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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- भाषा-शिक्षण की दृष्टि से कौन-कौन सी सहगामी क्रियाएँ उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं? विस्तारपूर्वक स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तावना - सहगामी क्रियाएँ उसी समय से प्रचलित हैं, जब भारतवर्ष में छात्र गुरुकुलों में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। इनका पृथक् नामकरण हमारे यहाँ नहीं हुआ, क्योंकि हम प्रारम्भ से ही इन्हें शिक्षा का अंग समझते थे। पाश्चात्य देशों में पहले ये शिक्षा से भिन्न समझी जाती थीं, इसलिए उन्हें पाठान्तर क्रियाएँ कहा गया। परन्तु बाद में देखा गया कि इनसे बालक-बालिकाओं में 'स्व' का निर्माण होता है। जीवन के बहुत-से क्षेत्र ऐसे हैं, जिन्हें पाठ्यक्रम के भिन्न-भिन्न विषय स्पर्श नहीं कर पाते, परन्तु फिर भी उनका प्रभाव छात्र - छात्राओं पर पड़ता है। इसलिए उन्हें 'सहगामी क्रियाएँ' कहा जाने लगा।
सहगामी क्रियाओं का प्रयोजन
सहगामी क्रियाओं द्वार विद्यार्थियों की निम्नलिखित आवश्यकताओं की पूर्ति होती है-
(क) सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति - इन क्रियाओं के द्वारा विद्यार्थी सीखते हैं, कि-
(i) एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच में तथा
(ii) एक व्यक्ति और समुदाय के मध्य में किस प्रकार का सम्बन्ध होना चाहिए।
(ख) मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति - सहगामी क्रियाओं द्वारा बालकों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है, उदाहरणस्वरूप, किशोरावस्था के बालकों में समूह-प्रियता की प्रवृत्ति पाई जाती है, विद्यालय के अधिकारी चाहें या न चाहें, वहाँ भिन्न-भिन्न समूह बनते रहेंगे। सहगामी क्रियाओं द्वारा हम बालकों की इस प्रवृत्ति का उन्नयन कर सकते हैं।
(ग) नैतिक आवश्यकताओं की पूर्ति - इन क्रियाओं के द्वारा बालक-बालिकाओं में सच्चाई, न्यायप्रियता तथा ईमानदारी जैसे गुणों का विकास कर सकते हैं। किसी ने खूब कहा है, कि एक छटाँक नैतिक अनुभव, एक सेर नैजिक प्रशिक्षण से बढ़कर है।
(घ) रुचियों का विकास - पाठशालाओं में आयोजित की जाने वाली सहगामी क्रियाओं से इस बात का पता चल जाता है कि बालकों की रुचियाँ क्या-क्या हैं? वे अपनी रुचि से कार्यों में भाग लेकर, अपनी रुचियों को विकसित कर सकते हैं।
(ङ) अवकाश के समय का सदुपयोग - छात्र जिन सहयोगी क्रियाओं में भाग लेते हैं, आगे जाकर भावी जीवन में अवकाश के समय उनका प्रयोग भलीभाँति कर सकते हैं। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास सभी दिशाओं में होता है।
सहगामी क्रियाओं का वर्गीकरण - पाठशाला में आयोजित की जाने वाली सहयोगी क्रियाओं की कोई सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, पाठशालाओं के साधनों तथा स्थानीय परिस्थितियों को सामने रखकर ही इनकी व्यवस्था की जाती है। कुछ प्रमुख क्रियाओं का उल्लेख निम्नलिखित है-
भाषा की दृष्टि से उपयोगी क्रियाएँ - यहाँ कुछ ऐसी सहगामी क्रियाओं का वर्णन किया जा रहा है, जिनका उपयोग भाषा शिक्षण में किया जाता है
