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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :215
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2702
आईएसबीएन :0

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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज

अध्याय 13 - लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम-1994

[Parental Diagnostic Technique Act-1994]

प्रश्न- कन्या भ्रूण हत्या क्या है? तथा ऐसा होने के क्या कारण हैं?

लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. गर्भपात के अधिनियम को भारत में कब लागू किया गया?
  2. कन्या भ्रूण हत्या के क्या कारण हैं?

उत्तर-

यह एक सोचनीय तथ्य है कि हमारे समाज में पैदा होने से पहले ही स्त्रियों के साथ भेदभाव किया जाता है। यद्यपि संविधान ने पुरुष और स्त्री पर यह पाबंदी लगाई है कि वे लिंग के आधार पर कोई भी भेदभाव न करें। फिर भी कई शिशु ऐसे होते हैं जिन्हें जन्म से पहले ही भेदभाव का शिकार बनना पड़ता है। प्रतिवर्ष हजारों बच्चे गर्भ में मार दिए जाते हैं वे भी केवल इसलिए कि वे लड़कियाँ हैं। जब बच्चा बड़ा हो ही नहीं पाता है तथा सोनोग्राफी के माध्यम से बच्चे के लिंग का पता लगाया जाता है और कई लोग गर्भपात करवा देते हैं। भ्रूण की हत्या को बालिका भ्रूण हत्या कहते हैं। यह सही है कि गर्भपात अधिनियम को भारत में 1971 में पारित किया गया था। इसमें यह प्रावधान है कि ऐसा गर्भपात चिकित्सीय दशाओं में किया जाना चाहिए। यद्यपि इस अधिनियम द्वारा किसी स्त्री-भ्रूण हत्या की स्वतंत्रता नहीं है। शहरी क्षेत्रों में लिंग परीक्षण कराना बहुत मुश्किल है लेकिन एक लंबे समय के बाद देश के विभिन्न भागों में कई ऐसे क्लीनिक खुल गए हैं जो लिंग का पता लगाते हैं। टेलीविजन की खबरों के अनुसार कई गाँवों में पीने के लिए पानी तो नहीं है लेकिन भ्रूण को जानने व गर्भपात करने के लिए सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अक्सर इन क्लीनिकों में जो दशाएँ हैं वे स्वास्थ्य परक नहीं हैं। यह सब होने हुए भी माता-पिता और परिवार बिना दोष हुई लड़कियों से छुटकारा पाने के लिए तैयार रहते हैं। यह मुख्य कारण है कि बिना दोष हुई लड़कियों की माता-पिता मार देते हैं। अपने इस कार्य को वे उचित ठहराकर कहते हैं कि एक लड़की का जन्म भविष्य में उनके ऊपर बहुत बड़ा बोझ लाता है। यह इसलिए कि उन्हें दहेज की बहुत बड़ी रकम चुकानी पड़ती है। भारत के पितृसत्तात्मक परिवार में लड़की के विवाह के खर्चे प्रायः माता-पिता द्वारा चुकाया जाता है। यह खर्च उपहार द्वारा भी चुकाया जाता है।

रोचक बात यह है कि दहेज चुकाया जाना या उसकी माँग केवल एक बार ही नहीं होती। गरीब और संपन्न घरों में दहेज प्रथा के कारण स्त्रियों की हत्या का बहुत बड़ा कारण बनता है। माता-पिता तब के लिए सोचते हैं कि अपने बच्चों को कष्ट उठाने अथवा दहेज के लिए उठाया उसे वे नहीं चाहते कि उनकी लड़कियाँ भी उठाएँ। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि स्वयं भी इस तरह ही भ्रूण हत्या का कार्य अपने हाथों द्वारा करती हैं? इसमें ऐसी कितनी महिलाएँ होंगी जो भ्रूण हत्या करने के लिए तैयार न होती हों। वास्तव में आर्थिक दबाव इतने अधिक होते हैं कि उन्हें अपने पति या परिवार अथवा सुरक्षा की कोई व्यवस्था न होने के कारण यह सब करना पड़ता है। इनके अभाव में ही स्त्रियाँ भ्रूण का गर्भपात कराने के लिए तैयार हो जाती हैं।

पूर्व-गर्भावस्था-निदान-तकनीक अधिनियम 1994 में पारित हुआ था। आज भी इस अधिनियम को प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया है। स्थिति यहाँ तक है कि न किसी डॉक्टर और न किसी माता-पिता को इसके उल्लंघन करने पर आज तक कोई दंड नहीं दिया गया। जिन डॉक्टरों ने आज तक कितने गर्भपात कराए हैं, उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती है। इसका कारण यह है कि लोग बिना कानूनी कार्यवाही के भ्रूणपात कराते हैं और कहते हैं कि "हमने 5,00,000/- खर्च किया।" और कुछ करने से तो फिलहाल 1500 रुपये खर्च कीजिए। आज देश के अधिकांश भागों में लिंग का पता लगाने के लिए ऐसे क्लीनिक मौजूद हैं जो खुले आम इस धंधे को करते हैं और वे इसे गंभीर चुनौती नहीं मानते।

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