लोगों की राय

बी ए - एम ए >> बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 शिक्षाशास्त्र - शैक्षिक आकलन

बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 शिक्षाशास्त्र - शैक्षिक आकलन

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2799
आईएसबीएन :0

Like this Hindi book 0

5 पाठक हैं

बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 शिक्षाशास्त्र - शैक्षिक आकलन - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- व्यक्तित्व के विभिन्न उपागमों या सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।

अथवा
मनोविश्लेषण सिद्धान्त पर टिप्पणी लिखिये।
अथवा
युंग के नव्य विश्लेषणात्मक सिद्धान्त का वर्णन कीजिये।
अथवा
एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धान्त का वर्णन कीजिये।
अथवा
सामाजिक अधिगम सिद्धान्त का वर्णन कीजिये।
अथवा
मानवतावादी सिद्धान्त का वर्णन कीजिये।
अथवा
शीलगुण सिद्धान्त का वर्णन कीजिये।
अथवा
व्यक्तित्व का शीलगुण उपागम।

उत्तर -

फ्रायड का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त

(Freud's Psychoanalytical Theory)

मनोविश्लेषणवाद के संस्थापक डा. सिग्मण्ड फ्रायड (Dr. Sigmond Freud) ने व्यक्तित्व की व्याख्या गहन तथा विस्तृत रूप से की है। यह सिद्धान्त उनके चालीस वर्षों ( 1900- 1940) के शोध अनुभवों पर आधारित है। फ्रायड ने व्यक्तित्व के विकास के लिये व्यक्ति के जीवन के आरम्भिक पाँच वर्षों को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार आरम्भिक पाँच वर्षों में बालक के विकास का सम्पूर्ण ढांचा तैयार हो जाता है और शेष जीवन में वह उस ढांचे को विस्तार ही देता रहता है। फ्रायड ने इसे विकास को पाँच भागों में बाँटा है। उनके अनुसार सबसे पहले मुखवर्ती अवस्था में बालक अपना अंगूठा मुख में डाल कर चूसता है और सन्तुष्टि का अनुभव करता है। गुदावस्था में वह मलमूत्र इत्यादि गन्दी वस्तुओं को स्पर्श करता है, खेलता है तथा रोकने पर नाराजगी व्यक्त करता है। लैंगिक अवस्था मे वह लैंगिक अंगों (Sex organs) को स्पर्श करके आनन्द का अनुभव करता है। अव्यक्त अवस्था में उसमें लैंगिक आनन्द की भावनाएँ दब जाती हैं और उसका ध्यान बाहरी वातावरण पर केन्द्रित हो जाता है। अन्तिम अवस्था, जननिक अवस्था में विपरीत लिंगीयों के प्रति उसका आकर्षण बढ़ जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि फ्रायड ने लैंगिकता का उपयोग व्यापक अर्थों में किया है।

फ्रायड का मत है कि मनोलैंगिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं मे बालक को जिस प्रकार के अनुभव होंगे उसी प्रकार का उसका व्यक्तित्व भी विकसित होगा। फ्रायड ने इस प्रकार विकसित होने वाले व्यक्तित्व की संरचना में तीन घटक इद्म (Id), अहम् (Ego) तथा पराअहम ( Super ego ) का वर्णन किया है। फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व का मूल स्रोत इद्म (Id) ही है जो नवजात शिशु में विद्यमान रहता है। इसी से बाद में अहम् तथा पराअहम् का विकास होता है। इसी में यौन तथा आक्रामकता सहित सभी अन्तर्नोद रहते हैं। इसी में लैंगिक ऊर्जा पायी जाती है जिसे लैंगिक शक्ति (Libio) कहते हैं। अहम् वास्तविकता सिद्धान्त ( Reality Principle) का अनुसरण करता है तथा पराअहम सामाजिक मान्यताओं, मूल्यों, आदर्शों तथा प्रचलनों का प्रतिनिधित्व करता है।

 

