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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
अध्याय 15 - महिला आरक्षण एवं ट्रांसजेंडर के प्रति सुप्रीम कोर्ट के फैसले
[Reservation for Women, Supreme Court Verdict about Transgender]
प्रश्न- आरक्षण एवं महिला सशक्तीकरण किस प्रकार अंतःसंबंधित है?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- सशक्तीकरण का क्या अर्थ है?
- महिलाओं की समाज में किस प्रकार की भूमिका है?
उत्तर-
पंद्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में 4 जून, 2009 को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में घोषणा की कि सरकार विधानसभाओं और संसद में महिला आरक्षण विधेयक को शीघ्र पारित करने की दिशा में से दिन के भीतर कदम उठाएगी। संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने महिला आरक्षण को लेकर सरकार की मंशा सामने रखी।
राष्ट्रपति के अनुसार महिलाओं के वर्ग, जाति और महिला होने के कारण अनेक अवसरों से वंचित रहना पड़ता है, इसलिए पंचायत और शहरी स्थानीय निकायों में आरक्षण बढ़ाकर महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए अगले 100 दिनों में संवैधानिक संशोधन करने के कदम उठाए जाएंगे ताकि अधिक-से-अधिक महिलाएं सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर सकें। सरकार अगले 100 दिनों के भीतर सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं की प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश करेगी, इसके साथ-साथ बेहतर समन्वय के लिए महिला सशक्तीकरण पर एक राष्ट्रीय मिशन स्थापित करने का कदम उठाया जाएगा।
15वीं लोकसभा ने कई मायनों में इतिहास रचा है। नारी सशक्तीकरण अब राजनीतिक गलियारों का मुद्दा नहीं, बल्कि 15वीं लोकसभा की हकीकत है। यह पहला मौका है, जब संसद में प्रवेश करने वाली महिलाओं की संख्या 50 से अधिक है। यही नहीं सबसे बड़ा वर्ग यह है कि भारत के इतिहास में पहली बार एक महिला को लोकसभा में अध्यक्ष बनने का मौका मिला है। संसद में महिला आरक्षण का प्रश्न आज प्रत्येक व्यक्ति का प्रश्न बन गया है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को भी 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के उद्देश्य से 14वीं लोकसभा में 108वां संविधान संशोधन विधेयक ने देश के जनमानस को फिर चेतावनी कर दिया था।
महिलाओं का राजनीतिक सशक्तीकरण और लैंगिक असमानता दूर करने के उद्देश्य से राज्यसभा में रखा गया विधेयक इस रास्ते का पहला प्रयास नहीं था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने प्रधानमंत्रीत्व काल में भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की थी। पंचायतों, राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों को संविधान में स्थान देने की योजना बनाते समय संसद और विधान मंडलों के लिए भी ऐसे ही कदम की रूपरेखा बनी थी। बाद में प्रयास फलदायी नहीं हुआ।
देश की आधी आबादी (महिलाएं) पिछले एक दशक से अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग कर रही है लेकिन प्रमुख राजनीति संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं होने दे रही। यह अत्यंत आश्चर्यजनक और सुखद है कि पंद्रहवीं लोकसभा में अपेक्षित महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। यह पहला मौका है जब 58 महिलाएं लोकसभा में पहुंची हैं, जो अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है। अब कुल 556 ने चुनाव लड़ा था। उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा 12, पश्चिम बंगाल से 7 और राजस्थान से 3 महिला सांसद चुन गई हैं।
14वीं लोकसभा में देशभर में 355 महिला उम्मीदवार चुनाव रणभूमि में उतरीं थी, परन्तु 543 सदस्यीय सदन में 10 प्रतिशत से भी नहीं थी। नई लोकसभा में पिछली की तुलना में 13 महिलाएं ज्यादा हैं।
दस साल पहले महिलाओं को विधानसभाओं और संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का सिफारिश छोड़ा गया। यह घोर विडंबना है कि महिला आरक्षण के ज्वलंत मुद्दे पिछले करीब एक दशक में किसी न किसी तरीके से लंबित होता रहा है। राजनीतिक दल भी गाहे-बगाहे महिला आरक्षण का राग अलापते रहे हैं। लगभग सभी पार्टियों के चुनावी घोषणा-पत्र में महिला आरक्षण पर अमल का वादा किया जाता है। प्रधानमंत्री रहे एच. डी. देवेगौड़ा और अटल बिहारी वाजपेयी ने महिला आरक्षण बिल पेश किया परंतु पास कराने की कोशिशें विफल रही। सरकारी आती जाती रहीं, प्रधानमंत्री बदलते रहे, पर विधेयक 1996 से अब तक 6 बार संसद में पेश हो चुका है, लेकिन आम सहमति के अभाव में यह पारित नहीं हो सका। 12वीं और 13वीं लोकसभा में दो बार बिल को राज्य शासनकाल में प्रस्तुत किया गया। यूपीए सरकार के कार्यकाल में महिला आरक्षण विधेयक आगे नहीं बढ़ा। आम सहमति न बन पाने के कारण लगातार महिला विधेयक को इस प्रकार से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
आज भी महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। अंतर-संसदीय संघ (Inter Parliamentary Union) के अनुसार विश्वभर की संसदों में सिर्फ 17.5 प्रतिशत महिलाएं हैं। यथार्थ देशों की संसदों में तो महिलाओं नहीं हैं और 60 देशों में यह प्रतिशत 8 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है। यूरोप में औसत प्रतिनिधित्व 16 प्रतिशत है, जबकि अफ्रीका एवं एशियाई देशों में 16 से 10 प्रतिशत और देशों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व सिर्फ 9.6 प्रतिशत है।
महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में 183 देशों में रुआंडा नंबर एक है, वहां संसद में 48.8 प्रतिशत महिलाएं हैं। संसद में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में भारत दुनिया में 134वें स्थान पर है। अधिकारियों तथा संसद महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, पर समाज की "आधी आबादी" के लिए काम करने के लिए तैयार नहीं है। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की करनी और कथनी में अंतर दिखता है। आरक्षण से सही राजनीतिक दल महिलाओं को ज्यादा टिकट देने लगेंगे तो भी महिलाओं की संख्या संसद में बढ़ेगी। पंद्रहवीं लोकसभा इसका उदाहरण है।
पंचायती राज और स्थानीय निकाय संबंधित 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक के अधिनियमित होने के बाद तो महिलाओं की आवाज इस मुद्दे पर और सशक्त हो चली है। धारात्मक संस्थानों में तो महिलाओं के लिए आरक्षण है, किंतु इन्हीं के समान बनाने वाले संस्थानों में सही महिला आरक्षण के लिए कोई ठोस कारण नहीं है। महिलाएं, त्याग, समर्पण, सहयोग और पुनर्निर्माण (रिकंस्ट्रक्शन) के बेहतरीन उदाहरण सामने रखती हैं। संस्थानों का इस्तेमाल पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक बेहतर ढंग से कर सकती हैं। पंचायत राज संस्थानों में "महिला स्पर्श" के लिए स्थान बनाते समय इन्हीं बिंदुओं पर गंभीरता से विचार किया गया था। अब संवैधानिक संस्थानों के लिए भी ऐसी व्यवस्था जोरदार ढंग से अनुभव हो रही है।
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