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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 हिन्दी - साहित्यशास्त्र और हिन्दी आलोचना

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2784
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 हिन्दी - साहित्यशास्त्र और हिन्दी आलोचना- सरल प्रश्नोत्तर

4. रूपक

प्रश्न- रूपक किसे कहते हैं? रूप के भेदों-उपभेंदों पर प्रकाश डालिए।

उत्तर -

रूपक से आशय - साहित्याचार्यों द्वारा काव्य के दो भेद किए गए हैं- दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य। इनमें से अभिनय पूर्वक रंगमंच पर प्रदर्शित किए जाने से हमारे नेत्रों का विषय बनने वाले नाटकादि दृश्य काव्य कहलाते हैं। इस दृश्य काव्य को नाट्य, रूप एवं रूपक भी कहा जाता है, जो इसकी अलग विशेषताओं पर आधारित भिन्न-भिन्न नाम हैं। 'अवस्थानुकृतिर्नाट्स' अभिनय करने वाले पात्र (नट आदि) के द्वारा राम, दुष्यन्त आदि नायक तथा सीता, शकुन्तला आदि नायिकाओं की सुख- दुःख, हर्ष - शोक आदि अवस्थाओं का अपने अभिनय कौशल से अनुकरण किया जाना ही नाट्य कहलाता है। नाट्य का अर्थ है अभिनय। अतः अभिनेय होने के कारण नाटकादि को नाट्य कहा जाता है। 'रूपं दृश्यतयोच्यते' वह नाट्य ही अभिनय द्वारा रंगमंच पर प्रदर्शित होने से हमारे नेत्रों के लिए दर्शनीय होता है। इसीलिए इसी को रूप भी कहा जाता है। जैसे कि प्रकृति में नीला, पीला, लाल, हरा आदि पदार्थ (वस्तुएँ) नेत्रों से देखे जाने के कारण रूप है वैसे ही नाटकादि भी नेत्र ग्राह्य होने के कारण रूप कहलाता है। 'रूपक तत्समारोपात्' रंगमंच पर राम आदि का अभिनय करने वाले पात्र (नट) में सहृदय जन रात आदि का आरोप कर लेते हैं अर्थात् उसे राम आदि ही समझने लगते हैं। नट पर राम आदि का आरोप किए जाने के कारण जो पहले नाट्य और रूप कहा गया हैवही रूपक भी कहलाता है। इस तरह नेत्रों का विषय बनने से जो काव्य दृश्य काव्य रूप है वहीं अभिनेयता के कारण नाट्य और रूपक भी है।

रूपक के भेद - रूपक अनेक प्रकार के होते हैं। दशरूपककार धनंजय ने “वस्तुनेता रसस्तेषां भेदकः " कहकर वस्तु, नेता एवं रसभेद के आधार पर रूपक के दस भेदों का निरूपण किया है। 'दशधैव रसाश्रयम्" से धनंजय ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि रूपक रस पर आश्रित होते हैं और इनकी संख्या दस ही है। तात्पर्य यह है कि शुद्ध रूप में दस प्रकार का ही नाट्य होता है जो कि रसाश्रित होता है जहाँ रसों का संकर होता है वह शुद्ध रूपक न होकर संकीर्ण रूपक या उपरूपक कहलाता है। रस पर आधारित दस रूपक इस प्रकार इंगित किए गए हैं-

नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः।
व्यायोग समवकारी वीथ्यङ्केहामृगाः इति।। "

क्योंकि यह सभी रूपकों में नाटक प्रकरण, भाण, प्रहसन, डिम, व्यायोय, समवकार, वीथि अंक और ईहामृग ये दश रूपक भेद कहे गए हैं। इन दश रूपकों का समीक्षात्मक विवरण इस प्रकार है-

