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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 भूगोल

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2776
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 भूगोल - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- एक देश की प्रकृति के साथ सामंजस्य से जीने की चाह के मार्ग में कौन-सी समस्याएँ आती हैं?

उत्तर -

प्रकृति के साथ समरसता के साथ जीना

1972 की स्टॉकहोम घोषणा में यह कहा गया था कि "मनुष्य अपने पर्यावरण की कठपुतली व उसे ढालने वाला- दोनों है जो (पर्यावरण) उसे शारीरिक सतत और बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक अभिवृद्धि के अवसर सुलभ कराता है। इस ग्रह में मानव प्रजाति की एक लम्बी व उत्पीड़क विकास में एक ऐसी अवस्था आ गई है जिसमें विज्ञान व प्रौद्योगिकी में तीव्र प्रगति के कारण मनुष्य ने अपने वातावरण में अनगिनत तरीकों से वे अभूतपूर्व स्तर पर रूपान्तरण करने की शक्ति प्राप्त कर ली है। पर्यावरण के दोनों रूप - प्राकृतिक एवं मनुष्य - निर्मित, मनुष्य के कल्याण तथा मूलभूत मानव अधिकार सहित जीवन के अधिकार के उपयोग के लिए अनिवार्य हैं"।

स्टॉकहोम सम्मेलन के तीस वर्ष बाद भी हम विश्व पर्यावरण की अवस्था का व्यापक विवरण नहीं दे सकते और न ही हम विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि राष्ट्रीय सरकारों के पास स्वस्थ पर्यावरण नीतियों से विकास नीतियों के सामंजस्य के लिए इच्छा या ज्ञान है। इस संदर्भ में निम्न समस्याएँ व चुनौतियाँ हैं-

(1) पर्यावरणीय हानियों के लेखांकन की समस्या - पर्यावरण प्रदूषण के कारण विनाश की आर्थिक कीमत का उद्घाटन करने वाले प्रामाणिक अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं। वैसे 1980 के दशक के मध्य से ऐसे अध्ययनों द्वार विनाश की कीमत का खुलासा करने की कोशिश की गई हैं। उदाहरण के लिए समाज, ऐतिहासिक स्मारकों व जैविक प्रणालियों के विनाश की कीमत। प्रदूषण व भूमण्डलीय चेतावनी की आर्थिक कीमत में व कीमत भी शामिल है जो राष्ट्रों को समुद्र स्तर के ऊँचे उठने के कारण वहन करनी होगी जैसे तटीय क्षेत्र की जनता के 'पारिस्थितिकीय शरणार्थी के रूप में विस्थापन के लिए खर्च।

कुछ अध्ययनों ने यह अनुमान लगाया है कि विकसित देशों में प्रदूषण कटौती व नियंत्रण की कीमत उनके वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद का 0.8 से 1.5 प्रतिशत होगी। विकासशील देशों के लिए यह आँकड़े काफी कम होंगे। इसे ध्यान में रखते हुए पिछले दो दशकों में कुछ ऐसे प्रयत्न भी हुए हैं जिसमें राष्ट्रीय आय लेखांकन में पर्यावरण पतन की वजह से लगने वाली प्रत्यक्ष लागत और प्राकृतिक संसाधन पूँजी के अवमूल्यन, दोनों को लेखबद्ध किया जाए ताकि भविष्य में उत्पादन संभावना में हानि को दर्शाया जा सके। हालाँकि राष्ट्रीय लेखाएँ मछली, लकड़ी व खनिज जैसे संसाधन भंडार के दोहन से होने वाली आय का रिकॉर्ड रखती हैं लेकिन गिरते हुए संसाधन भंडार व पर्यावरण गुणवत्ता के पतन से भविष्य में होने वाली आय के नुकसान का ब्यौरा नहीं दिया जाता। जब इस प्रकार के अवमूल्यन को राष्ट्रीय पूँजी भंडार में शामिल किया जाता है जब संसाधन पतन का कुल योगदान राष्ट्रीय आय में अपेक्षाकृत कम होता है और आर्थिक सुधारों पर प्रभाव का वह सही तौर पर प्रतिबिम्ब होता हैं उदाहरण के लिए जापान का उदाहरण लें। जापान ने अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद को पर्यावरण सहित अनेक तत्वों को शामिल करके सही करने की कोशिश की। इसमें यह पाया गया कि 1955 से 1985 के मध्य जापान की सकल राष्ट्रीय उत्पाद में अभिवृद्धि 8.3 प्रतिशत प्रति वर्ष की बजाय मात्र 5.8 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से थी। इसी तरह से भौतिक क्षय व पैट्रोल की कीमत में बढ़ोत्तरी, जंगल, जमीन और जल संपत्तियों की भी समीक्षा की जाए तो अधिकांश विकसित एवं विकासशील देशों के सकल राष्ट्रीय उत्पाद मूल्यांकन में तीव्र कमी आएगी। लेकिन संसाधन भंडार में हानि का लेखांकन करना जटिल है और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में संघर्ष का एक विषय है कोई भी राष्ट्रीय सरकार अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कमी को जाहिर नहीं करना चाहती।

