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फास्टर नोट्स-2018 बी. ए. प्रथम वर्ष शिक्षाशास्त्र प्रथम प्रश्नपत्र

यूनिवर्सिटी फास्टर नोट्स

प्रकाशक : कानपुर पब्लिशिंग होम प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 307
आईएसबीएन :0

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बी. ए. प्रथम वर्ष (सेमेस्टर-1) शिक्षाशास्त्र के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार हिन्दी माध्यम में सहायक-प्रश्नोत्तर

प्रश्न- राष्ट्रीय एकता की समस्या पर प्रकाश डालिए।

अथवा

राष्ट्रीय एकीकरण / एकता के मार्ग में कौन-कौन सी बाधाएँ है?

उत्तर-

राष्ट्रीय एकता की समस्या
(Problem of National Integration)

भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। भारत में अनेक धर्म, सम्प्रदाय, जातियाँ, वर्ण तथा भाषायें हैं जिनके कारण राष्ट्रीय एकता में बाधा आती है। आर्थिक विषमता तथा सामाजिक असमानताओं के कारण अलगाववादी शक्तियाँ अपना सिर उठा रही है। इस समय यदि हम राष्ट्रीय एकता के महत्व को नहीं समझे तो हमारी स्वतन्त्रता खतरे में आ जाएगी। नेहरू जी ने राष्ट्रीय एकता के विषय में ठीक ही कहा था कि - "अब निश्चित रूप से समय आ गया है कि प्रत्येक भारतीय को अपने अन्दर देखना चाहिए और अपने आप से यह पूछना चाहिए कि वह राष्ट्र के साथ है या किसी विशिष्ट समूह के साथ। यह हमारे समय की चुनौती है जिसका प्रत्येक व्यक्ति व बच्चों को सामना करना है। हमने बड़े संघर्ष के बाद जो स्वतन्त्रता प्राप्त की है इसकी सुरक्षा और समृद्धि के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है।
स्वतन्त्र भारत में आर्थिक, क्षेत्रीय, जातीय, भाषायी, अलगाववाद जिस अनुपात में बढ़ा है इसी अनुपात से राष्ट्रीय एकता की भावना घटती जा रही है। वस्तुतः हम राष्ट्रीय एकता की समस्या को 'अनेकता में एकता' जैसे नारों में परिवर्तित करके स्वयं को भरमाते रहे हैं।

