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प्राचीन भारतीय और पुरातत्व इतिहास >> बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 प्राचीन भारतीय इतिहास

बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 प्राचीन भारतीय इतिहास

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2793
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 प्राचीन भारतीय इतिहास - सरल प्रश्नोत्तर

अध्याय - 10

प्राचीन भारत में कृषि, सिंचाई एवं भूमि प्रबन्धन

(Agriculture, Irrigation and
Land Management in Ancient India)

प्रश्न- वैदिक युग से मौर्य युग तक अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व की विवेचना कीजिए।

अथवा
प्राचीन भारत में भूमि स्वामित्व की समस्या की विवेचना कीजिए।
अथवा
प्राचीन भारत में कृषि पर एक निबन्ध लिखिए।
अथवा
प्राचीन भारत में कृषि के विकास पर एक निबन्ध लिखिए।
अथवा
कृषि के विशेष सन्दर्भ में वैदिक काल का वर्णन कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. प्राचीनकाल की ऋण व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
2. प्राचीनकाल में प्रचलित ब्याज दरें व ब्याज भुगतान पर टिप्पणी लिखिए।
3. सिन्धु घाटी सभ्यता की कृषि का वर्णन करिए।
4. ऋग्वैदिक काल की कृषि का वर्णन करिए।
5. उत्तर वैदिक काल की कृषि का वर्णन करिए।
6. पूर्व- गुप्तकाल से गुप्तकाल तक की कृषि व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
7. प्राचीन भारतीय सिंचाई व्यवस्था पर एक लघु निबन्ध लिखिए।
8. मौखरि वंश के शासनकाल में कृषि व्यवस्था को समझाइए।
9. यशोवर्मन के राज्य में कृषि व्यवस्था किस प्रकार की थी?
10. उत्तरकालीन गुप्त राजवंश के समय की कृषि व्यवस्था बताइए।
11. राजपूत कालीन कृषि व्यवस्था बताइए।
12. सिन्धु प्रदेश की कृषि व्यवस्था बताइए।
13. तुर्की आक्रमण के समय कृषि व्यवस्था बताइए।
4. उत्तर गुप्तकाल की कृषि फसलें बताइए।
15. उत्तर गुप्तकाल की सिंचाई का वर्णन करिए।
16. प्राचीन भारतीय सिंचाई व्यवस्था पर एक दीर्घ निबन्ध लिखिए।
17. वैदिक कालीन सिंचाई व्यवस्था पर एक निबन्ध लिखिए
। 

उत्तर-

प्राचीनकाल में ऋण व्यवस्था

प्राचीन भारत में व्यापार के लिए या फिर अपने निजी कार्यों के लिए वस्तु विनिमय होता था, जो आगे चलकर ऋण क रूप धारण कर गया। पूर्व मौर्य काल में ऋण व्यवस्था की छाप देखने को नहीं मिलती हैं, परन्तु मौर्य काल में इसका रूप विस्तार रूप से देखा जाता है। व्यक्ति अपने निजी कार्यों के लिए या व्यापार करने के लिए बड़े-बड़े महाजनों से ब्याज की दर तय करके कर्ज लिया करता था। महाजनों को इस समय योग क्षेम धनिक के नाम से पुकारा जाता था जो कर्ज लिया करता था, उसको उस समय धारणिक के नाम से पुकारते थे। महाजन की मनमानी को रोकने के लिए राज्य का महाजनी करने वालों पर नियंत्रण भी रहता था।

प्राचीनकाल में ब्याज की प्रचलित दरें - अर्थशास्त्र के अनुसार वार्षिक ब्याज की दर 15% थी परन्तु इसका पालन नहीं किया जाता था। इस समय ब्याज की निम्न तीन दरें प्रचलित थीं-

1. साधारण कार्य के लिए जो रकम कर्ज के रूप में महाजन से ली जाती थी, उस पर 5 प्रतिशत ब्याज देना पड़ता था। खतरा होने पर ब्याज की दर बढ़ा भी दी जाती थी।

2. जो व्यापारी स्थल मार्ग से व्यापार करते थे और उनको व्यापार करते समय खतरनाक मार्गों से जाना पड़ता था उनसे 20 प्रतिशत ब्याज लिया जाता था।

3. जो व्यापारी सुदूर प्रदेशों में व्यापार के लिए जमा करते थे उनसे 5 प्रतिशत से 35 प्रतिशत या इससे अधिक ब्याज लिया जाता था।

इस समय ब्याज मुक्त होने की प्रथा प्रचलित थी। जो व्यक्ति धार्मिक कार्य के लिए कर्ज लिया करता था या शिक्षा की उन्नति अथवा जो व्यक्ति भयानक रोग के इलाज के लिए महाजन से कर्ज लेता था उस पर ब्याज नहीं लिया जाता था।

प्राचीनकाल में ब्याज का भुगतान करने का तरीका - ऋण की रकम एक मुश्त या फिर किस्तों में जमा करने की व्यवस्था प्रचलित थी। ऋण की रकम के ब्याज का भुगतान मासिक तथा वार्षिक रूप में होता था। यह बात कर्ज देने वाले और कर्ज लेने वाले के बीच तय हो जाती थी। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में जो व्यक्ति अधिक ब्याज लिया करता था उसको राज्य की ओर से कड़ा दंड देने की व्यवस्था थी। यदि कर्जदार अपने कर्ज की रकम के अदा करने से पूर्व मर जाता था तब उसके कर्ज की रकम उसके पुत्रों या उत्तराधिकारी को अदा करनी पड़ती थी तथा ऋण अदा करने का समय, ऋण लेने से पूर्व दोनों तय कर लिया करते थे यदि तय किये समय में ऋण की रकम अदा कर दी जाती थी तब दोनों पार्टियों के मध्य किसी प्रकार मन-मुटाव उत्पन्न नहीं होता था यदि कर्जदार अपने निर्धारित समय के भीतर अपने ऋण की रकम अदा नहीं कर पाता था तब कर्जदार को राज्य की ओर से दंड दिया जाता था जिसको कर्जदार बड़ी खुशी के साथ सहन करता था। दंड सजा तथा जुर्माने दोनों रूप में देने की व्यवस्था प्राचीनकाल में प्रचलित थी। महाजन ब्याज और ऋण के रूप में दी गई धनराशि नहीं लेता था और उस पर ब्याज बढ़ता था। यदि दस वर्ष तक उसकी यह प्रतिक्रिया बनी रहती थी तब यह समझ लिया जाता था कि महाजन को अपने धन की आवश्यकता नहीं है। कुछ महाजन अपनी अदायगी के संबंध में कर्ज लेने वाले को व्यक्तिगत या अपने हरकारे के द्वारा धन जमा करने की तिथि बता दिये करते थे। यदि निश्चित तिथि पर रकम जमा हो पाती थी तब किसी प्रकार की अशान्ति उत्पन्न नहीं होती थी। धनराशि जमा न होने पर महाजन के आदमी उस कर्जदार के घर आते थे और उसका घरेलू सामान उठाकर ले जाते थे। यदि कर्जदार किसान होता तब उसके पशु तक खोलकर ले जाते थे और अपनी कर्ज की रकम बड़ी कठोरता से वसूल करते थे, ऋण संबंधी मुकदमों का फैसला न्यायालय में होता था। मुकदमें की सुनवाई करते समय दोनों पार्टियाँ साक्ष्यों के साथ उपस्थित होती थीं। दोनों ओर की बातें सुनी जाती थी। उस समय वकील नहीं थे, दोनों स्वयं ही अपने-अपने दावे न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया करते थे और फैसला पाते थे या यदि परिवार के किसी सदस्य ने अपने ही परिवार के किसी सदस्य से ऋण लेता था तब ऐसे ऋण के मुकदमें राज्य की न्यायालय में नहीं सुने जाते थे। उनकी सुनवाई सरकारी न्यायालय में नहीं होती थी। प्राचीनकाल में ऋण व्यवस्था कठोर रूप में थी। महाजन अधिक सूद की दर पर कर्ज दिया करते थे फिर भी इस व्यवस्था का चलन तेजी के साथ बढ़ता गया जिसके कारण व्यापार में बड़ी तेजी के साथ वृद्धि हुई। व्यापारियों के लिए ऋण व्यवस्था वास्तव में बड़ी ही लाभदायक तथा उपयोगी सिद्ध हुई।

सिन्धु घाटी सभ्यता के समय कृषि व्यवस्था

इस सभ्यता के निर्माताओं के आर्थिक शरीर में कृषि रीढ़ की हड्डी के समान थी। कृषि इनका प्रमुख व्यवसाय था, सिन्धु घाटी के किनारे पर यह सभ्यता फूली तथा फली थी। इस कारण इस सभ्यता के समय कृषि की तेजी के साथ उन्नति हुई होगी। इस सभ्यता के किसानों को खेती-बाड़ी करते समय किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं हुआ होगा, क्योंकि उर्वरा भूमि नदी तथा वर्षा के कारण उपजाऊ रूप में हो गई थी। इस सभ्यता के निर्माताओं को अपनी फसलों की सिंचाई करते समय भी किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं हुआ होगा, क्योंकि यहाँ पर पानी का अभाव कभी नहीं रहा होगा। खेती-बाड़ी का कार्य अच्छे तथा उन्नत रूप में होता था। इस सभ्यता के किसान गेहूँ तथा जौ की खेती विशेषतौर से करते थे तथा किसान गेहूँ, जौ के साथ-साथ वे धान, मटर, तिल, कपास आदि की फसलें उगाते थे। खुदाई में गेहूँ तथा जौ के दाने प्राप्त हुए हैं। अन्न पीसने के लिए पनचक्कियाँ भी थीं तथा फसल खूब पैदा होती थी। किसान अपनी आवश्यकता से अधिक खाने-पीने की वस्तुएं रखता था तथा शेष फसल की उपज वह बाजार में ले जाकर बेच दिया करता था, जिसके कारण उसकी आर्थिक दशा बहुत ही अच्छी हो गई थी। अनाज रखने के लिए बड़े-बड़े अन्नागार भी होते थे। अनाज ढोने के लिए दो पहिये या चार पहिए की गाड़ी का प्रयोग किया जाता था।

ऋग्वैदिक काल के समय की कृषि

आर्य सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी। इस सभ्यता के निर्माताओं के किसानों का मुख्य व्यवसाय कृषि ही था। ऋग्वैदिककाल में कृषि पर विशेष महत्व दिया जाता था। उस समय का किसान अपने खेतों को हल तथा बैलों से जोता करते थे। खेतों में पटेला देने के लिए बैल, भैंसों तथा ऊंटों का भी प्रयोग किया जाता था। घर के सभी सदस्य खेती-बाड़ी के कार्य किया करते थे।