नव्य मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त

(Neo-Psychoanlytical Theory)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन फ्रायड के शिष्य युंग (Young, 1931) ने किया है। युंग ने फ्रायड द्वारा लैंगिक कारकों पर अधिक बल देने पर आपत्ति करते हुए कहा है कि व्यक्तित्व के विकास के लिए कुछ अन्य मूल प्रवृत्तियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने व्यक्ति के लक्ष्यों (Goals) एवं आकांक्षाओं (Aspirations) पर अधिक बल दिया है। युंग के अनुसार व्यक्ति के व्यवहार पर व्यक्तिगत अचेतन (Personal unconscious) के अतिरिक्त सामूहिक अचेतन (Collective unconcious) का भी प्रभाव पड़ता है जिसे वह अनुवांशिकता से प्राप्त करता है। इसी में प्रत्येक प्रकार के व्यवहार एवं स्मृतियाँ पायी जाती हैं। सामूहिक अचेतन का निर्माण पीढ़ी दर पीढ़ी के अनुभवों में होता है और यही व्यवहार का निर्देशन करता है। युंग के अतिरिक्त अन्य नव-मनोविश्लेषणात्मकवादियों ने भी फ्रायड की मूल प्रवत्यात्मक एवं लैंगिक कारकों को अधिक बल देने के कारण आलोचना की है। इस विचार के समर्थकों में प्रमुख एडलर (Adler 1930), हार्नी (Horney, 1937) फ्राम (Fromm 1941), सलिवान ( Sullian) आदि प्रमुख हैं। इनका विचार है कि व्यक्ति जिस समाज में रहता है उस समाज की विशेषताओं की छाप उसके व्यक्तित्व पर अवश्य पड़ती है। इन्होंने मूल प्रवृत्तियों के बजाय समाज की संस्कृति के प्रभाव पर अधिक बल दिया हैं। इनका यह भी मानना है कि इदद्म (Id) की अपेक्षा अहम् (Ego ) अधिक महत्वपूर्ण है और इसका विकास स्वतन्त्र रूप से होता है इसका अपना स्वयं का शक्ति स्रोत होता है तथा इसका कार्यक्षेत्र भी व्यापक है।

 

मनोसामाजिक सिद्धान्त

(Psycho Social Theory)

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक एरिक्सन (Erikson, 1963) द्वारा किया गया है। ये भी मूल रूप से मनोविश्लेषणवादी रहे हैं परन्तु इनका मानना है कि व्यक्तित्व के विकास में जैविक कारकों की अपेक्षा सामाजिक कारकों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है। बच्चे को अपने जीवन में जिस प्रकार की सामाजिक अनुभूतियाँ होंगी उसी के अनुरूप विकास के प्रतिमान भी प्रदर्शित होंगे। फ्रायड की भांति एरिक्सन का भी मानना है कि विकास की एक अवधि में बालक को जो अनुभव होता है वह आगामी विकास को भी प्रभावित करता है। एरिक्सन ने इदम् (Id) की अपेक्षा अहम् - (Ego ) को अधिक महत्वपूर्ण बताया है। इनकी मान्यता है कि व्यक्ति की वास्तविकताओं को समझकर उसके जीवन को सन्तुलित बनाया जा सकता है। इसके अनुसार बालक का सामाजिक परिवेश उसके व्यक्तित्व के विकास को सर्वाधिक प्रभावित करता है। एरिक्सन ने व्यक्तित्व के विकास को आठ अवस्थाओं में विभाजित किया है।

सामाजिक अधिगम सिद्धान्त
(Social Learning Theory)

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक डालर एवं 'मिलर (Dollar and Miller, 1941) बण्डुरा (Bandura, 1973) आदि हैं। सामाजिक अधिगम सिद्धान्तवादी व्यक्ति के विकास में सामाजिक अधिगम को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका सामाजिक अधिगम से तात्पर्य बालक द्वारा अपने परिवेश के साथ घटित होने वाली अन्तः क्रिया द्वारा विभिन्न प्रकार के व्यवहारों के अर्जन से होता है। इस विचारधारा के समर्थकों का मानना है कि व्यक्तित्व व्यक्तिगत कारकों तथा परिस्थितिजन्य कारकों के मध्य होने वाली अन्तः क्रिया का परिणाम है। इसे प्रक्षेणात्मक या अनुकरणात्मक अधिगम भी कहते हैं क्योंकि बच्चे प्रारम्भ में अपने माता-पिता तथा थोड़ा बड़ा होने पर अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों के व्यवहारों का अनुकरण करते हैं तथा वैसा ही बनना चाहते हैं। इस सिद्धान्त के प्रमुख प्रत्यय नमूना या आदर्श, प्रेक्षण, अनुकरण, ध्यान, धारणा, क्रियात्मक पुनरावृत्ति, अभिप्रेरणा, तादात्मीकरण आदि हैं।

