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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय 12 - वाणिज्य की पाठ्य-पुस्तक
(Text Book of Commerce)
प्रश्न- शिक्षण में पाठ्य-पुस्तकों का क्या महत्त्व है? इसका प्रयोग किस प्रकार तथा किस सीमा तक करना चाहिए।
अथवा
अध्यापन-अध्ययन प्रक्रिया में पाठ्य पुस्तकों के स्थान और महत्त्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
भारतीय परिस्थितियों में पाठ्य पुस्तक की क्या आवश्यकता है?
अथवा
वणिज्य की पाठ्य पुस्तक की आवश्यकता की चर्चा कीजिये।
अथवा
वाणिज्य शास्त्र में पाठ्य पुस्तक की क्या महत्व है?
उत्तर-
पुरातन काल में जब मुद्रण कला का विकास नहीं हुआ था, सभी विषयों की शिक्षा मौखिक रूप से ही प्रदान की जाती थी। मुद्रण कला के साथ-साथ ज्ञान को पुस्तकों के रूप में संगठित करने के प्रयत्न हुए।शिक्षा के इतिहास में एक ऐसा समय भी आया कि इन पुस्तकों का अध्ययन ही शिक्षा समझा जाता था।विकास के पथ पर हम बढ़ते ही रहे, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हमने बहुत अधिक उन्नति की और आज ऐसी स्थिति में हैं जब हम आपसी शिक्षा को बड़े व्यवस्थित ढंग से चलाते हैं।आज उसके उद्देश्य, पाठ्यचर्या एवं शिक्षण विधियाँ सभी कुछ निश्चित हैं। आज शिक्षा को कई स्तरों, शिशु, प्राथमिक, निम्न माध्यमिक, माध्यमिक एवं विश्वविद्यालयों में बाँटा गया है और सभी स्तरों के लिए भिन्न-भिन्न पाठ्यचर्या निश्चित की गई है। प्रत्येक स्तर की पाठ्यचर्या के आधार पर हमने उस स्तर का पाठ्य-विवरण तैयार किया है। भिन्न-भिन्न स्तर के लिए भिन्न-भिन्न विषयों की पाठ्यचर्या पर अब भिन्न-भिन्न पुस्तकों का निर्माण हुआ है। इन पुस्तकों को हम पाठ्य-पुस्तकें कहते हैं। इस प्रकार पाठ्य-पुस्तकें वे पाठ्य हैं जो किसी स्तर के बच्चों के पाठ्यचर्यानुसार तैयार की जाती हैं। इनमें वे तथ्य एवं सूचनाएँ संगठित होती हैं जिनका ज्ञान उस स्तर के छात्रों को देना चाहते हैं।
सच पूछिए तो आज की पूरी शिक्षा पाठ्य-पुस्तकों पर आधारित है। आज यह शिक्षा के मुख्य साधन के रूप में प्रयोग की जाती है। पाठ्य-पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें भी शिक्षा के क्षेत्र में सहायक होती हैं। परन्तु यहाँ हम केवल पाठ्य पुस्तकों पर ही विचार कर रहे हैं।
वाणिज्य पाठ्य-पुस्तकों की उपयोगिता / आवश्यकता
पाठ्य-पुस्तकें शिक्षक एवं छात्रों दोनों के लिए उपयोगी हैं। पाठ्य-पुस्तकों से सामान्य रूप से निम्नलिखित लाभ होते हैं-
(i) शिक्षा प्रक्रिया का व्यवस्थित होना - पाठ्य पुस्तकों की सहायता से शिक्षा की प्रक्रिया बड़े व्यवस्थित ढंग से चलती है। इनसे कक्षा - विशेष की पाठ्यचर्या स्पष्ट हो जाती है तथा अध्यापक अपने वर्ष भर की कार्य की योजना बनाने में समर्थ होते हैं। उन्हें बहकने का अवसर नहीं रहता।
(ii) बच्चों को यह पता रहता है कि उन्हें क्या पढ़ना है और कितना पढ़ना है। उनके भटकने की गुंजाइश नहीं रहती।
(iii) अध्यापक को पाठ की तैयारी करने में सहायता प्रदान करना - पाठ्य-पुस्तकें अध्यापक को पाठ की तैयारी करने एवं बच्चों को पाठ पढ़ने के लिए तैयार होने, दोनों में सहायक होती हैं।
