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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2762
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- वाणिज्य की प्रचलित पाठ्य पुस्तकों में कौन-कौन से दोष पाये जाते हैं? इनके सुधार हेतु शिक्षा आयोग के विचार बताइए।

उत्तर-

पाठ्य-पुस्तकों में पाये जाने वाले दोष - वर्तमान में वाणिज्य की प्रचलित पाठ्य-पुस्तकों में निम्न दोष पाये जाते हैं-

(i) पाठ्य-पुस्तकों की भाषा व शैली में भी त्रुटि पाई जाती है।

(ii) पाठ्य-पुस्तकों में विषय-वस्तु तथा उनकी व्यवस्था कक्षा स्तर व पाठ्यक्रम के अनुरूप नहीं पाया जाता है।

(iii) पाठ्य-पुस्तकों में स्रोत संदर्भों की कमी पाई जाती है।

(iv) प्रचलित पाठ्य-पुस्तकों की बाहरी लिखावटें भी निम्न स्तर की हैं।

(v) पाठ्य-पुस्तकों में उचित ग्राफ, तालिका, चित्रों आदि का अभाव पाया जाता है।

(vi) वर्तमान पाठ्य-पुस्तकों में मुद्रण संबंधी त्रुटियाँ भी पाई जाती हैं।

(vii) प्रचलित पाठ्य-पुस्तकें कक्षा स्तर के न तो अनुरूप हैं और न ही वे प्रभावशाली शिक्षण यन्त्र का काम करती हैं।

पाठ्य-पुस्तकों में सुधार के लिए शिक्षा आयोग के विचार

पाठ्य-पुस्तकों में सुधार हेतु शिक्षा आयोग के सुझाव निम्नलिखित हैं-

(i) पुस्तक लेखन कार्य हेतु सभी संभव क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

(ii) पाठ्य-पुस्तकों का उत्पादन न लाभ व न हानि के आधार पर किया जाना चाहिए।

(iii) शिक्षकों को पाठ्य-पुस्तकें लिखने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

(iv) देश में विराजमान विद्वानों की मदद से NCERT द्वारा पाठ्य-पुस्तकों के प्रयत्नों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

(v) पाठ्य-पुस्तक लेखन को आकर्षक बनाने हेतु इस अभिकरण द्वारा निजी प्रकाशकों से अधिक पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए।

(vi) प्रत्येक पाठ्य-पुस्तक का कम से कम पाँच वर्षों में पूर्ण संशोधन करना कार्यनीति का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

पाठ्य पुस्तकों के सुधार हेतु कोठारी आयोग के सुझाव

कोठारी आयोग ने अनुभव किया है कि अपने विषय में विशेषज्ञों द्वारा लिखी तथा छपाई एवं चित्रकला के विशिष्ट गुणों से सुसज्जित पाठ्य-पुस्तक विद्यार्थियों की अभिरुचियों को अनुप्रेरित करने में बहुत सहायता देती है। अतः शिक्षा स्तर को ऊँचा करने के लिए अच्छी पुस्तकों के निर्माण के प्रभावशाली कार्यक्रम बनाने चाहिए। इस संदर्भ में आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं-

 (अ) राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम

(i) देश में सर्वोत्तम प्रतिभाओं को संगठित करना (Mobilisation of bestalents in the country) - स्कूल एवं विश्वविद्यालय के स्तर पर आवश्यक पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण के लिए देश की सर्वोत्तम प्रतिभाओं को संगठित करना अत्यंत आवश्यक है। स्कूल स्तर पर 'राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्' (N.C.E.R.T.) द्वारा अपनाए गए सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर पुस्तकों के उत्पादन से स्वीकृत राष्ट्रीय स्तर को व्यावहारिक रूप से कार्यान्वित करने में सुविधा होगी। इससे पुस्तकों के मूल्य कम करने में भी सहायता मिलेगी, पुस्तकों का स्तर भी ऊँचा होगा और राष्ट्रीय एकता के विकास में भी सहायता मिलेगी।

(ii) पाठ्य पुस्तक के लिए स्वायत्त संगठन - शिक्षा मंत्रालय को चाहिए कि वह सार्वजनिक क्षेत्र में एक स्वायत्त संस्था की स्थापना करे जो राष्ट्रीय स्तर पर पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण की व्यवस्था करे।

(iii) छोटी समितियों की स्थापना - विभिन्न कार्य-योजनाओं पर सविस्तार विचार करने के लिए शिक्षा मंत्रालय द्वारा छोटी समितियों की स्थापना करनी चाहिए।