मानवतावादी सिद्धान्त
(Humanistic Theory)

मानवतावादी व्यक्तित्व सिद्धान्त के प्रतिपादक कार्ल रोजर्स (Carl Rogors, 1970) तथा अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow, 1970) हैं। यह सिद्धान्त व्यक्तित्व के विकास में स्व की अवधारणा (Concept of sel) एवं व्यक्ति की वैयक्तिक अनुभूतियों (Individual experiences) को ही सर्वाधिक महत्व देता है। इनके अनुसार व्यक्तित्व का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किंस रूप में स्वयं अपने आपको तथा अपनी अनुभूतियों को समझता है और विश्व के बारे में उसके विचार किस प्रकार के हैं। रोजर्स ने व्यक्तित्व की व्याख्या में आत्म या स्व (Self) को सर्वाधिक महत्व दिया है क्योंकि स्व का प्रभाव व्यक्ति के प्रत्यक्षीकरण तथा व्यवहार पर पड़ता है और यही व्यवहार का निर्धारक है। इस सिद्धान्त के दूसरे प्रबल समर्थक मैस्लो ने व्यक्तित्व के समुचित विकास के लिए आत्मसिद्धि (Self-actualization) को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार व्यक्ति में पाँच प्रकार की आवश्यकताएँ होती हैं। ये आवश्यकतायें क्रमशः दैहिक, सुरक्षा, सम्बन्ध एवं प्यार, आत्म प्रतिष्ठा तथा आत्मसिद्धि हैं। इनका विकास क्रमशः होता है। जीवन के आरम्भ में व्यववहार पर दैहिक एवं सुरक्षा की आवश्यकता का प्रभाव अधिक पड़ता है किन्तु आगे चलकर अन्य आवश्यकतायें भी व्यक्तित्व को अधिक प्रभावित करती हैं। आत्मसिद्धि सर्वोच्च आवश्यकता है जिसमें व्यक्ति में विवेक, सहिष्णुता, वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन एवं स्वतन्त्र चिन्तन आदि का विकास होता है। जिसके परिणामस्वरूप स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

शीलगुण सिद्धान्त
(Trait Theories)

शीलगुण सिद्धान्त व्यक्तित्व के विकास के बजाय व्यक्तित्व की विशेषताओं पर अधिक बल देते हैं। इस सिद्धान्त के प्रतिपादकों, आलपोर्ट, एडवर्ड, कैटेल, आइजनेक एवं गार्डन आदि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्ति की अनुक्रियाएँ तथा उसके व्यवहार उसकी व्यक्तित्व प्रणाली के शीलगुणों द्वारा निर्धारित होते हैं। व्यक्तित्व के वैज्ञानिक अध्ययन में इसी सिद्धान्त का उपयोग सर्वाधिक हुआ है। इसके अन्तर्गत कारक विश्लेषण के आधार पर व्यक्तित्व प्रणाली में पाये जाने वाले अनेक गुणों का पता लगाया गया है। कैटेल के अनुसार कुछ शीलगुण अनुवांशिकता पर निर्भर होते हैं तथा कुछ का विकास पर्यावरण द्वारा निर्धारित होता है। इसमें प्रथम प्रकार के शीलगुण संरचनात्मक शीलगुण (Constitutional traits) दूसरे पर्यावरणीय निर्धारित शीलगुण (Environment mold traits) होते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि भिन्न-भिन्न विद्वानों ने व्यक्तित्व के अध्ययन के लिए भिन्न भिन्न सिद्धान्तों की व्याख्या की है। इनमें से कोई भी सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं है। यह समस्या आरम्भ से ही बनी हुई है और निकट भविष्य में भी इसके निदान की कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

