बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
प्रश्न- विद्यालय बच्चे के व्यवहार-मानदंडों को किस प्रकार गढ़ता है?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- विद्यालय में प्राप्त ज्ञान का प्रभाव बालक पर किस प्रकार पड़ता है?
- किसे लघु समाज की संज्ञा दी गई? बताइए।
उत्तर— जैसे ही बच्चा पढ़ता है, वह विद्यालय पहुंचाया जाता है, जहाँ पर उसका दूसरों से सम्पर्क बढ़ता है। विद्यालय में बच्चे का पहला दिन मध्यस्तरीय इकाई में प्रवेश के अनुशनों में से एक है। यह स्मरण रखना उचित है कि बच्चों का समाजीकरण शैशव से किशोरावस्था तक बहुत तीव्र दर से होता है जिसमें परिवार और सहपाठी शिक्षा के प्रारंभिक स्तर पर अधिकतम प्रभाव डालने का प्रयत्न करते हैं। अतः यह विद्यालय ही है जो बच्चों के व्यवहार-मानदंडों को गढ़ता है।
विद्यालय औपचारिक शैक्षिक संस्थाओं के समस्त प्रकार की ओर संकेत करता है। बुब्बर के शब्दों में "विद्यालय शिक्षा और समाजीकरण का सक्रिय, प्रत्यक्ष और औपचारिक अधिग्रहण है।" विद्यालय को सामान्यतः 'बाहरी समाज' से प्रयोग से समझा गया है। विद्यालय को समाज के मूल्यों को जीवंत रखने वाले रूप में देखा जाना चाहिए जो मान्यता को बच्चों के माध्यम से नैतिक, बौद्धिक और सौंदर्यबोध विकास के उच्चतर स्तरों पर ले जाने के लिए सतत प्रयत्न करता है। विद्यालय विद्यार्थियों को औपचारिक और अनौपचारिक दोनों प्रकार की परिस्थितियां प्रदान करते हैं। औपचारिक परिस्थितियां कक्षाओं में प्रदान की जाती हैं जबकि समाजीकरण की विषय-वस्तु, पाठ्यक्रम और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया द्वारा निर्धारित की जाती है। अनौपचारिक परिस्थितियां शिक्षकों और सहपाठियों के विद्यार्थियों के अन्य-वैयक्तिक संबंधों में देखी जा सकती हैं।
विद्यालय एक लघु समाज है, जहाँ पर विभिन्न परिवारों, विभिन्न धर्मों, विभिन्न जातियों और आर्थिक स्तर के बच्चे साथ-साथ रहते हैं, सांस्कृतिक क्रियाओं में भाग लेते हैं और समाज के साथ सामंजस्य करना सीखते हैं। विद्यालय में बच्चे वे जो कुछ परिवार, समुदाय अथवा समाज के माध्यम से सीखते हैं, स्थायी हो जाता है।
जैसे कि आप देख सकते हैं कि विद्यालय में बच्चों को इस उद्देश्य के साथ समाजीकृत किया जाता है कि उन्हें जीवन के लिए तैयार किया जा सके और एक इकाई से पूरे संसार के लिए उपयुक्त भूमिका निभा सकें। विद्यालय जीवनलक्षी भूमिकाओं को चुनते हैं, जो उनके लिए उपयुक्त समझे जाते हैं। साथ ही साथ उन्हें आचार-व्यवहार और कौशल सिखाना होता है जो इन विचारों से मेल खाते हैं।
विद्यालय द्वारा प्रदत्त समाजीकरण केवल बढ़ते हुए बच्चों को न केवल शैक्षणिक अंतर्दृष्टि प्रदान करने में मदद करता है बल्कि बहुत से मूल्यों जैसे - समयबद्धता का महत्व, अनुशासन, नेतृत्व, समूह कार्य और सहयोग आदि से भी। विद्यालयों द्वारा अदा की जाने वाली दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका लिंग-समाजीकरण के सम्बन्ध में है। यद्यपि लिंग की पहली शिक्षा परिवार से प्राप्त होती है, फिर भी विद्यालय में बच्चों अपने विभिन्न आयामों को समझता है। इस प्रकार विद्यालय सार्वभौमिक 'महत्त्वपूर्ण अधिकारी' हो जाता है, साथ ही साथ उसे विद्यालय और आस-पड़ोस से सम-समूह से परिचित कराया जाता है।
विद्यालय व्यवस्था समाज के अन्तर्गत कार्य करती है और समाज की मांगों को पूरा करती है। यह उत्तरोत्तर के प्रयोगों को पूर्ण करती है, जब सुधार और गति की आवश्यकताएं होती हैं ठीक उसी समय यह जांच-पड़ताल करती है ताकि समाज के सांस्कृतिक मूल्य फीके न हो जाएं जो पहले विद्यालय शिक्षा से वंचित रहे जाते हैं। उनके पास विद्यालयों में अपने प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित अन्तरक्रिया, प्रदर्शन और व्यापक समाजीकरण के क्षेत्र वाली केवल संरचित सामाजिकता होगी। अप्रत्यक्ष पाठ्यचर्या भी विद्यालय में समाजीकरण के लिये एक वाहन के रूप में प्रयोग की जाती है। अप्रत्यक्ष पाठ्यचर्या का अर्थ है कि बच्चे शैक्षिक विषय-वस्तु के अतिरिक्त और क्या सीखते हैं, उनमें से क्या करने है अथवा उन्हें क्या करने की अपेक्षा की जाती है। शिक्षक और सहपाठी सामाजिक कार्य और लिंग आदि के विषय में बच्चों को अभिप्रेरित करने का प्रयास करते हैं जो कि उनके व्यवहार में प्रतिबिंबित होता है। इस प्रकार एक अधिकतर क्षेत्र में विद्यालय बच्चों के समाजीकरण में परिवार से प्राप्त आदतों, मूल्यों और मानदंडों को पूर्वानुमानित करते हुए और ठीक उसी समय उन्हें विचारों और कार्यों के नये क्षेत्रों के लिये प्रदर्शित करते हुए निर्णायक भूमिका अदा करता है।
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