(ब) प्रांतीय स्तर पर कार्यक्रम

पाठ्य-पुस्तकों में सुधार करने के लिए आयोग ने प्रांतीय स्तर पर निम्नलिखित कार्यक्रमों का सुझाव दिया है-

(i) प्रान्तीय स्तर पर विशेषज्ञ विभाग - प्रांतीय स्तर पर पाठ्य-पुस्तकों के उत्पादन के लिए विशेषज्ञ विभाग की स्थापना करके राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे प्रयासों को सहयोग प्रदान करना चाहिए।

(ii) प्रान्तीय शिक्षा विभाग - पाठ्य-पुस्तकों की तैयारी एवं मूल्यांकन प्रान्तीय शिक्षा विभाग के दायित्व में होना चाहिए, जहाँ संभव हो सके शिक्षा विभागों में अपने छापेखानों में पाठ्य-पुस्तक का उत्पादन करना चाहिए।

(iii) विद्यार्थियों के सहकारी स्टोर - पाठ्य-पुस्तकों के विक्रय तथा वितरण के लिए विद्यार्थियों के सहकारी स्टोर बनाए जाने चाहिए। शिक्षा विभागों द्वारा यह कार्य सीधे तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।

(iv) प्रान्तीय स्तर पर स्वायत्त संस्था - पाठ्य पुस्तकों एवं शिक्षण सहायक साधनों का उत्पादन किसी स्वायत्त संस्था के हाथों में देना चाहिए और इस संस्था को शिक्षा विभाग के निकटतम संपर्क में काम करना चाहिए।

(v) पाठ्य पुस्तकों में निरन्तर सुधार - एक ऐसी संस्था स्थापित की जानी चाहिए। जिसके द्वारा पाठ्य-पुस्तकों का निरन्तर सुधार एवं संशोधन होता रहे। पाठ्यक्रम में कोई परिवर्तन न होने पर पाठ्य-पुस्तकों में संशोधन की आवश्यकता बनी रहती है। उन्हें संमृद्ध करने के लिए भी उनमें संशोधन करना आवश्यक है।

(vi) पुस्तकों का बहुमुखी चुनाव - किसी कक्षा के लिए एक पुस्तक निर्धारित करना उपयोगी सिद्ध नहीं होता। प्रत्येक विषय में कम से कम दो या तीन पाठ्य-पुस्तकें निर्धारित की जानी चाहिए और विद्यार्थियों को बहुमुखी चुनाव का अवसर देना चाहिए।

(vii) पारिश्रमिक की उदार नीतियाँ - सरकार जब पुस्तकें लिखवाती है। उनका पारिश्रमिक इतना थोड़ा होता है कि योग्यतम व्यक्ति इस कार्य की ओर आकर्षित नहीं होते। यही कारण है कि निजी संस्थाओं की पुस्तकें सरकार द्वारा निर्मित पाठ्य-पुस्तकों से अच्छी होती हैं। इसलिए सरकार को पारिश्रमिक की उदार नीतियाँ बनानी चाहिए और सुयोग्य व्यक्तियों को इस कार्य की ओर आकर्षित करना चाहिए।

(viii) बिना लाभ हानि का आधार - राज्य द्वारा तैयार की गई पुस्तकों का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होना चाहिए। राज्य के केवल मात्र उद्देश्य पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण करना और उन्हें विद्यार्थियों तक पहुँचाना है। अतः राजकीय पाठ्य-पुस्तक उत्पादन का कार्य बिना लाभ-हानि पर आधारित होना चाहिए।

(ix) हस्तलिखित प्रतियों को स्वीकृति - शिक्षा विभाग को विभिन्न साधनों द्वारा हस्तलिखित प्रतियाँ आमंत्रित करनी चाहिए।उच्च स्तरीय कमेटी द्वारा इन प्रतियों का चुनाव करके उन्हें स्वीकृत किया जाना चाहिए।

(x) व्यावसायिक स्वीकृति - अध्यापकों को पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए। अच्छी पाठ्य-पुस्तकों को पर्याप्त मात्रा में व्यावसायिक स्वीकृति प्रदान करनी चाहिए।

(xi) अध्यापक मार्गदर्शिकाओं का निर्माण - पाठ्य पुस्तकों के पूरक के रूप में अध्यापक मार्गदर्शिकाओं का निर्माण होना चाहिए।

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