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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
अध्याय 10 - लड़कियों की शिक्षा-भेदभाव एवं विरोध (प्रवेश, अवरोध एवं बहिष्कार)
(Schooling of girls-inequalities and resistances (issues of access, retention & exclusion))
प्रश्न- विद्यालय में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किस प्रकार का लिंग आधारित भेदभाव किया जाता है?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- विद्यालयों में खेलों की व्यवस्था किसे ध्यान में रखकर की जाती है?
- शिक्षकों की भाषा का छात्रों एवं छात्राओं पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
विद्यालयों के व्यावसायिक विकास हेतु विद्यालय में विभिन्न प्रकार की पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ आयोजित की जाती हैं। परंतु विद्यालय में यह पूर्णतः लिंग स्पष्ट होता है जहाँ एक ओर लड़कों को कला, गायन, रंगोली, साज-सज्जा आदि क्रियाओं में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया जाता है, वहीं लड़कों को भाषण, वाद-विवाद, कविता-पाठ में प्रधानता दी जाती है।
विद्यालय में खेलों की व्यवस्था भी लिंग स्पष्ट होती है। लड़कों के लिए जहाँ दौड़ने-भागने वाले खेल फुटबॉल, क्रिकेट आदि रखे जाते हैं, वहीं लड़कियों के लिए केरम, लुडो, रस्सी-कूद, खो-खो, कबड्डी, बैडमिंटन आदि खेलों की व्यवस्था होती है। इन खेलों का या तो एक जगह बैठकर खेला जाता है या बहुत कम स्पेस की आवश्यकता होती है। शिक्षक इस ओर सचेत रहते हैं कि लड़के व लड़कियाँ के लिए जो खेल निर्धारित किए गए हैं वह उसी में भाग लें। अपने जेंडर के विपरीत खेल की माँग करने पर उन्हें सीधे तौर पर मना किया जाता है।
कक्षा में शिक्षक लड़कियों की तुलना में लड़कों पर ज्यादा ध्यान देते हैं तथा जो महिला विद्यार्थी प्राप्त करती भी है वह लड़कों की तुलना में ज्यादा नकारात्मक होता है। चूँकि गणित और विज्ञान विषयों की छवि पुरुषोचित विषय की है, अतः शिक्षक लड़कों को इन विषयों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं, वहीं लड़कियों की तुलना में लड़कों पर कम ध्यान दिया जाता है। इसके पीछे यह मान्यता काम करती है कि "लड़कियाँ गणित पढ़ कर क्या करेंगी?" उन्हें मार्केटिंग से मतलब ही नहीं। लड़कियाँ गणित में कमजोर होती हैं। अध्यापन में भी कई मान्यताएँ भेदभाव करती हैं। शिक्षक कक्षा में लड़कों से ज्यादा चुनौतीपूर्ण सवाल पूछते हैं। एक शिक्षक-छात्र के मध्य जितनी स्पष्ट अंतःक्रिया होती है उतनी छात्रा के साथ नहीं होती। इस प्रकार की विभेदीकरण शिक्षक अंतःक्रिया लड़कों और लड़कियों को बहुत अलग किस्म के संदेश देती है, ये संदेश विद्यार्थी अलग प्रकार से प्रभावित करते हैं।
विद्यालयों में कार्यों का बँटवारा भी इस प्रकार से किया जाता है कि उनका समाज स्वीकृत पुरुषोचित व स्त्रीत्वोचित कार्यों के विभाजन से कोई खास विरोध न रहे। उदाहरण के लिए लड़कियों को शांत व नियंत्रण में रखने, कक्षा व श्यामपट्ट को साफ-सुथरा तथा रजिस्टर के देखभाल का कार्य लड़कियों को दिया जाता है। वहीं पूरी कक्षा को शांत व नियंत्रण में रखने, बाहर से सामान लाने का कार्य, फर्नीचर को उठाकर ले आने-ले जाने का कार्य लड़कों को सौंपा जाता है। लड़कियों को ऐसे काम दिए जाते हैं कि जिससे कि जिम्मेदारी का दायरा कक्षा और विद्यालय की चारदीवारी से घिरी जगहों में ही केंद्रित रहता है, जबकि लड़कों को विद्यालय से बाहर भी स्वतंत्र रूप से भेजा जाता है।
विद्यालयों में शिक्षक भेदभाव में ढलाव बनाए हैं जिसकी उपमा प्रयाशा की जाती है। शिक्षकों की अपेक्षाएँ ही विद्यार्थी की भविष्य की आकांक्षाओं पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों से जो अपेक्षा करते हैं, उसमें जेंडर एक महत्वपूर्ण आयाम है। सामान्यतः अध्यापक यह मानते हैं कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य लड़कों को सार्वजनिक जीवन के लिए तैयार करना है। लड़कों को नौकरी करनी है तथा परिवार की प्रथा बनना है, वहीं लड़कियों के लिए मुख्य भूमिका के अंदर माँ और पत्नी के रूप में निर्माण समय के अंतर्गत कार्य कर रही है। इसके बावजूद भी लड़कियों हेतु उपयुक्त लक्ष्य कम महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
शिक्षकों की भाषा में भी लैंगिक असमानता परिलक्षित होती है। यदि एक लड़का स्कूल में रोता है तो सामान्य तौर पर इसे यह कहकर चुप कराया जाता है कि "लड़के तो बहादुर होते हैं, लड़के तो नहीं रोते हैं।" वहीं एक लड़के को यह कह दिया जाता है कि "तुम तो बहुत सुंदर हो, तुम पढ़ाई क्यों करते हो?" चूँकि लड़के व लड़कियों के मध्य अंतःक्रिया को सामान्य माने नहीं जाता था। शिक्षक भी इस असमानता को बनाए रखने हेतु प्रयत्न करते हैं तथा इसे मानक के उल्लंघन करने पर शाब्दिक टिप्पणी भी उनके द्वारा दी जाती है तथा वे परोक्ष रूप से लगातार इस ओर प्रयत्नरत रहते हैं कि लड़के व लड़कियाँ अपने पुरुषोचित गुणों व भूमिकाओं के अनुसार ही कार्य करें।
भाषा न केवल हमें यथार्थ से अवगत कराती है बल्कि हमारे अंदर यथार्थ को देखने के नजरिए को भी बनाती है। उदाहरण देने लायक यह है कि लिंग के ध्यान में रखकर दिया जाना चाहिए न केवल एक ही लिंग को प्राथमिकता दी जाए।
अंततः यह कह सकते हैं कि विद्यालय भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अनुसार स्त्री व पुरुष के समाजीकरण का कार्य करती हुई प्रतीत होती है। यह जहाँ पितृसत्तात्मक स्त्री व पुरुष छवि को गढ़ने में अहम भूमिका निभा रही है, वहीं विद्यालयी वातावरण में महिला सशक्तिकरण एवं लैंगिक संवेदनशीलता के प्रति प्रतिवद्धता का अभाव दिखाई देता है।
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