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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 चित्रकला - भारतीय वास्तुकला का इतिहास

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2803
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 चित्रकला - भारतीय वास्तुकला का इतिहास - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता की मूर्ति शिल्प कला किस प्रकार की थी?

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. सिन्धु घाटी सभ्यता की पाषाण मूर्तियाँ कैसी थीं?
2. सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त मोहरें किस प्रकार की थीं?

उत्तर-

मूर्ति शिल्प - सैन्धव सभ्यता के अन्तर्गत मूर्ति शिल्प का सम्यक विकास हुआ। यहाँ के नगरों की खुदाई में प्रस्तर, धातु तथा मिट्टी की मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं। प्रस्तर तथा धातु की मूर्तियाँ सीमित ही हैं, किन्तु कलात्मक दृष्टि से वे उच्चकोटि की हैं। पाषाण मूर्तियाँ इस प्रकार से हैं- 

पाषाण मूर्तियाँ - प्रस्तर मूर्तियों में सर्वप्रथम मोहनजोदड़ो से प्राप्त योगी अथवा पुरोहित की मूर्ति का उल्लेख किया जा सकता है। यह मूर्ति सेलखड़ी प्रस्तर से निर्मित है, जिसकी ऊँचाई 19 सेमी है। योगी की मूँछें नहीं हैं, किन्तु दाढ़ी विशेष रूप से सँवारी गई है। योगी के केश पीछे की ओर एक फीते से बाँधे गये हैं। मस्तक पर गोल अलंकरण है और यह बाँये कन्धे को ढकते हुए त्रिफुलिया अलंकरण वाली शाल ओढ़े हुए है। योगी के नेत्र - अर्धोन्मीलित हैं जिसके कारण यह मूर्ति अध्यात्म की ओर इंगित करती है। निचले होंठ भी मोटे हैं और योगी की दृष्टि नासाग्र पर टिकी हुई है तथा नाक का अग्र भाग खण्डित है। मस्तक पीछे की ओर ढलुआ तथा गोल है और मुँह की गोलाई बड़ी है। इस मूर्ति के केश विन्यास विशेष रूप से आकर्षक हैं। इस प्रकार की कुछ मूर्तियाँ मिस्र, किरीट तथा माइसने, मैसोपोटामिया आदि सभ्यताओं से भी प्राप्त होती हैं जिनका सम्बन्ध देवताओं से था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मोहनजोदड़ो की इस मूर्ति का अवश्य ही कोई धार्मिक महत्त्व होगा। कुछ विद्वानों का विचार है कि यह मूर्ति पुजारी की है जो सैन्धव सभ्यता के धार्मिक महत्ता का सूचक है। ऐसा लगता है कि सैन्धव सभ्यता में योग विद्या का जो प्रचार था उसी का प्रतिनिधित्व इस मूर्ति के द्वारा होता है।

इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो से कुछ अन्य प्रस्तर मूर्तियाँ भी मिली हैं जिसमें एक श्वेत पाषाण का पुरुष मस्तक है जिसमें पहली मूर्ति (योगी) की तरह कारीगरी नहीं मिलती है। एक दूसरी पाषाण मूर्ति जो मोहनजोदड़ो से ही प्राप्त है, यह श्वेत पाषण से निर्मित लगभग 10 इंच ऊँची एक संयुक्त पशुमूर्ति है जिसमें शरीर भेड़ का तथा मस्तक सूँढ़दार हाथी का है। सम्भवतः इस मूर्ति का कोई धार्मिक महत्त्व रहा होगा।

हड़प्पा की पाषाण मूर्तियाँ के विकसित स्वरूप के परिचायक हैं तथा यहाँ की मूर्तिकला मोहनजोदड़ो से भी श्रेष्ठतर है। हड़प्पा की प्रस्तर मूर्तियों में दो सिररहित मानव मूर्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दोनों ही मूर्तियों के पैर तथा मस्तक टूटे हुए हैं। हैं।

पहली मूर्ति लाल बलुए प्रस्तर से निर्मित है जो धड़ (शरीर का मध्य भाग) तक ही शेष है। मूर्ति नग्न अवस्था में है तथा हस्त, सिर, पाद खण्डित हैं। इस मूर्ति के हस्त, पाद एवं सिर पृथक रूप से जोड़े गये हैं। शरीर में स्थूल माँसपेशियाँ हैं। इस मूर्तिकी उभरी नसें व माँसपेशियाँ शरीर की प्रौढ़ता को इंगित करती है। मूर्ति में चिकनापन एवं पूर्ण सौन्दर्य व्याप्त है। इस प्रतिमा को कुछ विद्वान कोई जैन मूर्ति मानते हैं। किन्तु डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने इसे महानन्द देवता की मूर्ति माना है।