ऋग्वैदिक काल में मुख्य पैदावार गेहूँ, चने तथा जौ की बुआई की जाती थी। खेती से संबंधित अनेक कार्य जैसे - माड़ना, खेत काटना, खेत निराना, खेत जोतना, खेत में पटेला लगाना, खेतों की बुआई करना, खेतों में उगे पौधों की निराई करना, ठीक समय पर सिंचाई करना आदि प्रचलित थे, जिनको ऋग्वैदिक काल के किसान अकेले तथा सामूहिक रूप से करते थे। अच्छी फसल की पैदावार के लिए देवताओं से प्रार्थना भी की जाती थी। ऋग्वैदिक काल का प्रमुख पेशा कृषि ही था। जब आर्य जाति ने सिन्धु घाटी की सभ्यता के निर्माताओं को रणभूमि में हरा दिया और उनको अपना दास बना लिया तब उनसे कृषि के कार्य कराये गये। अतः ऋग्वैदिक काल में कृषि की प्रतिष्ठा स्थापित हो चुकी थी। इस युग का किसान गेहूँ तथा जौ की खेती के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के फूल, तरकारियाँ तथा अनेक प्रकार की दालों की भी पैदावार अच्छी प्रकार से होती थी। अच्छी फसल पैदा करने के लिए ऋग्वैदिक काल का किसान ठीक समय पर अपनी फसल की सिंचाई करते थे तथा अपने खेतों को गोबर की खाद भी देते थे। इस खाद को वे स्वयं तैयार किया करते थे। खेतों की सिंचाई ढेंकली के द्वारा की जाती थी। कुएं, तालाब, झील, पोखर तथा नदियों के पानी से खेतों की सिंचाई की जाती थी। इस समय खेत किसानों की व्यक्तिगत संपत्ति थे, परन्तु चरागाह सामूहिक रूप में थे, जिसकी घास हर किसान के जानवर चरा करते थे। फसल को कीड़े मकोड़े तथा हानि पहुंचाने वाले पशुओं से भी बचाया जाता था।

उत्तर वैदिक काल में कृषि की दशा

इस काल तक पहुंचते-पहुंचते कृषि के रूप में परिवर्तन हुए जिनके कारण कृषि की तेजी से उन्नति हुई। इस युग के किसानों ने कृषि के अनेक कार्यों में परिवर्तन करके उनमें महत्वपूर्ण सुधार किये, जिसके कारण किसानों की आर्थिक दशा ऋग्वैदिक काल के मुकाबले अच्छी हो गई। काटक संहिता में उल्लेख है कि खेतों की जुताई करते समय 24 बैलों को हल में जोता जाता था। कृषि अधिक भूमि में की गई। शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में कृषि सम्बन्धी जो उल्लेख को मिलते हैं उनसे पता चलता है कि इस काल में कृषि के क्षेत्र में अधिक उन्नति हुई थी। गोबर की खाद का भी उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में देखा जा सकता है।

फसलं की अच्छी उपज के लिए खाद भी फसल बोने से पूर्व डाली जाती थी। अनेक प्रकार के अनाज, दाल, तिलहन, कपास, मूंगफली, गन्ना आदि की खेती हुआ करती थी। सिंचाई, कुओं, नहरों तथा तालाबों के पानी से होती थी, एक वर्ष में दो फसलें उगाई जाती थीं। इन दोनों फसलों को बोने तथा काटने का समय भी निश्चित हो चुका था। तैत्तरीय संहिता से ज्ञात होता है कि जौ, गेहूँ जाड़े के मौसम में बोया जाता था तथा गर्मी में काटा जाता था। धान की फसल बरसात के मौसम में बोई जाती थी और सर्दी के मौसम में काटी जाती थी। उड़द तथा तिलहन भी वर्षाकाल में बोये जाते थे। बाद में उत्तर वैदिक काल के किसान एक वर्ष में तीन फसलें पैदा करने लगे थे।

खेतों की जुताई - उत्तर वैदिक काल में ऋग्वैदिक काल के मुकाबले में खेतों की जुताई के लिए छः, आठ, बारह तथा कभी-कभी सोलह या चौबीस बैलों का प्रयोग किया जाता था। खेतों की जुताई गहरे रूप में की जाती थी तथा खेतों के डेले बारीक करने हेतु पटेला भी चलाया जाता था। खेतों की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने के लिए साल में हर फसल से पूर्व खेतों में गोबर की खाद भी दी जाती थी।

सिंचाई व्यवस्था - उत्तर वैदिक काल में सिंचाई की व्यवस्था भी अच्छे रूप में थी। मैदानी इलाके के खेत कच्चे कुएं के पानी से ढेंकली द्वारा सींचे जाते थे। नदियों, झीलों, तालाबों, पोखरों के पास के खेतों की सिंचाई इनके पानी से कई सिंचाई के तरीकों से की जाती थी। वर्षा के पानी को एक गहरे गड्डे में रोका जाता था और फिर उसका प्रयोग सिंचाई में किया जाता था।

फसल की रक्षा - फसल की रक्षा तथा सुरक्षा की जाती थी। चिड़ियों तथा पशुओं से फसल को सुरक्षित रखने हेतु एक मनुष्य का पुतला बांस की खपच्चियों से तैयार करके उसको मनुष्य जैसे कपड़े पहनाकर खेतों के बीच तथा कोने में लगा दिये जाते थे। जिनके कारण पशुओं तथा पक्षियों से फसल को हानि कम होती थी। कीड़ों से फसल को बचाने के लिए उनके पत्तों पर चूल्हे की राख डाली जाती थी, फिर भी चूहे तथा अन्य छोटे-छोटे कीटाणुओं से खड़ी फसल को हानि पहुंचती थी।

किसान - इस समय कि किसान ग्रामों में रहता था जिसके मकान लकड़ी तथा घास-फूस से बनाये जाते थे। उनकी सबसे बड़ी दौलत उनके पशु थे, जिस किसान के पास अधिक पशु होते थे उनकी गणना धनी किसानों में होती थी। किसान को परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्यों को खेती-बाड़ी सम्बन्धित कोई न कोई कार्य अवश्य करना पड़ता था।

भूमि की किस्में - इस समय कितने प्रकार की भूमि थी? उनकी समस्त किस्मों के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त होती थी। हर भूमि में जैसी पैदावार होती थी, उसका भी उल्लेख देखने को मिलता है। इन भूमियों की अपनी अलग-अलग कर व्यवस्था थी, जिसकी किसान अपनी सुविधा के अनुसार राज्य को देता था। कृषि की यही व्यवस्था 300 ई० तक किसी न किसी रूप में अवश्य बनी रही।

पूर्व-गुप्तकाल से गुप्तकाल तक कृषि व्यवस्था

पूर्व - गुप्तकाल की आर्थिक दशा की रीढ़ कृषि थी क्योंकि इस समय की भी आर्थिक व्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। इस काल में छोटे बड़े नगरों का विकास हो चुका था। देश में किसानों की संख्या अधिक थी, वे युद्ध तथा अन्य राजनैतिक कार्यों से मुक्त थे। कभी अकाल नहीं पड़ा तथा खाद्यान्न में कभी महंगाई भी नहीं आई। वर्षा के मौसम में दो बार जल-वृष्टि होती थी। जाड़े के मौसम में गेहूँ बोया जाता था। गर्मी में तिल और ज्वार की फसल होती थी। किसान आमतौर से दो फसलें पैदा करते थे। इनके अतिरिक्त फल तथा तरकारियाँ भी पैदा की जाती थीं जिनको मौसम के अनुसार बोया और खाया जाता था। कृषि के द्वारा अनेक प्रकार के अन्न जैसे गेहूँ, धान, (चावल), जौ, ज्वार, चना, मटर, विभिन्न प्रकार की दालें, तेल निकालने वाले पदार्थ तथा फल और तरकारियाँ पैदा की जाती थीं।

इस काल में देश का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। इस समय में कृषकों का कार्य बड़ी महत्वपूर्ण दृष्टि से देखा जाता था। युद्ध काल के समय में भी कृषि को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जाती थी। राज्य किसानों की सुविधा का बड़ा ध्यान रखता था। शिकारी और सैनिक दोनों ही कृषि को हानि नहीं पहुंचाते थे। शिकारी कृषि की रक्षा के लिए उन जंगली पशुओं को जो उनको हानि पहुंचाते थे, मारते रहते थे। राज्य की ओर से उन्हें इस काम के लिए भत्ता मिलता था। राज्य बाढ़, अग्नि, टिड्डी दल और अन्य संकटों से कृषि की रक्षा के उपाय करता था। भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए गोबर की खाद का उपयोग किया जाता था। कष्ट के समय किसानों को राज्य की ओर से आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। फसल खराब होने पर उनका सरकारी लगान भी माफ कर दिया जाता था। सरकारी अधिकारी किसानों से लगान वसूल करते समय किसी प्रकार का अत्याचार नहीं करते थे

फसलें - इस समय में दो मुख्य फसलें होती थीं। एक जाड़ों की फसल जो गेहूँ की फसल कहलाती थी। बड़ी महत्वपूर्ण दृष्टि से देखी जाती थी, इस फसल के अंतर्गत अधिक मात्रा में गेहूँ पैदा करने पर ध्यान दिया जाता था। इसके लिए सरकार की ओर से भी किसानों को हर प्रकार की सहायता दी जाती थी। किसान भी इस फसल की पैदावार को अधिक लाभदायक बनाने हेतु अच्छे कार्य करते थे। दूसरी धान की फसल थी। दोनों फसलों के लिए अच्छे ढंग से खेतों को तैयार किया जाता था। खेतों की जुताई की जाती थी। जुताई करते समय हलों का सहारा लिया जाता था हल शीशम की लकड़ी के बनाये जाते थे, उनका फाल अच्छे लोहे से बनाया जाता था। जिसका नीचे का भाग नुकीली शक्ल का होता था। इस काल में दोनों फसलों से काफी संख्या में गल्ला जैसे दालें, तेल के पदार्थ (लाई, सरसों, तिलहन मूंगफली), गेहूँ, जौ, चना, धान, मूंग, मसूर, उरद, अरहर, सरसों, मटर, कपास, आलू, गन्ना, तरबूज, खरबूजा, अंगूर, अनार, सेब, नासपाती, आम, जामुन, आंवला, कटहल, नींबू, किशमिश आदि पैदा कर लिये जाते थे जो देश के निवासियों के एक वर्ष इस्तेमाल करने पर भी बच जाते थे। किसानों के घरों में गेहूँ, चावल, दालें, तेल निकालने वाले पदार्थों का फालतू भंडार सदा रहा करता था।

