बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 तृतीय प्रश्नपत्र - शिक्षा के तकनीकी परिप्रेक्ष्य बीएड सेमेस्टर-2 तृतीय प्रश्नपत्र - शिक्षा के तकनीकी परिप्रेक्ष्यसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 तृतीय प्रश्नपत्र - शिक्षा के तकनीकी परिप्रेक्ष्य - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- शैक्षिक तकनीकी के विकास और उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
शैक्षिक तकनीकी के विकास, कार्य और उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।
अथवा
शैक्षिक तकनीकी के उद्देश्य लिखिये।
उत्तर-
शैक्षिक तकनीकी का विकास
सर्वप्रथम, शिक्षण में तकनीकी का प्रयोग 1926 में अमेरिका में ओहियो राज्य विश्वविद्यालय में सिडनी प्रैसी ने शिक्षण मशीन के निर्माण द्वारा प्रारम्भ किया। इस मशीन का निर्माण एक शिक्षण- "युक्ति के रूप में जाँच हेतु किया गया था।
तत्पश्चात् 1930-40 के लगभग लम्सडेन तथा ग्लैसर आदि तकनीकी विशेषज्ञों ने शिक्षण के यंत्रीकरण करने का प्रयत्न किया। यह कार्य कुछ विशेष प्रकार की पुस्तकों, कार्डों व बोर्डों के रूप में प्रस्तुत किया गया। किन्तु वास्तव में शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य सन् 1954 में बी. एफ. स्किनर के प्रयोगों द्वारा प्रारम्भ हुआ। स्किनर ने जानवरों पर किये गये परीक्षणों का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में सीखने के लिए किया। उसके इन्हीं परीक्षणों के फलस्वरूप अभिक्रमित अधिगम का विकास हुआ। इसी के अनुरूप इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम ब्राइनमौर ने प्रयोग किया। तत्पश्चात् औद्योगिक क्रान्ति तथा अन्य क्षेत्रों में प्रगति के फलस्वरूप शिक्षाशास्त्रियों ने इसकी विस्तार से व्याख्या की। अतः 1950 के बाद शैक्षिक तकनीकी का विशेष रूप से विकास हुआ तथा शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान पर आधारित इस प्रत्यय का एक नवीन क्षेत्र विकसित होना प्रारम्भ हुआ।
रूस एवं अमेरिका की औद्योगिक प्रगति के कारण 1960 के बाद अन्य देशों में भी शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में विशेष उन्नति हुई। इस समय अनेक प्रकार के तकनीकी आविष्कार हुए, जैसे दृश्य-श्रव्य साधन, रेडियो, टीवी, टेपरिकॉर्डर, प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर तथा प्रणाली विश्लेक्षण इत्यादि। इन तकनीकियों का सुरक्षा, उद्योग, वाणिज्य, स्वास्थ्य एवं शिक्षा आदि के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया जाने लगा। शिक्षा पर भी इन सबका प्रभाव पड़ा और शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक तकनीकी एवं व्यवहार तकनीकी आदि के क्षेत्र में अनेक शोधकार्य किये गये। परिणामस्वरूप अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में अनेक शिक्षण- सिद्धान्तों, प्रतिमानों व डिजाइनों का प्रतिपादन किया गया। अमेरिका में विश्वविद्यालयों के शिक्षा, मनोविज्ञान एवं विज्ञान द्वारा सन् 1966 में शिक्षा तकनीकी की एक राष्ट्रीय परिषद स्थापित की गयी। इसके अतिरिक्त बन्द सर्किट टेलीविजन व अन्य दृश्य-श्रव्य सामग्री का उपयोग किया गया। शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान भाषा प्रयोगशाला की स्थापना था। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में एक नवीनतम प्रयोग इलेक्ट्रॉनिक वीडियोटेप भी माना जाता है। कई अन्य वैज्ञानिक 1969 में इस क्षेत्र के विकास के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे और उन्होंने प्रशासन व इंजीनियरिंग के विकास की दृष्टि से सुरक्षा, उद्योग, कृषि, व्यापार व वाणिज्य, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किये। विकास के द्वारा अनेक प्रकार की तकनीकियों की खोज हुई जैसे - चीनी तकनीकी, कागज तकनीकी एवं कपड़ा तकनीकी आदि।