हड़प्पा से प्राप्त दूसरी मूर्ति भूरे सलेटी प्रस्तर की है। इस मूर्ति के भी पैर खण्डित हैं। इस मूर्ति में भी हस्त, ग्रीवा, स्कन्ध एवं सिर को पृथक रूप से जोड़ा गया है। इसके टूटे अंगों को एकत्रित करने से उत्तम कोटि के मूर्ति का निर्माण होता है। इस मूर्ति का दाहिना पैर धरती पर स्थिर है तथा बायाँ पैर नृत्य की मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। कमर से ऊपर के शरीर का भाग बाँये घूमा हुआ है और दोनों हस्त भी बाँये फैले हैं। यह एक ललित नृत्य मुद्रा की मूर्ति है जो नारी सुलभ कोमलता से परिपूर्ण है। डॉ० अग्रवाल ने इस मूर्ति को अर्थववेद में वर्णित महानग्नि देवी के रूप में माना है जो विश्व की प्रकृतिस्वरूपणी शाश्वती स्त्री या मातृदेवी की सूचक है।

धातु मूर्तियाँ - पाषाण के अतिरिक्त सैन्धव कलाकारों ने धातुओं से भी नयनाभिराम मूर्तियों का निर्माण किया। धातु निर्मित प्रतिमाओं में सर्वाधिक उल्लेखनीय मोहनजोदड़ो से प्राप्त 44 सेमी लम्बी एक नर्तकी की कांस्य मूर्ति है। यह सुन्दर एवं भाव युक्त है। इसके पैरों का निचला भाग क्षतिग्रस्त है और दाहिना हाथ कट्यावलम्बित मुद्रा में है। वामहस्त में कन्धे से कलाई तक चूड़ियाँ बनी हैं जिसे डॉ० अग्रवाल ने कटकावलि कहा है। दाहिने हाथ में बाजुबन्द तथा कलाई में दो चूड़ियाँ हैं। मूर्ति के केश घुंघराले हैं जो पीछे की ओर जूड़े में बँधे हुए हैं। गले में छोटा सा हार तथा कमर में मेखला है। नर्तकी के वाम पाद जो थोड़ा आगे बऐ हुए हैं, संगीत की लय के साथ उठते हुए जान पड़ते हैं। अपनी मुद्रा की सरलता एवं स्वाभाविकता के कारण यह मूर्ति सबको आश्चर्यचकित करती है।

नर्तकी की मूर्ति के अतिरिक्त मोहनजोदड़ो से ही काँसे की एक अन्य नर्तकी की मूर्ति भी मिली है लेकिन यह मूर्ति कलात्मक दृष्टि से उत्तम नहीं है। यहीं से ताँबे की दो अन्य मानव मूर्तियाँ भी मिलती हैं—पहली कमर पर हाथ रखे हुए तथा दूसरी हाथ ऊपर उठाये हुए है।

मृण्मूर्तियाँ - सैन्धव सभ्यता की ये मृण्मूर्तियाँ लाल रंग की ठोस पकाई हुई मिट्टी से निर्मित की गयी हैं और इन पर लाल मिट्टी का पोत और कहीं-कहीं चटक रंग भी हैं। ये मूर्तियाँ दो प्रकार की हैं - एक मनुष्यों की, जिनमें स्त्री, पुरुष दोनों की ही मूर्तियाँ हैं, दूसरी पशुओं की।

मोहनजोदड़ो से जो पुरुष मूर्तियाँ मिली हैं उनमें लम्बी नाक, साफ ठोढ़ी, लम्बी कटावदार आँखें, चिपकाया हुआ मुख और पीछे की ओर जाता हुआ ढलुआ माथा आदि प्राप्त होता है। कुछ मूर्तियों को छोड़कर बाकी सभी मूर्तियाँ नग्न हैं। पुरुष मूर्तियों को श्रृंगयुक्त दिखाया गया है। इनके साधारण गठन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन मूर्तियों को बनाने वाले कारीगर ने इनमें कोई विशेष रुचि नहीं ली थी।