फसल की बुआई - प्रत्येक फसल की बुआई ठीक समय पर होती थी। किसान अपने खेतों को फसल बोने से पूर्व अच्छी तरह से तैयार कर लेते थे। खेतों को पहले के मुकाबले में अधिक गहरा जोता जाता था। खेतों की जुताई हल, बैल और जुएं के द्वारा होती थी। जुताई एक भैंसे, दो बैलों, एक ऊंट की सहायता से की जाती थी। इस काल में हल पुराने समय के मुकाबले से अधिक शक्तिशाली और टिकाऊ शीशम की पक्की लकड़ी से बनाये जाते थे, जिनकी बनावट और उपयोगिता पर पहले के मुकाबले में अधिक बल दिया जाता था। हलों को नुकीले रूप में पहले के मुकाबले में बनाया जाता था। खेत जब तैयार हो जाते थे तब उनमें अच्छे किस्म के बीज बोये जाते थे। बीजों के चुनाव पर पहले के मुकाबले अधिक बल दिया जाता था। किसान अपने खेतों में बोने के लिए बीजों की स्वयं व्यवस्था करते थे। घुने दानों को निकाल दिया जाता था। सदा अच्छे बीज का प्रयोग खेतों की बुआई में किया जाता था।

निराई - इस काल में किसान अपनी फसल की निराई भी करते थे। निराई करते समय बेकार घास और अन्य किस्म के पौधों को जड से खोद कर निकाल दिया जाता था। किसानों का विश्वास था कि ऐसे घास और पौधे फसल को ठीक विधि से उगने नहीं देते हैं और इनकी बदौलत फसल की उपज ठीक नहीं होती है। निराई का काम नर और नारियाँ दोनों एक साथ मिलकर करते थे। निराई करते समय वे जो गीत गाते थे, उससे उनकी थकावट दूर हो जाती थी। उस समय खेतिहर मजदूर नहीं थे। ग्राम निवासी एक-दूसरे के खेतों की मिल बांटकर निराई करते थे। निराई के द्वारा जो घास फूस प्राप्त होती थी उससे उनके पशुओं का चारा बनता था।

खाद - जब खेत तैयार हो जाते थे उनमें गोबर की खाद दी जाती थी गोबर को खाद स्वयं किसान और उसके परिवार के सदस्य बनाया करते थे। पशुओं का गोबर एक गड्ढे में डाल देते थे और जब उनको अपने खेतों में गोबर खाद देने की आवश्यकता होती थी, वे अपने गड्ढों से ऐसी खाद निकालकर अपने खेतों में काफी मात्रा में डाल देते थे। खाद को फैलाकर उसको पटेले के द्वारा खेत के ऊपरी धरातल पर एक समान फैला दिया जाता था। बाद को उस खेत की गहरी जुताई की जाती थी। गहरी जुताई के बाद उस खेत की धरातल को पटेला चलाकर एक समान कर दिया जाता था। पुराने समय में खाद खेत के ऊपरी भाग पर डाली जाती थी। इस ढंग से पड़ी खाद भूमि के अन्दर नहीं जाती थी जिससे अच्छी किस्म की पैदावार नहीं हो पाती थी। खाद डालने के ढंग में परिवर्तन करके इस युग के किसानों ने अच्छी पैदावार ली।

खेतों की सिंचाई - इस युग के किसान अपने खेतों की सिंचाई पहले के मुकाबले में अच्छे ढंग से करता था। इस काल के पूर्व का किसान अच्छी उपज के लिए आकाश से होने वाली वर्षा का मुंह नहीं ताकता था। जब अच्छी वर्षा होती थी तब अच्छी फसल होती थी। सिंचाई की आवश्यकता कम होती थी, परन्तु जब वर्षा कम होती थी तब किसानों को सिंचाई के अनेक साधनों से जल प्रयोग करना पड़ता था। राज्य में नहरें, तालाब, कच्चे-पक्के कुयें, आदि के जल से खेतों की सिंचाई ढेंकली के द्वारा की जाती थी।

हमारे देश में ढेंकली के खेतों की सिंचाई करने की बड़ी प्राचीन व्यवस्था है। इस युग में अच्छे किस्म के डोल बनाये गये और ढेंकली को रस्सी की सहायता से बांधकर उनसे कुएं, तालाबों से पानी निकाल कर किसानों ने अपने खेतों की सिंचाई की अच्छी व्यवस्था करके अच्छी फसल पैदा की।

कुओं, तालाबों आदि से पानी निकालने के लिए डोल, चरस और एक प्रकार की वायु संचालित चक्की का भी प्रयोग किया जाता था। इस समय में सिंचाई के निम्नलिखित साधन थे-

1. वायु द्वारा संचालित चक्की द्वारा।
2. नहरों के लिए बांध बनाकर पानी जमा करना।
3. नदी, तालाब, कुएं और झीलों के पानी द्वारा सिंचाई।
4. डोल या चरस द्वारा सिंचाई करने की विधि
5. बैलों के द्वारा रहट या चरस के द्वारा सिंचाई करने का तरीका।

पूर्व - गुप्तकाल में भारत की सिंचाई व्यवस्था में अच्छे किस्म के परिवर्तन किये गये जिनके कारण. सिंचाई व्यवस्था में अच्छे सुधार हुए और कृषि में अच्छे चिन्ह दिखाई देने लगे। अच्छी फसले पैदा हुईं और किसानों को आर्थिक दशा में अच्छे सुधार हुए। पैदावार इतनी अधिक हुई कि एक वर्ष की पैदावार कई वर्षों तक प्रयोग में लाई गई।

फसल की रक्षा - सिंचाई के साथ-साथ फसल की रक्षा के लिए भी अच्छे उपाय इस समय किये गये जिनकी बदौलत फसल की रक्षा के कारण पैदावार बढ़ी फसल की रक्षा के लिए राज्य की ओर से बहेलियों तथा चरवाहों की नियुक्ति हुई। अकाल की स्थिति का सामना करने के लिए राजकीय खाद्यान्न भंडार भी थे जिनमें फसल के समय अन्न संग्रह किया जाता था। इसमें जो अन्न रखा जाता था उसमें नीम की पत्तियां डाल दी जाती थीं ताकि अन्न को हानिकारक कीटाणु किसी भी प्रकार से हानि न पहुंचा सके। अनावृष्टि तथा अकाल के समय राज्य की ओर से किसानों को अच्छे बीज, पशु और अन्य उपकरणों को खरीदने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती थी। इससे पता चलता है कि फसल को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त था।

राज्य कर - कृषि की पैदावार का 1/2, 1/3, 1/5 और 1/8 भाग सरकारी कर के रूप में लिया जाता था। फसल की पैदावार को कूटने की कई विधियाँ इस समय प्रचलित थीं। अच्छी भूमि के खेतों से पैदावार का 1/3 भाग सरकारी कर के रूप में लिया जाता है। दूसरे किस्म की भूमि के खेतों से पैदावार का 1/4 भाग और 1/5 भाग कर के रूप में लिया जाता था। जंगली भूमि के खेतों से पैदावार 1/8 भाग कर के रूप में सरकार लिया करती थी। कर नकद तथा अन्न के रूप में लिया जाता था। किसानों से कर वसूल करते समय कठोर विधि का प्रयोग नहीं किया जाता था। उनसे कर फसल के तैयारी पर ही लिया जाता था। कर अधिकारी सरकारी कर वसूल करते समय किसानों की भी सुविधाओं को ध्यान में रखते थे।

कृषि में किसान परिवार की भूमिका - पूर्व गुप्तकाल में किसानों को अच्छी फसल उगाने के कारण आदर की दृष्टि से देखा जाता था। उनका सामाजिक महत्व भी ऊंचा था। किसान प्रातः काल उठकर अपने हलों को कन्धे पर रखकर अपने पशुओं के साथ खेतों पर चले जाते थे और वहाँ पहुंचकर वे अपने खेतों को संभालने, बोने, निराने में लग जाते थे। दोपहर का भोजन वे अपने खेतों में बनी घास-फूस की झोपड़ियों में करते थे या फिर पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करते थे तथा पेड़ की छाया में कुछ देर तक़ विश्राम भी करते थे। उनके परिवार के सदस्य उनके सोते समय खेतों को फसल की रक्षा करते थे। खेतों की सिंचाई में उसके परिवार के सदस्य उसकी सहायता भी करते थे। नारियाँ खेतों से लकड़ी जमा करती थीं। सिंचाई की व्यवस्था में भी सहायता देती थीं, वे बर्तनों को धोकर साफ़ करती थीं। उनके बच्चे पशुओं को चारागाहों में चराते थे सन्ध्या के समय वे अपने परिवार के सदस्यों के साथ घर वापस आती थीं, घर में आते ही वे रात का भोजन बनाने में लग जाती थी। पुरुष भुसोड़ियों में अपने पशुओं को बांधकर चौपाल में आकर, बैठकर हुक्का पिया करते थे। चौपाल में सब लोग बैठकर ग्राम की उन्नति, कृषि की उन्नति आदि बातों पर गंभीरता के साथ विचार किया करते थे नौ दस बजे उनकी चौपाल की बैठक समाप्त हो जाती थी। उसके बाद वे भोजन करते और अपने पशुओं को चारा डालकर सोने के लिए अपनी-अपनी चारपाइयों पर पहुंच जाते थे।

पूर्व- गुप्तकाल में कृषि के क्षेत्र में जो सुधार हुए उनका पैदावार पर अच्छा प्रभाव पड़ा। किसानों की आर्थिक दशा पहले के मुकाबले में अच्छी हो गई।

गुप्तकालीन भारत में कृषि

गुप्त वंश के प्रतापी, वीर, साहसी एवं सम्राज्यवादी सम्राटों ने अपनी कुशल नीति तथा महत्वाकांक्षा के अनुरूप विशाल साम्राज्य का निर्माण किया और उसी के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना एवं सुरक्षा को जन्म दिया। इन सम्राटों की चेतना तथा सुरक्षा की परिस्थितियों ने देश की कृषि व्यवस्था को उभारा जिसके कारण देश खुशहाली के वातावरण में पहुंच गया और हर तरफ लोग खुशहाल दिखाई देने लगे। इस काल की कृषि व्यवस्था के सभी पहलुओं में काफी सीमा तक विकास हुआ, जिसके कारण कृषि संबंधी उपलब्धियाँ भी इस क्षेत्र में दिखाई देने लगी और इतिहास के विद्वानों ने बिना किसी हिचकिचाहट के यह. कह दिया कि गुप्तकालीन भारत कृषि उपलब्धियों का युग था अथवा स्वर्ण युग था।

कृषि - भारत गुप्तकाल में भी कृषि प्रधान देश था। इस समय के 90% निवासी ग्रामों में रहा करते थे और उनका प्रमुख व्यवसाय कृषि ही था। गुप्तकाल में कृषि उन्नत दशा में थी। इस काल में कृषि के द्वारा जो अन्न, दालें, फल, सब्जी तथा तेल के पदार्थ इतनी संख्या में पैदा होते थे जोकि उस समय की जनसंख्या की मांग से कुछ सीमा तक अधिक थे। इस युग का किसान फसल बोने, गिराने तथा काटने में बड़ा ही निपुण हो गया था। वह अपने खेतों की गहरी जुताई करके अपने खेतों की मिट्टी को बारीक बनाने की क्रिया से अच्छी तरह परिचित था तथा उसको गहरी जुताई की विशेषताओं का भी ज्ञान था। इस युग का किसान खेती के लिए अनेक वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल किया करता था। देश की मुख्य उपज गेहूँ, जौ, ज्वार, बाजरा, मसाले, पान, तेल के बीज, रुई, नील, धूप, पटसन, चावल, गन्ना आदि थे। इस युग में कोई आधुनिक जमींदारी प्रथा जैसी पद्धति नहीं थी। भूमि पर राजा का अधिकार समझा जाता था, किसान अपनी पैदावार का 16 से 25 प्रतिशत कर के रूप में राजा को दिया करता था तथा कर अन्न रूप में अदा करना पड़ता था।