अमेरिका में एमिडोन, फ्लैंडर्स तथा स्मिथ आदि शिक्षाशास्त्रियों द्वारा व्यवहार तकनीकी के क्षेत्र में कक्षा शिक्षण अन्तःक्रिया को संख्यात्मक उपागम से शिक्षक के शाब्दिक तथा अशाब्दिक व सांकेतिक कक्षा व्यवहार को मापने की खोज की गयी और कई निरीक्षण विधियों का निर्माण किया जिनके द्वारा शिक्षक व विद्यार्थी के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाना सम्भव हो सका। इस प्रकार शिक्षा तकनीकी का प्रारम्भ अमेरिका एवं रूस में हुआ।
भारत में विज्ञान एवं तकनीकी का उपयोग सबसे पहले सेना व सुरक्षा कार्यों के लिए किया गया। बाद में स्वास्थ्य, प्रबन्ध, व्यापार, उद्योग तथा शिक्षा के क्षेत्रों में इसका प्रयोग किया गया। भारत में सर्वप्रथम 1966 में एक भारतीय अभिक्रमित अनुदेशन संगठन स्थापित किया गया।
इस संगठन के द्वारा विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा-तकनीकी के विकास के लिए प्रयास किये गये। शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी के माध्यम से विशेष प्रयत्न सन् 1970 के लगभग किये गये। इस समय राष्ट्रीय अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद एवं उच्च शिक्षा संस्थान, बड़ौदा, मेरठ तथा शिमला विश्विद्यालयों एवं शिक्षा विभागों में एम. एड. एवं पी. एच. डी. स्तर पर शोध कार्यों को प्रोत्साहित किया गया। इससे अभिक्रमित अनुदेशन एवं शिक्षा तकनीकी के क्षेत्र में विशेष उन्नति सम्भव हो सकी। व्यवहार में परिवर्तन के विषय में भी कुछ शोध कार्य किये गये। राष्ट्रीय अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद के अंतर्गत एक शिक्षा तकनीकी केंद्र स्थापित किया गया, जिसका कार्य शिक्षा- तकनीकी के ज्ञान का प्रसार करना एवं शोध कार्यों द्वारा शिक्षण प्रक्रिया का विकास करना एवं प्रभावशाली बनाना है।
शैक्षिक तकनीकी के कार्य - शैक्षिक तकनीकी के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) शैक्षिक उद्देश्यों के संदर्भ में व्यावहारिक उद्देश्यों को सीखने की परिस्थितियों में परिवर्तित करना।
(2) विद्यार्थियों की उपलब्धियों का मूल्यांकन।
(3) शैक्षिक तकनीकी शैक्षिक संगठन, प्रशासन, प्रबन्ध तथा निर्देशन की रूपरेखा एवं विकास करने में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है।
(4) सीखने वालों की विशेषताओं, क्षमताओं तथा गुणों का विश्लेषण करना।
(5) विद्यार्थियों के व्यवहार में सुधार करने के लिए पुनर्बलन तथा पृष्ठ पोषण (Feed back) देना।
(6) पाठ्यवस्तु को व्यविस्थत करना
(7) पाठ्यवस्तु के प्रस्तुत करने की विधियों, साधनों तथा सामग्री की संरचना करना।
(8) शिक्षा के प्रसार के साथ ही साथ शैक्षिक सामग्री के संचित करने में सहायता करना।
शैक्षिक तकनीकी के उद्देश्य - शैक्षिक तकनीकी के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-
(1) शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करना तथा उनको व्यावहारिक रूप से परिभाषित करना एवं लिखना।
(2) सीखने की विधियों तथा प्रविधियों को क्रमबद्ध करके अधिक आधुनिक एवं प्रभावपूर्ण बनाना।
(3) शिक्षण, अधिगम एवं मूल्यांकन प्रक्रिया में सुधार करना तथा इसके द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में अपेक्षित सुधार करना।
(4) शिक्षा तकनीकी का उद्देश्य कक्षा शिक्षण को स्पष्ट, सरल, वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ तथा प्रभावपूर्ण बनाना है।
(5) अध्यापक के व्यवहार को वस्तुनिष्ठ एवं मनोवैज्ञानिक बनाना।
(6) शिक्षा, प्रशासन, संगठन की समस्याओं का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन करना।
(7) शिक्षा तकनीकी का उद्देश्य मानव जीवन की जटिलतम समस्याओं का निराकरण करके उसका सतत् विकास करना है।
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