(2) उत्तरदायित्व निर्धारित करने और मूल्य चुकाने की समस्या - पर्यावरण उपयोग का भूमण्डलीय संतुलन यह परामर्श देता है कि गरीब देशों को स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पोषण पर निवेश द्वारा मानव पूँजी में सुधार करने के लिए मौद्रिक (monetary) संसाधनों का पुनर्वितरण हो। आर्थिक एवं पर्यावरण रंगमंचों में आजकल यह एक प्रमुख संघर्ष है। यह धनवान देशों की जीवन शैली व उनके उपभोग स्तर में कटौती की माँग करता है। पर्यावरण को एक मुफ्त संसाधन मानने की वजह से अमीर देशों ने लाभ उठाया और विश्व के सर्वाधिक प्रदूषण को पर्यावरण में छोड़ दिया। यह कहा गया है कि पर्यावरण की सही कीमत लगाई जाए और सभी राष्ट्रों को (सकल राष्ट्रीय उत्पाद के आधार पर 50 प्रतिशत तथा 50 प्रतिशत जनसंख्या के याधार पर) व्यापार - योग्य परमिट जारी कर दिए जाएँ। यदि ऐसा हो जाता है तो यह अनुमान लगाया गया है कि अमीर देशों को अपने सम्मिलित सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत गरीब देशों को उनके पर्यावरण परमिट को खरीदने के लिए देना होगा। मानव विकास रिपोर्ट में यह बताया गया है कि विकासशील देशों में विश्व के उष्णकटिबंधीय जंगल हैं और यह सभी के हित में है कि उनका परिरक्षण भूमण्डलीय ऊष्णींकरण (warming) को रोकने और विविधता सुरक्षित रखने के लिए किया जाए। इसी तरह के ओजोन पर परिरक्षण के लिए जरूरी है कि क्लोरोफ्लोरोकार्बनों के उत्पादन पर भूमण्डलीय स्तर पर नियंत्रण हो। उसके उत्पादन के लिए औद्योगिक देश ही सर्वाधिक उत्तरदायी हैं और इस प्रदूषक प्रौद्योगिकी के विकासशील देशों में स्थानान्तरण पर रोक लगनी चाहिए। यह तभी संभव है जबकि विकासशील देशों की उचित क्षतिपूर्ति हो और उनकी वैकल्पिक प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए सहायता की जाए। इस सिद्धान्त का एक सहज परिणाम यह भी है कि प्रदूषण फैलाने वाले देशों को इस गैर-जिम्मेदारना कार्य के लिए कीमत चुकानी चाहिए अथवा 'प्रदूषक भुगतान करें' सिद्धान्त को अपनाया जाना चाहिए। यह अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के विभिन्न प्रकार के प्रदूषण के व्यापार - योग्य परमिट का आधार हो सकता है। इसे अमीर देशों द्वारा सेवाओं के लिए भुगतान न कि गरीब देशों को सहायता के रूप में माना जाना चाहिए।