1. नाटक - नाटक को सभी रूपकों की प्रकृति कहा जाता है। प्रमुख है। इसमें रसों की प्रचुरता होती है। रूपक के सभी लक्षण वस्तु नेता एवं रस सम्बन्धी नाटकों में पाए जाते हैं। नाटक के प्रारम्भ में पूर्वरंग (मंगलाचरण) आदि का विधान किया जाता है। तत्पश्चात् प्रस्तावना के बाद नाटक का अभिनय अंकों के अन्तर्गत किया जाता है। नाटक का कथानक प्रख्यात अर्थात् इतिहास ( रामायण, महाभारत, पुराणादि) से उद्धृत होता है। इसका नाटक रमणीय पुणों से युक्त तथा प्रसिद्ध वंश में उत्पन्न हुआ कोई राजा (राजर्षि) या दिव्य पुरुष होता है। उसे धीरोदात्त पराक्रमी, यश की अभिलाषा करने वाला, उत्साह सम्पन्न कृष्णादि की तरह दिव्य, रामादि की तरह दिव्यादिव्य दुष्यन्तादि की तरह अदिव्य होना चाहिए। नाटक का इतिवृत्त बनने वाली प्रख्यात कथा में यदि कोई अंश नायक की धीरेदात्तता की दृष्टि से या रसानुभूति की दृष्टि से अनुचित हो तो उसे हटा देना चाहिए या उसकी दूसरी प्रकार से कल्पना कर ली जानी चाहिए। नाट्यारम्भ से पूर्व यदि कोई वृत्तान्त ऐसा हो जिसे रंगमंच पर दिखाना सम्भव न हो किन्तु दर्शकों के लिए उसे जानना जरूरी हो तो अंकों से पहले विष्कम्भक की योजना करके उसकी सूचना दी जानी चाहिए।

2. प्रकरण - प्रकरण की कथा ऐतिहासिक न हो कर कवि की कल्पना से निर्मित एवं साधारण जन के जीवन पर आधारित होती है। इसका नायक मन्त्री, ब्राह्मण या वणिक (वैश्य / व्यापारी) में से कोई एक होता है। वह धीर प्रशान्त कोटि का होता है तथा सदैव धर्म-अर्थ और काम की सिद्धि के लिए तत्पर रहता है। उसकी कार्यसिद्धि अनेकानेक विघ्नों से बाधित होती है। इस रूपक भेद में शृंगार अथवा वीर में कोई एक अंगी रस होता है तथा अन्य रस गौण रूप में होते हैं। इसमें पाँच अर्थ प्रकृतियाँ, पंच कार्यवस्थाएँ, पंच सन्धियाँ तथा अंक संख्या, नाटक की तरह ही होती है। नायिका की दृष्टि से प्रकरण तीन तरह का होता है एक कुलजनिष्ठ, जिसमें केवल कुलजा (कुलीन वंशोत्पन्न) नायिका होती है। दूसरा जिसमें केवल गणिका नायिक होता है और तीसरा जिसमें कुलजा और गणिका दोनों ही नायिकाएँ होती हैं।

3. भाण - भाण नामक रूपक भेद में कोई चतुर तथा बुद्धिमान (पण्डित) विट अपने या दूसरे के अनुभव के आधार पर किसी धूर्त के चरित्र का वर्णन करता है। भाग में एक ही अंक तथा (विट) एक अकेला पात्र होता है। वह विट आकाश भाषित के द्वारा स्वयं ही सम्बोधन और उत्तर प्रत्युत्तर करते हुए कथा को आगे बढ़ाता है। इस रूपक में शौर्य एवं सौभाग्य ( विलासादि) के वर्णन से वीर तथा शृंगार रस की सूचना विट के द्वारा दी जाती है। इसमें भारती वृत्ति की प्रधानता होती है। इसकी कथावस्तु कविकल्पित होती है। इसमें मुख तथा निर्वहण ये दो सन्धियाँ अंगों सहित होती है। साथ ही लास्य के दस अंगों की योजना भी इसमें होती है।

