लोगों की राय

बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण

बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2762
आईएसबीएन :0

Like this Hindi book 0

5 पाठक हैं

बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- वाणिज्य शिक्षण में पाठ्यचर्या या पाठ्यक्रम के आधार का विवेचन कीजिए।

उत्तर-

पाठ्यचर्या के आधारों को विद्यालयों द्वारा अपने छात्रों के लिए प्रस्तुत अधिगमानुभवों की प्रकृति, प्रकार, मात्रा तथा गुणवत्तात्मकता को प्रभावित करने वाले मूल्यों, परम्पराओं तथा शक्तियों के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है। पाठ्यचर्या के आयोजक को अपने समाज की प्रकृति, उसके स्थायी मूल्यों, उसके परिवर्तनों के क्षेत्रों, व्यक्ति की प्रकृति तथा सामाजिक विरासत ऐसे आधार हैं जिनके आधार पर निम्न आधारों को जन्म मिला है-

(क) दार्शनिक आधार - हेनरी टी. जॉनसन के अनुसार-  दर्शनशास्त्र जीवन की मूलभूत समस्याओं के उत्तर- प्राप्त करने तथा मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए अनिवार्य है। इस शास्त्र से जीवन-बोध तथा जीवन-मूल्यों का अर्थ समझा जा सकता है। दर्शन के अभाव में जीवन को समझा नहीं जा सकता है। साथ ही दर्शन के अभाव में पाठ्यचर्या, जोकि जीवन से सम्बन्धित है, निष्प्राण हो जाती है। रस्क महोदय का कथन है कि “दर्शन पर पाठ्यचर्या का संगठन जितना आधारित है उतना शिक्षा का कोई अन्य पक्ष नहीं है।" प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा का पाठ्यचर्या पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। आदर्शवादी दर्शन कतिपय शाश्वत् मूल्यों में आस्था रखता है और मानव को अपना जीवन उनकी प्राप्ति के लिए समर्पित कर देने का आह्वान करता है।

यथार्थवादी दर्शन का उदय आदर्शवाद की प्रतिक्रियास्वरूप हुआ था।यथार्थवाद भौतिक तथा प्रत्यक्ष जगत को वास्तविक मानता है। वे मस्तिष्क को पदार्थ का ही अनिवार्य अंग मानते हैं। यथार्थवादी विचारधारा के अनुसार-शिक्षा का उद्देश्य भौतिक व्यवस्था को समझने तथा उसके साथ समायोजन स्थापित करने में सहायता देना है। इस कारण यथार्थवादी पाठ्यचर्या में उन विषयों एवं क्रियाओं पर बल दिया जाता है जो बालक को वास्तविक जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से परिचित करा सकें।

प्रकृतिवादी दर्शन बालक की पूर्ण स्वतन्त्रता पर बल देता है। इस कारण प्रकृतिवादी पाठ्यचर्या में ऐसे अधिगमानुभवों पर बल दिया जाता है जो व्यावहारिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने में सहायक सिद्ध हों। अतः बालक के स्वाभाविक विकास नामक उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में खेलकूद, व्यायाम, भ्रमण, प्रकृति निरीक्षण, भूगोल, हस्तकला, विज्ञान आदि को स्थान प्रदान किया जाता है।

प्रयोजनवादी विचारधारा शाश्वत् सत्य में आस्था नहीं रखती वरन् यह विचारधारा सत्य को परिवर्तनशील मानती है। प्रयोजनवादी पाठ्यचर्या को ज्ञान का ऐसा पुंज नहीं मानते जिसे आत्मसात् करना प्रत्येक छात्र के लिए अनिवार्य है। प्रयोजनवादी विचारधारा के अनुसार-पाठ्यचर्या छात्रों की रुचि पर आधारित होती है। प्रयोजनवादी पाठ्यचर्या में पाठ्य सामग्री का कोई स्थान नहीं है। पाठ्य सामग्री का उपयोग छात्रों की आवश्यकताओं तथा रुचियों से सम्बद्ध करके किया जाता है। इस विचारधारा की पाठ्यचर्या में सामाजिक कार्यों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाता है।