मृण्मयी मूर्तियों में नारी मूर्तियाँ अपेक्षाकृत आकर्षक व प्रभावोत्पादक हैं। ये विभिन्न आभूषणों से लदी हुई हैं और इनके मस्तक पर पंखे के सदृश्य फैला हुआ आभरण, कानों में गोलाकार कुण्डल, कण्ठाहार, छाती पर कई लड़ियों वाला हार, कटि पर मेखला तथा भुजाओं में बाजुबन्द दर्शाये गये हैं। इनकी कमर में घुटनों तक लम्बा परिधान है और निचला भाग नग्न है। इनकी आँखें, स्तन, आभूषण आदि अलग से चिपकाये गये हैं। कुछ मूर्तियों की माँग में लाल रंग भरा गया है जिसे विद्वानों ने इन नारी मूर्तियों को मातादेवी की मूर्तियाँ बताया है, जो सैन्धव धर्म की सर्वप्रमुख देवता थीं। कुछ मूर्तियों की गोद में शिशु को भी दिखाया गया है जिससे उनका मातृत्व सूचित होता है। मातादेवी के अतिरिक्त कुछ सामान्य नारी मूर्तियाँ भी मिलती हैं जिन्हें आटा गूँथते या रोटी लिए हुए दिखाया गया है। नारी मूर्तियों की संख्या से स्पष्ट होता है कि सैन्धव लोगों के धार्मिक जीवन में मातृका पूजन का विशेष महत्त्व था और ये मूर्तियाँ देवी के कल्याणकारिणी स्वरूप की सूचक हैं। मानव मूर्तियों से कहीं अधिक संख्या में पशुओं की मृण्मूर्तियाँ बनायी गयी हैं। ये मूर्तियाँ कला की दृष्टि से उत्तम मानी जा सकती हैं। इनमें कूबड़दार वृषभ विशेष रूप से पाये गये हैं। अन्य पशुओं में हाथी, गैंडा, बन्दर, सुअर, बाघ, भालू, खरगोश, भैंसा, भेंडा आदि की मूर्तियाँ अधिक संख्या में मिली हैं। इसके साथ ही साथ विभिन्न पक्षियों जैसे-मोर, कबूतर, तोता, चील, गोरैया, मुर्गा, उलूक आदि की भी मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। हड़प्पा से मीन, कछुआ तथा नक्र की मृण्मूर्तियाँ मिलती हैं। सैन्धव स्थलों से प्राप्त बहुसंख्यक मृण्मूर्तियों में तीन चौथाई मृण्मूर्तियाँ पशुओं की ही हैं। इनमें वृषभ की आकृतियाँ अत्यधिक सौन्दर्यपूर्ण एवं आकर्षक हैं।

चित्रांकन  - सिन्धु नगरों की खुदाई से कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिला है कि जिससे यह स्पष्ट हो सके कि यहाँ चित्रकारों ने भित्तियों या पट्टों पर स्वतन्त्र चित्र संयोजन किया हो। फिर भी चित्रकारी का अनुमान मृदभाण्डों पर बने असंख्य अलंकरण इकाइयों से लगाया जा सकता है। मिट्टी के बर्तनों पर बने इन चिह्नित अलंकरणों को 'भाण्डालेख' भी कहते हैं। सैन्धव सभ्यता में मृदभाण्ड कला का अच्छा विकास हुआ। खुदाई में विभिन्न आकार-प्रकार के मिट्टी के बर्तन तथा उनके बहुसंख्यक टुकड़े पाये गये हैं। ये मृदभाण्ड मुख्यतः लाल या गुलाबी रंग के हैं और कुछ को लाल रंग से पोत कर काली रेखाओं से चित्र बनाये गये हैं। इन चित्रों में टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ, लहरदार रेखाएँ, त्रिभुज, बकरा, हिरन, मोर, मछली, मुर्गा, सूर्य, तारागण, विभिन्न वनस्पति-नीम, केला, खजूर, पीपल आदि तथा मत्स्य शल्क, जाल, चौकोर, तिकोन ज्यामितीय आकार, जलचर, फूल, पत्ती आदि अनेक रूप बनाये गये हैं। मानवाकृतियों का अंकन अल्प होते हुए भी वे आकर्षक और रोचक हैं जैसे-एक चित्र में कोई मछुआरा अपने कन्धों पर दो जालों की बहंगी उठाये हुए चल रहा है। एक शिकारी मृग का शिकार कर रहा है जिसके बाँयी ओर एक कुत्ता भी हिरन के शिकार हेतु तत्पर दिखाया गया है

