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प्राचीन भारतीय और पुरातत्व इतिहास >> बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 प्राचीन भारतीय इतिहास

बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 प्राचीन भारतीय इतिहास

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2794
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 प्राचीन भारतीय इतिहास - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- पुरातत्व में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज उत्खननों के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।

अथवा
लम्बवत् (ऊर्ध्वाधर) एवं क्षितिजाकार उत्खनन विधि से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. पुरातत्व में ऊर्ध्वाधर (लम्बवत्) उत्खनन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 2. क्षैतिज उत्खनन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर-

पुरावशेषों एवं पुरानिधियों तथा उनके समग्र परिप्रेक्ष्य में खोज निकालने के साधनों में उत्खनन का विशिष्ट स्थान है। वास्तव में आजकल उत्खनन कुछ खास पुरातात्विक समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। किसी भी स्थल के उत्खनन की रूपरेखा इस प्रकार बनाई जानी चाहिए, जिससे महत्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान हो सके। किसी स्थल के उत्खनन का औचित्य मात्र इसलिए नहीं है कि उसके उत्खनन से कुछ न कुछ पुरावशेष अवश्य प्राप्त होंगे। प्रारम्भ में जितने भी उत्खनन होते थे उन्हें विधिविहीन श्रेणी में रखा गया लेकिन आजकल प्रमुख रूप में उत्खनन की दो विधियों का महत्वपूर्ण स्थान है-

1. लम्बवत् उत्खनन (Vertical Excavation) - किसी भी स्थान पर सभ्यता के क्रम को जानने के लिए लम्बवत् (Vertical) उत्खनन किया जाता है। यह उत्खनन केवल सीमित क्षेत्र में किया जाता है, जिससे उस स्थान पर यह पता चले कि वह स्थान कितने काल तक तथा किन व्यक्तियों द्वारा विकसित रहा है। पुरातत्व के क्षेत्र में इस उत्खनन का मुख्य उद्देश्य सभ्यता का प्रत्यक्षीकरण न होकर सभ्यतां क्रम का प्रत्यक्षीकरण है। बड़े-बड़े नगरों का उत्खनन के फलस्वरूप उस स्थल का संस्कृति मान या समयमान (Time Scale) तैयार किया जाता है तथा इससे अथवा ऐतिहासिक टीले के क्षेत्र में किस संस्कृति के लोग कब आये उनकी संस्कृति का अन्त कब हुआ? इसके अतिरिक्त विभिन्न संस्कृतियों का पूर्वापर क्रम पारस्परिक सम्बन्ध तथा सापेक्ष समय का अनुमान लगाया जा सकता है। इसीलिए ह्वीलर ने कहा है कि "Vertical digging first horizotal digginy after wards.” इस विधि में किसी स्थल से सीमित क्षेत्र में प्राकृतिक स्तर के मिलने तक उत्खनन किया जाता है। उत्खनन से प्राप्त विभिन्न संस्कृतियों की विशेषताओं तथा पुरावशेषों एवं पुरानिधियों सहित यथावत एवं अभिलेख तैयार कर लिया जाता है। कई स्थलों के उत्खनन से यदि एक ही प्रकार का सांस्कृतिक अनुक्रम प्राप्त हो, तो हमें उस संस्कृति के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त हो सकती है, किन्तु इस विधि के उत्खनन से एक सीमित क्षेत्र के खुदाई होने के कारण किसी स्थल या संस्कृति या सभ्यता का सर्वांगीण चित्र नहीं प्रस्तुत किया जा सकता है,

इस सम्बन्ध में ह्वीलर का कथन है कि-

"By vertical excavation is meant the excavation of a restricted area in depth which a veiw to as certaining the succession of cultures or of phase and so producing a time scale or culture scale for the site."