(ख) मनोवैज्ञानिक आधार - आधुनिक मान्यता के अनुसार-शिक्षा का लक्ष्य बालक को मात्र ज्ञान देना नहीं है वरन् उसके व्यवहार में परिवर्तन लाकर उसका सर्वांगीण विकास करना है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए मात्र कक्षा - शिक्षक ही नहीं वरन् पाठ्यचर्या निर्माता, समाज, प्रशासक आदि भी उत्तर-दायी हैं। पाठ्यचर्या निर्माता को बालक की प्रकृति उसके विकास के क्रमिक चरणों के अनुरूप उसकी आवश्यकताओं, क्षमताओं, अभियोग्यताओं, अनुभवों, अभिरुचियों, आकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में आने वाली अन्य प्रवृत्तियों को ध्यान में रखना परमावश्यक है। साथ ही उसे पाठ्यचर्या को उनके अधिकाधिक अनुकूल बनाने का प्रयास करना भी आवश्यक है। बालक की वैयक्तिक प्रकृति के साथ ही पाठ्यचर्या निर्माता को अधिगम परिस्थितियों का भी ज्ञान रखना आवश्यक है। इन्हीं को सरल रूप में पाठ्यचर्या के मनोवैज्ञानिक आधार की संज्ञा दी जाती है। हैरेल्ड टी. जॉनसन के अनुसार-  पाठ्यचर्या के मनोवैज्ञानिक आधार मनोविज्ञान के वे पक्ष हैं जो सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। वे पाठ्यचर्या निर्माता को बालक या छात्र के व्यवहार के सम्बन्ध में बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने में सहयता प्रदान करते हैं।

पाठ्यचर्या निर्माता को छात्रों के विषय में जानकारी क्यों प्राप्त करनी चाहिए? इसके उत्तर- में निम्नलिखित तथ्यों को प्रस्तुत किया जा सकता है-

(i) लोकतन्त्र व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर आधारित है। लोकतन्त्र में व्यक्ति को अनन्त महत्त्व का स्वीकार किया जाता है। अतः लोकतन्त्र में शिक्षा का लक्ष्य प्रत्येक व्यक्ति के विकास के अधिकतम अवसर उपलब्ध कराना है। इस कारण शिक्षक, पाठ्यक्रम निर्माता, प्रशासक आदि को व्यक्ति की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है।

(ii) कोई व्यक्ति तभी वास्तविक रूप में शिक्षित माना जा सकता है जब उसकी विशिष्ट क्षमताओं एवं प्रतिभाओं का पूर्ण विकास हो जाय।

(iii) किसी समाज एवं राष्ट्र का विकास एवं समृद्धि भी वास्तव में उसके प्रत्येक सदस्य की क्षमताओं के अधिकतम विकास पर निर्भर करती है।

(iv) व्यक्ति की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं, दृष्टिकोण, अभिरुचियों आदि की किसी शैक्षिक कार्यक्रम के लिए उपयुक्त अधिगमानुभवों के चयन का आधार प्रदान करती है।