    अनुक्रम

  1. प्रश्न- शिक्षा में मापन के अर्थ एवं विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
  2. प्रश्न- मापन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  3. प्रश्न- शैक्षिक मापन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  4. प्रश्न- मापन की उपयोगिता एवं महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
  5. प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र में मूल्यांकन की अवधारणा एवं अर्थ को स्पष्ट करते हुए इसकी उपयोगिता भी स्पष्ट कीजिए।
  6. प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र में मूल्यांकन का अर्थ स्पष्ट कीजिए !
  7. प्रश्न- शिक्षा के क्षेत्र में मूल्यांकन की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
  8. प्रश्न- मापन और मूल्यांकन में सम्बन्ध बताइए।
  9. प्रश्न- मापन एवं मूल्याँकन में क्या अन्तर है? शिक्षा में इनकी क्या आवश्यकता है?
  10. प्रश्न- शिक्षा में मूल्यांकन के उद्देश्य और कार्यों का उल्लेख कीजिए।
  11. प्रश्न- सतत् और व्यापक मूल्यांकन से आप क्या समझते हैं? विस्तार से वर्णन कीजिए।
  12. प्रश्न- आकलन क्या है तथा आकलन क्यों किया जाता है? विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं के आधार पर परिभाषित कीजिए।
  13. प्रश्न- आकलन के क्षेत्र उनकी आवश्यकता तथा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में आकलन की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
  14. प्रश्न- शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में आकलन के प्रकार तथा इसकी विशेषताएँ एवं उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए।
  15. प्रश्न- आकलन के प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए।
  16. प्रश्न- आकलन प्रक्रिया के सोपान कौन-कौन से हैं?
  17. प्रश्न- भौतिक तथा मानसिक मापन क्या होता है? इनका तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
  18. प्रश्न- सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन का अर्थ एवं परिभाषा दीजिए। सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन के उद्देश्यों तथा उसके स्वरूप का वर्णन कीजिए।
  19. प्रश्न- अच्छे मापन की विशेषतायें बताइये।
  20. प्रश्न- मापन कितने प्रकार का होता है?
  21. प्रश्न- शैक्षिक मापन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  22. प्रश्न- मापन के प्रमुख कार्य बताइये।
  23. प्रश्न- मापन एवं मूल्यांकन के विशिष्ट उद्देश्य बताइए।
  24. प्रश्न- सतत् तथा व्यापक मूल्यांकन का क्या महत्त्व है? वर्णन कीजिए।
  25. प्रश्न- सतत् और व्यापक मूल्यांकन की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
  26. प्रश्न- परीक्षण मानक को विस्तार से समझाइये।
  27. प्रश्न- मानक से आप क्या समझते हैं? ये कितने प्रकार के होते है? अच्छे मानकों की विशेषताएँ बताइए।
  28. प्रश्न- मानक कितने प्रकार के होते हैं?
  29. प्रश्न- अच्छे मानकों की विशेषताएँ बताइए।
  30. प्रश्न- अंकन तथा ग्रेडिंग प्रणाली का अर्थ बताते हुए दोनों के बीच क्या अन्तर है? व्याख्या कीजिए।
  31. प्रश्न- वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रचलित क्रेडिट सिस्टम क्या है? इसके लाभ और हानि पर प्रकाश डालिए।
  32. प्रश्न- मानक परीक्षण 'मानक' क्या होते हैं?
  33. प्रश्न- मानक क्या है? मानकों के प्रकार बताइये।
  34. प्रश्न- उपलब्धि परीक्षण से क्या आशय है? इसके उद्देश्य एवं महत्व को स्पष्ट कीजिए।