कृषि योग्य भूमि - कुछ भूमि जो राजा की ओर से जागीर के रूप में प्राप्त होती थी, उस पर कर नहीं लिया जाता था। कभी-कभी राजा या महाराजा मंदिर या मठ को कुछ भूमि दान के रूप में दे दिया करते थे। ऐसी भूमि का लगान केवल वही व्यक्ति या संस्था वसूल करती थी जिसको वह भूमि दान के रूप में मिलती थी। संस्था के लोग किसानों को उनकी भूमि से बेदखल नहीं कर सकते थे। इस काल में भूमि की कीमत उसकी पैदावार के आधार पर आंकी जाती थी। बंगाल की खालसा भूमि का मूल्य 50 दीनार से. 75 दीनार प्रति एकड़ था। भूमि इस काल में एक महत्वपूर्ण संपत्ति के रूप में देखी जाती थी और यह हस्तान्तरण ग्रामीणों की इच्छा या ग्राम अथवा नगर सभा की आज्ञा से होता था। डॉ० सेठी के शब्दों में ग्राम वृद्धों के समक्ष भूमि का हस्तान्तरण होता था जो इसकी सीमायें निर्धारित कर देते थे। जो भूमि खाली या मरु पड़ी हुई होती थी जिस पर किसी व्यक्ति का निजी स्वामित्व नहीं होता था वह राज्य की भूमि समझी जाती थी। इसका हस्तान्तरण भी राज्य नगर सभा या ग्राम पंचायत की इच्छा से ही होता था। बहुत से स्थानों पर राज्य की भूमि होती थी, जब कोई राजा उनको दान में देता था, तो दान गृहीता उनका स्वामी बन जाता था। कभी-कभी उनकी भूमि कर से भी मुक्त कर दी जाती थी।

भूमि के अधिकारी - गुप्तकाल में भूमि की नाप भी हुआ करती थी। कृषि योग्य भूमि का सही-सही ब्यौरा भी रखा जाता था। राज्य की ओर से महाक्षटलिक तथा करणिक नामक पदाधिकारी कृषि भूमि की देखभाल किया करते थे।

कृषक - इस समय के किसानों को राज्य आर्थिक सहायता भी दिया करते थे। कृषि कर अन्न के वसूल किया जाता था, किसानों को राज्य का कोई भी छोटा-बड़ा पदाधिकारी सताता नहीं था। कृषि कर वसूल करने का कार्य ध्रुवाधिकारी अफसर किया करता था। किसान का परिवार खेती के कार्यों में लगा रहता था। किसानों की आर्थिक दशा बहुत अच्छी थी, उनके मकान भी कच्चे-पक्के बने हुए थे। समाज में किसानों को महत्वपूर्ण दृष्टि से देखा जाता था। यदि इन पर कर्ज होता था तो इनको दास नहीं बनाया जाता था। उनको अपना कर्ज अदा करने में हर प्रकार की सुविधा दी जाती थी।

फसलें - गुप्तकालीन किसान एक साल में तीन फसलें पैदा करता था। रवी की फसल, खरीफ की फसल तथा जायद। तीसरी फसल साग-सब्जी तथा खरबूज, तरबूज की थी। नदियों के किनारे इस प्रकार की फसल से इस युग का किसान इतनी तरकारियां तथा फल पैदा कर लिया करता था जिससे इस समय की आवश्यकताओं की पूरी तरह से पूर्ति हो जाती थी।

सिंचाई के साधन - इस समय सिंचाई के साधन भी बड़ी उन्नत दशा में थे।

सिंचाई व्यवस्था में निम्न पांच विधियों का प्रयोग होता था। ये सिंचाई विधियाँ मौर्यकाल में भी प्रचलित थी परन्तु गुप्तकाल में इनमें काफी अच्छे तथा उपयोगी परिवर्तन हो चुके थे-

1. नदी, तालाब, कुयें तथा सरोवर द्वारा।
2. ढोल अथवा चरस डालकर सिंचाई करना।
3. बैलों की सहायता से रहट या चरस द्वारा।

4. नहरों में बांध बनाकर जल एकत्र करना तथा डोलियों की सहायता से सिंचाई करना।

5. वायु द्वारा संचालित चक्की द्वारा।
6. ढेंकली द्वारा सिंचाई करना।
7. चर्खी के द्वारा।

समय का किसान वर्षा पर निर्भर नहीं था। राज्य की ओर से सिंचाई के लिए कुएं, तालाब, झील तथा नहरों का निर्माण किया जाता था। जो खेत नदियों के किनारे होते थे, उन खेतों की सिंचाई नदियों के पानी के द्वारा की जाती थी।

गुप्तकालीन भारत में गेहूँ, जौ, चावल (धान), मक्का, जवार, बाजरा, दालें, तिलहन विभिन्न प्रकार के फल, साग-सब्जी, सुपारी, नील की फसलें होती थीं। महाकवि कालिदास के वर्णन से है कि इस काल में धान तथा गन्ने की फसलें प्रचुर मात्रा में हुआ करती थीं। इस काल में कृषि की उन्नति के लिए अनेक वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता था, जिनका पहले कभी भी प्रयोग नहीं हुआ था। इस काल की उन्नति के लिए सिंचाई को उत्तम बनाने हेतु अनेक नहरों, तालाबों, कुओं तथा झीलों का भी निर्माण हुआ। स्कन्दगुप्त के शासनकाल में सुदर्शन झील का निर्माण कराया गया। भूमि को इस काल में अधिक मूल्यवान समझा जाता था। इस समय में जमींदारी प्रथा नहीं थी, कृषि को उन्नत बनाने के लिए हॅल, बैल तथा उत्तम खाद का प्रयोग किया जाता था। कृषकों को राज्य की ओर से आर्थिक सहायता भी प्राप्त होती थी। दैवी विपत्तियों से निपटने के लिए अन्न संचय भी किया जाता था।

कृषि की भूमि को नापने की व्यवस्था भी थी जिसका गुप्तकाल से पूर्व चलन नहीं था। कृषि से संबंधित कार्यों की देख-रेख के लिए महाक्षपटलिक और करणिक नामक अधिकारी थे। कृषि योग भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व रहता था तथा काफी बड़ी भूमि पर राजा का अधिकार था। वनों की लकड़ियाँ राजा की आमदनी बढ़ाने का एक प्रमुख साधन था। वनों की लकड़ी अनेक कार्यों में प्रयोग की जाती थी। कृषि पर उपज का 16 से 25 प्रतिशत तक कर लिया जाता था। कर वसूल करने के लिए ध्रुवाधिकरण नामक अधिकारी था। कर का भुगतान अन्न से किया जाता था।

गुप्तकालीन भारतीय कृषि के क्षेत्र में परिवर्तन

हमारा देश भारत कृषि प्रधान है, यहाँ के निवासी गुप्तकाल में 90 प्रतिशत ग्रामों में रहते थे जिनका प्रमुख व्यवसाय कृषि था। गुप्तकाल में कृषि के हर छोटे-बड़े क्षेत्र में नवीनता की छाप हमें देखने को मिलती हैं। गुप्तकाल के शासक कृषि प्रिय सम्राट थे, वे हर प्रकार की उन्नति चाहते थे। क्योंकि उन्नत कृषि से ही उनके साम्राज्य की आर्थिक व्यवस्था ठीक रह सकती थी और कृषि की उन्नति से ही खुशहाली देश में पनप सकती थी इस बात का गुप्त सम्राटों ने सदैव अपने हृदय में पनपने दिया। साथ ही साथ भारतीय किसानों ने भी हृदय से कृषि की उन्नति के लिए कार्य किये। गुप्तकाल में नवीन कृषि खोजों को अपनाकर कृषि के क्षेत्र में इतनी उन्नति हुई कि उनकी आर्थिक स्थिति पहले के मुकाबले में अच्छी बन गई। ग्रामों की दशा सुधर गई, ग्रामों में भी पक्के मकान दिखाई देने लगे तथा किसानों के पशुधन में तेजी से वृद्धि हुई। साथ ही साथ गुप्त साम्राज्य शक्तिशाली रूप में उभरने लगा। राजनैतिक एकीकरण तथा राष्ट्रीयता के प्रतिष्ठान द्वारा गुप्तकाल की कृषि पहले के कालों के मुकाबले में बेहतर रूप में दिखाई देने लगी। गुप्त सम्राटों ने कृषि की रक्षा के लिए पिछले कालों के मुकाबले में बेहतर कार्य किये जिनमें से कुछ का वर्णन निम्नलिखित हैं-

1. किसानों को पहले के मुकाबले में अधिक रूप में आर्थिक सहायता दी गई, उनको अच्छे बीज खरीदने तथा अच्छे नस्ल के बैल, भैंस खरीदने के लिए अधिक धनराशि दी, पशु खरीदकर उनके द्वारा कृषि की पैदावार में वृद्धि हुई।

2. नये नये कृषि यंत्रों के प्रयोग पर बल दिया गया तथा उनको किसानों से खरीदने के लिए कहा गया। जिन किसानों के पास कृषि औजार खरीदने के लिए धन नहीं था, सरकार ने उनको आर्थिक सहायता देकर कृषि के नवीन यंत्रों को खरीदवा दिया। किसानों ने नवीन कृषि यंत्रों को खरीदकर उनका प्रयोग कृषि में किया। इसका अच्छा परिणाम निकला और पैदावार पहले युगों के मुकाबले अधिक बढ़ गई।

3. कृषि के प्रयोग में प्रयोग होने वाले पशुओं की नस्ल सुधारने हेतु गुप्त सम्राटों ने बड़े अछूते कार्य किये। गुप्तकाल में पशुओं की अच्छी नस्ल की उन्नति के लिए बड़े लाभदायक तथा उपयोगी कार्य किये गये। पशुओं के सुधार हेतु अस्पताल खोले गये। उनकी खुराक पर विशेष ध्यान दिया गया। साथ ही साथ उनसे कृषि के कार्य भी कराये गये। अतः इस परिवर्तन का यह परिणाम निकला कि प्रत्येक ग्राम के पास कृषि में प्रयोग होने वाले अच्छे पशु हो गये, वर्ष में इनसे प्रत्येक किसान न अपने खेतों की जुताई अच्छे ढंग से की अतः कृषि की उन्नति हुई।