(1) वाद-विवाद प्रतियोगिता - वाद-विवाद प्रतियोगिता में छात्र - छात्राओं को अपने विचार तथा तर्क - शक्ति का उपयोग करना पड़ता है। उन्हें कम समय में अपने विचारों को प्रस्तुत करना होता है, और उन्हें प्रमाणित करने के लिये उदाहरण आदि प्रस्तुत करने होते हैं। वाद-विवाद प्रतियोगिता से विद्यार्थियों को निम्नलिखित लाभ होते हैं-
(क) छात्र आत्मविश्वास के साथ अपने विचारों को प्रस्तुत कर सकते हैं।
(ख) निर्धारित विषय के सम्बन्ध में वे पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाएँ आदि पढ़ते हैं, इससे उनके ज्ञान में अभिवृद्धि होती है तथा मस्तिष्क सक्रिय होता है।
(ग) नए विषयों को प्रस्तुत करने के लिये नए शब्दों के प्रयोग करने से उनका शब्द भण्डार बढ़ता
(घ) प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहने पर उनका भाषा पर पूर्ण अधिकार हो जाता है।
(ङ) छात्र अपने उच्चारण को शुद्ध बनाने का प्रयास करते हैं। इससे उन्हें शुद्ध बोलने की आदत पड़ जाती है।
(च) निरन्तर मंच पर बोलते रहने से उनके बोलने की अपनी शैली बन जाती है।
(2) व्याख्यान या भाषण - विद्यालय में सजीवता लाने के लिये समय-समय पर व्याख्यान अवश्य कराए जाने चाहिए। सम्भव हो तो प्रतिदिन प्रात-काल में प्रारम्भ के समय 20 से 30 मिनट का व्याख्यान हो, अन्यथा साप्ताहिक व्याख्यान अवश्य होना चाहिए। व्याख्यान के लिये जहाँ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को आमन्त्रित किया जाए, वहाँ कभी-कभी अध्यापकों तथा छात्रों के भी व्याख्यान होने चाहिए। इस विषय के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
(क) व्याख्यान का विषय ऐतिहासिक, साहित्यिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक अथवा सामान्य समस्यओं. से सम्बन्धित हो, वह रोचक तथा ज्ञानवर्द्धक होना चाहिए।
(ख) विषय ऐसा चुना जाये, जिसे विद्यालय के छात्र भलीभाँति समझ सकें। भाषण या व्याख्यानों से विद्यार्थियों को निम्नलिखित लाभ होते हैं-
(क) उनके ज्ञान में वृद्धि होती है।
(ख) नवीन विषयों के प्रति उत्सुकता जाग्रत होती है, उत्सुकता जाग्रत होने पर वे जानकारी प्राप्त करने के लिये प्रेरित होते हैं।
(ग) छात्रों का दृष्टिकोण व्यापक होता है।
(घ) वे भाषण कला की भिन्न-भिन्न शैलियों से परिचित होते हैं।
(3) भाषा परिषद या साहित्य परिषद - विद्यालय में भाषा परिषद या साहित्य परिषद भी आयेजित की जा सकती है। इस परिषद से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न कार्यक्रम संगठित किये जा सकते हैं, यथा-
(क) कवि-गोष्ठी या कवि सम्मेलन।
(ख) अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता।
(ग) लेखन प्रतियोगिता।
(घ) कहानी प्रतियोगिता।
(ङ) काव्य पाठ-लयानुसार।
(च) गद्य का शुद्ध-पाठ।
इन सब कार्यक्रमों के द्वारा बालक-बालिकाएँ जहाँ साहित्य में रुचि लेने लगेंगे, वहाँ वे साहित्य-रचना की ओर प्रेरित भी होंगे।
भाषा की दृष्टि से उपयोगी उपरोक्त सहगामी क्रियाओं के अतिरिक्त नाटकीय क्रियाएँ, संग्रहालय, भ्रमण या सरस्वती यात्राएँ आदि कुछ अन्य पाठ्य सहगामी क्रियाएँ हैं, जिनका प्रयोग करके विद्यालयों को विद्यार्थियों के शैक्षणिक उन्नयन का प्रयास करना चाहिए।
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