4. प्रहसन — हास्य रस प्रधान प्रहसन की कथावस्तु कवि कल्पित होती है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार इसमें एक या दो अंक होते हैं। अन्य आचार्य इसे भाण की तरह एकांकी मानते हैं। प्रहसन तीन प्रकार का होता है शुद्ध, विकृत और संकीर्ण पाखण्डी कहलाने वाले धूर्त विप्र, एवं धूर्त दास-दासी आदि के चरित्र, वेश तथा भाषादि से युक्त प्रहसन शुद्ध प्रहसन है। कामुक की तरह वेश वाले तथा वैसी ही भाषा बोलने वाले नपुंसक, कंचुकी, तपस्वी आदि पात्रों का समावेश जिस प्रहसन में हो वह विकृत प्रहसन तथा धूर्त पात्रों के चरित्रांकन से युक्त प्रहसन संकीर्ण प्रहसन कहलाता है। यह रूपक हास्य उत्पन्न करने वाले कथनों से परिपूर्ण होता है। इसका नायक बौद्ध भिक्षु, शैव सन्यासी, तपस्वी या गृहस्थ हो सकता है। इसके परिहास पूर्ण संवादों से दर्शकों में हास्य उत्पन्न होता है। प्रहसन में मिथ्या आचरण करने वाले नायक को सुसंस्कृत भाषा में सभ्य जन की तरह बोलते हुए दिखाया जाता है। यहाँ नाटकीय कथानक के कुछ अंश में विशेष भाव को प्रकट करते हैं तथा शेष अंश में मिथ्याचारी नायक के जीवन के उन अंशों को दिखाया जाता है जिनका उपहास करना यहाँ लक्षित होता है। यह एक अंक वाला रूपक है। इसमें भी मुख तथा निर्वहण दो सन्धियाँ होती है। यहाँ वेशभूषा तथा भाषा की विकृति से हास्य उत्पन्न होता है।

5. डिम - डिम की कथावस्तु इतिहास प्रसिद्ध होती है। इसमें स्त्री पात्रों के अभाव में कैशिकी वृत्ति को छोड़कर सात्वती, आरभटी और भारती ये तीन वृत्तियाँ होती हैं। इसके नेता देव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस तथा नाग आदि मानवेत्तर योनि के लोग होते हैं अथवा भूत, प्रेत, पिशाच आदि सोलह उद्धत नायक इसमें होते हैं। इसमें रौद्र रस अंगीरस होता है तथा श्रृंगार एवं हास्य को छोड़कर अन्य रस (करूण, वीर, वीभत्स, भयानक एवं अद्भुत) अंग रूप में होते हैं। यह माया, इन्द्रजाल, संग्राम, क्रोध, उद्भ्रान्त (उन्मत्त) आदि की चेष्टाओं तथा सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण आदि के दृश्यों से युक्त होता हैं। इस रूपक में चार अंक होते हैं। इसमें मुख, प्रतिमुख, गर्भ तथा निर्वहण ये चार संधियाँ होती हैं।

6. व्यायोग - व्यायोग का इतिवृत्त इतिहास प्रसिद्ध होता है। इसका नायक कोई इतिहास प्रसिद्ध उद्भत व्यक्ति होता है। इसमें मुख प्रतिमुख और निर्वहण ये तीन संधियाँ तथा श्रृंगार एवं हास्य के अलावा अन्य छः रस (करूण, रौद्र, वीर, वीभत्स, भयानक एवं अद्भमुत) दीप्त होते हैं। इसमें ऐसे युद्ध का वर्णन होता है जिसके मूल में कोई स्त्री कारण न हो। जैसे- 'जामदग्न्य जय' नामक व्यायोग में प्रसिद्ध उद्धत नायक परशुराम ने पितृवध के कारण क्रोधित होकर सहदााबाहु से युद्ध किया है। यह रूपक एक अंक का ही होता है, जिसमें एक ही दिन की कथा वर्णित होती है। कैशिकी वृत्ति को छोड़कर सात्वती, आरभटी और भारती रूप तीन वृत्तियाँ इसमें होती। नामक रूपक भेद में पुरूष पात्रों की ही बहुलता होती है।

7. समवकार - देवों और असुरों से सम्बद्ध पुराण प्रसिद्ध कथा ही समवकार का इतिवृत्त होता है। इसमें सात्वती, आरभटी, भारती ये तीन वृत्तियाँ होती हैं। कैशिकी वृत्ति इसमें स्वल्प रूप में होती है। इसमें बारह नायक होते हैं जो इतिहास प्रसिद्ध देवता और दावन होते हैं। इन सभी नायकों की फलसिद्धि भी पृथक होती है। ये सभी नायक वीर रस से पूर्ण होते हैं। जैसे समुद्रमंथन में परिलक्षित होते हैं। समवकार में तीन अंक होते हैं। प्रत्येक अंक में क्रमशः तीन प्रकार का कपट (वस्तुकृत, स्वभावकृत और दैवकृत) तीन प्रकार का विद्रव (नगरोपरोध युद्ध तथा वायु, अग्निकृत) तथा तीन प्रकार का श्रृंगार ( धर्म, अर्थ एवं काम से युक्त श्रृंगार) होता है। इसमें बिन्दु नामक अर्थ प्रकृति तथा प्रवेशक नामक अर्थोपक्षेपक नहीं होता। -

