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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- कक्षा 11 और 12 के पुस्तपालन और लेखाकर्म का उल्लेख करते हुए, वाणिज्य शास्त्र के पाठ्यक्रम के दोष बताइए।
अथवा
माध्यमिक स्तर के वर्तमान वाणिज्य पाठ्यक्रम का आलोचनात्मक मूल्याँकन कीजिए।
अथवा
उच्च माध्यमिक स्तर पर वाणिज्य के वर्तमानं पाठयक्रम का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
अथवा
माध्यमिक स्तर के वाणिज्य पाठ्यक्रम की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर-
कक्षा 11 और 12
प्रथम प्रश्न-पत्र
दोहरा लेखा प्रणाली के सिद्धान्त, प्रारम्भिक लेखे की पुस्तकें और खाताबही, विनिमय पत्रों का प्रयोग - चेक, हुण्डी, रुक्का, बैंक समाधान विवरण, व्यापार, लाभ और हानि खाता, चिट्ठा साधारण समायोजनाओं के साथ। साझा व्यापार, भेजे हुए माल सम्बन्धी लेखे, संयुक्त साहस सम्बन्धी लेखे।चालू खाता और मध्यम भुगतान तिथि।
द्वितीय प्रश्न-पत्र
कैपिटल और रेवेन्यू, ह्रास रिजर्व और घटते हुए फण्ड, आय और व्यय के खाते, प्राप्त और भुगतान सम्बन्धी खाते।इकहरा लेखा प्रणाली। कम्पनी खाते, इन्वेस्टमेण्ट खाते, भारतीय बहीखाता प्रणाली जिसमें साझा व्यापार सम्मिलित है।
प्रथम प्रश्न-पत्र
व्यापार की स्थापना, व्यापार में सफलता के लिए आवश्यक तत्त्व, साधारण व्यापार, फाइलिंग, बहुप्रतिलिपिकरण और अन्य श्रम बचाने वाले यन्त्र, सन्देश भेजने के साधन, डाकखाने सम्बन्धी जानकारी, बैंक और चेक, विनिमय-पत्र प्रोमिजरी नोट्स, हुण्डी, व्यापारिक शब्द और संक्षिप्त शब्द, मुख्य व्यापारिक दस्तावेजों को तैयार करना।
द्वितीय प्रश्न-पत्र
सफल व्यापारी के लिए आवश्यक तत्त्व, व्यापार की स्थापना के लिए आवश्यक बातें।व्यापारिक घरों के प्रकार, एकाकी व्यापार, साझेदारी और मिश्रित पूँजी वाली कम्पनी। आयात और निर्यात व्यापार।अंग्रेजी में विदेशी बीजक तैयार करना। अंग्रेजी में बाजार समाचार।
प्रथम प्रश्न-पत्र
मुद्रा - परिभाषा और कार्य मुद्रा का मूल्य, मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त।मान की समस्या, स्वर्ण और चाँदी मान, अनेक और द्विधातुमान, स्वर्ण चलन, स्वर्ण विनिमय मान, स्वर्ण धातु और स्वर्णमान।अच्छे मान की विशेषताएँ, भारत में मुद्रामान।
पत्र-मुद्रा - पत्र मुद्रा के गुण और अवगुण, पत्र, मुद्रा के प्रकार, स्टेट और बैंक द्वारा नोट छापना, सिंगिल और मल्टीपल पत्र मुद्रा के छापने का ढंग, अधिक और कम नोटों का छापना। पत्र मुद्रा की विशेषताएँ।भारत में पत्र मुद्रा चलन।
साख - परिभाषा, प्रारम्भ और विकास, साख के प्रकार, साख के विकास के लिए अनुकूल दशाएँ।साख के विकास के लाभ।
द्वितीय प्रश्न-पत्र
बैंकिंग – परिभाषा, आरम्भ और विकास। बैंकिंग व्यापार की व्यवस्था। बैंक के कार्य-जमा ऋण और अन्य विविध सेवाएँ चल सावधि खाते और सेविंग्ज बैंक खाते।चेक, विनिमय पत्र, रुक्का और हुण्डी, चेक और विनिमय पत्र का बैंक द्वारा किलिएरेन्स, बैंकर के कैश रिजर्व, ऋण सिक्यूरिटी का ऋण लेने के लिए प्रयोग।बैंक की बैलेन्स शीट, बैंक का असफल होना, बैंकों का जोखों का समय।भारत में बैंकिंग विपत्ति।