(iv) ज्ञान विस्फोट - आधुनिक युग ज्ञान के विस्फोट का युग है। आज के बालक को बहुत कुछ सीखना है और उसका मूल्यांकन करना है। उसने अपने अन्दर बहुत से दृष्टिकोणों को अपनाना है तथा जीवन में बहुत से निर्णय लेने हैं। ये सारी क्षमताएँ केवल प्रत्यक्ष अनुभव पर निर्भर रहकर प्राप्त नहीं की जा सकतीं। किसी ने सच ही कहा है कि आधुनिक सभ्यता न सुधरने वाली पुस्तकों की सभ्यता है।इसलिए पुस्तकों का सामान्य तौर पर और पाठ्य-पुस्तकों का विशेष तौर पर बड़ा महत्त्व है।
(v) ज्ञान को इकाइयों में बाँटने के लिए - आज के युग में हमें पूर्ण ज्ञान को इकाइयों में बाँटने की बहुत आवश्यकता है। पाठ्य पुस्तक से शिक्षक को यह लाभ होता है कि उसे यह देखना तथा समझना सरल हो जाता है कि किस-किस पाठ में दिया गया ज्ञान समान है या एक-दूसरे पर आधारित है। इस आधार पर शिक्षक समस्त ज्ञान को इकाइयों में बाँट सकता है तथा ऐसा करने के पश्चात् ज्ञान प्रदान कर सकता है जिसे छात्र सरलता से ग्रहण कर पाते हैं।
(vi) शिक्षण में एकरूपता लाने के लिए - राष्ट्रीय विकास के लिए शिक्षा में एकरूपता आवश्यक है।परन्तु इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि सभी विद्यार्थियों का परिवेश एक जैसा नहीं होता तथा उनके स्तर भी भिन्न होते हैं।यही बात अध्यापकों के बारे में भी कही जा सकती है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर नयी शिक्षा नीति में एकरूपता पर बल दिया गया है। पाठ्य-पुस्तकें ही एक ऐसा साधन हैं जो शिक्षा में एकरूपता ला सकती हैं।
(vii) मितव्ययता - पाठ्य-पुस्तकें कक्षा शिक्षण का प्रमुख साधन होती हैं। इनकी सहायता से एक साथ अनेक बच्चों को पढ़ाना सम्भव होता है।
(viii) व्यष्टि-शिक्षण - व्यष्टि शिक्षण में भी पाठ्य पुस्तकों का अपना महत्त्व होता है। डाल्टन आदि प्रणालियों में बच्चे पुस्तकों का अध्ययन करके अपने ज्ञान को स्पष्ट एवं निश्चित करते हैं। अध्यापक तो केवल पथ-प्रदर्शक के रूप में कार्य करते हैं।
(ix) शिक्षक की पूरक - पाठ्य-पुस्तकें शिक्षक की पूरक होती हैं। कक्षा में जो कुछ पढ़ाया जाता है, यह आवश्यक नहीं कि बच्चे उसे पूर्ण रूप से ग्रहण कर लें। उस स्थिति में पुस्तकें बच्चों की सहायता करती हैं। वे घर में इन पुस्तकों का अध्ययन कर विषय का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करते हैं।
(x) पाठ को दोहराने के लिए - ये पुस्तकें पाठ को दोहराने एवं गृह कार्य करने में भी बच्चों की सहायता करती हैं।
(xi) स्वाध्याय की आदतों का निर्माण - पाठ्य-पुस्तकों के अध्ययन से बच्चों में स्वाध्याय की आदतों का निर्माण होता है।
(xii) विद्वानों तथा शिक्षकों के विचारों को प्रदान करना - पाठ्य-पुस्तकें छात्रों तथा सामान्य अध्यापकों को विद्वानों तथा उच्चकोटि के अध्यापकों के विचारों तथा अनुभवों को प्रदान करती हैं। वे इन अनुभवों से लाभ उठाने में समर्थ होते हैं।
पाठ्यक्रम के निर्माता प्रायः हर कक्षा के लिए बहुत बोझल पाठ्यक्रम निर्धारित कर देते हैं। विद्यालय के मुख्याध्यापक अथवा शिक्षा अधिकारियों की ओर से अध्यापक को यह निर्देश होता है कि वे समय से पहले पाठ्यक्रम को कक्षा में पूर्ण कर लें।इसलिए अध्यापक को तो केवल पाठ्यक्रम पूरा करने में ही चिन्ता होती है। क्योंकि इस पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए उसके पास कुछ निश्चित कालांश होते हैं, इसलिए वह यह नहीं देखता कि वह कक्षा के समक्ष प्रभावशाली ढंग से अध्यापन करवा भी रहा है या नहीं। उसे तो केवल एक ही बात की चिन्ता होती है कि चाहे वह कैसे भी पढ़ाये, पाठ्यक्रम को पूरा कर दे। इसलिए इस प्रभावहीन अध्यापन का उपचार पाठ्य पुस्तक ही है।