4. रोगी पशुओं के लिए अस्पताल खोले गये तथा उनमें दवाइयाँ अधिक मात्रा में रख दी गई तथा रोगी पशुओं को शीघ्र उनके रोगों से छुटकारा दिलाया गया। साथ ही साथ उनको अच्छे किस्म का दाना, घास भी खिलाया गया। इस परिवर्तन से रोगी पशुओं की मरने की संख्या कम हो गई। पशु की मृत्यु संख्या कम होने से किसानों की आर्थिक दशा बिगड़ने नहीं पाई, साथ ही कृषि की भी उन्नति हुई, पैदावार बढ़ गई जिससे किसानों की आर्थिक दशा पहले के मुकाबले में अधिक अच्छी हो गई। इससे राज्य की शक्ति भी बढ़ी, अतः गुप्त साम्राज्य की शक्ति दिन-प्रतिदिन अच्छी होती गई।

5. गुप्तकाल के सम्राटों के शासनकालों में राजनैतिक एकता तथा सामाजिक एकता के क्षेत्रों में बहुमुखी विकास के कारण कृषि की उन्नति के लिए देश में अच्छा वातावरण पैदा हो गया जिसके कारण गुप्तकाल में कृषि की दशा प्रत्येक वर्ष अच्छी होती गई तथा गुप्त साम्राज्य बराबर उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता ही गया।

6. गुप्त सम्राटों के शासनकाल में कृषि की उन्नति के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया गया। गुप्तकाल से पूर्व कृषि की उन्नति के लिए इस प्रकार की वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग नहीं किया गया था। अतः गुप्तकाल में कृषि की बड़ी उन्नति हुई।

7. कृषि की फसल अनेक रोगों के कारण पैदावार अच्छे रूप में नहीं थी, हानिकारक कीटाणु तैयार फसलों को बड़ी हानि पहुंचाते थे। गुप्तकाल में फसलों के हानिकारक कीटाणुओं को मारने के लिए जो नवीन परिवर्तन किये गये उनका अच्छा परिणाम निकला। फसल को हानि पहुंचाने वाले कीड़ों को मारने के लिए दवाइयों का प्रयोग किया गया, जिसके प्रयोग से कीटाणुओं को मार डाला गया। अतः कृषि की गुप्तकाल में बड़ी तेजी से उन्नति हुई।

8. गुप्त सम्राटों के शासनकाल में कुएं, तालाब, नहरों, झीलों का अधिक संख्या में निर्माण कराया गया। प्रत्येक किसान के खेतों में एक कुआं कच्चा या पक्के रूप में था और प्रत्येक किसान अपनी फसल की सिंचाई समय के अनुसार करता था। इससे भी कृषि की उन्नति हुई और अधिक पैदावार बढ़ी। कुएं पक्के रूप में बनाये गये इस काल से पूर्व कच्चे किस्म से कुयें बनाये जाते थे जो बरसात के मौसम में खराब हो जाते थे। वर्षा का पानी उनको खराब कर दिया करता था। जिसके कारण सिंचाई करते समय अनेक प्रकार की कठिनाई का किसानों को सामना करना पड़ता था। गुप्त सम्राटों ने इस कमी को देखा तथा पक्के किस्म के कुएं अधिक संख्या में बनवाये, जिसके कारण गुप्तकाल के समय पैदावार बढ़ी।

9. गुप्त सम्राटों ने ऐसे किसानों को जिनके पास अपनी भूमि नहीं थी उनको भूमि दी, पशु तथा कृषि यंत्रों को खरीदने के लिए आर्थिक सहायता दी। ऐसी भूमिहीन किसानों में बड़ी रुचि के साथ अच्छी फसलें पैदा कीं जिनके प्रयत्नों से कृषि पैदावार बढ़ी। भूमिहीन किसानों की आर्थिक दशा अच्छी होती गई तथा राज्य को कृषि के रूप ऐसे किसानों में अच्छी तादाद में अन्न प्राप्त हुआ जिसके कारण देश में खुशहाली हर तरफ दिखाई देने लगी। इससे गुप्त साम्राज्य अधिक शक्तिशाली बना।

10. गुप्त साम्राज्य में भूमि की नाप कराई गई तथा कृषि भूमि का वर्गीकरण भी किया गया। गुप्तकाल में भूमि की नाप इस ढंग से नहीं हुई जिस ढंग से पूर्व गुप्तकाल में हुआ करती थी। भूमि की नाप की जो सहूलियतें किसानों को सरकार की ओर से प्राप्त हुई उनसे किसानों को बड़ा लाभ हुआ। कृषि से सम्बन्धित लेखा-जोखा रखने के लिए दो पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई जोकि महाझपटलिक तथा कारणिक नामों से पुकारे गये। इनकी देख-रेख में गुप्तकालीन भारत में कृषि की बड़ी तेजी से उन्नत हुई और पैदावार अधिक बढ़ गयी।

11. गुप्त सम्राटों से कृषि कर को वसूल करने के लिए ध्रुवाधिकरण नामक एक पदाधिकारी की नियुक्ति की, जो फसल के समय किसानों को कृषि कर 16 प्रतिशत से 25 प्रतिशत अन्न के रूप में वसूल करता था। किसानों को कृषि कर देते समय किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती थी। कृषि कर अदा करने के पश्चात् किसानों के पास इतना अन्न बच जाता था कि जिनसे प्रत्येक किसान परिवार अपने सभी खर्च पूरा कर लेता था। फिर भी अन्न से उनका घर खाली नहीं होता था और इससे राज्य को अधिक शक्ति प्राप्त हुई।

12. गुप्तकालीन भारत में सिंचाई, बीज, कृषि रोगों की चिकित्सा की नवीन प्रणालियों की खोज हुई तथा उनका प्रयोग खेती-बाड़ी को उन्नति रूप प्रदान करने के लिए किया गया जिसका अच्छा परिणाम निकला। कृषि की पैदावार में वृद्धि हुई। किसानों को अपनी फसलों से अच्छा लाभ हुआ। अतः किसानों ने बड़ी रुचि से पैदावार बढ़ाने के लिए कदम उठाये।

गुप्तकाल के पश्चात् उत्तरी भारत के प्रमुख वंशों की कृषि व्यवस्था

गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात् निम्न राज्यों का उदय बड़ी महत्वपूर्ण दृष्टि से देखा जाता है क्योंकि इन वंशों के शासकों ने अपने-अपने शासनकालों में कृषि की उन्नति पर बड़ा ध्यान दिया। इन वंशों के शासक कृषि को अपने देश की उन्नति तथा शक्ति का आधार कृषि समझते थे। गुप्तकाल में कृषि के क्षेत्र में जो परिवर्तन किये गये थे, उनमें कुछ वैज्ञानिक सुधार इस काल के शासकों द्वारा किये गये, जिनका परिणाम यह हुआ कि देश में पैदावार में वृद्धि हुई तथा हर वंश का राज्य शक्ति के साथ उभरा। इस शक्ति के बल पर भारतीय शासक आपस में युद्ध करने लग गये। उनके आपसी मनमुटाव के कारण तुकों ने सफलता का मुंह देखा और मुहम्मद गोरी ने सन् 1193 ई० में भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना की।

1. मालवराज यशोवर्मन के समय की कृषि व्यवस्था - इस साम्राज्य के शासनकाल में भी कृषि की उन्नति पर ध्यान दिया गया जिसकी उन्नति के कारण इस वंश के राज्य की शक्ति अधिक बढ़ गयी। इस राज्य में खुशहाली हर तरफ देखने को मिली।

2. वाकाटक वंश के समय की कृषि व्यवस्था - इस वंश के शासनकाल में भी कृषि की बड़ी उन्नति हुई क्योंकि वाकाटक वंश के राजाओं ने कृषि की उन्नति पर बड़ा ध्यान दिया। किसानों के गुप्तकालीन कृषि व्यवस्था में जो परिवर्तन किये गये थे उनके पहले के मुकाबले में अधिक उपयोगी बनाया गया जिसका अच्छा परिणाम निकला वाकाटक वंश के साम्राज्य की प्रजा की आर्थिक दशा अच्छी हो गई तथा अच्छी आर्थिक दशा ने वाकाटक वंश के राज्य को शक्ति प्रदान की, और इस वंश के राज्यों की गणना देश के शक्तिशाली राज्यों में हुई।

3. मौखरि वंश के शासनकाल में कृषि व्यवस्था - जब छठी शताब्दी ई0 के मध्य में गुप्त साम्राज्य समाप्त हुआ तब उस समय देश में अनेक छोटे-छोटे राज्य थे जो कि अपने राज्यो में कृषि व्यवस्था की उन्नति पर अधिक ध्यान दिया करते थे क्योंकि उनके देश की शक्ति बढ़ाने का एक प्रमुख साधन कृषि ही था। इन राज्यों में मौखरि वंश के राज्य की गणना, शक्तिशाली राज्य में होती थी, इस वंश के शासनकाल में कृषि राज्य के किसानों का प्रमुख पेशा था। किसान 90 प्रतिशत ग्रामों में रहते थे और एक वर्ष में दो फसलें पैदा करते थे। हर प्रकार की दालें, अन्न तथा साग-सब्जियाँ, फल, मसालें पैदा करते थे जो पूरे साल चलती थी और बच भी जाती थी। किसानों की आर्थिक दशा अच्छी थी। वे अच्छी तरह से रहते थे, समाज में किसानों को अच्छी दृष्टि से देखा जाता था। मौखरि वंश के शासक किसानों एवं कृषि की उन्नति पर बड़ा ध्यान दिया करते थे। राज्य की ओर से किसानों को आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। सिचाई गुप्तकाल के समान थी। सन् 606 ई0 में गृह वर्मा की रणभूमि में मौत की गोद में सुला दिया गया। वह पुत्रहीन था इसके मरते ही मौखरियों की सत्ता का पतन हुआ और कन्नौज पर कुछ राजा हर्ष के समय तक सामन्त रूप में शासन करते रहें। जब हर्ष का देहान्त हो गया तब तो इस वंश के लोग अर्द्ध स्तम्भ शासकों के रूप में शासन करते रहे। मौखरि वंश के शासन की परम्परा गृहवर्मन तक चलती रही, परन्तु गृहवर्मन के देहान्त होने पर इस वंश की राजनैतिक शक्ति का अन्त हो गया। मौखरि वंश के राज्य का अवश्य अन्त हो गया, परन्तु कृषि के क्षेत्र में जो मौखरियों की देन थी वह बराबर उन्नति करती रही और देश की तेजी से उन्नति होती रही। ग्रामों में रहने वाले किसानों की आर्थिक दशा में दिन-प्रतिदिन उन्नति होती रही और भारत में धन-दौलत की कमी नहीं रही।

