बी ए - एम ए >> बीए सेमेस्टर-4 गृह विज्ञान बीए सेमेस्टर-4 गृह विज्ञानसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीए सेमेस्टर-4 गृह विज्ञान - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय - 10
प्रसार शिक्षण एवं अधिगम
(Extension Teaching and Learning)
अधिगम का अर्थ है - सीखना। जन्म के साथ ही व्यक्ति सीखना आरम्भ कर देता है और जीवनपर्यन्त वह सीखता ही रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने पूर्व के अनुभवों से ही सीखता है। अतः अपने पूर्व के अनुभवों का लाभ उठाना ही अधिगम कहलाता है। सीखने के अंतर्गत विभिन्न क्रियाएँ आती हैं। अतः इसकी कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी जा सकती है। परन्तु कुछ विद्वानों ने इसके पश्चात् भी अपने- अपने दृष्टिकोण द्वारा अधिगम को परिभाषित करने का सम्पूर्ण प्रयास किया है। गिलफोर्ड के अनुसार, " सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में कोई परिवर्तन है।"
किंबाल यंग के अनुसार - "सीखना व्यक्ति की अनुकूलता प्रणाली में होने वाले उन परिवर्तनों को कहते हैं, जो पर्यावरण से उत्पन्न उत्तेजनाओं पर निर्भर होते हैं।"
गेट्स के अनुसार, - " अनुभव द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाना ही सीखना है।"
अधिगम प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति अपने स्वयं के प्रयासों द्वारा व्यवहार में परिवर्तन अनुभव करता है। व्यक्ति अपने कार्यों और अनुभवों द्वारा सीखता है। अतः शिक्षक को अपने विद्यार्थी को ऐसे अनुभव देने चाहिए जिससे उसके व्यवहार में वांछित परिवर्तन आ सके। अधिगम की प्रक्रिया तभी संभव हो सकती है जब देखने वाला कुछ देखकर सुनकर अनुभव कर रहा हो और उससे प्रतिक्रिया करे। अन्य शब्दों में सीखने वाले का क्रियाशील होना अनिवार्य है। अतः शिक्षक को ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करनी चाहिए कि सीखने वाला क्रिया करने के लिए बाध्य हो जाए।
प्रसार शिक्षक नवीन वैधानिक पद्धतियों का विकास करके ग्रामीणों को नवीन कार्य प्रणालियों की जानकारी देता है। जिसके फलस्वरूप लोगों के ज्ञान में वृद्धि होती है और लोगों के कार्य कौशल में भी निखार आता है। प्रसार शिक्षक के प्रसारकर्ता प्रौढ़ साक्षरता के क्षेत्र में भी अग्रसर रहता है। वास्तविक रूप में कोई भी शिक्षक प्रेरणा का भंडार होता है। जब किसी विषय को शिक्षक आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करता है तब लोगों की रुचि उस विषय के प्रति जागृत होती है और वह उसे अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। प्रसार कार्य में अभिप्रेरणा का महत्व अत्यन्त ही सकारात्मक होता है। अभिप्रेरणा के निमित्त बहुत सी बातों को दर्शाने की आवश्यकता होती है। ऐसी अवस्था में प्रसार कार्यकर्ता प्रशिक्षक की भूमिका निभाता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में नयी प्रणालियों को विकसित करना या पद्धतियों की जानकारी देना ही पर्याप्त नहीं होता है। बल्कि इसका प्रदर्शन करके भी सम्बन्धित प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाता है। इस प्रकार शिक्षक की भूमिका ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं को अनेक क्षेत्रों में प्रशिक्षित करने की भी होती है। उदाहरण के लिए बच्चों का समुचित ढंग से लालन-पालन, सिलाई-बुनाई, सस्ते और पौष्टिक व्यंजन बनाना इत्यादि। यह जानकारी प्रशिक्षण द्वारा ही प्रदान की जाती है जिसमें शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
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