  35. प्रश्न- उपलब्धि परीक्षणों के उद्देश्य बताइये।
  36. प्रश्न- उपलब्धि परीक्षणों का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
  37. प्रश्न- प्रमापीकृत परीक्षण का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताओं को बताइये।
  38. प्रश्न- प्रमापीकृत परीक्षण की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
  39. प्रश्न- एक अच्छे परीक्षण से आप क्या समझते हैं? एक अच्छे परीक्षण की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  40. प्रश्न- एक अच्छे परीक्षण की विशेषतायें बताइये।
  41. प्रश्न- परीक्षण से आप क्या समझते हैं? इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
  42. प्रश्न- परीक्षण की प्रकृति के आधार पर परीक्षणों के प्रकार लिखिए।
  43. प्रश्न- परीक्षण के द्वारा मापे जा रहे गुणों के आधार पर परीक्षणों के प्रकार लिखिए।
  44. प्रश्न- परीक्षण के प्रशासन के आधार पर परीक्षणों के विभिन्न प्रकारों को बताइये।
  45. प्रश्न- परीक्षणों में प्रयुक्त प्रश्नों के आधार पर परीक्षणों के विभिन्न प्रकार लिखिए।
  46. प्रश्न- प्रश्नों के उत्तर के फलांकन के आधार पर परीक्षणों का वर्गीकरण, कीजिए।
  47. प्रश्न- परीक्षण में लगने वाले समय के आधार पर परीक्षणों के प्रकार लिखिए।
  48. प्रश्न- "निबन्धात्मक परीक्षण की कमियों को दूर करने के लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षण की आवश्यकता है।" इस कथन के सन्दर्भ में वस्तुनिष्ठ परीक्षण की उपयोगिता का वर्णन कीजिए।
  49. प्रश्न- निबन्धात्मक परीक्षाओं के गुण एवं दोषों का वर्णन कीजिए।
  50. प्रश्न- निबन्धात्मक परीक्षाओं के दोषों का वर्णन कीजिए।
  51. प्रश्न- वस्तुनिष्ठ परीक्षण का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इसके उद्देश्य, गुण व दोषों की विवेचना कीजिए।
  52. प्रश्न- वस्तुनिष्ठ परीक्षण के उद्देश्य बताइए।
  53. प्रश्न- वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के प्रमुख गुणों का वर्णन कीजिए।
  54. प्रश्न- वस्तुनिष्ठ परीक्षण के प्रमुख दोषों का वर्णन कीजिए।
  55. प्रश्न- परीक्षणों का वर्गीकरण कीजिए।
  56. प्रश्न- मापीकृत उपलब्धि परीक्षण और अध्यापककृत उपलब्धि परीक्षणों में अन्तर बताइये।
  57. प्रश्न- बुद्धि के प्रत्यय / अवधारणा को बताते हुए उसके अर्थ एवं परिभाषा तथा बुद्धि की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  58. प्रश्न- बुद्धि को परिभाषित कीजिये। इसके विभिन्न प्रकारों तथा बुद्धिलब्धि के प्रत्यय का वर्णन कीजिए।
  59. प्रश्न- बुद्धि परीक्षण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों तथा महत्व का वर्णन कीजिए।
  60. प्रश्न- गिलफोर्ड के त्रिआयामी बुद्धि सिद्धान्त का वर्णन कीजिये।
  61. प्रश्न- 'बुद्धि आनुवांशिकता से प्रभावित होती है या वातावरण से। स्पष्ट कीजिये।
  62. प्रश्न- बुद्धि के प्रमुख सिद्धान्तों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  63. प्रश्न- व्यक्तिगत एवं सामूहिक बुद्धि परीक्षण से आप क्या समझते हैं? व्यक्तिगत तथा सामूहिक बुद्धि परीक्षण की विशेषताएँ एवं सीमाएँ बताइये।
  64. प्रश्न- व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षण की विशेषताएँ बताइये।
  65. प्रश्न- व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षण की सीमायें बताइये।
  66. प्रश्न- सामूहिक बुद्धि परीक्षण से आप क्या समझते हैं?
  67. प्रश्न- सामूहिक बुद्धि परीक्षण की विशेषताएँ बताइए।
  68. प्रश्न- सामूहिक बुद्धि परीक्षण की सीमाएँ बताइए।
