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बी ए - एम ए >> फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्र फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्रयूनिवर्सिटी फास्टर नोट्स
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बी. ए. प्रथम वर्ष (सेमेस्टर-1) शिक्षाशास्त्र के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार हिन्दी माध्यम में सहायक-प्रश्नोत्तर
प्रश्न- मानव संसाधन विकास का परिभाषाओं सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मानवीय संसाधन
(Human Resournces)
मानवीय संसाधन ऐसे संसाधन होते हैं जो व्यक्ति की कार्यकुशलता में वृद्धि करते हैं ओर जिनके प्रयोग से व्यक्ति अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।
निकिल एवं डार्सी के अनुसार "मानवीय साधन वह साधन होते हैं जिनमें निम्न तथ्य सम्मिलित होते हैं -
1. ज्ञान (जो तथ्यात्मक तथा सम्बन्धात्मक होता है)
2. योग्यताएँ एवं कुशलताएँ (जन्मजात और अर्जित)
3. अभिवृत्तियाँ (शिक्षा को कार्यान्वित करने के सम्बन्ध में विचारधारा अथवा भावनाएँ)।
4. शक्ति (जो शारीरिक तथा मानसिक कार्य करने के लिये परम आवश्यक है)।
ग्रास तथा क्रेन्डल ने मानवीय साधनों में निम्नलिखित साधन सम्मिलित किये है - समय, रुचियाँ, शक्ति, कौशल, ज्ञान, अभिवृत्तियाँ तथा योग्यताएँ।
मानवीय साधनों का शिक्षा में महत्व
(Importance of Human Resources in Education)
मानवीय साधनों के वास्तविक ज्ञान से लोग संसाधनों का उचित उपयोग करते हैं तथा उनका उपव्यय नहीं करते हैं। मानवीय संसाधनों से व्यक्ति का व्यक्तिगत विकास भी होता है। मानवीय संसाधनों के उचित उपयोग से देश, समाज तथा राज्यों का विकास होता है। मानवीय संसाधनों के उचित विकास से व्यक्ति कौशलों की प्राप्ति करता है। मानवीय संसाधनों के उचित विकास से लोग अपनी रुचियों को विकसित कर सकते हैं और उन रुचियों का प्रयोग बागवानी संगीत तथा भोजन तैयार करने के क्षेत्र में कर सकते हैं। व्यक्ति को समय का सदुपयोग करना आता है। व्यक्ति अपने समय को बचाकर ज्ञानोपार्जन के क्षेत्र में लगा सकता है। जिस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को जीविकोपार्जन के योग्य बनाना होता है उसी प्रकार मानवीय साधनों के उचित उपयोग से व्यक्ति जीविकोपार्जन के योग्य बन सकता है।
शिक्षा की प्रक्रिया में, मनुष्य ज्ञान एवं कौशल अर्जित करता है तथा अभिवृद्धि एवं योग्यता का विकास करता है। शिक्षित व्यक्ति नैतिक, सामाजिक, भावनात्मक, मानसिक एवं आर्थिक दृष्टि से भी विकसित होता है। शिक्षा मानवीय विकास का आधार है। व्यक्तियों की दक्षता ज्ञान कौशल और क्षमताओं का विकास शिक्षा से ही किया जा सकता है। व्यक्ति में परिवर्तित माहौल के अनुरूप बनने की शक्ति तथा लचीलापन इन्हीं के आधार पर आता है। राष्ट्रीय विकास के लिये व्यक्ति एवं भौतिक संसाधनों के विकास की आवश्यकता होती है और भौतिक संसाधनों एवं मानवीय विकास का कार्य शिक्षा द्वारा ही सम्पन्न किया जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु शिक्षा की पद्धति को नया स्वरूप प्रदान किया जाये। शैक्षिक क्षेत्र में बुनियादी बदलाव लाने के साथ-साथ प्राथमिक स्तर से व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था करके विकास के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।
शिक्षा के संसाधनों के द्वारा इन उद्देश्यों के साथ-साथ सामाजिक कल्याण, सुधार और प्रगति में रुचि का सम्बन्धित होना भी आवश्यक है। वर्तमान समय में व्यक्ति को भौतिक संसाधनों से सम्पन्न बनाने में तथा नवयुवकों को उन व्यवसायों में सफल बनाना जो देश एवं समाज के लिये उपयोगी सिद्ध हों, शिक्षा का अभीष्ट दायित्व है।
मानव संसाधन विकास की अवधारणा
(Concept of Human Resource Development)
प्रारम्भ में यह मान्यता थी कि शिक्षा का मूल्य स्वयं शिक्षा में ही निहित है। 'ज्ञान-ज्ञान' के लिए है या 'शिक्षा-शिक्षा' के लिए है का नारा सर्वमान्य सिद्धान्त बना हुआ था। बालक के चारित्रिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए शिक्षा देने की परम्परा थी। शिक्षा को अनुत्पादक क्रिया माना जाता था और शिक्षा पर धन व्यय करना भावनात्मक कारणों से ही सम्भव था। जब शिक्षा का प्रसार हुआ, नामांकन संख्या बढ़ने लगी, व्यय में वृद्धि होने लगी और राज्य को शिक्षा पर अधिक धन खर्च करना पड़ा तो शिक्षाशास्त्रियों का ध्यान शिक्षा के आर्थिक पक्ष की ओर गया। वर्तमान समय में अर्थशास्त्र की धारणा बदली और इसमें मनुष्य की उन क्रियाओं के अध्ययन को प्रमुखता दी गयी जिसका सम्बन्ध धन से हो। मनुष्य समाज में रहता है और समाज में रहने के कारण उसकी अनेक आर्थिक समस्याएँ होती है। इन आर्थिक समस्याओं का विश्लेषण अर्थशास्त्र में होता है। डॉ. सगीर के अनुसार "अर्थशास्त्र मनुष्य के साधारण जीवन में व्यापार सम्बन्धी क्रियाओं का अध्ययन करता है। यह इस बात का पता लगाता है कि वह किस प्रकार धनोपार्जन करता है तथा उसका उपयोग करता है अतः यह एक ओर धन का अध्ययन करता है तो दूसरी ओर इससे भी अधिक महत्वपूर्ण पक्ष व्यक्ति का अध्ययन करता है।