बड़े-बड़े नगरों का उत्खनन कार्य खडे बल से ही किया जाता था। प्राचीन नगरों के अवशेष ढूँढने तथा एक स्थान से दूसरे स्थान का संबंध जानने के लिए इस विधि से उत्खनन करना आवश्यक है और आवश्यकतानुसार इसे प्रत्येक दिशा में आगे भी बढ़ाया जा सकता है। यह उत्खनन गहराई में किया जाता है इसीलिए इसमें उत्खनन खातों की लम्बाई में तो बढ़ाया जा सकता है, किन्तु चौड़ाई में नहीं। जिस स्थल का उत्खनन करना है, उत्खनन के पूर्व ही उसकी चौड़ाई के दोनों सिरों पर एक ओर सर्वप्रथम डेढ़ इंच हटकर दो खूँटे (Pegs) गाड़ दिए जाते हैं।

पुनः इसी का आधार मानकर इसके दक्षिण या वामहस्त की और एक-एक मीटर की दूरी पर सामान्तर खूँटे गाड़ दिए जाते हैं। इन खूँटों को एक सुतली या पतली डोरी से बाँध दिया जाता है, जिसे डेटम रेखा कहते हैं। इन खूँटों को पुस्तिका पर अंकित करने के लिए रोमन संख्याएँ अंकित की जाती हैं। उसके समानान्तर वही संख्या डैश के साथ अंकित हो, जिससे दोनों ओर के खूँटों में विभेद स्थापित किये जा सके। लम्बाई में हर तीन मीटर की दूरी पर कुछ स्थान मेड़ (Balk) के लिए छोड़ दिया जाता है, जिसमें उत्खनित मिट्टी को रखा जा सके तथा वर्ग के चतुर्दिक भ्रमण पर निरीक्षण किया जा सके। नामांकन निम्नांकित चित्र के अनुसार '0' एवं (O) से प्रारम्भ किया जाता है तथा उसके पश्चात् " 1-1, 11-11”, "1-1, 11-11 ” क्रमशः अंकित किए जाते हैं। पूरे क्षेत्र को A, B, C, D एक आयत में निर्धारित किया जाता है।
"

यदि उत्खननकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार क्षेत्र को विस्तृत करना चाहता है, तो वह A से B तथा C से D की ओर तो बढ़ा सकता है, किन्तु A से C एवं B से D की ओर नहीं बढ़ा सकता है। यदि वह 0 खूँटे से पीछे की ओर क्षेत्र विस्तृत करना चाहता है, तो वह A- A, B - B, C - C खूँटों पर अंकित करता है। स्तरानुसार गहराई में अनुपभुक्ता भूमि (virgin soeil) तक लम्बवत् उत्खनन किया जाता है। लम्बवत् उत्खनन के महत्व का उल्लेख करते हुए डॉ. ह्वीलर ने कहा है कि-

"Vertical digging well, by it self, serve a valuable purpose in established geographical distribution of a culture and its time relationship with other culture from place but this evidence still derives its ultimate significance from a knowledge of the social environment of the cultures concered.”

इस विधि को ह्वीलर ने "It is the railway time-table without a train.” कहा है इससे किसी युग की सभ्यता का निर्धारण नहीं किया जा सकता है, अपितु उस युग की ऐतिहासिक तिथि ही निर्धारित की जा सकती है।

क्षैतिज उत्खनन (Horizontal Excavation) - क्षैतिज उत्खनन में किसी युग की सभ्यता का विस्तार सम्पूर्ण अथवा अधिकृत क्षेत्र में देखने का प्रयास किया जाता है। इस विधि में किसी स्थान की सांस्कृतिक स्थिति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है तथा सम्बन्धित सभ्यता के अप्रत्यक्ष अवशेष प्राप्त होते हैं तथा इस विधि से दो सभ्यताओं में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है तथा उसके समग्र स्वरूप के विषय में जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। सामाजिक, आर्थिक धार्मिक तथा तकनीकी पक्षों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करके उस संस्कृति को जीवन्त बनाया जा सकता है। यही पद्धति क्षैतिज उत्खनन में लागू होती है। सर मार्टीमर ह्वीलर के अनुसार, "किसी संस्कृति का सर्वांगीण परिचय प्राप्त करने के लिए जब किसी पुरास्थल के काल विशेष से सम्बद्ध सम्पूर्ण अथवा अधिकांश निक्षेप का उत्खनन किया जाता है, तो उसे क्षैतिज उत्खनन कहा जाता है।

"By horizontal excavation is meant the uncovering of the whole or a large part specific phse in the occupation of an ancient site in order to revealfully its lay out and function."