(3) पर्यावरणीय संघर्षों को सुलझाने में अन्तर्राष्ट्रीय विधि व्यवस्था की सत्ता एवं सामर्थ्य - अधिकांश राष्ट्रीय समाजों की तरह अन्तर्राष्ट्रीय समाज भी संसाधनों पर पहुँच तथा नियंत्रण के अधिकारों का आबंटन करता हैं ऐसा कुछ नियमों के मध्यम से होता है जो सम्पत्ति नियमों के अनुरूप होते हैं अन्तर्राष्ट्रीय कानून में इस सम्पत्ति अवधारणाओं को राष्ट्रीय सम्प्रभुता, भौमिक ( territorial) अधिकारों अथवा क्षेत्राधिकार के शब्दों के अन्तर्गत माना जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून एक राष्ट्र का अपनी भूमि पर क्षेत्राधिकार प्रयोग के अधिकार को मान्यता देता है लेकिन भूमि से बाहर की अनुमति के लिए वह मना कर सकता है। संसाधनों पर सम्प्रभुता अथवा क्षेत्राधिकार के अर्थ में अन्यों के उनके उपयोग पर रोक लगाने का अधिकार भी निहित है और इसीलिए अन्तर्राष्ट्रीय विधि में यह अत्यंत चर्चा का मुद्दा बन गया है। 1973 में अरब राज्यों द्वारा तेल प्रतिबंध (oil embargo) इस अधिकार का सबसे अच्छा उदाहरण है। इसके विपरीत, प्राकृतिक संसाधनों पर समान पहुँच का सिद्धान्त है। इसका उदाहरण समुद्र की स्वतंत्रता है। इस सिद्धान्त पर भी अब संशोधन हुआ है और एकमात्र (विशिष्ट) आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone - EEZ) को समुद्री स्वतंत्रता से अलग कर दिया गया है। यह चर्चा 'पेचीदा मुद्दों' को जन्म देती है। यहाँ प्रश्न अन्तर्राष्ट्रीय नियमों की निष्पक्षता से हैं। वे मूलभूत मान्यताएँ कितनी समतापूर्ण तथा तर्कयुक्त हैं जिनके आधार पर वर्तमान में अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था संसाधनों का वितरण करती है? यह केवल प्रभावित संसाधनों को सुरक्षित करने का प्रश्न नहीं है बल्कि इसमें अन्तर्राष्ट्रीय निवेश प्रणाली के विनियमन की बात भी है। इस अन्तर्राष्ट्रीय निवेश प्रणाली में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) द्वारा खदान, मत्स्य तथा लकड़ी आदि जैसे प्राकृतिक संसाधन क्षेत्रों में निवेश का प्रश्न भी विवाद का मुद्दा है। पिछले दशक में कम से कम दो ऐसे महत्वपूर्ण मामले हैं जो अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) के समक्ष फैसले के लिए आए। भारत और पाकिस्तान ने अपनी तटीय मत्स्य (fisheries) क्षेत्र के परिरक्षण के प्रश्न पर संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध न्याय के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में याचिका दायर की थी और न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय दिया। जलवायु सम्मेलन अथवा क्योटो अनुबंध तथा जैविक विविधता सम्मेलन पर हस्ताक्षर से पूर्व वार्ताओं में 'पारस्परिक निर्भरता की भ्रान्ति का भण्डाफोड़ हुआ और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य विकसित राष्ट्रों के 'वर्चस्व सिद्धान्त' के उपयोग का खुलासा हुआ।