4. मालवा नरेश यशोवर्मन के राज्य में कृषि व्यवस्था - यशोवर्मन ने हूणों तथा गुप्त नरेशों को हरा कर अपने स्वतंत्र राज्य की नींव डाली। यह एक सकल विजेता था। जिसने अराजक परिस्थिति में अपने देश की रक्षा की तथा हूणों को अपने देश से भी निकाल दिया। इसके साम्राज्य में कृषि की तेजी से उन्नति हुई और आर्थिक दशा अच्छी बनी रही जिसके कारण इस राज्य की शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही गई। इसके राज्य में भी दो फसलें पैदा की जाती थीं सभी किस्म के अन्न, दालें, मसाले, तेल पदार्थ, फल, सब्जियाँ अधिक तादाद में पैदा होते थे, जो सालों साल चलते रहते थे, फिर भी बड़ी संख्या में बच जाती थी। मसाले तथा कुछ किस्म के चावल बाहर राज्यों को भी भेजे जाते थे। किसान 90% ग्रामों में रहते थे जिनका प्रमुख पेशा कृषि था। कृषि की उन्नति पर किसान तथा राज्य दोनों ध्यान दिया करते थे। इस राजा का अधिक समय युद्धभूमि में बीता, फिर भी कृषि की उन्नति में किसी प्रकार की अड़चन पैदा नहीं होने दी। कृषि की पैदावार बढ़ाने के लिए अच्छे उपाय किये गये तथा कृषि की पैदावार बढ़ गई, जिसके कारण इस राज्य की सैनिक शक्ति बढी।

5. उत्तरकालीन गुप्त राजवंश के समय कृषि व्यवस्था - गुप्त साम्राज्य की समाप्ति पर देश के अनेक राजवंशों का उदय हुआ उनमें सबसे शक्तिशाली तथा प्रमुख मगध के गुप्त वंश का राज्य था, इस वंश के शासनकाल में कृषि की दशा अच्छी थी। इस देश में दो फसलें पैदा की जाती थी। अन्न, दालें, तेल पदार्थ, फल, सब्जियाँ, मसाले आदि बड़ी संख्या में पैदा किये जाते थे जिनकी अधिक पैदावार के कारण किसानों की आर्थिक दशा अच्छी थी। वे ग्रामों में कच्चे तथा पक्के मकान बनाकर बड़ी अच्छी तरह से रहते थे। उनका जीवन भी खुशहाल था। उनके पास अधिक मात्रा में पशु धन था। उनके घरों में हर प्रकार की खान-पान की चीजें भरी रहती थीं।

6. हर्षकालीन कृषि व्यवस्था - हर्ष के काल में भी भारत की गणना कृषि प्रधान देश के रूप में होती थी। अनेक भौगोलिक प्रकरणों द्वारा देश की धरती कृषि योग्य बनाई गई। हर्ष के शासनकाल में कृषि सुधार के लिए कार्य किये जिनका परिणाम यह हुआ कि पैदावार में अधिक वृद्धि हुई। गुप्तकाल के समान - हर्ष के शासनकाल में भी कृषि के लिए अनेक प्रकार की वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया गया। सिंचाई के लिए अच्छे तथा उपयोगी कार्य किये गये। नहरों की मरम्मत कराई गई जिनमें हर मौसम में पानी रहता था, बरसात अच्छी न होने पर भी कृषि की पैदावार में सिंचाई के कारण कमी नहीं होने पाती थी। दैवी विपत्तियों का सामना करने के लिए कृषि की उन्नति के लिए उपयोगी तथा लाभदायक उपाय किये जाते थे। कृषि भूमि की नाप भी कराई जाती थी। नाप के द्वारा अच्छी तथा दूसरे किस्म की भूमि पर कृषि कर पैदावार के अनुसार कर लगाया जाता था। प्रत्येक प्रकार की भूमि का लिखित रूप में ब्यौरा राज्य रखता था। कृषि का ब्योरा जो पदाधिकारी रखते थे, उन्हें महाक्षपटालिक तथा करणिक कहते थे। कृषि कर वसूल करने के लिए भी पदाधिकारी थे। कर अन्न के रूप में वसूल किया जाता था। किसानों को उनके कृषि कार्य की उन्नति के लिए राज्य हर समय सहायता करता था। हर्षकालीन लिखित पुस्तकों में भी कृषि के विषय में अच्छी जानकारी मिलती है।

7. राजपूतकालीन कृषि व्यवस्था - राजपूतकालीन भारत के राज्य वंशों के शासक कृषि की उन्नति के लिए सदा अच्छे कार्य करते थे तथा कृषि कार्यों के प्रति विशेष रुचि भी रखते थे। इन वंशों के शासकों का अधिक समय रणभूमि में बीता करता था, फिर भी प्रत्येक शासक कृषि की उन्नति के लिए अच्छे कार्य किया करते थे। भोज ने एक विशाल झील का निर्माण कराया तथा सिंचाई की विधियों में भी सुधार किया। यह झील 250 वर्ग मील के क्षेत्र में फैली हुई थी। इस झील को निर्माण करने का उद्देश्य राज्य की सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाना था। इसके अतिरिक्त कुयें, तालाब भी बनवाये जिनसे सिंचाई की गई। राजपूतकालीन भारत में कृषि योग्य भूमि की देख-रेख अच्छी रूप में की गई। पशुओं के चराने के लिए चरागाहें भी बनाई गई जिनमें पशुओं को सुविधाजनक रूप में चराया जाता था। कृषि में प्रयोग होने वाले पशुओं के स्वास्थ्य को भी अच्छा बनाने के लिए अच्छे कार्य किये गये तथा उनकी नस्ल को सुधारने के लिए भी उपयोगी कार्य किये गये, जिनके सहयोग से राजपूत कालीन भारत में कृषि उन्नति कर गई। राजपूत वंशों के शासनकाल में ग्राम एक-दूसरे के पास-पास नहीं थे। फिर भी अधिक लोग 85 प्रतिशत ग्रामों में रहा करते थे। उनका प्रमुख पेशा कृषि था। राजपूत कालीन भारत में अधिक पैदावार होने लगी थी जिसके कारण राजपूत समाज में किसानों की आर्थिक दशा अच्छी थी।

8. सिन्ध प्रदेश की कृषि व्यवस्था - सिन्ध पर अरबों का अधिकार हो चुका था। अरबों ने भी कृषि की उन्नति पर ध्यान दिया। उपजाऊ भूमि की नाप कराई गयी तथा कृषि भूमि जो अच्छे किस्म की थी उस पर कृषि की पैदावार का 1/4 भाग कृषि कर के रूप में लिया जाता था। किसान कृषि कर अधिकारियों को अन्न के रूप में देते थे, दूसरे प्रकार की भूमि पर 1/6 भाग कर के रूप में वसूल किया जाता था। खेतों का आकार बड़ा किया गया, उनकी मेड़ों को ऊंचा बनाकर फसल की रक्षा की गई तथा किसानों ने अपने-अपने खेतों को अच्छे किस्म के हलों से जोता। खेतों की जुताई गहरे रूप में की गई। खेतों के बड़े-बड़े ढेलों को बारीक करके खेतों में फसल बोई गई। प्रत्येक फसल से अच्छी पैदावार के लिए बीजों को खेती में डाला गया। अच्छी तादाद में गोबर की खाद डाली गई। सिंचाई व्यवस्था को बेहतर रूप दिया गया। पक्के कुएं अधिक रूप में बने जिनसे डोल के द्वारा पानी निकाल कर खेतों की सिंचाई की गई। डोल को खींचने के लिए चार बैलों का प्रयोग किया जाता था। डोल को ऊपर उठाने के लिए दो व्यक्ति हुआ करते थे। खेतों की फसल को बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर सिंचाई की गई जिसका परिणाम यह हुआ कि पैदावार में वृद्धि हुई और किसानों को दोनों फसलों से अच्छी मात्रा में पैदावार प्राप्त हुई जिसके कारण किसानों की आर्थिक दशा अच्छी हो गई और भी अच्छे रूप में जीवन का आनन्द उठाने लगे।

खेतों की निराई भी अच्छे रूप में की गई। बेकार घास की निराई के द्वारा फसल के खेतों से अलग किया गया। निराई से घास प्राप्त हुई उनको पशुओं को खाने के लिए दिया जाता था। जब फसल पककर तैयार होती तब उसको अच्छे ढंग से काटकर एक खुले मैदान में जमा करके उसे माड़ा जाता है। फसल की मड़ाई करते समय दो बैलों का प्रयोग किया गया, इससे फसल घमाई में बड़ी सरलता हुई। अतः कम समय में पैदावार किसानों के घरों में चली गई। घमाई करके पैदा किए अन्न, दाल, तेल पदार्थ आदि को कृषि कर के रूप में अदा कर दिया जाता था। बची हुई पैदावार से किसानों ने अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की दैनिक, मासिक तथा वार्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति करके जीवन का आनन्द उठाया।

तुर्की आक्रमण के समय कृषि व्यवस्था

तुर्की आक्रमणों के समय भारत की कृषि व्यवस्था को जान-बूझकर हानि नहीं पहुंचाई गई। महमूद गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किये। अपने हर आक्रमण में किसानों के खेतों में जिनमें फसल खड़ी थी, उसको तुर्की सेना ने किसी प्रकार से हानि नहीं पहुंचाई, फसल हवा में हिलती रही और महमूद के आंक्रमण से उनको कुछ भी भय नहीं हुआ। हिलते हुए फसल के पौधों ने महमूद गजनवी से कहा कि जितनी चाहो दौलत भारत से ले जाओ, फिर भी भारत में हमारी बदौलत किसी प्रकार की कमी नहीं होने पायेगी। महमूद ने भारत की दौलत से गजनी को संसार का एक प्रसिद्ध नगर बना दिया जिसकी गणना संसार के सुन्दर नगरों में होने लगी। महमूद गजनवी को प्रत्येक आक्रमण से अधिक धन प्राप्त हुआ। बहुत अधिक संख्या में महमूद गजनवी द्वारा भारत का धन गजनी चला गया परन्तु कृषि की अच्छी पैदावार ने उसकी पूर्ति कर दी। प्रत्येक आक्रमण के पश्चात् भारत की दौलत ने महमूद गजनवी को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि “भारत में कृषि की पैदावार अच्छे रूप से होती है। इस देश के शासक कभी भी कमजोर नहीं हो सकते। मुझे जो सफलता प्रत्येक आक्रमण में मिली है वह केवल यहाँ के शासकों में उनके आपसी फूट के कारण प्राप्त हुई है"

महमूद गजनवी के बाद मुहम्मद गोरी ने भारत पर 9 बार आक्रमण किये। उसको 1191 ई0 में पृथ्वीराज चौहान के द्वारा हार का मुंह देखना पड़ा। मुहम्मद गोरी भी यहां की उन्नति कृषि व्यवस्था को देखकर बढ़ा खुश हुआ था। इसी कारण तो उसने भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने की ठान ली। सन् 1192 ई० उसने तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज को हरा दिया और सर्वप्रथम भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना की। वह स्वयं तो भारत से चला गया पर अपने प्रतिनिधि के रूप में कुतुबुद्दीन ऐबक को नव-निर्मित मुस्लिम राज्य का शासक बनाया। सन् 1206 ई० में मुहम्मद गोरी का देहान्त हो गया और सन् 1206 ई0 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की।