इस विधि में उत्खनन स्थल के किसी महत्वपूर्ण भाग को केन्द्र मानकर पूरे क्षेत्र को एक विशाल वर्ग में आवृत कर लिया जाता है। इसके पश्चात् उस विशाल वर्ग को कई बराबर-बराबर उपवर्गों में विभाजित कर लिया जाता है। सामान्यतः इन उपवर्गों की लम्बाई इतनी रखी जाती है जितनी गहराई में उत्खनन करना होता है। हर दो वर्गों के बीच लगभग एक मीटर का घेरा (Balk) छोड़ा जाता है, जिससे श्रमिक मिट्टी बाहर निकाल सकें। हर वर्ग के चारों कोने पर दृढ़ता से खूँटे गाड़े जाते हैं, जिससे उपलब्ध वस्तु के स्तर एवं उसके अंकन की सुविधा हो।" क्षैतिज उत्खनन में यह भी ध्यान देने योग्य है कि सभी वर्गों में एक स्तर तक उत्खनन का साथ हो। यदि दो वर्गों के बीच कोई दीवार या अन्य अवशेष हों तो बीच में मेड़ को हटाकर वर्गों को मिलाया जा सकता है। आवश्यकतानुसार इसके क्षेत्र को भी विस्तृत करते समय इस डोरी से डेटम रेखा का विशेष ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि उसी रेखा से वस्तुओं का अंकन समकोणिक दूरी एवं गहराई के आधार पर किया जाता है। सुविधार्थ हर वर्ग का नामकरण अ- 1 अ-2 अ-3 तथा ब-1 ब-2 ब-3 इत्यादि की भाँति किया जाता है।

इस विधि से उत्खनन करने के लिए प्रथमतः एक वर्ग के एक कोने में डेढ़ इंच का वर्ग लिया जाता है, जिसका उत्खनन विशेषज्ञ स्वयं अपने हाथों से डेढ़ इंच की गहराई तक करता है। इस लघु वर्ग से वह पूरे क्षेत्र के विषय में अनुमान लगाता है तथा हर उपवर्ग का उत्खनन इसी लघु वर्ग से नियंत्रित होता है। इसीलिए इसे नियन्त्रित खात कहते हैं। इस उत्खनन विधि में प्रकाश सभी वर्गों में पूर्णतः पहुँचता है, जिससे गहराई तक स्तरों तथा उनमें उपलब्ध सामग्रियों का अच्छी तरह से निरीक्षण किया जा सकता है।

क्षैतिज उत्खनन से किसी स्थान की सांस्कृतिक स्थिति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। इसका एक सुन्दर उदाहरण तक्षशिला का सिरकप नामक स्थान है, जिसका उत्खनन सर जॉन मार्शल ने करके (1944-45 ई.) वहाँ पर निवसित पार्थियन युग की सांस्कृतिक स्थिति का चित्रण किया था। इस विधि का उपयोग अधिक लाभदायक तब सिद्ध होता है, जब लम्बवत् विधि के साहचर्य में उत्खनन कार्य किया जाता है। इस प्रकार भी स्थान पर लम्बवत् विधि से उत्खनन करके यह पता लगा लेना चाहिए कि स्थान कितना प्राचीन है। किस सभ्यता के लोग यहाँ पर आकर निवास करते रहे और कैसे उनका उत्थान एवं पतन हुआ? इस पद्धति का क्षेत्र सीमित होने के कारण उस स्थान पर पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए लम्बवत् उत्खनन के साथ-साथ क्षैतिज उत्खनन करना भी अनिवार्य हो जाता है। क्षैतिज उत्खनन से सिल्वेस्टर ग्लासटोनवरी, पंजाब और तक्षशिला आदि की सांस्कृतिक स्थितियों का पता लगाया था। ह्वीलर का कहना है कि- "किसी भी स्थान का क्षैतिज रूप में उत्खनन करने से पहले स्तर विन्यास का विधिवत् अध्ययन एवं अभ्यास कर लेना चाहिए। अन्यथा सभ्यता का निर्धारण सही ढंग से नहीं हो सकता।" इसी विधि का आश्रय लेकर पिटरिवर्स ने भी विभिन्न स्थानों की खुदाई कराई थी। ह्वीलर का अभिमत है कि- .