बर्तन भाण्डों में अनाज रखने के बड़े कोठिले, पानी के घड़े, सुराही एवं मर्तबान, कटोरे, प्याले, नुकीली पेंदी के गिलास, श्मशान पात्र, टोंटीदार करवे आदि प्राप्त हुए हैं। ये चिकनी मिट्टी से बने हुए हैं तथा इन्हें लाल पोत देकर पकाया जाता था। पात्र अलंकरण हेतु लाल, गुलाबी, काले वर्णों का प्रयोग किया गया है। बर्तन चाक तथा हस्त दोनों से निर्मित हैं लेकिन चाक पर बनाये गये बर्तनों की अधिकता है। बर्तन भट्टों में भली-भाँति पकाये जाते थे और इन पर काँच का ओप (चमक) भी चढ़ाया गया है। बर्तन भाण्डों पर काँच की ओप चढ़ाने की प्रक्रिया सबसे पहले सिन्धु घाटी में ही पायी गयी है। मैसोपोटामिया, सीरिया, मिस्र व पश्चिमी एशिया में भी ऐसे आकर्षक प्रतीकात्मक अलंकरण नहीं मिले हैं जो हमें सिन्धु घाटी की सभ्यता से प्राप्त हुए हैं।

मुद्राएँ - सैन्धव कला के अन्तर्गत मुद्राओं अथवा मुहरों का विशिष्ट स्थान है जिनमें हमें रिलीफ स्थापत्य के दर्शन होते हैं और इस संस्कृति के निश्चित चिह्न हैं। सिन्धु घाटी से 1200 से अधिक मुहरें प्राप्त हुई हैं जो सेलजड़ी पत्थर से निर्मित हैं। इसके अतिरिक्त काँचली मिट्टी, चर्ट, गोमेद, मिट्टी आदि की बनी मुहरें भी हैं। अधिकांश मुहरें वर्गाकार या चौकोर हैं लेकिन कुछ गोलाकार व बेलनाकार भी हैं। मुहरों के पीछे छेद कर एक घुण्डी लगायी जाती थी जिसमें धागा डालकर काम में लाया जाता था। मुहरें सामान्यतः 2.8x2.8 सेमी आकार की हैं, जो मोटाई में करीब 1 इंच की हैं। ये कलात्मक दृष्टि से अत्युत्कृष्ट हैं तथा विश्व की महान कलाकृतियों में अपना स्थान रखती हैं। मुहरों पर वृषभ (छोटे सींगों वाला नटुआ बैल) का अंकन काफी लोकप्रिय था। एक मुहर पर चिह्नित वृषभ की आकृति अत्यन्त प्रशंसनीय है जिसमें उसे हँसा मारने की आक्रामक में अंकित किया गया है। यह अन्य मुहर में तीन व्याघ्रों के शरीर संयुक्त हैं। पशुपति शिव की एक मुहर मोहनजोदड़ो से मिली है। इसमें त्रिमुखी शिव को एक चौकी पर पदमासन की मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है तथा कुछ मुहरों पर स्वास्तिक, पीपल वृक्ष आदि उत्कीर्ण हैं।

हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से कुछ ताम्र मुद्राएँ भी मिली है जिन्हें विद्वानों ने ताबीज की संज्ञा दी है। इनको सिक्कों की भाँति प्रयोग में लाया जाता था। मोहनजोदड़ो से मिले एक मुद्रा छाप के अग्रभाग में छः मानव आकृतियाँ एक पंक्ति में बनी हैं तथा नीचे की ओर हाथ में हंसिया लिए एक झुकी हुई आकृति है। उसके सामने पीपल के वृक्ष के नीचे एक बकरा है। चित्र से ऐसा प्रतीत होता है कि देवी को प्रसन्न करने हेतु बकरे की बलि दिये जाने का अंकन है। कुछ मुहरों पर उकेरित रहस्यमयी चित्रलिपि भी है जो लगभग अपठित ही है। फिर भी भारत के कई विद्वजन इसे पढ़ने का दावा करते हैं।

सैन्धव सभ्यता के इन स्थलों से कलाकृतियों के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के आभूषण भी मिले हैं। ये सोने, चाँदी, मिट्टी, पत्थर आदि के बने हैं जो जौहरियों की कला के विकसित होने के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। यहाँ से प्राप्त आभूषणों के मनकों पर ज्यामितीय अलंकार उच्चकोटि के हैं। आभूषणों की सबसे बड़ी विशेषता सोने, साँदी और संगों से निर्मित मनकों या गुरिया है जिनकी शोभा देखते ही बनती है। इस प्रकार के आभूषण मैसोपोटामिया, ईरान, सुमेरियन, मिस्र, बेबीलोनियन सभ्यताओं में भी पायी गयी हैं। किन्तु सिन्धु सभ्यता के प्रत्येक कला क्षेत्र (वास्तु, शिल्प, चित्र, मृतका) में इन सभ्यताओं की चमक फीकी ही है। सर जॉन मार्शल का कथन है कि, "यहाँ साधारण नागरिक सुविधा और विलास का जिस मात्रा में उपयोग करता था, उसकी तुलना समकालीन सभ्य जगत के अन्य क्षेत्रों से सम्भव नहीं हो सकती है।