गुप्तकाल में उत्तर भारत में कृषि की दशा

उत्तर गुप्तकाल में उत्तरी भारत में अनेक शक्तिशाली राज्यों का उदय हुआ जिनके प्रतापी, वीर साहसी एवं साम्राज्यवादी शासकों ने अपनी कुशल कृषि नीति से पैदावार को बढ़ावा दिया और अपनी शक्ति बढ़ाई तथा अपने-अपने राज्यों की जनता को खुशहाली के साथ रहने के अवसर प्रदान किये। कृषि की उन्नति के कारण हर तरफ उनके राज्य में खुशहाली दिखाई देने लगी। इस काल में कृषि के क्षेत्र में जो परिवर्तन हुए थे उनको बढ़ावा दिया गया। भारत की गणना इस काल में भी कृषि प्रधान देश के रूप में होती थी। इस समय में भी ग्रामों में 90% किसान रहते थे जिनका प्रमुख पेशा कृषि था। 10% लोग ऐसे थे जो महाजन, बढ़ई, लोहार थे जो कृषि कार्यों में बड़ी सहायता दिया करते थे। गुप्तकाल में जो कृषि उन्नत दशा में थी उसको इस काल में भी वैसा ही बनाये रखा गया। इस काल में कृषि के द्वारा जो अन्न, दालें, सब्जियाँ, फल तथा तेल पदार्थ पैदा किये गये उनमें बराबर वृद्धि हुई, उनमें कमी नहीं हुई। किसानों ने बड़ी लगन के साथ कृषि कार्य किये तथा पैदावार को गिरने नहीं दिया। इस समय की जनसंख्या की प्रचुरता के बाद काफी संख्या में पैदावार बच भी जाती थी। इस काल से पूर्व ग्रामों की जनसंख्या अधिक नहीं थी। ग्रामों में मकान किसानों के खेतों के पास ही होते थे जिसके कारण एक किसान के परिवार का घर दूसरे किसान के घर से काफी दूरी पर रहता था। परन्तु ग्राम की सुरक्षा के लिए किसानों के घरों को पास-पास होने पर बल दिया गया ताकि कठिनाई तथा आपत्ति के समय एक किसान दूसरे किसान की सहायता कर सके तथा आपसी संबंध अधिक शक्तिशाली हो सकें। ग्रामों के निवासियों के घर जाति के आधार पर बंटे थे। ब्राह्मण किसानों के घर एक तरफ, शूद्रों के मकान तीन वर्णों के लोगों के मकानों से अलग हुआ करते थे। एक जाति के किसानों का आपसी व्यवहार अच्छा था। ग्रामों के हर जाति के लोग अपनी-अपनी जाति के रीति-रिवाजों को मानते थे। परन्तु समस्त ग्राम निवासियों में सामाजिक मेल-मिलाप का अभाव था फिर भी कठिनाई के समय खेतों की जुताई, निराई, कटाई तथा फसल की बटाई के समय एक-दूसरे की सहायता करते थे। सब एक-दूसरे को अपना भाई समझते थे। ग्राम की लड़कियाँ सबकी पुत्रियाँ थीं। प्रत्येक ग्राम निवासी नारियों को आदर की दृष्टि से देखते थे। ग्राम में प्रत्येक जाति के अपने-अपने कुयें भी थे, हर जाति का अपना-अपना पनघटे था। उनके पूजा-गृह, मंदिर भी अलग थे तथा शूद्रों को मंदिरों में जाने की आज्ञा नहीं थी।

उत्तर गुप्तकाल में कृषि योग्य भूमि

उत्तर गुप्तकाल में कुछ भूमि राजा की ओर से जागीर के रूप में दान स्वरूप ब्राह्मणों को दी जाती थी। कभी-कभी राजा-महाराजा किसी ब्राह्मण, मंदिर या मठ को कुछ ग्राम दान के रूप में दे दिया करते थे। ऐसी भूमि का लगान केवल वही व्यक्ति या संस्था वसूल करता या करती थी जिसको वह भूमि दान के रूप में मिलती थी। ऐसे लोगों को केवल किसानों से लगान वसूल करने का अधिकार था। ऐसे व्यक्ति तथा संस्था किसानों को उनकी भूमि से बेदखल नहीं कर सकते थे। जो व्यक्ति अपनी भूमि को स्वयं नहीं जोतते थे, वे अपनी भूमि को किसानों को कुछ शर्तों के साथ जोतने के लिए दे दिया करते थे, ऐसी भूमि से उत्तर गुप्तकाल में कृषि लगीन के रूप में 33% से 50% तक पैदावार का भाग जागीरदारों को मिलता था। गुप्तकाल में 17% से 35% तक कृषि कर राज्य को प्राप्त होता था। उत्तर गुप्तकाल में भूमि की कीमत उसकी पैदावार के आधार पर आंकी जाती थी। ऐसी बात गुप्तकाल में पैदा हुई थी, गहरी भूमि में 50% से 75% तक प्रति एकड़ कृषि कर राज्य को किसान दिया करते थे। इस काल में भी भूमि एक खास संपत्ति के रूप में देखी जाती थी। जागीरी भूमि को जागीरदार को बेचने का हक भी प्राप्त था। कर के रूप में जागीरदार किसी प्रकार का कर राज्य को नहीं देता था।

उत्तर गुप्तकाल में भूमि के अधिकारी - उत्तर मुप्तकाल में कृषि योग्य भूमि की नाप कराई जाती थी। कृषि, भूमि, सहरा भूमि, बंजर भूमि का ब्यौरा भी रखा जाता था। उत्तर गुप्तकाल में ग्रामों में चौधरी, पटेल मुखिया आदि सरकारी कर्मचारी कृषि की देखभाल किया करते थे। राज्य की ओर से महाक्षपटलिक तथा करणिक नामक अधिकारी राज्य की राजधानी में रहते थे जो संपूर्ण राज्य की भूमि की देखभाल किया करते थे।

उत्तर गुप्तकाल में कृषक - इस समय में कृषकों को राज्य अधिक आर्थिक सहायता भी दिया करता था। ऐसी प्रथा का चलन गुप्तकाल में भी था, किसानों को राज्य का कोई भी छोटा-बड़ा पदाधिकारी सताता नहीं था। कृषि कर वसूल करने के अधिकारी भी गुप्तकाल के समान उत्तर काल में भी थे, वे किसानों से कृषि कर उनकी सहूलियत के अनुसार वसूल किया करते थे। किसान का परिवार खेतों के कार्यों में लगा रहता था। समाज में किसानों को अच्छी दृष्टि से देखता था। उनको अन्न देवता भी कहा जाता था। यदि उन पर महाजन का कर्ज होता था तो उनको दास नहीं बनाया जाता था। महाजन की ओर से उनको अपना कर्ज अदा करने के लिए हर प्रकार की सहूलियत दी जाती थी।

उत्तर गुप्तकाल में पैदा की जाने वाली फसलें - इस काल का किसान तीन फसलें एक वर्ष में पैदा करता था जिनको खरीफ की फसल, रवी की फसल तथा जायद की फसल के नाम से पुकारा जाता था। इस तीसरी फसल की उन्नति तथा पूर्ण रूप से विकास उत्तर गुप्तकाल में हुआ। जायद फसल साग-सब्जी तथा खरबूजे, तरबूजों की थी। इनको नदियों के किनारे पैदा किया जाता था। नदियों के किनारे उत्तर गुप्तकाल का किसान इतनी संख्या में पैदा कर लिया करता था कि जो उस समय के निवासियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के पश्चात् बच भी जाती थी। मौसम के अनुसार फल भी खूब पैदा होते थे।

उत्तर गुप्तकाल में सिंचाई के साधन - उत्तर गुप्तकाल में गुप्तकाल के समान सिंचाई के साधन थे परन्तु उनमें थोड़ा बहुत परिवर्तन भी पैदा कर दिया गया था। सिंचाई पर इस काल के शासक तथा किसान दोनों ही अधिक ध्यान दिया करते थे। इस समय का किसान वर्षा पर निर्भर नही था। यदि वर्षा ठीक हो गई तब उसको अपने खेतों में सिंचाई कम करना पड़ती थी। परन्तु वर्षा न होने पर इस युग का किसान अपने खेतों की सिंचाई समय पर करता था जिसके कारण पैदावार में कमी नहीं होने पाती थी सिंचाई की निम्न सात विधियाँ प्रचलित थीं-

(i) नदी, तालाब, कुएं तथा सरोवर से ढेंकुली के द्वारा - यह सिंचाई की विधि हमारे देश में प्राचीनकाल से प्रचलित रही है। मौर्यकाल से ढेंकुली की बनावट में परिवर्तन हुए, फिर गुप्तकाल में इसकी शक्ल-सूरत को बदला गया परन्तु उत्तर गुप्तकाल में इसको शक्तिशाली बनाया गया। इसके पिछले भाग में पत्थर या ईंटों की सिल आयाताकार रूप में बनाकर रखी गई जिसके कारण कुएं तालाब, झील, नाले आदि के पानी से खेतों की सिंचाई करते समय बड़ी सहूलियत हुई। कम से कम परिश्रम में खेत के अधिक भाग को सींचा गया।

(ii) डोल अथवा चरस के द्वारा सिंचाई विधि - उत्तर गुप्तकाल में डोल तथा चरसों को नया रूप दिया गया। इनको बेहतर बनाने का कार्य गुप्तकाल से शुरू हो गया था। डोल मिट्टी, चमड़े तथा लोहे के बनाये गये, परन्तु मिट्टी के डोल तथा चरस कुएं से पानी खींचते समय जल्दी टूट जाते थे। अतः मिट्टी से बने डोल तथा चरसों के स्थान पर लोहे के चरस तथा डोल बनाये गये जिनसे उनके टूटने का भय सदा के लिए समाप्त हो गया। कुएं जो अधिक रूप में कच्चे होते थे उनको गहरा तथा पक्के रूप में पक्की ईंटों से बनाया गया। अतः इस विधि से खेतों की सिंचाई करते समय किसानों को बड़ी सहूलियत मिली, परन्तु इस सिंचाई में उसके परिवार के बड़े सदस्य लगे थे, अतः पैदावार में वृद्धि हुई।

(iii) बैलों की सहायता से रहट या चरस द्वारा सिंचाई विधि - सिंचाई के लिए पक्के किस्म के कुएं बनाये गये जो अधिक गहरे रूप में थे। इनसे रहट तथा चरस के द्वारा बैलों की जोड़ी की सहायता से कुएं से पानी खींचकर खेतों की सिंचाई उत्तर गुप्तकालीन किसान किया करता था। इस सिंचाई विधि में 3-4 व्यक्ति सिंचाई के कार्य में लगते थे।

(iv) नहरों को बांधकर जल एकत्र करना तथा डलियों की सहायता से सिंचाई करने की विधि - 55 यह भी हमारे देश की सिंचाई की प्राचीनतम विधि थी। इस विधि से भी उत्तर गुप्तकाल का किसान अपने खेतों की सिंचाई करता था। किसान इस सिंचाई विधि का प्रयोग उन खेतों में प्रयोग करते थे जो नहरों, नदियों, तालाबों तथा झीलों के पास हुआ करते थे।