"It is needless to say, it must not be infered that horizontal excavation is neccessarily summary and unscientific ideally carefull horizontal digging can alone. In the long ran gives us the full information that we ideally want"

वे पुनः कहते हैं कि- That all horizontal digging must procced from further clear and comprehensive vertical, section of priority is fundamently not in doubt.

 

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- पुरातत्व क्या है? इसकी विषय-वस्तु का निरूपण कीजिए।
  2. प्रश्न- पुरातत्व का मानविकी तथा अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
  3. प्रश्न- पुरातत्व विज्ञान के स्वरूप या प्रकृति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  4. प्रश्न- 'पुरातत्व के अभाव में इतिहास अपंग है। इस कथन को समझाइए।
  5. प्रश्न- इतिहास का पुरातत्व शस्त्र के साथ सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
  6. प्रश्न- भारत में पुरातत्व पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  7. प्रश्न- पुरातत्व सामग्री के क्षेत्रों का विश्लेषण अध्ययन कीजिये।
  8. प्रश्न- भारत के पुरातत्व के ह्रास होने के क्या कारण हैं?
  9. प्रश्न- प्राचीन इतिहास की संरचना में पुरातात्विक स्रोतों के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  10. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास की संरचना में पुरातत्व का महत्व बताइए।
  11. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अभिलेखों का क्या महत्व है?
  12. प्रश्न- स्तम्भ लेख के विषय में आप क्या जानते हैं?
  13. प्रश्न- स्मारकों से प्राचीन भारतीय इतिहास की क्या जानकारी प्रात होती है?
  14. प्रश्न- पुरातत्व के उद्देश्यों से अवगत कराइये।
  15. प्रश्न- पुरातत्व के विकास के विषय में बताइये।
  16. प्रश्न- पुरातात्विक विज्ञान के विषय में बताइये।
  17. प्रश्न- ऑगस्टस पिट, विलियम फ्लिंडर्स पेट्री व सर मोर्टिमर व्हीलर के विषय में बताइये।
  18. प्रश्न- उत्खनन के विभिन्न सिद्धान्तों तथा प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
  19. प्रश्न- पुरातत्व में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज उत्खननों के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  20. प्रश्न- डेटिंग मुख्य रूप से उत्खनन के बाद की जाती है, क्यों। कारणों का उल्लेख कीजिए।
  21. प्रश्न- डेटिंग (Dating) क्या है? विस्तृत रूप से बताइये।
  22. प्रश्न- कार्बन-14 की सीमाओं को बताइये।
  23. प्रश्न- उत्खनन व विश्लेषण (पुरातत्व के अंग) के विषय में बताइये।
  24. प्रश्न- रिमोट सेंसिंग, Lidar लेजर अल्टीमीटर के विषय में बताइये।
  25. प्रश्न- लम्बवत् और क्षैतिज उत्खनन में पारस्परिक सम्बन्धों को निरूपित कीजिए।
  26. प्रश्न- क्षैतिज उत्खनन के लाभों एवं हानियों पर प्रकाश डालिए।
  27. प्रश्न- पुरापाषाण कालीन संस्कृति का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  28. प्रश्न- निम्न पुरापाषाण कालीन संस्कृति का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  29. प्रश्न- उत्तर पुरापाषाण कालीन संस्कृति के विकास का वर्णन कीजिए।
  30. प्रश्न- भारत की मध्यपाषाणिक संस्कृति पर एक वृहद लेख लिखिए।
  31. प्रश्न- मध्यपाषाण काल की संस्कृति का महत्व पूर्ववर्ती संस्कृतियों से अधिक है? विस्तृत विवेचन कीजिए।
  32. प्रश्न- भारत में नवपाषाण कालीन संस्कृति के विस्तार का वर्णन कीजिये।
  33. प्रश्न- भारतीय पाषाणिक संस्कृति को कितने कालों में विभाजित किया गया है?
  34. प्रश्न- पुरापाषाण काल पर एक लघु लेख लिखिए।
  35. प्रश्न- पुरापाषाण कालीन मृद्भाण्डों पर टिप्पणी लिखिए।
  36. प्रश्न- पूर्व पाषाण काल के विषय में एक लघु लेख लिखिये।