8. वीथि - यह रूपक भेद भी एकांकी है। वीथि में कैशिकी वृत्ति होती है। इसमें श्रृंगार रस का पूर्ण परिपाक न होने के कारण वह बहुत से उपायों द्वारा केवल सूक्ष्म मात्रा होता है। अन्य रसों का भी स्वल्प मात्रा में स्पर्श किया जाता है अर्थात् अन्य रस भी इसमें सूचित मात्रा होते हैं। इसमें मुख एवं निर्वहण नामक दो सन्धियाँ होती हैं। यह प्रस्तावना के उद्भात्यक आदि अंगों से युक्त होती है। वीथि के अंग होते हैं। इसमें पात्र संख्या एक या दो ही होती है।

6. अंक - नाटक के अन्तर्विभाग (अंक) तथा इस रूपक भेद में किसी प्रकार का संशय न हो इसलिए इस रूपक भेद का दूसरा नाम 'उत्सृष्टिकांक' कहा जाता है। उत्सृष्टिकांक की कथावस्तु तो इतिहास प्रसिद्ध होती है किन्तु प्रख्यात कथा को ग्रहण करते हुए भी कवि अपने बुद्धि वैभव से उसमें परिवर्तन कर लेता है। इसका अंगों रस करूण रस है। इसके नायक सामान्य जन होते हैं। इसमें मुख एवं निर्वहण सन्धि एवं भारती वृत्ति तथा उसके अंगों की योजना की जाती है। इसमें एक ही अंक होता है। करूण रस प्रधान होने के कारण यह रूपक भेद स्त्रियों के विलाप से युक्त होता है। अर्थात् इसमें शोकग्रस्त विह्वल स्त्रियों का विशेष रूप से चित्रण होता है। इसमें वाक् युद्ध तथा मौखिक जन- पराजय का वर्णन किया जाता है। कोई-कोई आचार्य इसमें एक से तीन तक अंकों का विधान करते हैं।

10. ईहामृग - मृग की तरह अलभ्य (अप्राप्य) किसी नायिका की ईहा (अभिलाषा) के वर्णित होने के कारण ही इस रूपक भेद को ईहामृग कहा जाता है। इसका इतिवृत्त इतिहास तथा कवि कल्पना का मिश्रित रूप होता है। इसमें चार अंक तथा मुख, प्रतिमुख, निर्वहण रूप तीन सन्धियाँ होती हैं। इसमें देवता तथा मनुष्य में से कोई एक नायक तथा दूसरा प्रतिनायक होता है। वे धीरोदात्त कोटि के होते हैं। इसमें प्रतिनायक भ्रमात्मक एवं विपरीत बुद्धि के कारण अनुचित कार्य करने वाला होता है। वह किसी दिव्य स्त्री (जो उससे प्रेम नहीं करती) का अपहरण करना चाहता है। ऐसी स्थिति में कवि उस प्रतिनायक के आश्रय से श्रृंगाराभास का कुछ-कुछ वर्णन इस रूपक में करता है। नायक प्रतिनायक का विरोध पूर्णता पर पहुँच कर भी किसी न किसी बहाने से इसमें युद्ध को रोक दिया जाता है। प्रतिनायक के वध की स्थिति आ जाने पर भी उसका वध टाल दिया जाता है। रूपक के मूल कथानक में महापुरुष के वध का वर्णन भले भी अंकित हो, किन्तु रूपक में उसे कदापि प्रदर्शित नहीं किया जाता है अर्थात् इसके इतिवृत्त में प्रतिनायक का वध नहीं दिखाया जाता।

