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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय 13 - एक अच्छे वाणिज्य शिक्षक के गुण
(Qualities of a Good Commerce Teacher)
प्रश्न- एक आदर्श वाणिज्य शिक्षक में कौन-कौन से गुण एवं योग्यताएँ होनी चाहिए। विवेचना कीजिए ।
अथवा
एक अच्छे वाणिज्य शिक्षक के गुणों एवं प्रवीणताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
(An Ideal Commerce Teacher)
वाणिज्य अध्यापकों में अपेक्षित गुणों के विषय में बहुत से शिक्षा- शास्त्रियों के गूढ़ अध्ययन किया है जिनमें फिन्ले (Finley) तथा हर्ड (Hurd) प्रमुख हैं उनके अनुसार- विज्ञान शिक्षक में अपेक्षिक गुणों का अध्ययन निम्न प्रकार कर सकते हैं-
1. स्वस्थ व्यक्तित्व (Healthy Personality) - व्यक्तित्व को एकांगी दृष्टिकोण से नहीं लेना चाहिये। यह किसी भी एक पक्ष चाहे वह शारीरिक हो अथवा बौद्धिक से सम्बन्धित नहीं होता है।स्वस्थ व्यक्तित्व से तात्पर्य एक ऐसे व्यक्तित्व से है जो शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक दृष्टिकोण से समायोजित हो।स्वस्थ व्यक्तित्व का छात्रों के ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अध्यापक के इस गुण को छात्र अप्रत्यक्ष रूप से अनुकरण करने लगते हैं। इस कारण इस ओर से अध्यापक को बहुत ही सतर्क एवं सचेत रहना चाहिये।
2. नेतृत्व क्षमता (Ability to lead ) – शिक्षा एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। इसकी निरन्तरता की उपादेयता इसके द्वारा ग्रहित मार्ग पर निर्भर करती है। अध्यापक ही इसे उपयुक्त दिशा प्रदान कर सकता है। इस कारण छात्रों की शक्ति को दिशाविहीन होने से रोकने के लिये एवं उसको वांछित धाराओं में मार्गन्तीकरण हेतु उसमें सबल नेतृत्व के गुण का होना अत्यन्त आवश्यक है। इसी गुण के आधार पर वह छात्रों की अनुशासनहीनता को भी नियन्त्रित करने में सक्षम हो सकेगा। क्योंकि अनुशासनहीनता का प्रमुख कारण छात्रों की शक्ति को उचित दिशा का न मिलना है एवं यदि अध्यापक इस शक्ति को सृजनात्मक दिशा में नेतृत्व दे सकने में सक्षम है तो अनुशासनहीनता स्वमेव ही समाप्त हो जायेगी।
3. आत्म-विश्वास (Self-Confidence) - धर्म एवं आत्मविश्वास ऐसे गुण हैं जिनका होना एक अध्यापक में बहुत आवश्यक है।वाणिज्य शिक्षण में यदा-कदा अध्यापक के सम्मुख इस प्रकार की समस्याओं का आना सम्भव है जिनका हल उसने पहले से नहीं सोचा हुआ होता है। ऐसी स्थिति में आत्म-विश्वास का होना ही उसकी उन परिस्थितियों समायोजन में सहायक हो सकता है।
4. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार (Sympathetic Behaviour) - वाणिज्य शिक्षण का आधार जिज्ञासा है। छात्रों में वाणिज्य के प्रति रुचि एवं अभिरुचि का विकास तभी सम्भव है जबकि उसकी जिज्ञासा की पूर्ति हो सके। अध्यापक और छात्रों में सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्धों का होना अन्य विषयों की अपेक्षा वाणिज्य में अधिक आवश्यक है। यदि अध्यापक का व्यवहार अपने छात्रों के प्रति अत्यधिक कठोर है तो वह सदैव भयभीत रहेंगे। ऐसी स्थिति में जिज्ञासा तृप्ति का प्रश्न हीं नहीं उठता है। इस कारण अध्यापक का व्यवहार प्रेमपूर्ण एवं सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिये जिससे वह छात्रों के लिये एक सच्चे मित्र, हितैषी एवं पथ-प्रदर्शक का उत्तर-दायित्व उचित प्रकार से निभा सके। छात्र निस्संकोच अपनी समस्याएँ उसके सम्मुख समाधान हेतु रख सकें।
5. निष्पक्ष दृष्टिकोण (Impartial Attutide ) - वाणिज्य अध्यापक की एक प्रमुख विशेषता छात्रों को परिस्थितियों को निष्पक्ष रूप से अवलोकन करने की आदत डालना है। यदि अध्यापक में स्वयं निष्पक्षता का अभाव है और वह स्वयं ही पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं तो वह छात्रों में गुण को विकसित करने में पूर्णतया असफल रहेगा। दैनिक शिक्षण में भी उसका व्यवहार पूर्णतया निष्पक्ष रहना चाहिये। किसी भी प्रकार के भेदभाव पूर्ण व्यवहार की उससे अपेक्षा नहीं की जाती है।
6. स्पष्टवादिता (Frankness) - वाणिज्य शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य ही शाश्वत सत्य की प्राप्ति है। वैज्ञानिक किसी भी चीज अथवा सिद्धान्त को तब तक सत्य मानने को तत्पर नहीं होता है जब तक कि वस्तुनिष्ठ तरीके से उसको सत्यापित न कर ले। उसका सम्बन्ध 'क्या है' से है 'क्या होना चाहिये' से नहीं है।इस दृष्टिकोण से उसमें स्पष्टवादिता का होना एक अत्यन्त आवश्यक गुण है। उसे छात्रों के सम्मुख दैनिक शिक्षण में भी अपने इस गुण की निरन्तरता को बनाये रखना चाहिये।उसे किसी भी दशा में अस्पष्ट एवं भ्रमपूर्ण वाचन नहीं करना चाहिये।
7. अभिव्यक्ति की शक्ति (Power of Expression ) - यह सबसे प्रमुख गुण है। यदि अध्यापक अपनी बात को छात्रों के सम्मुख उचित प्रकार से रखने में असमर्थ है तो चाहे वह शैक्षिक दृष्टिकोण से कितना भी योग्य एवं विद्वान क्यों न हो वह एक असफल शिक्षक ही होगा। भाषा पर नियन्त्रण एवं पाठ्यवस्तु को क्रमबद्ध कर सकने की क्षमता अभिव्यक्ति के अन्तर्गत आती है। उसकी भाषा छात्रों के स्तर के अनुरूप हो एवं उसके विचार स्पष्ट एवं क्रमबद्ध होने चाहिये।
8. अध्ययनशील (Studious) - किसी भी अन्य विषय की अपेक्षा वाणिज्य में ज्ञान की मात्रा अत्यन्त तीव्रता से बढ़ रही है। यह प्रगति इतनी तीव्र है कि इसके साथ ज्ञानार्जन का सामंजस्य रखना कठिन हो रहा है। एक वाणिज्य अध्यापक के लिये तो यह और भी आवश्यक है कि वह वाणिज्य क्षेत्र की नवीनतम खोजों से परिचित हो। तभी वह अपने छात्रों को इस तेजी से परिवर्तनशील समाज के साथ समायोजित करा सकने में सक्षम हो सकेगा। समय परिस्थिति एवं नवीन ज्ञान के आधार पर उनका स्वरूप - परिमार्जित होता रहता है। इस कारण वाणिज्य अध्यापक को किसी भी सिद्धान्त को सदैव के लिये सत्य व अपरिवर्तनशील नहीं मानना चाहिये और यह तभी सम्भव है जबकि वह सदैव नवीन ज्ञान के प्रति सजग रहे, अध्ययनरत रहे।
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