सैन्धव कला भारतीय कला के इतिहास में किसी प्रारम्भिक अवस्था को व्यक्त न करके पूर्ण विकसित अवस्था को व्यक्त करती है। निश्चित रूप से धर्म और भारतीय लिपि की तरह ही कला की परम्परा का मूल स्रोत सिन्धु सभ्यता को ही माना जाना चाहिए। स्टेला क्रमरिश ने कहा है कि, "जिस भारतीय कला ने प्रत्येक काल में अपनी अक्षुण्ण परम्परा को प्रतिष्ठित किया है, उसका स्रोत सिन्धु घाटी की कला से ही प्रभावित होता है।"

इस उन्नत कलामय सभ्यता के समाप्त होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। मार्शल, मैके आदि विद्वान इस सभ्यता का विनाश एक मात्र नदी की बाढ़ के कारण हुआ मानते हैं। पुराविद् बी०बी० लाल के अनुसार, "जलवायु परिवर्तन, प्रदूषित वातावरण तथा व्यापार में भारी गिरावट के कारण ही इस सभ्यता के कारण जो भी रहे हों, लेकिन यह सभ्यता अपने धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक रीति-रिवाज व अपनी उत्कृष्ट कला थाती को आगे आने वाली पीढ़ी को सौंप कर स्वयं सदा-सदा के लिए अमर हो गयी।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- 'सिन्धु घाटी स्थापत्य' शीर्षक पर एक निबन्ध लिखिए।
  2. प्रश्न- मोहनजोदड़ो व हड़प्पा के कला नमूने विकसित कला के हैं। कैसे?
  3. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज किसने की तथा वहाँ का स्वरूप कैसा था?
  4. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता की मूर्ति शिल्प कला किस प्रकार की थी?
  5. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेष कहाँ-कहाँ प्राप्त हुए हैं?
  6. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता का पतन किस प्रकार हुआ?
  7. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता के चरण कितने हैं?
  8. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता का नगर विन्यास तथा कृषि कार्य कैसा था?
  9. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था तथा शिल्पकला कैसी थी?
  10. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता की संस्थाओं और धार्मिक विचारों पर लेख लिखिए।
  11. प्रश्न- प्राचीन भारतीय वास्तुकला का परिचय दीजिए।
  12. प्रश्न- भारत की प्रागैतिहासिक कला पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
  13. प्रश्न- प्रागैतिहासिक कला की प्रविधि एवं विशेषताएँ बताइए।
  14. प्रश्न- बाघ की गुफाओं के चित्रों का वर्णन एवं उनकी सराहना कीजिए।
  15. प्रश्न- 'बादामी गुफा के चित्रों' के सम्बन्ध में पूर्ण विवरण दीजिए।
  16. प्रश्न- प्रारम्भिक भारतीय रॉक कट गुफाएँ कहाँ मिली हैं?
  17. प्रश्न- दूसरी शताब्दी के बाद गुफाओं का निर्माण कार्य किस ओर अग्रसर हुआ?
  18. प्रश्न- बौद्ध काल की चित्रकला का परिचय दीजिए।
  19. प्रश्न- गुप्तकाल को कला का स्वर्ण काल क्यों कहा जाता है?
  20. प्रश्न- गुप्तकाल की मूर्तिकला पर एक लेख लिखिए।
  21. प्रश्न- गुप्तकालीन मूर्तिकला के विषय में आप क्या जानते हैं?
  22. प्रश्न- गुप्तकालीन मन्दिरों में की गई कारीगरी का वर्णन कीजिए।
  23. प्रश्न- गुप्तकालीन बौद्ध मूर्तियाँ कैसी थीं?
  24. प्रश्न- गुप्तकाल का पारिवारिक जीवन कैसा था?
  25. प्रश्न- गुप्तकाल में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी?
  26. प्रश्न- गुप्तकालीन मूर्तिकला में किन-किन धातुओं का प्रयोग किया गया था?