भारत एक निर्धन देश है जहाँ अन्य अध्यापन सामग्री के उपलब्ध होने की बात सोची भी नहीं जा सकती। इसलिए भी पाठ्य पुस्तक की आवश्यकता बढ़ जाती है।
(xx ) माता-पिता की निरक्षरता - पाठ्य पुस्तक एक प्रकार से घर से निरक्षरता के विरुद्ध एक बीमा है। भारत में साक्षरता बहुत कम है। सरकार के पूरे यत्नों के बावजूद भी 40% अध्यापक भी केवल दिन के समय ही बच्चों के पास होता है। इसी प्रकार वर्ष में बहुत से दिन के समय ही वह बच्चों के पास होता है। इसी प्रकार वर्ष में बहुत से दिन तो अवकाश के होते हैं। ऐसे अवसरों पर पाठ्य-पुस्तक बच्चों के काम आती है।
(xxi) अभ्यास के लिए - ज्ञान तभी पूर्ण होता है जब उसे प्रयुक्त किया जाए तथा उसे प्रयोग करने के लिए आवश्यक है कि उसे आत्मसात् ( Assimilate) किया जाए। ऐसा केवल सतत् अभ्यास से ही सम्भव हो सकता है। बड़ी कक्षाओं या श्रेणी में किया गया अध्ययन के साथ ही अध्ययन क्रम का न तो अन्त होता है और न ही होना चाहिए। ज्ञान की प्राप्ति उस समय तक व्यर्थ है, जब तक उसे याद रखकर समय-समय पर उसका प्रयोग न किया जाए। ऐसा तभी सम्भव है जब श्रेणी में की गई पढ़ाई के नोट बनाए जाएँ या रिकार्ड रखा जाए। किन्तु सामान्य विद्यार्थी में इतनी योग्यता नहीं होती कि वह एक ही समय में अध्यापक द्वारा बताई जाने वाली बातों को सुन, समझ व नोट कर सकें। अतः बालकों के अभ्यास के लिए अध्यापक को प्रश्न व समस्याएँ आदि देनी पड़ती हैं। अच्छा अध्यापक सदा अपने शिक्षण-कार्यक्रम को मौलिक ढंग से तैयार करता है और सामग्री को प्रस्तुत करने का उसका ढंग भी मौलिक होता है।किन्तु हर अध्यापक में न तो इतनी योग्यता होती है और न हमारी शिक्षा-पद्धति उन्हें इतनी स्वतन्त्रता प्रदान करती है कि वे अपनी मौलिकता को दर्शा सकें। यही कारण है कि वाणिज्य जैसे विषय को पढ़ाने के लिए अच्छी पाठ्य-पुस्तक की बड़ी आवश्यकता है।
(xxii) वाणिज्य एक नया विषय - लवाणिज्य एक नवीन विषय है। इस विषय पर अभी पर्याप्त संख्या में अच्छी पाठ्य-पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप आरम्भिक अवस्था में या तो, भूगोल, नागरिक शास्त्र तथा इतिहास पर लिखी भिन्न-भिन्न पुस्तकें पढ़ी जा रही हैं या ऐसी मोटी-मोटी पुस्तकों की सहायता ली जा रही है, जिनमें वाणिज्य, भूगोल तथा नागरिकशास्त्र के विषयों को एकत्रित कर दिया गया है। किन्तु ये पुस्तकें व्यर्थ हैं, क्योंकि ये वाणिज्य की सच्ची अवधारणा के अनुरूप नहीं लिखी गई हैं। इन पुस्तकों में लेखकों ने यह बात भली प्रकार से समझा ही नहीं कि वाणिज्य तो एक ऐसा समय तथा एकीकृत रूप है जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को उनके वातावरण में अर्थात् परिवार, समुदाय, राज्य तथा राष्ट्र में भली प्रकार रहना सीखना है ताकि वे समाज के वर्तमान स्वरूप को समझ सकें तथा वर्तमान युग की परिवर्तनकारी शक्तियों तथा आन्दोलनों की बुद्धिमत्तापूर्वक व्याख्या कर सके। इस दृष्टि से देखा जाए तो आज के वाणिज्य के शिक्षक अन्धकार में ही भटक रहे हैं
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