11. उपरूपक – इन दस रूपकों के अलावा नाट्याचार्यों ने अट्ठारह उपरूपक भेद भी बताए हैं जो इस प्रकार हैं-

1. नाटिका,
2. त्रोटक,
3. गोष्ठी,
4. सट्टक,
5. नाट्यरासक
6. प्रस्थानक,
7. उल्लास्य,
8. काव्य,
6. प्रखण,
10. रासक,
11. संलापक,
12. श्रीगदित,
13. शिल्पक,
14. विलासिका,
15. दुर्माल्लिका,
16. प्रकरणिका,
17. हल्लीश,
18. भणिका

इनमें से नाटिका, त्रोटक, सट्टक, रासक एवं भाणिका ही प्रमुख है। दशरूपकाकार धनंजय ने दशरूपकम में अन्य संकीर्ण या उपरूपक भेदों का निराकरण करने के लिए केवल नाटिका का लक्षण मात्र दे दिया है जो निम्न प्रकार ह-

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- काव्य के प्रयोजन पर प्रकाश डालिए।
  2. प्रश्न- भारतीय आचार्यों के मतानुसार काव्य के प्रयोजन का प्रतिपादन कीजिए।
  3. प्रश्न- हिन्दी आचायों के मतानुसार काव्य प्रयोजन किसे कहते हैं?
  4. प्रश्न- पाश्चात्य मत के अनुसार काव्य प्रयोजनों पर विचार कीजिए।
  5. प्रश्न- हिन्दी आचायों के काव्य-प्रयोजन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए?
  6. प्रश्न- आचार्य मम्मट के आधार पर काव्य प्रयोजनों का नाम लिखिए और किसी एक काव्य प्रयोजन की व्याख्या कीजिए।
  7. प्रश्न- भारतीय आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य लक्षणों का विश्लेषण कीजिए
  8. प्रश्न- हिन्दी के कवियों एवं आचार्यों द्वारा प्रस्तुत काव्य-लक्षणों में मौलिकता का अभाव है। इस मत के सन्दर्भ में हिन्दी काव्य लक्षणों का निरीक्षण कीजिए 1
  9. प्रश्न- पाश्चात्य विद्वानों द्वारा बताये गये काव्य-लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
  10. प्रश्न- आचार्य मम्मट द्वारा प्रदत्त काव्य-लक्षण की विवेचना कीजिए।
  11. प्रश्न- रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्' काव्य की यह परिभाषा किस आचार्य की है? इसके आधार पर काव्य के स्वरूप का विवेचन कीजिए।
  12. प्रश्न- महाकाव्य क्या है? इसके सर्वमान्य लक्षण लिखिए।
  13. प्रश्न- काव्य गुणों की चर्चा करते हुए माधुर्य गुण के लक्षण स्पष्ट कीजिए।
  14. प्रश्न- मम्मट के काव्य लक्षण को स्पष्ट करते हुए उठायी गयी आपत्तियों को लिखिए।
  15. प्रश्न- 'उदात्त' को परिभाषित कीजिए।
  16. प्रश्न- काव्य हेतु पर भारतीय विचारकों के मतों की समीक्षा कीजिए।
  17. प्रश्न- काव्य के प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए।
  18. प्रश्न- स्थायी भाव पर एक टिप्पणी लिखिए।
  19. प्रश्न- रस के स्वरूप का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  20. प्रश्न- काव्य हेतु के रूप में निर्दिष्ट 'अभ्यास' की व्याख्या कीजिए।
  21. प्रश्न- 'रस' का अर्थ स्पष्ट करते हुए उसके अवयवों (भेदों) का विवेचन कीजिए।
  22. प्रश्न- काव्य की आत्मा पर एक निबन्ध लिखिए।
  23. प्रश्न- भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्य ने अलंकारों को काव्य सौन्दर्य का भूल कारण मानकर उन्हें ही काव्य का सर्वस्व घोषित किया है। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने में आपकी क्या आपत्ति है? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  24. प्रश्न- काव्यशास्त्रीय सम्प्रदायों के महत्व को उल्लिखित करते हुए किसी एक सम्प्रदाय का सम्यक् विश्लेषण कीजिए?
  25. प्रश्न- अलंकार किसे कहते हैं?
  26. प्रश्न- अलंकार और अलंकार्य में क्या अन्तर है?
  27. प्रश्न- अलंकारों का वर्गीकरण कीजिए।