(v) वायु द्वारा संचालित चक्की द्वारा सिंचाई विधि - इस विधि का आविष्कार मौर्यकाल में हुआ। गुप्तकाल में इस सिंचाई विधि को वैज्ञानिक रूप दिया गया। उत्तर गुप्तकाल में इसमें थोड़ा सुधार करके इसको अधिक उपयोगी बनाया गया। परन्तु इस विधि के द्वारा कम ही किसान अपने खेतों की सिंचाई किया करते थे।

(vi) ढेंकुली द्वारा सिंचाई की विधि - कच्चे कुएं बनाकर उत्तर गुप्तकाल का किसान अपने खेतों की सिंचाई किया करता था। प्रत्येक किसान के खेतों में एक कच्चे किस्म का कुआं होता था उसी से ढेंकुली द्वारा किसान अपने खेतों को सींचता था। इस सिंचाई विधि से आज भी ग्राम का किसान अपने खेतों को सींचता है।

(vii) चखीं के द्वारा सिंचाई की विधि - उत्तर गुप्तकाल में चर्खी के द्वारा भी सिंचाई होती थी। उत्तर गुप्तकाल का किसान वर्षा पर निर्भर नहीं था। राज्य की ओर से सिंचाई के लिए पक्के कुएं, तालाब, झीलें अथवा नहरों का निर्माण किया जाता था। जो खेत नदियों के किनारे होते थे, उन खेतों की सिंचाई नदियों के जल के द्वारा की जाती थी।

उत्तर गुप्तकाल में कृषि उन्नत दशा में भी थी जिसके कारण पैदावार अच्छे रूप में हुआ करती थी। देश में धन-दौलत की कमी नहीं थी। इस युग के किसानों की आर्थिक दशा बहुत ही अच्छी थी। चारों ओर खुशहाली का दौर था। इसी कारण भारत विदेशों में सोने की चिड़िया के नाम से देखा जाता। महमूद गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण केवल भारत की दौलत प्राप्त करने के लिए किये थे।

कृषि की उन्नति के कारण ग्रामों के किसानों की आर्थिक दशा अच्छी हो गई थी, जिसके कारण किसान परिवारों में सुख-चैन की बंसरी बजने लगी थी। खुशहाली उनके कदम चूमने लगी थी। किसानों के घरों में हर सदस्य को अच्छे ढंग से रहना आ गया था। किसान परिवार के हर सदस्य को दो वक्त की रोटी बड़े आराम से मिलती थी। निर्धन किसान को कृषि के कार्य बड़ी अच्छी मात्रा में मिलते थे। कृषि मजदूरों का भी आर्थिक जीवन पहले से बेहतर हो गया था। उनके परिवारों में भी खुशहाली के चिन्ह अच्छे रूप में दिखाई देने लगे थे। अतः यह कहना उचित है कि कृषि की अच्छी दशा के कारण भारतवासियों की आर्थिक व्यवस्था अच्छी थी।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- वर्ण व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? भारतीय दर्शन में इसका क्या महत्व है?
  2. प्रश्न- जाति प्रथा की उत्पत्ति एवं विकास पर प्रकाश डालिए।
  3. प्रश्न- जाति व्यवस्था के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए। इसने भारतीय
  4. प्रश्न- ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल की भारतीय जाति प्रथा के लक्षणों की विवेचना कीजिए।
  5. प्रश्न- प्राचीन काल में शूद्रों की स्थिति निर्धारित कीजिए।
  6. प्रश्न- मौर्यकालीन वर्ण व्यवस्था पर प्रकाश डालिए। .
  7. प्रश्न- वर्णाश्रम धर्म से आप क्या समझते हैं? इसकी मुख्य विशेषताएं बताइये।
  8. प्रश्न- पुरुषार्थ क्या है? इनका क्या सामाजिक महत्व है?
  9. प्रश्न- संस्कार शब्द से आप क्या समझते हैं? उसका अर्थ एवं परिभाषा लिखते हुए संस्कारों का विस्तार तथा उनकी संख्या लिखिए।
  10. प्रश्न- सोलह संस्कारों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  11. प्रश्न- प्राचीन भारतीय समाज में संस्कारों के प्रयोजन पर अपने विचार संक्षेप में लिखिए।
  12. प्रश्न- प्राचीन भारत में विवाह के प्रकारों को बताइये।
  13. प्रश्न- प्राचीन भारत में विवाह के अर्थ तथा उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए तथा प्राचीन भारतीय विवाह एक धार्मिक संस्कार है। इस कथन पर भी प्रकाश डालिए।
  14. प्रश्न- परिवार संस्था के विकास के बारे में लिखिए।
  15. प्रश्न- प्राचीन काल में प्रचलित विधवा विवाह पर टिप्पणी लिखिए।
  16. प्रश्न- प्राचीन भारतीय समाज में नारी की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
  17. प्रश्न- प्राचीन भारत में नारी शिक्षा का इतिहास प्रस्तुत कीजिए।
  18. प्रश्न- स्त्री के धन सम्बन्धी अधिकारों का वर्णन कीजिए।
  19. प्रश्न- वैदिक काल में नारी की स्थिति का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  20. प्रश्न- ऋग्वैदिक काल में पुत्री की सामाजिक स्थिति बताइए।
  21. प्रश्न- वैदिक काल में सती-प्रथा पर टिप्पणी लिखिए।
  22. प्रश्न- उत्तर वैदिक में स्त्रियों की दशा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  23. प्रश्न- ऋग्वैदिक विदुषी स्त्रियों के बारे में आप क्या जानते हैं?
  24. प्रश्न- राज्य के सम्बन्ध में हिन्दू विचारधारा का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  25. प्रश्न- महाभारत काल के राजतन्त्र की व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
  26. प्रश्न- प्राचीन भारत में राज्य के कार्यों का वर्णन कीजिए।
  27. प्रश्न- राजा और राज्याभिषेक के बारे में बताइये।
  28. प्रश्न- राजा का महत्व बताइए।
  29. प्रश्न- राजा के कर्त्तव्यों के विषयों में आप क्या जानते हैं?
  30. प्रश्न- वैदिक कालीन राजनीतिक जीवन पर एक निबन्ध लिखिए।
  31. प्रश्न- उत्तर वैदिक काल के प्रमुख राज्यों का वर्णन कीजिए।
  32. प्रश्न- राज्य की सप्त प्रवृत्तियाँ अथवा सप्तांग सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए।
  33. प्रश्न- कौटिल्य का मण्डल सिद्धांत क्या है? उसकी विस्तृत विवेचना कीजिये।
  34. प्रश्न- सामन्त पद्धति काल में राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
  35. प्रश्न- प्राचीन भारत में राज्य के उद्देश्य अथवा राज्य के उद्देश्य।
  36. प्रश्न- प्राचीन भारत में राज्यों के कार्य बताइये।
  37. प्रश्न- क्या प्राचीन राजतन्त्र सीमित राजतन्त्र था?
  38. प्रश्न- राज्य के सप्तांग सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
  39. प्रश्न- कौटिल्य के अनुसार राज्य के प्रमुख प्रकारों का वर्णन कीजिए।
  40. प्रश्न- क्या प्राचीन राज्य धर्म आधारित राज्य थे? वर्णन कीजिए।
  41. प्रश्न- मौर्यों के केन्द्रीय प्रशासन पर एक लेख लिखिए।
  42. प्रश्न- चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
  43. प्रश्न- अशोक के प्रशासनिक सुधारों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
  44. प्रश्न- गुप्त प्रशासन के प्रमुख अभिकरणों का उल्लेख कीजिए।
  45. प्रश्न- गुप्त प्रशासन पर विस्तृत रूप से एक निबन्ध लिखिए।
  46. प्रश्न- चोल प्रशासन पर एक निबन्ध लिखिए।
  47. प्रश्न- चोलों के अन्तर्गत 'ग्राम- प्रशासन' पर एक निबन्ध लिखिए।
  48. प्रश्न- लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में मौर्य प्रशासन का परीक्षण कीजिए।
  49. प्रश्न- मौर्यों के ग्रामीण प्रशासन पर एक लेख लिखिए।
  50. प्रश्न- मौर्य युगीन नगर प्रशासन पर प्रकाश डालिए।
  51. प्रश्न- गुप्तों की केन्द्रीय शासन व्यवस्था पर टिप्पणी कीजिये।
  52. प्रश्न- गुप्तों का प्रांतीय प्रशासन पर टिप्पणी कीजिये।
  53. प्रश्न- गुप्तकालीन स्थानीय प्रशासन पर टिप्पणी लिखिए।
  54. प्रश्न- प्राचीन भारत में कर के स्रोतों का विवरण दीजिए।
  55. प्रश्न- प्राचीन भारत में कराधान व्यवस्था के विषय में आप क्या जानते हैं?
  56. प्रश्न- प्राचीनकाल में भारत के राज्यों की आय के साधनों की विवेचना कीजिए।
  57. प्रश्न- प्राचीन भारत में करों के प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
  58. प्रश्न- कर की क्या आवश्यकता है?
  59. प्रश्न- कर व्यवस्था की प्राचीनता पर प्रकाश डालिए।
  60. प्रश्न- प्रवेश्य कर पर टिप्पणी लिखिये।
  61. प्रश्न- वैदिक युग से मौर्य युग तक अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व की विवेचना कीजिए।
  62. प्रश्न- मौर्य काल की सिंचाई व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
  63. प्रश्न- वैदिक कालीन कृषि पर टिप्पणी लिखिए।
  64. प्रश्न- वैदिक काल में सिंचाई के साधनों एवं उपायों पर एक टिप्पणी लिखिए।
  65. प्रश्न- उत्तर वैदिक कालीन कृषि व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
  66. प्रश्न- भारत में आर्थिक श्रेणियों के संगठन तथा कार्यों की विवेचना कीजिए।
  67. प्रश्न- श्रेणी तथा निगम पर टिप्पणी लिखिए।
  68. प्रश्न- श्रेणी धर्म से आप क्या समझते हैं? वर्णन कीजिए
  69. प्रश्न- श्रेणियों के क्रिया-कलापों पर प्रकाश डालिए।
  70. प्रश्न- वैदिककालीन श्रेणी संगठन पर प्रकाश डालिए।
  71. प्रश्न- वैदिक काल की शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
  72. प्रश्न- बौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए वैदिक शिक्षा तथा बौद्ध शिक्षा की तुलना कीजिए।
  73. प्रश्न- प्राचीन भारतीय शिक्षा के प्रमुख उच्च शिक्षा केन्द्रों का वर्णन कीजिए।
  74. प्रश्न- "विभिन्न भारतीय दार्शनिक सिद्धान्तों की जड़ें उपनिषद में हैं।" इस कथन की विवेचना कीजिए।
  75. प्रश्न- अथर्ववेद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

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