  27. प्रश्न- गुप्तकालीन मूर्तिकला के विकास पर प्रकाश डालिए।
  28. प्रश्न- गुप्तकालीन मूर्तिकला के केन्द्र कहाँ-कहाँ स्थित हैं?
  29. प्रश्न- भारतीय प्रमुख प्राचीन मन्दिर वास्तुकला पर एक निबन्ध लिखिए।
  30. प्रश्न- भारत की प्राचीन स्थापत्य कला में मन्दिरों का क्या स्थान है?
  31. प्रश्न- प्रारम्भिक हिन्दू मन्दिर कौन-से हैं?
  32. प्रश्न- भारतीय मन्दिर वास्तुकला की प्रमुख शैलियाँ कौन-सी हैं? तथा इसके सिद्धान्त कौन-से हैं?
  33. प्रश्न- हिन्दू मन्दिर की वास्तुकला कितने प्रकार की होती है?
  34. प्रश्न- जैन धर्म से सम्बन्धित मन्दिर कहाँ-कहाँ प्राप्त हुए हैं?
  35. प्रश्न- खजुराहो के मूर्ति शिल्प के विषय में आप क्या जानते हैं?
  36. प्रश्न- भारत में जैन मन्दिर कहाँ-कहाँ मिले हैं?
  37. प्रश्न- इंडो-इस्लामिक वास्तुकला कहाँ की देन हैं? वर्णन कीजिए।
  38. प्रश्न- भारत में इस्लामी वास्तुकला के लोकप्रिय उदाहरण कौन से हैं?
  39. प्रश्न- इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला की इमारतों का परिचय दीजिए।
  40. प्रश्न- इण्डो इस्लामिक वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने के रूप में ताजमहल की कारीगरी का वर्णन दीजिए।
  41. प्रश्न- दिल्ली सल्तनत द्वारा कौन सी शैली की विशेषताएँ पसंद की जाती थीं?
  42. प्रश्न- इंडो इस्लामिक वास्तुकला की विशेषताएँ बताइए।
  43. प्रश्न- भारत में इस्लामी वास्तुकला की विशेषताएँ बताइए।
  44. प्रश्न- इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला में हमें किस-किसके उदाहरण देखने को मिलते हैं?
  45. प्रश्न- इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला को परम्परा की दृष्टि से कितनी श्रेणियों में बाँटा जाता है?
  46. प्रश्न- इण्डो-इस्लामिक आर्किटेक्ट्स के पीछे का इतिहास क्या है?
  47. प्रश्न- इण्डो-इस्लामिक आर्किटेक्ट्स की विभिन्न विशेषताएँ क्या हैं?
  48. प्रश्न- भारत इस्लामी वास्तुकला के उदाहरण क्या हैं?
  49. प्रश्न- भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना कैसे हुई? तथा अपने काल में इन्होंने कला के क्षेत्र में क्या कार्य किए?
  50. प्रश्न- मुख्य मुगल स्मारक कौन से हैं?
  51. प्रश्न- मुगल वास्तुकला के अभिलक्षणिक अवयव कौन से हैं?
  52. प्रश्न- भारत में मुगल वास्तुकला को आकार देने वाली 10 इमारतें कौन सी हैं?
  53. प्रश्न- जहाँगीर की चित्रकला शैली की विशेषताएँ लिखिए।
  54. प्रश्न- शाहजहाँ कालीन चित्रकला मुगल शैली पर प्रकाश डालिए।
  55. प्रश्न- मुगल वास्तुकला की विशेषताएँ बताइए।
  56. प्रश्न- अकबर कालीन मुगल शैली की विशेषताएँ लिखिए।
  57. प्रश्न- मुगल वास्तुकला किसका मिश्रण है?
  58. प्रश्न- मुगल कौन थे?
  59. प्रश्न- मुगल वास्तुकला की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
  60. प्रश्न- भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना कैसे हुई? तथा अपने काल में इन्होंने कला के क्षेत्र में क्या कार्य किए?
  61. प्रश्न- राजस्थान की वास्तुकला का परिचय दीजिए।
  62. प्रश्न- राजस्थानी वास्तुकला पर निबन्ध लिखिए तथा उदाहरण भी दीजिए।
  63. प्रश्न- राजस्थान के पाँच शीर्ष वास्तुशिल्प कार्यों का परिचय दीजिए।
  64. प्रश्न- हवेली से क्या तात्पर्य है?
  65. प्रश्न- राजस्थानी शैली के कुछ उदाहरण दीजिए।

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