बी ए - एम ए >> बीए सेमेस्टर-4 समाजशास्त्र बीए सेमेस्टर-4 समाजशास्त्रसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीए सेमेस्टर-4 समाजशास्त्र - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय - 19
वृद्धों की समस्याएँ
(Problems of Elderly)
वर्तमान युग में पारिवारिक समस्याओं के अन्तर्गत वृद्धजनों के सम्बन्धित समस्याओं के प्रति समाज-शास्त्रियों की रुचि तेजी से बढ़ती जा रही है। इसका कारण यह है कि वृद्धजन आयु के आधार पर बनने वाला वह सबसे महत्वपूर्ण वर्ग है जिसकी प्रास्थिति का परिवार की संरचना से एक विशेष सम्बन्ध होता है। अपने संचित अनुभवों के कारण वृद्ध पीढ़ी से ही समाज के दूसरे सभी वर्गों को ऐसे दिशा निर्देश मिलते हैं जो किसी भी समाज के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए आवश्यक होते हैं। जिस समुदाय में वृद्धों का प्रतिशत जितना अधिक होता है, उस समुदाय का जीवन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से उतना ही अधिक संगठन देखने को मिलता है।
वास्तव में वृद्धावस्था एक स्वाभाविक और प्राकृतिक स्थिति है। प्रत्येक बच्चा कुछ समय बाद युवा और फिर प्रौढ़ बनकर अन्त में वृद्धावस्था के स्तर पर पहुँचता है। वृद्धावस्था में एक और व्यक्ति की शक्ति और उत्साह में बहुत कमी हो जाती है तो दूसरी ओर, मानसिक रूप से वृद्ध लोग अपने आप को अकेला और दूसरों पर निर्भर समझने लगते हैं। जीविकोपार्जन में उनका योगदान कम रह जाने के कारण अधिकांश वृद्धजनों को किसी न किसी तरह के आर्थिक अभावों का भी सामना करना पड़ता है। अमरीका और यूरोप जैसे सम्पन्न देशों में भी वृद्ध माता - पिता न केवल अपने बच्चों द्वारा पूरी तरह परित्यक्त होते हैं बल्कि बीमारी या असमर्थता की दशा में अपना ही जीवन उनके लिए बोझ बन जाता है। आज जैसे - जैसे भौतिकवादी और व्यक्तिवादी मूल्यों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, हमारे समाज में भी अधिकांश लोग वृद्धावस्था में प्रवेश करते ही व्यक्ति तरह - तरह की चिन्ताओं से घिरने लगता है। भारतीय समाज में सभी वृद्धों की समस्याएं एक जैसी नहीं हैं। इसका कारण यह है कि विभिन्न आधारों पर वृद्धजनों की पृष्ठभूमि एक-दूसरे से भिन्न है तथा ऐसे सभी वृद्धजनों की समस्याओं में कुछ भिन्नता देखने को मिलती है।
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