  57. प्रश्न- प्राचीन भारत में करों के प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
  58. प्रश्न- कर की क्या आवश्यकता है?
  59. प्रश्न- कर व्यवस्था की प्राचीनता पर प्रकाश डालिए।
  60. प्रश्न- प्रवेश्य कर पर टिप्पणी लिखिये।
  61. प्रश्न- वैदिक युग से मौर्य युग तक अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व की विवेचना कीजिए।
  62. प्रश्न- मौर्य काल की सिंचाई व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
  63. प्रश्न- वैदिक कालीन कृषि पर टिप्पणी लिखिए।
  64. प्रश्न- वैदिक काल में सिंचाई के साधनों एवं उपायों पर एक टिप्पणी लिखिए।
  65. प्रश्न- उत्तर वैदिक कालीन कृषि व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
  66. प्रश्न- भारत में आर्थिक श्रेणियों के संगठन तथा कार्यों की विवेचना कीजिए।
  67. प्रश्न- श्रेणी तथा निगम पर टिप्पणी लिखिए।
  68. प्रश्न- श्रेणी धर्म से आप क्या समझते हैं? वर्णन कीजिए
  69. प्रश्न- श्रेणियों के क्रिया-कलापों पर प्रकाश डालिए।
  70. प्रश्न- वैदिककालीन श्रेणी संगठन पर प्रकाश डालिए।
  71. प्रश्न- वैदिक काल की शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
  72. प्रश्न- बौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए वैदिक शिक्षा तथा बौद्ध शिक्षा की तुलना कीजिए।
  73. प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा के प्रमुख उच्च शिक्षा केन्द्रों का वर्णन कीजिए।
  74. प्रश्न- "विभिन्न भारतीय दार्शनिक सिद्धान्तों की जड़ें उपनिषद में हैं।" इस कथन की विवेचना कीजिए।
  75. प्रश्न- अथर्ववेद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

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