(4) निरंतर बढ़ती जनसंख्या - पॉल इहरलिच (Paul Ehrlich) ने 1969 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'दी पापुलेशन बम (The Population Bomb) में जनसंख्या अभिवृद्धि के खतरनाक विवरण दिए थे जिन्हें पढ़कर उन्नीसवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में टॉमस माल्थस की भविष्यवाणी याद आती है। टॉमस माल्थस ने कहा था कि मनुष्यों की संख्या में अभिवृद्धि खाद्य आपूर्ति की अभिवृद्धि से ज्यादा हो जाएगी जिसके परिणामस्वरूप गरीबी व भूख का जन्म होगा। पारम्परिक सिद्धान्तवादियों (जो मुख्य तौर पर पश्चिमी सिद्धान्तवादी है) ने जनसंख्या अभिवृद्धि को पर्यावरण पतन का प्रमुख कारण माना। लेकिन दूसरे सिद्धान्तकारों (जो भारतीय है) के अनुसार जनसंख्या अभिवृद्धि का पर्यावरण पतन से कोई सम्बंध नहीं है। विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र (Centre for Science and Environment) ने अपनी दूसरी नागरिक रिपोर्ट (Second Citizen's Report 1982) में यह दावा किया है कि भारत में भूख तथा गरीबी के कारण देश के प्राकृतिक संसाधनों का क्रूरतापूर्ण कुप्रबंध है। 1995 की मानव विकास रिपोर्ट में यह प्रदर्शित किया गया है कि शिक्षा-विस्तार व महिलाओं को रोजगार देने की विकास नीति के कारण कुछ दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में जनसंख्या अभिवृद्धि में तीव्र गिरावट आई है। इसीलिए जनसंख्या अभिवृद्धि असंतुलित तथा गैर- सतत विकास का कारण नहीं बल्कि परिणाम है।

(5) उपयुक्त अथवा वैकल्पिक प्रौद्योगिकी - उपयुक्त प्रौद्योगिकी की रचना एक आवश्यकता और एक सामुदायिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए हुई। आमतौर पर इसका उद्देश्य विनाश के बिना विकास है। प्रौद्योगिकी तब उपयुक्त है जब वह विकास के उद्देश्यों तथा प्रतिमानों में सामंजस्य रखती हो। पश्चिम के औद्योगिक रूप से विकास देशों में अधिकांश मौजूदा प्रौद्योगिकियाँ पूँजी सघन तथा सघन संसाधन पूँजी (intensive resource capital) पर आधारित हैं। उपयुक्त प्रौद्योगिकी इस प्रकार की प्रौद्योगिकी का विकल्प प्रस्तुत करती है। यह प्रकृति के संग सामंजस्यता से जीने के प्रयत्नों की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। उपयुक्त प्रौद्योगिकी के विकास के लिए निम्नलिखित परिस्थितियों का होना आवश्यक है-

(1) राष्ट्र की सम्पन्नता से प्रासंगिकता
(2) प्राकृतिक एवं मानव संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोगी
(3) उत्पादन, मूलभूत उपभोक्ता वस्तुओं व सेवाओं तथा अभिवृद्धि की दर की अधिकतमता
(4) भुगतान संतुलन में घाटे तथा रोजगार में कटौती
(5) आय वितरण में अधिकाधिक समता
(6) जीवन की गुणवत्ता में सुधार
(7) राजनीतिक विकास व स्थिरता को प्रोत्साहन
(8) क्षेत्रीय विकास में योगदान
(9) पर्यावरण समस्याओं को सुलझाने या उनकी उपेक्षा करने की क्षमता।
(10) सांस्कृतिक पर्यावरण व सामाजिक परम्परा की प्रासंगिकता।