  69. प्रश्न- संवेगात्मक बुद्धि से आप क्या समझते हैं? संवेगात्मक लब्धि के विचार पर टिप्पणी लिखिये।
  70. प्रश्न- बुद्धि से आप क्या समझते हैं? बुद्धि के प्रकार बताइये।
  71. प्रश्न- वंशानुक्रम तथा वातावरण बुद्धि को किस प्रकार प्रभावित करता है?
  72. प्रश्न- संस्कृति परीक्षण को किस प्रकार प्रभावित करती है?
  73. प्रश्न- परीक्षण प्राप्तांकों की व्याख्या से क्या आशय है?
  74. प्रश्न- उदाहरण सहित बुद्धि-लब्धि के प्रत्यन को स्पष्ट कीजिए।
  75. प्रश्न- बुद्धि परीक्षणों के उपयोग बताइये।
  76. प्रश्न- बुद्धि लब्धि तथा विचलन बुद्धि लब्धि के अन्तर को उदाहरण सहित समझाइए।
  77. प्रश्न- बुद्धि लब्धि व बुद्धि के निर्धारक तत्व बताइये।
  78. प्रश्न- शाब्दिक एवं अशाब्दिक बुद्धि परीक्षणों के अंतर को उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
  79. प्रश्न- व्यक्तित्व क्या है? उनका निर्धारण कैसे होता है? व्यक्तित्व की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
  80. प्रश्न- व्यक्तित्व के जैविक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक निर्धारकों का वर्णन कीजिए।
  81. प्रश्न- व्यक्तित्व से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयुक्त परिभाषा देते हुए इसके अर्थ को स्पष्ट कीजिये।
  82. प्रश्न- व्यक्तित्व कितने प्रकार के होते हैं? विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व का वर्गीकरण किस प्रकार किया है?
  83. प्रश्न- व्यक्तित्व के विभिन्न उपागमों या सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।
  84. प्रश्न- व्यक्तित्व पर ऑलपोर्ट के योगदान की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।-
  85. प्रश्न- कैटेल द्वारा बताए गए व्यक्तित्व के शीलगुणों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
  86. प्रश्न- व्यक्ति के विकास की व्याख्या फ्रायड ने किस प्रकार दी है? संक्षेप में बताइए।
  87. प्रश्न- फ्रायड ने व्यक्तित्व की गतिकी की व्याख्या किस आधार पर की है?
  88. प्रश्न- व्यक्तित्व के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
  89. प्रश्न- व्यक्तित्व के मानवतावादी सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
  90. प्रश्न- कार्ल रोजर्स ने अपने सिद्धान्त में व्यक्तित्व की व्याख्या किस प्रकार की है? वर्णन कीजिए।
  91. प्रश्न- व्यक्तित्व सूचियाँ क्या होती हैं तथा इसके ऐतिहासिक विकास क्रम के बारे में समझाइए?
  92. प्रश्न- व्यक्तित्व के शीलगुणों का वर्णन कीजिये।
  93. प्रश्न- प्रजातान्त्रिक व्यक्तित्व एवं निरंकुश व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिये।
  94. प्रश्न- शीलगुण सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
  95. प्रश्न- शीलगुण उपागम में 'बिग फाइव' ( OCEAN) संप्रत्यय की संक्षिप्त व्याख्या दीजिए।
  96. प्रश्न- प्रक्षेपी प्रविधियों के प्रकार तथा गुण-दोष बताइए।
  97. प्रश्न- प्रक्षेपी प्रविधियों के गुण बताइए।
  98. प्रश्न- प्रक्षेपी प्रविधियों के दोष बताइए।
  99. प्रश्न- प्रक्षेपी विधियाँ किसे कहते हैं? इनका अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  100. प्रश्न- प्रक्षेपी विधियों की प्रकृति तथा विशेषताएँ बताइये।
  101. प्रश्न- अभिक्षमता क्या है? परिभाषा भी दीजिए तथा अभिक्षमता कितने प्रकार की होती है? अभिक्षमता की विशेषताएँ क्या हैं?
  102. प्रश्न- अभिक्षमता परीक्षण के मापन पर प्रकाश डालिए।

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book