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बीए बीएससी बीकाम सेमेस्टर-2 प्राथमिक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2730
आईएसबीएन :0

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बीए बीएससी बीकाम सेमेस्टर-2 प्राथमिक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य - सरल प्रश्नोत्तर

अध्याय - 9 
त्वचा एवं जलने से संम्बंधित प्राथमिक चिकित्सा

(First Aid Related with Skin and Burns) 

त्वचा मानव शरीर का सबसे बड़ा और भारी (महत्वपूर्ण) अंग है। त्वचा का सबसे मुख्य कार्य शरीर के आन्तरिक अंगों की जीवाणुओं, विषाणुओं, धूल, मिट्टी तथा पर्यावरण की विपरीत दशाओं से रक्षा करना है। यह शरीर के लिए अनुकूल तापमान बनाये रखने तथा तंत्रिका तंत्र के माध्यम से व्यक्ति को बाहय- पर्यावरण को समझने में सहायता करती है। मानव त्वचा की कुल लम्बाई लगभग 20 वर्ग फुट होती है।

मानव त्वचा एक जटिल संरचना है। औसतन 1 वर्ग इंच त्वचा में 650 स्वेद ग्रंथियाँ, 20 रक्त वाहिकायें तथा 1000 तक तंत्रिका तंत्र की तंत्रिकायें फैली होती हैं। त्वचा का कुल वजन मानव शरीर के कुल वजन का 7 वाँ भाग होता है।

त्वचा की संरचना मुख्यतः तीन परतों से होती है-
(1) एपिडर्मिस  (2) डर्मिस तथा (3) हाइपोडर्मिस।

एपिडर्मिस त्वचा की सबसे बाह्य परत है। यह जलरोधक होने के साथ-साथ त्वचा को उसका टोन अर्थात सुन्दरता प्रदान करने का कार्य करती है। यह त्वचा की नई कोशिकाओं के निर्माण तथा उसको उसका वास्तविक रंग देने के लिए उत्तरदायी है। एपिडर्मिस या बाहय त्वचा के भीतर कैराटिनो साइट्स नामक कोशिकायें पायी जाती हैं, जिनका मुख्य कार्य बैक्टीरिया, परिजीवी, कवक, वायरस, गर्मी तथा पराबैगनी किरणों एवं पानी से शरीर को हो सकने वाले नुकसान के विरुद्ध एक अवरोध के रूप में कार्य करना है। यद्यपि एपिडर्मिस में कोई रक्तवाहिका नहीं पायी जाती है परन्तु त्वचा को रंग देने वाला मेलेनिन नामक वर्णक इसी भाग में पाया जाता है।

डर्मिस त्वचा की दूसरी परत है जो संयोजी ऊतकों से निर्मित होती है। इसका मुख्य कार्य शरीर को तनाव से बचाना और उसको मजबूती एवं लोच प्रदान करना है। त्वचा की यही परत पसीने और तेल के निर्माण, त्वचा को रक्त प्रदान करने तथा बाल उगाने के लिए उत्तरदायी है।

त्वचा का मुख्य कार्य शरीर को रोगाणुओं से बचाना है। त्वचा में पाई जाने वाली लैंगरहैंस की कोशिकायें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा होती हैं। त्वचा वसा एवं पानी के भण्डारण का भी कार्य करती है। त्वचा तापमान, दबाव, कम्पन, स्पर्श तथा चोट की जानकारी शरीर को देती है और शरीर से पानी के वाष्पीकरण को बचाती है। त्वचा में होने वाले रोगों में एक्जिीमा, मुंहासे, मलोनेमा, सोरायसिस, स्केबीज, दाद-खाज, लाइकेन प्लेनस आदि मुख्य हैं।

त्वचा का जल जाना त्वचा पर एक प्रकार का घाव है जो गर्मी, विभिन्न प्रकार के रसायन, विद्युत रैडियेशन की वजह से हो सकता है। जलना गंभीर प्रकार की त्वचा की क्षति है जिसके कारण त्वचा की कोशिकायें मर भी सकती हैं और त्वचा का रंग भी सफेद हो सकता है। अत्यधिक गंभीर रूप से जलने के मामलों में शीघ्र मेडिकल उपचार की आवश्यकता होती है। ऐसा करना जलने की जटिलताओं तथा पीड़ित की मृत्यु को रोकने के लिए आवश्यक है। जलना मुख्यतः तीन प्रकार का होता है और इसके प्रकार के अनुसार ही इसको देखभाल तथा चिकित्सा की आवश्यकता होती है-

(1) फर्स्ट डिग्री बर्ग
(2) सेकेण्ड डिग्री का बर्न
(3) थर्ड डिग्री का बर्न।

इसमें थर्ड डिग्री का बर्न सबसे घातक होता है। उपरोक्त के अलावा एक चौथे डिग्री का बर्न भी होता है जो त्वचा के अलावा | स्नायुओं तथा हड्डियों को भी प्रभावित करता है। अतः यह सबसे घातक होता है।

रासायनिक चोट या जलना तब होता है जब शरीर का कोई जीवित ऊतक किसी घातक रसायन या संक्षारक के सम्पर्क में आतां है यथा एसिड, क्षार या आक्सीकारक पदार्थ।

स्काल्ड (Scald) शरीर या उसके किसी भाग का गर्म द्रव या भाप से जलना होता है। जबकि सनबर्न एक ऐसा जलना है जोकि शरीर को बहुत देर तक सूर्य के तपते प्रकार में खुला छोड़ देने से होता है। इसके कारण त्वचा लाल हो जाती है। उसमें खुजलाहट होने लगती है।

हीटस्ट्रोक या सन स्ट्रोक जिसे लू लगना, ऊष्मा - मूर्छा या आतप ज्वर के नाम से भी जाना जाता है, शरीर की वह रुग्ण अवस्था है जिसमें गर्मी के कारण शरीर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या 104 डिग्री फारेनहाइट तक पहुँच जाता है और मन में उलझन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। लाल शुष्क त्वचा, सिर दर्द, चक्कर आना आदि इसके अन्य लक्षण हैं।

कभी-कभी बहुत ठंडी चीजों के शरीर के सम्पर्क में आने से भी शरीर जल सकता है जिसे 'कोल्ड बर्न' कहा जाता है। फ्रोस्ट बाइट या कोल्ड दंश एक ऐसी अवस्था है जिसमें त्वचा और उसके नीचे के ऊतक जम जाते हैं। यह ज्यादातर हाथ-पांव की अंगुलियों तथा शरीर के खुले भाग को प्रभावित करता है।

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