पर्यावरण आन्दोलन का यह प्रौद्योगिकी पक्ष कृषि तथा उद्योग, बड़ी तथा छोटी इकाई, पश्चिमी तथा पूर्वी (अथवा आधुनिक तथा पारम्परिक) प्रौद्योगिकी तथा उत्पादन परम्पराओं में एक सक्रिय सम्मिश्रण के लिए प्रयत्न करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमियों की समस्या को सुलझाने तथा बहुराष्ट्रीय तथा संसाधन पूँजी सघन प्रौद्योगिकी के विस्तार के कारण पारम्परिक हस्त- कौशल मजदूर अथवा किसी कुटीर उद्योग के सीमान्तकरण अथवा उन्मूलन से रोकने का यह संभावनाओं से भरा क्षेत्र है। गांधी का चर्खा और खादी उद्योग उपयुक्त प्रौद्योगिकी के प्रमुख उदाहरण हैं जिसने राजनीतिक विकास को भी प्रोत्साहन दिया अर्थात् विदेशी शासन की दासता से संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- प्रादेशिक भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  2. प्रश्न- प्रदेशों के प्रकार का विस्तृत वर्णन कीजिये।
  3. प्रश्न- प्राकृतिक प्रदेश को परिभाषित कीजिए।
  4. प्रश्न- प्रदेश को परिभाषित कीजिए एवं उसके दो प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
  5. प्रश्न- प्राकृतिक प्रदेश से क्या आशय है?
  6. प्रश्न- सामान्य एवं विशिष्ट प्रदेश से क्या आशय है?
  7. प्रश्न- क्षेत्रीयकरण को समझाते हुए इसके मुख्य आधारों का वर्णन कीजिए।
  8. प्रश्न- क्षेत्रीयकरण के जलवायु सम्बन्धी आधार कौन से हैं? वर्णन कीजिए।
  9. प्रश्न- क्षेत्रीयकरण के कृषि जलवायु आधार कौन से हैं? इन आधारों पर क्षेत्रीयकरण की किसी एक योजना का भारत के संदर्भ में वर्णन कीजिए।
  10. प्रश्न- भारत के क्षेत्रीयकरण से सम्बन्धित मेकफारलेन एवं डडले स्टाम्प के दृष्टिकोणों पर प्रकाश डालिये।
  11. प्रश्न- क्षेत्रीयकरण के भू-राजनीति आधार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  12. प्रश्न- डॉ० काजी सैयदउद्दीन अहमद का क्षेत्रीयकरण दृष्टिकोण क्या था?
  13. प्रश्न- प्रो० स्पेट के क्षेत्रीयकरण दृष्टिकोण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  14. प्रश्न- भारत के क्षेत्रीयकरण से सम्बन्धित पूर्व दृष्टिकोण पर प्रकाश डालिये।
  15. प्रश्न- प्रादेशिक नियोजन से आप क्या समझते हैं? इसके उद्देश्य भी बताइए।
  16. प्रश्न- प्रादेशिक नियोजन की आवश्यकता क्यों है? तर्क सहित समझाइए।
  17. प्रश्न- प्राचीन भारत में नियोजन पद्धतियों पर लेख लिखिए।
  18. प्रश्न- नियोजन तथा आर्थिक नियोजन से आपका क्या आशय है?
  19. प्रश्न- प्रादेशिक नियोजन में भूगोल की भूमिका पर एक निबन्ध लिखो।
  20. प्रश्न- हिमालय पर्वतीय प्रदेश को कितने मेसो प्रदेशों में बांटा जा सकता है? वर्णन कीजिए।
  21. प्रश्न- भारतीय प्रायद्वीपीय उच्च भूमि प्रदेश का मेसो विभाजन प्रस्तुत कीजिए।
  22. प्रश्न- भारतीय तट व द्वीपसमूह को किस प्रकार मेसो प्रदेशों में विभक्त किया जा सकता है? वर्णन कीजिए।
  23. प्रश्न- "हिमालय की नदियाँ और हिमनद" पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  24. प्रश्न- दक्षिणी भारत की नदियों का वर्णन कीजिए।
  25. प्रश्न- पूर्वी हिमालय प्रदेश का संसाधन प्रदेश के रूप में वर्णन कीजिए।
  26. प्रश्न- भारत में गंगा के मध्यवर्ती मैदान भौगोलिक प्रदेश पर विस्तृत टिप्पणी कीजिए।
  27. प्रश्न- भारत के उत्तरी विशाल मैदानों की उत्पत्ति, महत्व एवं स्थलाकृति पर विस्तृत लेख लिखिए।