अब अर्थशास्त्र को केवल धन का शास्त्र न मानकर धन, मनुष्य तथा मानव कल्याण से सम्बद्ध शास्त्र माना जाता है। इस प्रकार अर्थशास्त्र का सम्बन्ध शिक्षाशास्त्र से भी हो जाता है। इस में बालक के कल्याण का ध्यान रखा जाता है तथा व्यक्ति व समाज के नैतिक आदर्शों की विवेचना होती है। इसमें समाज-कल्याण व व्यक्ति-कल्याण की कल्पना को सजीव किया जाता है। शिक्षाशास्त्र अपना यह कार्य विद्यालयों की स्थापना, शिक्षकों की नियुक्ति, भवन-निर्माण, क्रीडागण व्यवस्था, परीक्षा-व्यवस्था एवं अन्य शैक्षिक कार्य-कलाप द्वारा सम्पन्न करता है। इस कार्य में धन की आवश्यकता होती है। धन की व्यवस्था व प्रबन्धन में इसे अर्थशास्त्र से सहायता मिलती है। अतः आजकल शिक्षा के अर्थशास्त्र का विकास हो रहा है।
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- प्रश्न- वैदिक काल में गुरुओं के शिष्यों के प्रति उत्तरदायित्वों का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य के परस्पर सम्बन्धों का विवेचनात्मक वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु यह किस सीमा तक प्रासंगिक है?
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा के कम से कम पाँच महत्त्वपूर्ण आदर्शों का उल्लेख कीजिए और आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए उनकी उपयोगिता बताइए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे? वैदिक काल में प्रचलित शिक्षा के मुख्य गुण एवं दोष बताइए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के प्रमुख गुण बताइए।
- प्रश्न- प्राचीन काल में शिक्षा से क्या अभिप्राय था? शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे?
- प्रश्न- वैदिककालीन उच्च शिक्षा का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा में प्रचलित समावर्तन और उपनयन संस्कारों का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का विकास तथा आध्यात्मिक उन्नति करना था। स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- आधुनिक काल में प्राचीन वैदिककालीन शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक शिक्षा में कक्षा नायकीय प्रणाली के महत्व की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- वैदिक कालीन शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं? शिक्षा के विभिन्न सम्प्रत्ययों का उल्लेख करते हुए उसके वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा का अर्थ लिखिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
- प्रश्न- शिक्षा के दार्शनिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के समाजशास्त्रीय सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के राजनीतिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के आर्थिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के मनोवैज्ञानिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- क्या मापन एवं मूल्यांकन शिक्षा का अंग है?
- प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए। आपको जो अब तक ज्ञात परिभाषाएँ हैं उनमें से कौन-सी आपकी राय में सर्वाधिक स्वीकार्य है और क्यों?
- प्रश्न- शिक्षा से तुम क्या समझते हो? शिक्षा की परिभाषाएँ लिखिए तथा उसकी विशेषताएँ बताइए।
- प्रश्न- शिक्षा का संकीर्ण तथा विस्तृत अर्थ बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा क्या है?
- प्रश्न- शिक्षा का 'शाब्दिक अर्थ बताइए।
- प्रश्न- शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी अपने शब्दों में परिभाषा दीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
- प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा की दो परिभाषाएँ लिखिए।
- प्रश्न- शिक्षा की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- आपके अनुसार शिक्षा की सर्वाधिक स्वीकार्य परिभाषा कौन-सी है और क्यों?
- प्रश्न- 'शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है।' जॉन डीवी के इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
- प्रश्न- 'शिक्षा भावी जीवन की तैयारी मात्र नहीं है, वरन् जीवन-यापन की प्रक्रिया है। जॉन डीवी के इस कथन को उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा विज्ञान है या कला या दोनों? स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ को स्पष्ट कीजिए तथा शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षा और साक्षरता पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए। इन दोनों में अन्तर व सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
- प्रश्न- शिक्षण और प्रशिक्षण के बारे में प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- विद्या, ज्ञान, शिक्षण प्रशिक्षण बनाम शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
- प्रश्न- विद्या और ज्ञान में अन्तर समझाइए।
- प्रश्न- शिक्षा और प्रशिक्षण के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।