  28. प्रश्न- 'तदोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि कथन किस आचार्य का है? इस मुक्ति के आधार पर काव्य में अलंकार की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
  29. प्रश्न- 'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' कथन किस आचार्य का है? इसका सम्बन्ध किस काव्य-सम्प्रदाय से है?
  30. प्रश्न- हिन्दी में स्वीकृत दो पाश्चात्य अलंकारों का उदाहरण सहित परिचय दीजिए।
  31. प्रश्न- काव्यालंकार के रचनाकार कौन थे? इनकी अलंकार सिद्धान्त सम्बन्धी परिभाषा को व्याख्यायित कीजिए।
  32. प्रश्न- हिन्दी रीति काव्य परम्परा पर प्रकाश डालिए।
  33. प्रश्न- काव्य में रीति को सर्वाधिक महत्व देने वाले आचार्य कौन हैं? रीति के मुख्य भेद कौन से हैं?
  34. प्रश्न- रीति सिद्धान्त की अन्य भारतीय सम्प्रदायों से तुलना कीजिए।
  35. प्रश्न- रस सिद्धान्त के सूत्र की महाशंकुक द्वारा की गयी व्याख्या का विरोध किन तर्कों के आधार पर किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
  36. प्रश्न- ध्वनि सिद्धान्त की भाषा एवं स्वरूप पर संक्षेप में विवेचना कीजिए।
  37. प्रश्न- वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ ध्वनि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  38. प्रश्न- 'अभिधा' किसे कहते हैं?
  39. प्रश्न- 'लक्षणा' किसे कहते हैं?
  40. प्रश्न- काव्य में व्यञ्जना शक्ति पर टिप्पणी कीजिए।
  41. प्रश्न- संलक्ष्यक्रम ध्वनि को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
  42. प्रश्न- दी गई पंक्तियों में में प्रयुक्त ध्वनि का नाम लिखिए।
  43. प्रश्न- शब्द शक्ति क्या है? व्यंजना शक्ति का सोदाहरण परिचय दीजिए।
  44. प्रश्न- वक्रोकित एवं ध्वनि सिद्धान्त का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
  45. प्रश्न- कर रही लीलामय आनन्द, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त।
  46. प्रश्न- वक्रोक्ति सिद्धान्त व इसकी अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
  47. प्रश्न- वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजनावाद के आचार्यों का उल्लेख करते हुए उसके साम्य-वैषम्य का निरूपण कीजिए।
  48. प्रश्न- वर्ण विन्यास वक्रता किसे कहते हैं?
  49. प्रश्न- पद- पूर्वार्द्ध वक्रता किसे कहते हैं?
  50. प्रश्न- वाक्य वक्रता किसे कहते हैं?
  51. प्रश्न- प्रकरण अवस्था किसे कहते हैं?
  52. प्रश्न- प्रबन्ध वक्रता किसे कहते हैं?
  53. प्रश्न- आचार्य कुन्तक एवं क्रोचे के मतानुसार वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजना के बीच वैषम्य का निरूपण कीजिए।
  54. प्रश्न- वक्रोक्तिवाद और वक्रोक्ति अलंकार के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
  55. प्रश्न- औचित्य सिद्धान्त किसे कहते हैं? क्षेमेन्द्र के अनुसार औचित्य के प्रकारों का वर्गीकरण कीजिए।
  56. प्रश्न- रसौचित्य किसे कहते हैं? आनन्दवर्धन द्वारा निर्धारित विषयों का उल्लेख कीजिए।
  57. प्रश्न- गुणौचित्य तथा संघटनौचित्य किसे कहते हैं?
  58. प्रश्न- प्रबन्धौचित्य के लिये आनन्दवर्धन ने कौन-सा नियम निर्धारित किया है तथा रीति औचित्य का प्रयोग कब करना चाहिए?
  59. प्रश्न- औचित्य के प्रवर्तक का नाम और औचित्य के भेद बताइये।
  60. प्रश्न- संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य के प्रकार के निर्धारण का स्पष्टीकरण दीजिए।
  61. प्रश्न- काव्य के प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए।
  62. प्रश्न- काव्य गुणों की चर्चा करते हुए माधुर्य गुण के लक्षण स्पष्ट कीजिए।