  37. प्रश्न- पुरापाषाण कालीन शवाशेष पद्धति पर टिप्पणी लिखिए।
  38. प्रश्न- मध्यपाषाण काल से आप क्या समझते हैं?
  39. प्रश्न- मध्यपाषाण कालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।।
  40. प्रश्न- मध्यपाषाणकालीन संस्कृति का विस्तार या प्रसार क्षेत्र स्पष्ट कीजिए।
  41. प्रश्न- विन्ध्य क्षेत्र के मध्यपाषाणिक उपकरणों पर प्रकाश डालिए।
  42. प्रश्न- गंगा घाटी की मध्यपाषाण कालीन संस्कृति पर प्रकाश डालिए।
  43. प्रश्न- नवपाषाणिक संस्कृति पर टिप्पणी लिखिये।
  44. प्रश्न- विन्ध्य क्षेत्र की नवपाषाण कालीन संस्कृति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
  45. प्रश्न- दक्षिण भारत की नवपाषाण कालीन संस्कृति के विषय में बताइए।
  46. प्रश्न- मध्य गंगा घाटी की नवपाषाण कालीन संस्कृति पर टिप्पणी लिखिए।
  47. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति से आप क्या समझते हैं? भारत में इसके विस्तार का उल्लेख कीजिए।
  48. प्रश्न- जोर्वे-ताम्रपाषाणिक संस्कृति की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
  49. प्रश्न- मालवा की ताम्रपाषाणिक संस्कृति का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  50. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति पर टिप्पणी लिखिए।
  51. प्रश्न- आहार संस्कृति का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  52. प्रश्न- मालवा की ताम्रपाषाणिक संस्कृति पर प्रकाश डालिए।
  53. प्रश्न- जोर्वे संस्कृति की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
  54. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति के औजार क्या थे?
  55. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  56. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता / हड़प्पा सभ्यता के नामकरण और उसके भौगोलिक विस्तार की विवेचना कीजिए।
  57. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता की नगर योजना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  58. प्रश्न- हड़प्पा सभ्यता के नगरों के नगर- विन्यास पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  59. प्रश्न- सिन्धु घाटी के लोगों की शारीरिक विशेषताओं का संक्षिप्त मूल्यांकन कीजिए।
  60. प्रश्न- पाषाण प्रौद्योगिकी पर टिप्पणी लिखिए।
  61. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के सामाजिक संगठन पर टिप्पणी कीजिए।
  62. प्रश्न- सिंधु सभ्यता के कला और धर्म पर टिप्पणी कीजिए।
  63. प्रश्न- सिंधु सभ्यता के व्यापार का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
  64. प्रश्न- सिंधु सभ्यता की लिपि पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
  65. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के पतन के कारणों पर प्रकाश डालिए।
  66. प्रश्न- लौह उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुरैतिहासिक व ऐतिहासिक काल के विचारों से अवगत कराइये?
  67. प्रश्न- लोहे की उत्पत्ति (भारत में) के विषय में विभिन्न चर्चाओं से अवगत कराइये।
  68. प्रश्न- "ताम्र की अपेक्षा, लोहे की महत्ता उसकी कठोरता न होकर उसकी प्रचुरता में है" कथन को समझाइये।
  69. प्रश्न- महापाषाण संस्कृति के विषय में आप क्या जानते हैं? स्पष्ट कीजिए।
  70. प्रश्न- लौह युग की भारत में प्राचीनता से अवगत कराइये।
  71. प्रश्न- बलूचिस्तान में लौह की उत्पत्ति से सम्बन्धित मतों से अवगत कराइये?
  72. प्रश्न- भारत में लौह-प्रयोक्ता संस्कृति पर टिप्पणी लिखिए।
  73. प्रश्न- प्राचीन मृद्भाण्ड परम्परा से आप क्या समझते हैं? गैरिक मृद्भाण्ड (OCP) संस्कृति का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  74. प्रश्न- चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW) के विषय में विस्तार से समझाइए।