राष्ट्रीय एकता की समस्या

राष्ट्रीय एकता की समस्याओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा रहा है -
1. जातिवाद (Casteism) - भारत की राष्ट्रीय एकता के मार्ग में जातिवाद प्रमुख समस्या है। प्रत्येक जाति अथवा धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म अथवा जाति के व्यक्ति से अपने को ऊँचा समझता है। इससे प्रत्येक व्यक्ति में एक-दूसरे के प्रति पृथकता की भावना इतना उग्र रूप धारण कर चुकी है कि इस संकुचित भावना को त्यागकर वह राष्ट्रीय हित के व्यापक दृष्टिकोण को अपनाने में असमर्थ है।
2. साम्प्रदायिकता (Communalism) - साम्प्रदायिकता भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में महत्वपूर्ण समस्या है। हमारे देश में हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि अनेक सम्प्रदाय हैं। यही नहीं इन सम्प्रदायों में भी अनेक सम्प्रदाय हैं। उदाहरण के लिए अकेला हिन्दू धर्म ही अनेक सम्प्रदायों में बँटा हुआ है। इन सभी सम्प्रदायों में आपसी विरोध तथा घृणा की भावना इस सीमा तक पहुँच गयी है कि एक सम्प्रदाय के व्यक्ति दूसरे सम्प्रदाय को एक आँख से नहीं देख सकते। प्रायः सभी सम्प्रदाय राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा केवल अपने-अपने साम्प्रदायिक हितों को पूरा करने में जुटे हुए हैं। इससे राष्ट्रीय एकता खतरे में पड गयी है।
3. प्रान्तीयता (Provincialism) - यह भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी समस्या है। हमारे देश में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् 'राज्य पुनर्गठन आयोग ने प्रशासन तथा जनता की विभिन्न सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए देश को चौदह राज्यों में विभाजित किया था। इस विभाजन के आज विघटनकारी परिणाम निकल रहे हैं। हम देखते हैं कि अब भी जहाँ एक ओर भाषा के आधार पर नए-नए राज्यों की माँग हो रही है वहीं दूसरी ओर प्रत्येक राज्य चाहता है कि इसका केन्द्रीय सरकार पर सिक्का जम जाए। इस संकुचित प्रान्तीयता की भावना के कारण देश के विभिन्न राज्यों में परस्पर वैमनस्य बढ़ता जा रहा है।
4. राजनीतिक दल (Political Parties) - हमारे देश में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् विभिन्न राजनीतिक दलों का निर्माण हुआ। खेद का विषय है कि इन राजनीतिक दलों में से कुछ ही दल जो सच्चे अर्थ में राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होते हुए अपना कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न कर रहे हैं।
5. आर्थिक विषमता (Economic Inequality) - हमारे देश में आर्थिक विषमता की खाई बहुत गहरी। मुट्ठी भर लोग अत्यधिक धनवान और अधिकांश लोग गरीब हैं। हर व्यक्ति में अधिक से अधिक धन की लोलुपता ने समाज में भ्रष्टाचार उत्पन्न किया है। गरीब व्यक्ति अपनी रोजी रोटी में इतना इलझा है कि वह राष्ट्रीय एकता की बात को सुनना या समझना नहीं चाहता। अर्थिक विषमता राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधक है। राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए आर्थिक विषमता को दूर करना आवश्यक है।
6. नेतृत्व का अभाव (Lack of Leadership) - जनतन्त्र की सफलता के लिए कुशल नेतृत्व का होना आवश्यक है जिसका हमारे देश में अभाव है। भाई भतीजावाद, धन और राजनीति में अपराधीकरण के कारण अच्छे लोग नेतृत्व संभालने के लिए आगे नहीं आते हैं। आज के नेताओं को जनता शंका की दृष्टि से देखती है क्योंकि ये अपने व्यक्तिगत लाभों को पूरा करने में अधिक व्यस्त हैं। अधिकांश नेता किसी न किसी घोटाले या भ्रष्टाचार में फँसे हुए हैं। देश के नेता अपने निहित स्वार्थो के लिए जातीयता, साम्प्रदायिकता और प्रान्तीयता के नाम पर जनता को भड़का रहे हैं। कुशल नेतृत्व ही देश को एकता के सूत्र में बाँधकर रख सकता है। राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए सफल, सुदृढ़ और स्वच्छ नेतृत्व की आवश्यकता है।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- वैदिक काल में गुरुओं के शिष्यों के प्रति उत्तरदायित्वों का वर्णन कीजिए।
  2. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य के परस्पर सम्बन्धों का विवेचनात्मक वर्णन कीजिए।
  3. प्रश्न- वैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु यह किस सीमा तक प्रासंगिक है?
  4. प्रश्न- वैदिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  5. प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा के कम से कम पाँच महत्त्वपूर्ण आदर्शों का उल्लेख कीजिए और आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए उनकी उपयोगिता बताइए।
  6. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे? वैदिक काल में प्रचलित शिक्षा के मुख्य गुण एवं दोष बताइए।
  7. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
  8. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा के प्रमुख गुण बताइए।
  9. प्रश्न- प्राचीन काल में शिक्षा से क्या अभिप्राय था? शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श क्या थे?
  10. प्रश्न- वैदिककालीन उच्च शिक्षा का वर्णन कीजिए।
  11. प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा में प्रचलित समावर्तन और उपनयन संस्कारों का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  12. प्रश्न- वैदिककालीन शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का विकास तथा आध्यात्मिक उन्नति करना था। स्पष्ट कीजिए।
  13. प्रश्न- आधुनिक काल में प्राचीन वैदिककालीन शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
  14. प्रश्न- वैदिक शिक्षा में कक्षा नायकीय प्रणाली के महत्व की विवेचना कीजिए।
  15. प्रश्न- वैदिक कालीन शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
  16. प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं? शिक्षा के विभिन्न सम्प्रत्ययों का उल्लेख करते हुए उसके वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
  17. प्रश्न- शिक्षा का अर्थ लिखिए।
  18. प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
  19. प्रश्न- शिक्षा के दार्शनिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  20. प्रश्न- शिक्षा के समाजशास्त्रीय सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  21. प्रश्न- शिक्षा के राजनीतिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  22. प्रश्न- शिक्षा के आर्थिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  23. प्रश्न- शिक्षा के मनोवैज्ञानिक सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए।
  24. प्रश्न- शिक्षा के वास्तविक सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए।
  25. प्रश्न- क्या मापन एवं मूल्यांकन शिक्षा का अंग है?
  26. प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए। आपको जो अब तक ज्ञात परिभाषाएँ हैं उनमें से कौन-सी आपकी राय में सर्वाधिक स्वीकार्य है और क्यों?
  27. प्रश्न- शिक्षा से तुम क्या समझते हो? शिक्षा की परिभाषाएँ लिखिए तथा उसकी विशेषताएँ बताइए।
  28. प्रश्न- शिक्षा का संकीर्ण तथा विस्तृत अर्थ बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा क्या है?
  29. प्रश्न- शिक्षा का 'शाब्दिक अर्थ बताइए।
  30. प्रश्न- शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी अपने शब्दों में परिभाषा दीजिए।
  31. प्रश्न- शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
  32. प्रश्न- शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
  33. प्रश्न- शिक्षा की दो परिभाषाएँ लिखिए।
  34. प्रश्न- शिक्षा की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  35. प्रश्न- आपके अनुसार शिक्षा की सर्वाधिक स्वीकार्य परिभाषा कौन-सी है और क्यों?
  36. प्रश्न- 'शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है।' जॉन डीवी के इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
  37. प्रश्न- 'शिक्षा भावी जीवन की तैयारी मात्र नहीं है, वरन् जीवन-यापन की प्रक्रिया है। जॉन डीवी के इस कथन को उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
  38. प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
  39. प्रश्न- शिक्षा विज्ञान है या कला या दोनों? स्पष्ट कीजिए।
  40. प्रश्न- शिक्षा की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
  41. प्रश्न- शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ को स्पष्ट कीजिए तथा शिक्षा के व्यापक व संकुचित अर्थ में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  42. प्रश्न- शिक्षा और साक्षरता पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए। इन दोनों में अन्तर व सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
  43. प्रश्न- शिक्षण और प्रशिक्षण के बारे में प्रकाश डालिए।
  44. प्रश्न- विद्या, ज्ञान, शिक्षण प्रशिक्षण बनाम शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
  45. प्रश्न- विद्या और ज्ञान में अन्तर समझाइए।
  46. प्रश्न- शिक्षा और प्रशिक्षण के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।

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