(ग) सांस्कृतिक आधार - संस्कृति किसी समाज की सम्पूर्ण जीवन शैली से सम्बन्धित है। इसमें समाज की भाषा, रीति-रिवाज, खान-पान, वेश-भूषा, सामाजिक एवं व्यावसायिक स्तर, लैंगिक व्यवहार, मनोरंजन, कला, ज्ञान-विज्ञान, संगीत, धार्मिक उत्सव, आस्थाओं, विश्वास, मूल्य आदि सम्मिलित रहते हैं। मानव ने स्वयं पर तथा प्रकृति पर नियन्त्रण प्राप्त करके जिस शक्ति को अर्जित किया है, वह शक्ति भी इसमें समाहित होती है। वस्तुतः संस्कृति मूलतः मानव के किसी विशेष ढंग से रहने की अभिव्यक्ति ही है। यह हमारे जीवन का उसी भाँति अंग बन जाती है जिस प्रकार वायु का हमारे जीवन से एकाकार हो जाता है। दूसरे शब्दों में, हम श्वास के माध्यम से वायु को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लेते हैं।उसे वस्तुनिष्ठ ढंग से नहीं देखा जा सकता है। इसकी तो प्रत्येक क्षण पर अनुभूति की जाती है। पाठ्यचर्या संस्कृति से अनेक बातें ग्रहण करती है। शिक्षा के उद्देश्य संस्कृति के मूलभूत सिद्धान्तों, मान्यताओं, मूल्यों आदि को अभिव्यक्त करते हैं। शिक्षा की पाठ्य वस्तु में समाज के कौशलों, विचारों तथा मूल्यों का समावेश होता है।

(घ) सामाजिक आधार - मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह जन्म से मृत्युपर्यन्त समाज में रहता है। दूसरे शब्दों में, उसका जन्म समाज में होता है और उसी में विकास, उन्नति, समृद्धि, अवनति तथा मृत्यु होती है। उसके जीवन का कोई भी पक्ष समाज के प्रभाव से अछूता नहीं रह पाता है। इस दृष्टि से शिक्षा का लक्ष्य बालक का समाजीकरण करना निर्धारित किया गया। कुछ विद्वान शिक्षा को समाजीकरण की प्रक्रिया मानते हैं। अतः पाठ्यचर्या का विकास सामाजिक पृष्ठभूमि तथा आकांक्षाओं एवं आवश्यकताओं के बीच होता है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक संस्थाओं तथा सामाजिक शक्तियों का शिक्षा संस्थाओं पर पड़ने वाला प्रभाव पाठ्यचर्या का सामाजिक आधार कहलाता है। वस्तुतः पाठ्यचर्या एक सामाजिक प्रणाली है जिसे समाजशास्त्र के माध्यम से ही समझा जा सकता है। समाजशास्त्री हमें इस बात का ज्ञान कराता है कि पाठ्यचर्या वह उपकरण है जिसके द्वारा शैक्षिक संस्था सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करती है। अतः पाठ्यचर्या नियोजकों को समाज के निम्नलिखित प्रमुख पक्षों पर ध्यान देना आवश्यक है-

(i) मूलभूत, विश्वास, आस्था एवं मूल्य।
(ii) परम्परों, रीति-रिवाज एवं आकांक्षा।

(iii) नागरिक, राजनीतिक, राष्ट्रीय, व्यावसायिक संगठनों तथा शैक्षिक नेताओं के दृष्टिकोण ।

(iv) सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक तथा प्रौद्योगिक परिस्थितियाँ।

(v) समाज का प्रचलित जीवन-दर्शन।(vi) छात्रों की पारिवारिक पृष्ठभूमि।

(vii) सांस्कृतिक परिवर्तन का मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र।

(viii) विद्यालय की स्थिति-छात्र संख्या, शिक्षक वर्ग, भौतिक परिस्थितियाँ, प्रशासकीय ढाँचा आदि।

(ङ) ऐतिहासिक आधार - इतिहास अतीतकालीन बातों का अभिलेख होने के कारण पाठ्यचर्या निर्माताओं को ऐसी सामग्री उपलब्ध कराता है जिसकी सहायता से जहाँ एक ओर उसे (पाठ्यचर्या निर्माता) भविष्य के लिए अच्छे और स्पष्ट उदाहरण मिलते हैं। दूसरी ओर वह भूलों की आवृत्ति से बच जाता है। इस आधार को अपनाकर वह समय, साधन तथा शक्ति का अपव्यय होने से बचा लेता है।

 

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book