  63. प्रश्न- काव्यगुणों का उल्लेख करते हुए ओज गुण और प्रसाद गुण को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए।
  64. प्रश्न- काव्य हेतु के सन्दर्भ में भामह के मत का प्रतिपादन कीजिए।
  65. प्रश्न- ओजगुण का परिचय दीजिए।
  66. प्रश्न- काव्य हेतु सन्दर्भ में अभ्यास के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  67. प्रश्न- काव्य गुणों का संक्षित रूप में विवेचन कीजिए।
  68. प्रश्न- शब्द शक्ति को स्पष्ट करते हुए अभिधा शक्ति पर प्रकाश डालिए।
  69. प्रश्न- लक्षणा शब्द शक्ति को समझाइये |
  70. प्रश्न- व्यंजना शब्द-शक्ति पर प्रकाश डालिए।
  71. प्रश्न- काव्य दोष का उल्लेख कीजिए।
  72. प्रश्न- नाट्यशास्त्र से क्या अभिप्राय है? भारतीय नाट्यशास्त्र का सामान्य परिचय दीजिए।
  73. प्रश्न- नाट्यशास्त्र में वृत्ति किसे कहते हैं? वृत्ति कितने प्रकार की होती है?
  74. प्रश्न- अभिनय किसे कहते हैं? अभिनय के प्रकार और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  75. प्रश्न- रूपक किसे कहते हैं? रूप के भेदों-उपभेंदों पर प्रकाश डालिए।
  76. प्रश्न- कथा किसे कहते हैं? नाटक/रूपक में कथा की क्या भूमिका है?
  77. प्रश्न- नायक किसे कहते हैं? रूपक/नाटक में नायक के भेदों का वर्णन कीजिए।
  78. प्रश्न- नायिका किसे कहते हैं? नायिका के भेदों पर प्रकाश डालिए।
  79. प्रश्न- हिन्दी रंगमंच के प्रकार शिल्प और रंग- सम्प्रेषण का परिचय देते हुए इनका संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
  80. प्रश्न- नाट्य वृत्ति और रस का सम्बन्ध बताइए।
  81. प्रश्न- वर्तमान में अभिनय का स्वरूप कैसा है?
  82. प्रश्न- कथावस्तु किसे कहते हैं?
  83. प्रश्न- रंगमंच के शिल्प का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
  84. प्रश्न- अरस्तू के 'अनुकरण सिद्धान्त' को प्रतिपादित कीजिए।
  85. प्रश्न- अरस्तू के काव्यं सिद्धान्त का विवेचन कीजिए।
  86. प्रश्न- त्रासदी सिद्धान्त पर प्रकाश डालिए।
  87. प्रश्न- चरित्र-चित्रण किसे कहते हैं? उसके आधारभूत सिद्धान्त बताइए।
  88. प्रश्न- सरल या जटिल कथानक किसे कहते हैं?
  89. प्रश्न- अरस्तू के अनुसार महाकाव्य की क्या विशेषताएँ हैं?
  90. प्रश्न- "विरेचन सिद्धान्त' से क्या तात्पर्य है? अरस्तु के 'विरेचन' सिद्धान्त और अभिनव गुप्त के 'अभिव्यंजना सिद्धान्त' के साम्य को स्पष्ट कीजिए।
  91. प्रश्न- कॉलरिज के काव्य-सिद्धान्त पर विचार व्यक्त कीजिए।
  92. प्रश्न- मुख्य कल्पना किसे कहते हैं?
  93. प्रश्न- मुख्य कल्पना और गौण कल्पना में क्या भेद है?
  94. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के काव्य-भाषा विषयक सिद्धान्त पर प्रकाश डालिये।
  95. प्रश्न- 'कविता सभी प्रकार के ज्ञानों में प्रथम और अन्तिम ज्ञान है। पाश्चात्य कवि वर्ड्सवर्थ के इस कथन की विवेचना कीजिए।
  96. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के कल्पना सम्बन्धी विचारों का संक्षेप में विवेचन कीजिए।
  97. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के अनुसार काव्य प्रयोजन क्या है?
  98. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के अनुसार कविता में छन्द का क्या योगदान है?
  99. प्रश्न- काव्यशास्त्र की आवश्यकता का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
  100. प्रश्न- रिचर्ड्स का मूल्य-सिद्धान्त क्या है? स्पष्ट रूप से विवेचन कीजिए।