  75. प्रश्न- उत्तरी काले चमकदार मृद्भाण्ड (NBPW) के विषय में संक्षेप में बताइए।
  76. प्रश्न- एन. बी. पी. मृद्भाण्ड संस्कृति का कालानुक्रम बताइए।
  77. प्रश्न- मालवा की मृद्भाण्ड परम्परा के विषय में बताइए।
  78. प्रश्न- पी. जी. डब्ल्यू. मृद्भाण्ड के विषय में एक लघु लेख लिखिये।
  79. प्रश्न- प्राचीन भारत में प्रयुक्त लिपियों के प्रकार तथा नाम बताइए।
  80. प्रश्न- मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि पर प्रकाश डालिए।
  81. प्रश्न- प्राचीन भारत की प्रमुख खरोष्ठी तथा ब्राह्मी लिपियों पर प्रकाश डालिए।
  82. प्रश्न- अक्षरों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए।
  83. प्रश्न- अशोक के अभिलेख की लिपि बताइए।
  84. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास की संरचना में अभिलेखों के महत्व का उल्लेख कीजिए।
  85. प्रश्न- अभिलेख किसे कहते हैं? और प्रालेख से किस प्रकार भिन्न हैं?
  86. प्रश्न- प्राचीन भारतीय अभिलेखों से सामाजिक जीवन पर क्या प्रकाश पड़ता है?
  87. प्रश्न- अशोक के स्तम्भ लेखों के विषय में बताइये।
  88. प्रश्न- अशोक के रूमेन्देई स्तम्भ लेख का सार बताइए।
  89. प्रश्न- अभिलेख के प्रकार बताइए।
  90. प्रश्न- समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के विषय में बताइए।
  91. प्रश्न- जूनागढ़ अभिलेख से किस राजा के विषय में जानकारी मिलती है उसके विषय में आप सूक्ष्म में बताइए।
  92. प्रश्न- मुद्रा बनाने की रीतियों का उल्लेख करते हुए उनकी वैज्ञानिकता को सिद्ध कीजिए।
  93. प्रश्न- भारत में मुद्रा की प्राचीनता पर प्रकाश डालिए।
  94. प्रश्न- प्राचीन भारत में मुद्रा निर्माण की साँचा विधि का वर्णन कीजिए।
  95. प्रश्न- मुद्रा निर्माण की ठप्पा विधि का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  96. प्रश्न- आहत मुद्राओं (पंचमार्क सिक्कों) की मुख्य विशेषताओं एवं तिथिक्रम का वर्णन कीजिए।
  97. प्रश्न- मौर्यकालीन सिक्कों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत कीजिए।
  98. प्रश्न- आहत मुद्राओं (पंचमार्क सिक्के) से आप क्या समझते हैं?
  99. प्रश्न- आहत सिक्कों के प्रकार बताइये।
  100. प्रश्न- पंचमार्क सिक्कों का महत्व बताइए।
  101. प्रश्न- कुषाणकालीन सिक्कों के इतिहास का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  102. प्रश्न- भारतीय यूनानी सिक्कों की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
  103. प्रश्न- कुषाण कालीन सिक्कों के उद्भव एवं प्राचीनता को संक्षेप में बताइए।
  104. प्रश्न- गुप्तकालीन सिक्कों का परिचय दीजिए।
  105. प्रश्न- गुप्तकालीन ताम्र सिक्कों पर टिप्पणी लिखिए।
  106. प्रश्न- उत्तर गुप्तकालीन मुद्रा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  107. प्रश्न- समुद्रगुप्त के स्वर्ण सिक्कों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  108. प्रश्न- गुप्त सिक्कों की बनावट पर टिप्पणी लिखिए।
  109. प्रश्न- गुप्तकालीन सिक्कों का ऐतिहासिक महत्व बताइए।
  110. प्रश्न- इतिहास के अध्ययन हेतु अभिलेख अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। विवेचना कीजिए।
  111. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में सिक्कों के महत्व की विवेचना कीजिए।
  112. प्रश्न- प्राचीन सिक्कों से शासकों की धार्मिक अभिरुचियों का ज्ञान किस प्रकार प्राप्त होता है?
  113. प्रश्न- हड़प्पा की मुद्राओं के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  114. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अभिलेखों का क्या महत्व है?
  115. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में सिक्कों का महत्व बताइए।

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