  28. प्रश्न- मध्य गंगा के मैदान के भौगोलिक प्रदेश पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  29. प्रश्न- छोटा नागपुर का पठार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  30. प्रश्न- प्रादेशिक दृष्टिकोण के संदर्भ में थार के मरुस्थल की उत्पत्ति, महत्व एवं विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  31. प्रश्न- क्षेत्रीय दृष्टिकोण के महत्व से लद्दाख पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  32. प्रश्न- राजस्थान के मैदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  33. प्रश्न- विकास की अवधारणा को समझाइये |
  34. प्रश्न- विकास के प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं? वर्णन कीजिए।
  35. प्रश्न- सतत् विकास का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  36. प्रश्न- सतत् विकास के स्वरूप को समझाइये |
  37. प्रश्न- सतत् विकास के क्षेत्र कौन-कौन से हैं? वर्णन कीजिए।
  38. प्रश्न- सतत् विकास के महत्वपूर्ण सिद्धान्त एवं विशेषताओं पर विस्तृत लेख लिखिए।
  39. प्रश्न- अल्प विकास की प्रकृति के विभिन्न दृष्टिकोण समझाइए।
  40. प्रश्न- अल्प विकास और अल्पविकसित से आपका क्या आशय है? गुण्डरफ्रैंक ने अल्पविकास के क्या कारण बनाए है?
  41. प्रश्न- विकास के विभिन्न दृष्टिकोणों पर संक्षेप में टिप्पणी कीजिए।
  42. प्रश्न- सतत् विकास से आप क्या समझते हैं?
  43. प्रश्न- सतत् विकास के लक्ष्य कौन-कौन से हैं?
  44. प्रश्न- आधुनिकीकरण सिद्धान्त की आलोचना पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
  45. प्रश्न- अविकसितता का विकास से क्या तात्पर्य है?
  46. प्रश्न- विकास के आधुनिकीकरण के विभिन्न दृष्टिकोणों पर प्रकाश डालिये।
  47. प्रश्न- डॉ० गुन्नार मिर्डल के अल्प विकास मॉडल पर विस्तृत लेख लिखिए।
  48. प्रश्न- अल्प विकास मॉडल विकास ध्रुव सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए तथा प्रादेशिक नियोजन में इसकी सार्थकता को समझाइये।
  49. प्रश्न- गुन्नार मिर्डल के प्रतिक्षिप्त प्रभाव सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
  50. प्रश्न- विकास विरोधी परिप्रेक्ष्य क्या है?
  51. प्रश्न- पेरौक्स के ध्रुव सिद्धान्त पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  52. प्रश्न- गुन्नार मिर्डल के सिद्धान्त की समीक्षा कीजिए।
  53. प्रश्न- क्षेत्रीय विषमता की अवधारणा को समझाइये
  54. प्रश्न- विकास के संकेतकों पर टिप्पणी लिखिए।
  55. प्रश्न- भारत में क्षेत्रीय असंतुलन की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
  56. प्रश्न- क्षेत्रीय विषमता निवारण के उपाय क्या हो सकते हैं?
  57. प्रश्न- क्षेत्रीय विषमताओं के कारण बताइये। .
  58. प्रश्न- संतुलित क्षेत्रीय विकास के लिए कुछ सुझाव दीजिये।
  59. प्रश्न- क्षेत्रीय असंतुलन का मापन किस प्रकार किया जा सकता है?
  60. प्रश्न- क्षेत्रीय असमानता के सामाजिक संकेतक कौन से हैं?
  61. प्रश्न- क्षेत्रीय असंतुलन के क्या परिणाम हो सकते हैं?
  62. प्रश्न- आर्थिक अभिवृद्धि कार्यक्रमों में सतत विकास कैसे शामिल किया जा सकता है?
  63. प्रश्न- सतत जीविका से आप क्या समझते हैं? एक राष्ट्र इस लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकता है? विस्तारपूर्वक समझाइये |