  101. प्रश्न- रिचर्ड्स के संप्रेषण के सिद्धान्त पर प्रकाश डालिए।
  102. प्रश्न- रिचर्ड्स के अनुसार सम्प्रेषण का क्या अर्थ है?
  103. प्रश्न- रिचर्ड्स के अनुसार कविता के लिए लय और छन्द का क्या महत्व है?
  104. प्रश्न- 'संवेगों का संतुलन' के सम्बन्ध में आई. ए. रिचर्डस् के क्या विचारा हैं?
  105. प्रश्न- आई.ए. रिचर्ड्स की व्यावहारिक आलोचना की समीक्षा कीजिये।
  106. प्रश्न- टी. एस. इलियट के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। इसका हिन्दी साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है?
  107. प्रश्न- सौन्दर्य वस्तु में है या दृष्टि में है। पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र के अनुसार व्याख्या कीजिए।
  108. प्रश्न- हिन्दी आलोचना के उद्भव तथा विकासक्रम पर एक निबन्ध लिखिए।
  109. प्रश्न- स्वच्छंदतावाद से क्या तात्पर्य है? उसका उदय किन परिस्थितियों में हुआ?
  110. प्रश्न- साहित्य में मार्क्सवादी समीक्षा का क्या अभिप्राय है? विवेचना कीजिए।
  111. प्रश्न- आधुनिक साहित्य में मनोविश्लेषणवाद के योगदान की विवेचना कीजिए।
  112. प्रश्न- आलोचना की पारिभाषा एवं उसके स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  113. प्रश्न- हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना पर प्रकाश डालिए।
  114. प्रश्न- हिन्दी आलोचना पद्धतियों को बताइए। आलोचना के प्रकारों का भी वर्णन कीजिए।
  115. प्रश्न- स्वच्छंदतावाद के अर्थ और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  116. प्रश्न- मनोविश्लेषवाद की समीक्षा दीजिए।
  117. प्रश्न- मार्क्सवाद की दृष्टिकोण मानवतावादी है इस कथन के आलोक में मार्क्सवाद पर विचार कीजिए?
  118. प्रश्न- नयी समीक्षा पद्धति पर लेख लिखिए।
  119. प्रश्न- विखंडनवाद को समझाइये |
  120. प्रश्न- यथार्थवाद का अर्थ और परिभाषा देते हुए यथार्थवाद के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
  121. प्रश्न- कलावाद किसे कहते हैं? कलावाद के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए।
  122. प्रश्न- बिम्बवाद की अवधारणा, विचार और उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
  123. प्रश्न- प्रतीकवाद के अर्थ और परिभाषा का वर्णन कीजिए।
  124. प्रश्न- संरचनावाद में आलोचना की किस प्रविधि का विवेचन है?
  125. प्रश्न- विखंडनवादी आलोचना का आशय स्पष्ट कीजिए।
  126. प्रश्न- उत्तर-संरचनावाद के उद्भव और विकास को स्पष्ट कीजिए।
  127. प्रश्न- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की काव्य में लोकमंगल की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।
  128. प्रश्न- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि "आधुनिक साहित्य नयी मान्यताएँ" का उल्लेख कीजिए।
  129. प्रश्न- "मेरी साहित्यिक मान्यताएँ" विषय पर डॉ0 नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि पर विचार कीजिए।
  130. प्रश्न- डॉ0 रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि 'तुलसी साहित्य में सामन्त विरोधी मूल्य' का मूल्यांकन कीजिए।
  131. प्रश्न- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचनात्मक दृष्टि पर प्रकाश डालिए।
  132. प्रश्न- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की साहित्य की नई मान्यताएँ क्या हैं?
  133. प्रश्न- रामविलास शर्मा के अनुसार सामंती व्यवस्था में वर्ण और जाति बन्धन कैसे थे?

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