भारतीय बैंकिंग - भारत में बैंकिंग विकास।कृषि, व्यापारिक और औद्योगिक फाइनेन्स रुपया उधार देने वाले, देशी साहूकार, सहकारी संस्थों। ऋण अफसर निदिश, चिटफण्ड, सरकारी तकाबी ऋण, भूमि-बन्धक बैंक, औद्योगिक बैंक, भारतीय मिश्रित पूँजी के बैंक, विदेशी विनिमय बैंक। स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया। रिजर्व बैंक आफ इण्डिया पोस्ट ऑफिस की बैंक सम्बन्धी सेवाएँ।
भारतीय मुद्रा बाजार - इसके अंग, दोष और निदान। भारतीय बैंकिंग अधिनियम।
अर्थशास्त्र
प्रारम्भिक अर्थशास्त्र की विषय सामग्री, क्षेत्र।अर्थशास्त्र का अन्य विज्ञानों से संम्बन्ध।आर्थिक जीवन का विकास। आर्थिक नियम ।
उपभोग - उपयोगिता, सीमान्त और कुल उपयोगिता - उपयोगिता ह्रास नियम।समसीमान्त उपयोगिता।माँग का नियम, माँग की लोच।आर्थिक क्रिया के पश्चात् सन्तोष।आवश्यकताएँ और उनका वर्गीकरण। पारिवारिक बजट और ऐंजिल का नियम।उपभोक्ता की बचत।बचत और व्यय का सम्बन्ध।व्यय का सामाजिक पहलू।
उत्पत्ति - आवश्यकताओं और उत्पत्ति के सम्बन्ध, उत्पत्ति के साधन -भूमि, श्रम, पूँजी, प्रबन्ध और जोखिम।श्रम विभाजन, उद्योगों का स्थानीयकरण । मशीनें - बड़े पैमाने पर उत्पादन।पूँजी की व्यवस्था करना।
विनिमय - वस्तु विनिमय प्रथा, क्रय और विक्रय।धातु के पत्र मुद्रा।माँग और पूर्ति वक्र रेखाएँ, पूर्ण और अपूर्ण प्रतियोगिता में माँग और पूर्ति का सन्तुलन। भारतीय मुद्रा - मान।
सहयोग - सहयोग के सिद्धान्त, सहकारी सोसाइटियों के प्रकार, केन्द्रीय सहकारी प्रान्तीय सहकारी बैंक।
वितरण - लगान, ब्याज, मजदूरी तथा लाभ।
वाणिज्यशास्त्र के पाठ्यक्रम के दोष
पिछले पृष्ठों में जूनियर हाईस्कूल, हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट कक्षाओं का वाणिज्यशास्त्र का पाठ्यक्रम दिया गया है। अब हम इसके दोषों पर एक दृष्टि डालेंगे; यथा-
(i) यह पाठ्यक्रम पुस्तकीय है। इसमें व्यावहारिकता की कमी है। पुस्तकीय ज्ञान पर अधिक बल दिया गया है। बी. कॉम. और एम.कॉम. करने पर भी छात्र एकाउण्टेण्ट के पद पर कार्य करने में असमर्थ रहते हैं। वे कुशल व्यापारी भी नहीं बन पाते हैं।
(ii) वाणिज्य के पाठ्यक्रम में उपविषयों की भरमार है। इसकी पाठ्य वस्तु महत्त्वपूर्ण नहीं है। कुछ ऐसी सामग्री का चयन किया गया है, जो छात्र के जीवन में कुछ भी महत्त्व नहीं रखती।
(iii) इसमें विविधता और लोच की कमी है। यह संकुचित विचारधारा पर आधारित है।
(iv) वाणिज्यशास्त्र एक प्रयोगात्मक विषय है, परन्तु इसके पाठ्यक्रम में प्रयोगात्मक क्रियाओं का सर्वथा अभाव है।
(v) इसमें छात्रों की विभिन्न अवस्थाओं की आवश्यकताओं पर बल नहीं दिया गया है।
(vi) वर्तमान वाणिज्य शिक्षा का पाठ्यक्रम बेकारी बढ़ाने में सहायक है। यह देश के औद्योगिक विकास में सहायक नहीं है।
(vii) पाठ्यक्रम वास्तविकता से परे है। बालक इसके द्वारा निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने में कठिनाई का अनुभव करता है।
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