  64. प्रश्न- एक देश की प्रकृति के साथ सामंजस्य से जीने की चाह के मार्ग में कौन-सी समस्याएँ आती हैं?
  65. प्रश्न- सतत विकास के सामाजिक घटकों पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  66. प्रश्न- सतत विकास के आर्थिक घटकों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
  67. प्रश्न- सतत् विकास के लिए यथास्थिति दृष्टिकोण के बारे में समझाइये |
  68. प्रश्न- सतत विकास के लिए एकीकृत दृष्टिकोण के बारे में लिखिए।
  69. प्रश्न- विकास और पर्यावरण के बीच क्या संबंध है?
  70. प्रश्न- सतत विकास के लिए सामुदायिक क्षमता निर्माण दृष्टिकोण के आयामों को समझाइये |
  71. प्रश्न- सतत आजीविका के लिए मानव विकास दृष्टिकोण पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
  72. प्रश्न- सतत विकास के लिए हरित लेखा दृष्टिकोण का विश्लेषण कीजिए।
  73. प्रश्न- विकास का अर्थ स्पष्ट रूप से समझाइये |
  74. प्रश्न- स्थानीय नियोजन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
  75. प्रश्न- भारत में नियोजन के विभिन्न स्तर कौन से है? वर्णन कीजिए।
  76. प्रश्न- नियोजन के आधार एवं आयाम कौन से हैं? वर्णन कीजिए।
  77. प्रश्न- भारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में क्षेत्रीय उद्देश्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
  78. प्रश्न- आर्थिक विकास में नियोजन क्यों आवश्यक है?
  79. प्रश्न- भारत में नियोजन अनुभव पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  80. प्रश्न- भारत में क्षेत्रीय नियोजन की विफलताओं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  81. प्रश्न- नियोजन की चुनौतियां और आवश्यकताओं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  82. प्रश्न- बहुस्तरीय नियोजन क्या है? वर्णन कीजिए।
  83. प्रश्न- पंचायती राज व्यवस्था के ग्रामीण जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव की विवेचना कीजिए।
  84. प्रश्न- ग्रामीण पुनर्निर्माण में ग्राम पंचायतों के योगदान की विवेचना कीजिये।
  85. प्रश्न- संविधान के 72वें संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में जो परिवर्तन किये गये हैं उनका उल्लेख कीजिये।
  86. प्रश्न- पंचायती राज की समस्याओं का विवेचन कीजिये। पंचायती राज संस्थाओं को सफल बनाने हेतु सुझाव भी दीजिये।
  87. प्रश्न- न्यूनतम आवश्यक उपागम की व्याख्या कीजिये।
  88. प्रश्न- साझा न्यूनतम कार्यक्रम की विस्तारपूर्वक रूपरेखा प्रस्तुत कीजिये।
  89. प्रश्न- भारत में अनुसूचित जनजातियों के विकास हेतु क्या उपाय किये गये हैं?
  90. प्रश्न- भारत में तीव्र नगरीयकरण के प्रतिरूप और समस्याओं की विवेचना कीजिए।
  91. प्रश्न- पंचायती राज व्यवस्था की समस्याओं की विवेचना कीजिये।
  92. प्रश्न- प्राचीन व आधुनिक पंचायतों में क्या समानता और अन्तर है?
  93. प्रश्न- पंचायती राज संस्थाओं को सफल बनाने हेतु सुझाव दीजिये।
  94. प्रश्न- भारत में प्रादेशिक नियोजन के लिए न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के महत्व का वर्णन कीजिए।
  95. प्रश्न- न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के सम्मिलित कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए।
  96. प्रश्न- भारत के नगरीय क्षेत्रों के प्रादेशिक नियोजन से आप क्या समझते हैं?

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